عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِنَّ اللهَ عَزَّ وَجَلَّ يَنْهَاكُمْ أَنْ تَحْلِفُوا بِآبَائِكُمْ»، قَالَ عُمَرُ: فَوَاللهِ مَا حَلَفْتُ بِهَا مُنْذُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَهَى عَنْهَا ذَاكِرًا وَلَا آثِرًا.
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह तुम्हें इस बात से रोकता है कि तुम अपने बाप-दादाओं की क़सम खाओ।" उमर रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : अल्लाह की क़सम, जिस दिन से मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह हदीस सुनी है, मैंने कभी बाप-दादाओं की क़सम नहीं खाई। न जान-बूझकर और न किसी की क़सम नक़ल करते हुए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्ल्ललाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि अल्लाह तआला ने बाप-दादाओं की क़सम खाने से मना किया है। अतः जिसे क़सम खानी हो, वह अल्लाह की क़सम खाए। किसी और की नहीं। उसके बाद उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु ने बताया कि जिस दिन से उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लाहु अलैहि व सल्लम को बाप-दादाओं की क़सम खाने से मना करते हुए सुना है, उन्होंने बाप-दादाओं की क़सम नहीं खाई है। न जान-बूझकर और न किसी दूसरे के द्वारा ग़ैरुल्लाह की खाई गई क़सम को नक़ल करते हुए।
फ़ायदे
- अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की क़मस खाना हराम है। आपने यहाँ बाप-दादाओं का उल्लेख इसलिए किया है कि अज्ञानता काल में बाप-दादाओं की क़सम खाना एक आम बात थी।
- अरबी शब्द "الحَلِف" का अर्थ है, किसी बात की पुष्टि के लिए अल्लाह, उसके नामों या गुणों की क़सम खाना।
- उमर रज़ियल्लाहु अनहु की यह फ़ज़ीलत कि वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेशों का अविलंब पालन करते थे, शरीयत के रहस्यों को खूब समझते थे और धर्मप्रायणता का अतुल्य थे।
हवाला
صحيح البخاري (8/ 132) (6647).
صحيح مسلم (3/ 1266) (1646).
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص684).
الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (2/ 134).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عائشة أم المؤمنين وعبد الله بن عباس رضي الله عنهما قالا: لَمَّا نَزَلَ بِرَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ طَفِقَ يَطْرَحُ خَمِيصَةً لَهُ عَلَى وَجْهِهِ، فَإِذَا اغْتَمَّ بِهَا كَشَفَهَا عَنْ وَجْهِهِ، فَقَالَ وَهُوَ كَذَلِكَ: «لَعْنَةُ اللَّهِ عَلَى اليَهُودِ وَالنَّصَارَى، اتَّخَذُوا قُبُورَ أَنْبِيَائِهِمْ مَسَاجِدَ» يُحَذِّرُ مَا صَنَعُوا.
