अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि अल्लाह बंदों की तीन आदतों को पसंद करता है और तीन आदतों को नापसंद। जिन तीन आदतों को पसंद करता है, वह इस प्रकार हैं : बंदे केवल उसी की इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ, सब मिलकर अल्लाह के वचन, क़ुरान एवं सुन्नत को मज़बूती से पकड़े रहें तथा मुसलमानों की जमात से अलग न हों। और जिन तीन आदतों को नापसंद करता है, वह हैं, ऐसी बातें करना जिनका कोई फ़ायदा न हो, जो बातें सामने न आई हों उनके बारे में पूछना या लोगों से उनका धन, उनके पास मौजूद चीज़ें और ऐसी वस्तुएँ माँगना जिन्हें माँगना आवश्यक न हो और माल बर्बाद करना और ग़ैर-शरई कार्यों में खर्च करना और माल को बर्बादी के हवाले करना।
- अल्लाह इबादत में निष्ठा को पसंद करता है और अविश्वास से नफ़रत करता है।
- अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहने की प्रेरणा कि इससे एकता एवं आपसी प्रेम पैदा होता है।
- जमात के साथ रहने की प्रेरणा तथा जमात से जुड़े रहने एवं उसे एकजुट रखने का आदेश, जबकि इसकी विपरीत दिशा में चलते हुए बिखराव के शिकार होने और आपसी कलह में फँसने की मनाही।
- ऐसी चीज़ों के बारे में बहुत ज़्यादा बात करने की मनाही, जिनसे इन्सान का कोई सरोकार न हो। क्योंकि बात अगर जायज़ चीज़ों के बारे में हो रही है, तो बिना मतलब समय बर्बाद हो रहा है और अगर हराम चीज़ों के बारे में हो रही है, तो गुनाह का पहाड़ खड़ा हो रहा है।
- लोगों के टोह में रहने तथा उनकी बातों एवं कार्यों की नक़ल उतारने की मनाही।
- लोगों से उनका धन बहुत ज़्यादा माँगने की मनाही।
- धन नष्ट करना हराम है। इस हदीस में धन को लाभकारी कार्यों में खर्च करने की प्रेरणा दी गई है।
صحيح مسلم (3/ 1340) (1715). البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (30/ 85). إكمال المعلم بفوائد مسلم (5/ 568).