आइशा और अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुम से रिवायत है, दोनों कहते हैं : जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु का समय आया, तो आप अपनी एक चादर अपने चेहरे पर डालने लगे और जब उससे मुँह ढक जाने की वजह से दम घुटने लगता, तो उसे अपने चेहरे से हटा देते। इसी (बेचैनी की) हालत में आपने फ़रमाया : "यहूदियों और ईसाइयों पर अल्लाह की लानत हो, उन्होंने अपने नबियों की क़ब्रों को मस्जिद बना लिया।" (वर्णनकर्ता कहते हैं कि) आप अपनी उम्मत को यहूदियों और ईसाइयों के अमल से सावधान कर रहे थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
आइशा और अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुम हमें बता रहे हैं कि जब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु का समय आया, तो आप अपने चेहरे पर कपड़े का एक टुकड़ा रखने लगे। फिर जब मृत्यु के समय होने वाले कष्ट के कारण साँस लेने में कठिनाई होने लगी, तो उसे अपने चेहरे से हटा दिया। इसी कठिन परिस्थिति में आपने फ़रमाया : अल्लाह की लानत हो यहूदियों एवं ईसाइयों पर। अल्लाह उनको अपनी रहमत से दूर रखे। ऐसा इसलिए कि उन्होंने अपने नबियों की क़ब्रों के ऊपर मस्जिदें बना डालीं। यहाँ यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह काम कितना ख़तरनाक है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस कठिन परिस्थिति में भी इसका ज़िक्र करना ज़रूरी समझा। आपने इस काम से मना इसलिए किया कि एक तो यह यहूदियों एवं ईसाइयों का काम है और दूसरा यह अल्लाह का साझी ठहराने का ज़रिया है।
फ़ायदे
- नबियों और अल्लाह के नेक बंदों की क़ब्रों को मस्जिद बनाकर उनके अंदर अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ना मना है, क्योंकि इससे शिर्क के द्वार खुलते हैं।
- एकेश्वरवाद पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का पूरा ध्यान और क़ब्रों के सम्मान से आपका भय, क्योंकि इससे शिर्क के द्वार खुलते हैं।
- यहूदियों, ईसाइयों तथा उनके पद्चिह्नों पर चलते हुए क़ब्रों पर भवन निर्माण करने और उनको मस्जिद बनाने वाले पर लानत करना जायज़ है।
- क़ब्रों के ऊपर भवन बनाना यहूदियों और ईसाइयों का तौर-तरीक़ा है और हदीस में इससे मना किया गया है।
- क़ब्रों को मस्जिद बनाने का एक रूप उनके पास तथा उनकी ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ना भी है, चाहे भवन न भी बनाया जाए।
हवाला
صحيح البخاري (1/ 95) (435)، (2/ 102) (1390).
صحيح مسلم (1/ 377) (531)، (1/ 376) (529).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، للشيخ صالح الفوزان (ص170).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد بن عبد العزيز السليمان القرعاوي (ص185).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «قَالَ اللهُ تَبَارَكَ وَتَعَالَى: أَنَا أَغْنَى الشُّرَكَاءِ عَنِ الشِّرْكِ، مَنْ عَمِلَ عَمَلًا أَشْرَكَ فِيهِ مَعِي غَيْرِي تَرَكْتُهُ وَشِرْكَهُ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया : मैं तमाम साझेदारों की तुलना में साझेदारी से अधिक बेनियाज़ हूँ। जिसने कोई कार्य किया और उसमें किसी को मेरा साझी ठहराया, मैं उसके साथ ही उसके साझी बनाने के इस कार्य से भी किनारा कर लेता हूँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा है : मैं तमाम साझेदारों की तुलना में साझेदारी से अधिक बेनियाज़ हूँ। चुनांचे अल्लाह हर चीज़ से बेनियाज़ है। इन्सान जब नेकी का कोई काम करता है और उसे अल्लाह के साथ-साथ ग़ैरुल्लाह के लिए भी करता है, तो अल्लाह उसके उस अमल को छोड़ देता है। उसे क़बूल नहीं करता। उसे उसके करने वाले के मुँह पर मार देता है। अतः नेकी के काम विशुद्ध रूप से अल्लाह के लिए करने चाहिएँ। क्योंकि अल्लाह उसी काम को ग्रहण करता है, जो विशुद्ध रूप से उसी के लिए किया जाए।
फ़ायदे
- इस हदीस में तमाम तरह के शिर्क से सावधान किया गया है और बताया गया है कि शिर्क इन्सान के किसी भी अमल को अल्लाह के निकट ग्रहण होने नहीं देता।
- अल्लाह की बेनियाज़ी और महानता का एहसास अमल के अंदर विशुद्धता लाने में मदद करता है।
हवाला
صحيح مسلم (4/ 2289) (2985).
شرح النووي على مسلم (18/ 115).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص287).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص325).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن جندب رضي الله عنه قال: سَمِعْتُ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَبْلَ أَنْ يَمُوتَ بِخَمْسٍ وَهُوَ يَقُولُ «إِنِّي أَبْرَأُ إِلَى اللهِ أَنْ يَكُونَ لِي مِنْكُمْ خَلِيلٌ فَإِنَّ اللهَ تَعَالَى قَدِ اتَّخَذَنِي خَلِيلًا كَمَا اتَّخَذَ إِبْرَاهِيمَ خَلِيلًا، وَلَوْ كُنْتُ مُتَّخِذًا مِنْ أُمَّتِي خَلِيلًا لَاتَّخَذْتُ أَبَا بَكْرٍ خَلِيلًا! أَلَا وَإِنَّ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمْ كَانُوا يَتَّخِذُونَ قُبُورَ أَنْبِيَائِهِمْ وَصَالِحِيهِمْ مَسَاجِدَ، أَلَا فَلَا تَتَّخِذُوا الْقُبُورَ مَسَاجِدَ! إِنِّي أَنْهَاكُمْ عَنْ ذَلِكَ».
जुंदुब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मृत्यु से पाँच दिन पहले कहते सुना है : "मैं अल्लाह के निकट इस बात से बरी होने का एलान करता हूँ कि तुममें से कोई मेरा 'ख़लील' (अनन्य मित्र) हो। क्योंकि अल्लाह ने जैसे इबराहीम को 'ख़लील' बनाया था, वैसे मुझे भी 'ख़लील' बना लिया है। हाँ, अगर मैं अपनी उम्मत के किसी व्यक्ति को 'ख़लील' बनाता, तो अबू बक्र को बनाता। सुन लो, तुमसे पहले के लोग अपने नबियों की कब्रों को मस्जिद बना लिया करते थे। सुन लो, तुम कब्रों को मस्जिद न बनाना। मैं तुम्हें इससे मना करता हूँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अल्लाह के यहाँ अपना स्थान स्पष्ट किया है। आपने बताया है कि अल्लाह के निकट आप प्रेम के उच्चतम स्थान पर विराजमान हैं, जो स्थान केवल इबराहीम अलैहिस्सलाम को प्राप्त था। इसी कारण, स्पष्ट कर दिया कि अल्लाह के सिवा आपका कोई 'खलील' (अनन्य मित्र) नहीं है, क्योंकि आपके दिल का गागर उसके प्रेम, सम्मान और उसके ज्ञान से परिपूर्ण है। अतः उसमें अब कोई खाली स्थान नहीं है। हाँ, यदि मख़लूक में से कोई आपका खलील होता, तो अबू बक्र रज़ियल्लाहु अनहु होते। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मोहब्बत के बारे में जायज़ सीमा से आगे बढ़ने से मना किया है, जिससे आगे बढ़ने का काम यहूदियों एवं ईसाइयों ने अपने नबियों की क़ब्रों तथा अपने में से नेक लोगों की क़ब्रों के सिलसिले में किया था। उन्होंने तो उन क़ब्रों को पूज्य बनाकर अल्लाह के साथ उनकी पूजा शुरू कर दी थी और उनके ऊपर मस्जिदें तथा इबादतखाने बना डाले थे। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी उम्मत को उनके जैसा काम करने से मना किया है।
फ़ायदे
- अबू बक्र रज़ियल्लाहु अनहु की फ़ज़ीलत, उनका सबसे उत्तम सहाबी तथा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु के बाद आपकी ख़िलाफ़त का सबसे अधिक हक़दार होना।
- क़ब्रों पर मस्जिद बनाना पिछले समुदायों द्वारा किए गए ग़लत कामों में से एक है।
- क़ब्रों को इबादत की जगह बनाने की मनाही कि उनके पास या उनकी ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ी जाए तथा उनके ऊपर मस्जिद या गुंबद बनाए जाएँ, क्योंकि इसके नतीजे में शिर्क के द्वार खुलने की आशंका रहती है।
- नेक लोगों के बारे में अतिशयोक्ति करने से मना किया गया है, क्योंकि इससे शिर्क के द्वार खुलते हैं।
- यहाँ अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिस चीज़ से मना किया है, उसकी ख़तरनाकी इससे समझ में आती है कि मृत्यु से पाँच दिन पहले उससे सावधान किया है।
हवाला
صحيح مسلم (1/ 377) (532).
شرح النووي على مسلم (5/ 13).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص188).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص172).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ حُذَيْفَةَ رضي الله عنه أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «لَا تَقُولُوا: مَا شَاءَ اللهُ وَشَاءَ فُلَانٌ، وَلَكِنْ قُولُوا: مَا شَاءَ اللهُ ثُمَّ شَاءَ فُلَانٌ».
हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : 'जो अल्लाह चाहे एवं अमुक चाहे' ना कहो, बल्कि 'जो अल्लाह चाहे फिर अमुक चाहे' कहो।
इसे अबू दावूद ने तथा नसई ने अल-कुबरा में एवं अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जासभी सनदों के आधार पर स़़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस बात से मना किया है कि कोई बात-चीत करते समय "जो अल्लाह चाहे और अमुक चाहे" कहे। या इसी तरह कोई "जो अल्लाह और अमुक चाहे" कहे। क्योंकि अल्लाह की चाहत और उसकी इच्छा मुतलक़ (निरपेक्ष) है और इसमें उसका कोई शरीक नहीं है। जबकि यहाँ "और" शब्द का प्रयोग यह बताता है कि कोई अल्लाह के साथ शरीक है और दोनों बराबर हैं। इसलिए इन्सान को "जो अल्लाह चाहे, फिर जो अमुक चाहे" कहना चाहिए। इस तरह "फिर" शब्द द्वारा बंदे की चाहत अल्लाह की चाहत के अधीन हो जाएगी। जबकि "और" शब्द में यह बात नहीं है।
फ़ायदे
- "जो अल्लाह चाहे और अमुक चाहे" तथा इस तरह के वाक्यों का प्रयोग हराम है, जिसमें दो वाक्यांशों को जोड़ने के लिए "और" शब्द का प्रयोग हुआ हो। क्योंकि यह शब्दों और वाक्यों में बहुदेववाद (शिर्क) का एक रूप है।
- "जो अल्लाह चाहे, फिर तुम चाहो" तथा इस तरह के अन्य वाक्यों का प्रयोग जायज़ है, जिसमें दो वाक्यांशों को जोड़ने के लिए "फिर" शब्द का प्रयोग हुआ हो। क्योंकि इसमें कोई ख़राबी नहीं है।
- अल्लाह की चाहत का सबूत तथा बंदे की चाहत का सबूत। साथ ही यह कि बंदे की चाहत अल्लाह की चाहत के अधीन है।
- अल्लाह की चाहत में बंदे को साझी बनाने की मनाही, चाहे शाब्दिक रूप से ही क्यों न हो।
- अगर इस तरह का वाक्य कहने वाले ने इस बात का विश्वास रखा कि बंदे की चाहत सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की चाहत की तरह असीम एवं विस्तृत है, या फिर बंदे के पास अल्लाह की चाहत से हटकर अपनी अलग चाहत होती है, तो यह महा शिर्क है। लेकिन अगर इस तरह का विश्वास न रखा तो छोटा शिर्क है।
हवाला
السنن الكبرى للنسائي (9/ 361) (10755).
سنن أبي داود (7/ 334) (4980).
مسند أحمد (38/ 299) (23265)، (38/ 364) (23339).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص368).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص329).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عبد الله بن مسعود رضي الله عنه قال: "لأن أحلف بالله كاذبًا أحب إليَّ من أن أحلف بغيره صادقًا".
अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैंः "मेरे निकट अल्लाह की झूठी कसम खाना किसी और की सच्ची कसम खाने से अधिक प्रिय है।"
इसे इब्ने अबी शैबा ने रिवायत किया है। - इसे अब्दुर रज़्ज़ाक़ ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि यदि मान लिया जाए कि मैं किसी बात पर अल्लाह की झूठी क़सम खा लेता हूँ, तो यह मेरे निकट इससे अधिक प्रिय है कि मैं किसी बात पर अल्लाह के सिवा किसी और की सच्ची क़सम खाऊँ। उन्होंने अल्लाह की झूठी कसम को किसी अन्य की सच्ची क़सम से बेहतर इसलिए समझा कि अल्लाह की क़सम में तौहीद की नेकी है और झूठ का गुनाह है। जबकि किसी और की सच्ची कसम में सच्चाई की नेकी है और शिर्क का गुनाह। ज़ाहिर सी बात है कि तौहीद की नेकी सच्चाई की नेकी से बड़ी है और झूठ का गुनाह शिर्क के गुनाह से कमतर है।
हवाला
كتاب التوحيد للإمام محمد بن عبد الوهاب ص252 ت: د. دغش العجمي . مكتبة أهل الأثر , الطبعة الخامسة , 1435ه
الجديد في شرح كتاب التوحيد لمحمد بن عبد العزيز السليمان القرعاوي, ت: محمد بن أحمد سيد , مكتبة السوادي، الطبعة: الخامسة، 1424ه
الملخص في شرح كتاب التوحيد للشيخ صالح الفوزان , دار العاصمة , الطبعة الأولى 1422ه
المصنف لابن أبي شيبة, ت: كمال يوسف الحوت, مكتبة الرشد, الطبعة: الأولى، 1409
إرواء الغليل للألباني , المكتب الإسلامي , ط2, 1405ه
यह हदीस HadeethEnc.com परعَن عُمَرَ بنِ الخَطَّابِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قال: سَمِعْتُ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «لَا تُطْرُونِي كَمَا أَطْرَتِ النَّصَارَى ابْنَ مَرْيَمَ؛ فَإِنَّمَا أَنَا عَبْدُهُ، فَقُولُوا: عَبْدُ اللهِ وَرَسُولُهُ».
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "तुम लोग मेरे प्रति प्रशंसा और तारीफ़ में उस प्रकार अतिशयोक्ति न करो, जिस प्रकार ईसाइयों ने मरयम के पुत्र के बारे किया। मैं केवल अल्लाह का बंदा हूँ। अतः मुझे अल्लाह का बंदा और उसका रसूल कहो।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी प्रशंसा में शरई सीमा से आगे बढ़ने, आपको अल्लाह की विशेषताओं से विशेषित करने, आपके बारे में ग़ैब की बात जानने का दावा करने और आपको अल्लाह के साथ पुकारने से मना किया है, जैसा कि ईसाइयों ने ईसा बिन मरयम के साथ किया। फिर बताया कि आप अल्लाह के बंदों में से एक बंदे हैं। इसलिए आदेश दिया कि हम आपको अल्लाह का बंदा और उका रसूल कहें।
फ़ायदे
- इसमें प्रशंसा करते समय शरई सीमा से आगे बढ़ने से मना किया गया है। क्योंकि इससे शिर्क के द्वार खुलते हैं।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिन बातों से सावधान किया था, आज वह बातें इस उम्मत के अंदर दिखाई पड़ती हैं। कुछ लोगों ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में अतिशयोक्ति की, कुछ लोगों ने आपके परिवार के बारे में अतिशयोक्ति की और कुछ लोगों ने अल्लाह के वलियों के बारे में अतिशयोक्ति की और इस तरह गुमराही के मार्ग पर चल पड़े।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खुद को अल्लाह का बंदा बताया है, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि आप अल्लाह के बंदे हैं और आपकी सारी ज़रूरतें अल्लाह ही पूरी करता है और आपको अल्लाह की किसी भी विशेषता से विशेषित करना जायज़ नहीं है।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खुद को अल्लाह का रसूल बताया है, ताकि स्पष्ट हो जाए कि आपको अल्लाह की ओर से भेजा गया है और आपकी पुष्टि तथा अनुसरण करना ज़रूरी है।
हवाला
صحيح البخاري (4/ 167) (3445).
عمدة القاري شرح صحيح البخاري، محمود بن أحمد بدر الدين العيني (16/ 37).
فتح الباري، لابن حجر (6/ 490).
منار القاري شرح مختصر صحيح البخاري، حمزة محمد قاسم (4/ 208).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه أَنَّهُ قَالَ: قِيلَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَنْ أَسْعَدُ النَّاسِ بِشَفَاعَتِكَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ؟ قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «لَقَدْ ظَنَنْتُ يَا أَبَا هُرَيْرَةَ أَنْ لَا يَسْأَلَنِي عَنْ هَذَا الْحَدِيثِ أَحَدٌ أَوَّلُ مِنْكَ؛ لِمَا رَأَيْتُ مِنْ حِرْصِكَ عَلَى الْحَدِيثِ، أَسْعَدُ النَّاسِ بِشَفَاعَتِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ، مَنْ قَالَ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ خَالِصًا مِنْ قَلْبِهِ أَوْ نَفْسِهِ»».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : कहा गया कि ऐ अल्लाह के रसूल! क़यामत के दिन आपकी सिफ़ारिश से कौन ज़्यादा हिस्सा पायेगा, तो आपने फ़रमाया : "अबू हुरैरा! मेरा ख़्याल था कि तुमसे पहले कोई मुझसे यह बात नहीं पूछेगा, क्योंकि मैं देखता हूँ कि तुम्हें हदीस से बहुत लगाव है। क़यामत के दिन मेरी सिफ़ारिश प्राप्त करने की सबसे बड़ी ख़ुश नसीबी उस व्यक्ति को हासिल होगी, जिसने अपने दिल या साफ़ नीयत से “ला इलाहा इल्लल्लाह” कहा हो।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि क़यामत के दिन आपकी सिफ़ारिश प्राप्त करने की सबसे बड़ी ख़ुश नसीबी उस व्यक्ति को हासिल होगी, जिसने अपने दिल या साफ़ नीयत से “ला इलाहा इल्लल्लाह” कहा हो।" यानी इस बात का इक़रार किया हो कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और शिर्क तथा रियाकारी जैसी चीज़ों से पाक-साफ़ रहा हो।
फ़ायदे
- इस बात का सबूत कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आख़िरत में सिफ़ारिश करेंगे और आपकी सिफ़ारिश केवल एकेश्वरवादी लोगों को प्राप्त होगी।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सिफ़ारिश का मतलब है, आपका जहन्नम का हक़दार बन चुके एकेश्वरवादियों के बारे में यह सिफ़ारिश करना कि उनको अल्लाह जहन्नम में न डाले तथा जहन्नम में जा चुके लोगों के बारे में यह सिफ़ारिश करना कि उनको जहन्नम से निकाल दे।
- विशुद्ध रूप से अल्लाह के लिए कलिमा-ए-तौहीद का इक़रार करने की फ़ज़ीलत और उसका महत्वपूर्ण प्रभाव।
- कलिमा-ए-तौहीद को संपूर्णरूप मानने का मतलब है, उसके मायने को जानना और उसके तक़ाज़ों (मांग) पर अमल करना।
- अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु की फ़ज़ीलत तथा उनका ज्ञान अर्जित करने का शौक़।
हवाला
صحيح البخاري (1/ 31) (99).
منار القاري شرح مختصر صحيح البخاري، لحمزة محمد قاسم (1/ 197).
القول المفيد على كتاب التوحيد، لابن عثيمين (1/ 343).
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com