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तशरीह के साथ हदीसें

सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह पर ईमान

138 हदीसें

जो अल्लाह पर तथा क़यामत के दिन पर ईमान रखता हो, वह अतिथि का सम्मान करने के मामले में उसका हक़ अदा करे। सहाबा ने कहाः उसका हक़ क्या है, ऐ अल्लाह के रसूल? तो फ़रमायाः एक दिन और एक रात तथा अतिथि सत्कार तीन दिन है। जो इससे अधिक हो वह अतिथि के ऊपर सदक़ा है।

عن أبي شُريح خُويلد بن عمرو الخزاعي عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: «مَنْ كَان يُؤمِن بِاللهِ وَاليَومِ الآخِرِ فَلْيُكْرِم ضَيفَه جَائِزَتَه»، قَالوا: وما جَائِزَتُهُ؟ يَا رسول الله، قال: «يَومُهُ ولَيلَتُهُ، والضِّيَافَةُ ثَلاَثَةُ أَيَّامٍ، فَمَا كَانَ وَرَاءَ ذَلك فَهُوَ صَدَقَةٌ عَلَيه». وفي رواية: «لا يَحِلُّ لِمُسْلِمٍ أَنْ يُقِيمَ عِنْدَ أَخِيهِ حَتَّى يؤْثِمَهُ» قالوا: يَا رَسول الله، وَكَيفَ يُؤْثِمَهُ؟ قال: «يُقِيمُ عِندَهُ ولاَ شَيءَ لَهُ يُقرِيهِ بهِ».
अबू शुरैह खुवैलिद बिन अम्र खुज़ाई कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायः "जो अल्लाह पर तथा क़यामत के दिन पर ईमान रखता हो, वह अतिथि का सम्मान करने के मामले में उसका हक़ अदा करे। सहाबा ने कहाः उसका हक़ क्या है, ऐ अल्लाह के रसूल? तो फ़रमायाः एक दिन और एक रात तथा अतिथि सत्कार तीन दिन है। जो इससे अधिक हो वह अतिथि के ऊपर सदक़ा है।" तथा एक रिवायत में हैः "किसी मुसलमान के लिए जायज़ नहीं कि अपने भाई के पास इतने दिन रहे कि उसे पापी बना दे। सहाबा ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, वह उसे पापी कैसे बना सकता है? तो आपने फ़रमायाः "वह उसके पास ठहरा रहे, जबकि उसके पास उसके सत्कार के लिए कुछ न हो।"
इसे दोनों रिवायतों के साथ बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415هـ. تطريز رياض الصالحين، للشيخ فيصل المبارك، ط1، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة، الرياض، 1423 هـ. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لمحمد علي بن محمد بن علان، ط4، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة، بيروت، 1425هـ. رياض الصالحين، للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428هـ. رياض الصالحين، ط4، تحقيق: عصام هادي، وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية القطرية، دار الريان، بيروت، 1428هـ. فتح رب البرية بتلخيص الحموية، لمحمد بن صالح بن محمد العثيمين، دار الوطن للنشر، الرياض. كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، ط1، كنوز إشبيليا، الرياض، 1430هـ. شرح رياض الصالحين، للشيخ ابن عثيمين، دار الوطن للنشر، الرياض، 1426هـ. صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة، (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.

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अत्यंत कृपाशील अल्लाह की हथेली में सातों आसमान और सातों ज़मीन ऐसी हैं, जैसे तुममें से किसी के हाथ में राई का एक दाना हो।

عن عبد الله بن عباس رضي الله عنهما قال: "ما السماوات السبع والأرضون السبع في كَفِّ الرحمن إلا كَخَرْدَلَةٍ في يد أحدكم".
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैंः "अत्यंत कृपाशील अल्लाह की हथेली में सातों आसमान और सातों ज़मीनें ऐसी हैं, जैसे तुममें से किसी के हाथ में राई का एक दाना हो।"
इसे इब्ने जरीर ने रिवायत किया है । - इसे ज़हबी ने 'अल्-उलू' में रिवायत किया है। - इसे अब्दुल्लाह बिन इमाम अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जाअलबानी ने इब्ने तैमीया से नक़ल किया है कि ये ह़दीस सह़ीह़ है और उनके फ़ैसले पर अपनी राय नहीं दी है।
तशरीह

यहाँ अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- बता रहे हैं कि यह विशाल सात आकाश तथा भारी-भरकम सात धरतियाँ रहमान की हथेली की तुलना में ऐसी हैं, जैसे हममें से किसी की हथेली में राई का छोटा-सा दाना हो। यहाँ अल्लाह की हथेली को इनसान की हथेली के समान क़रार नहीं दिया गया है, बल्कि दोनों उदाहरणों में जो व्यापक अंतर है, उसे समझाया गया है, क्योंकि जैसे अल्लाह की हस्ती के समान कोई वस्तु नहीं है, उसी तरह उसकी विशेषताओं के समान भी किसी की विशेषताएँ नहीं हैं।

हवाला

1- فتح المجيد شرح كتاب التوحيد، مطبعة السنة المحمدية، القاهرة، مصر، الطبعة: السابعة، 1377هـ - 1957م. 2- القول المفيد على كتاب التوحيد، دار ابن الجوزي، المملكة العربية السعودية، الطبعة: الثانية, محرم، 1424ه. 3- الملخص في شرح كتاب التوحيد، دار العاصمة الرياض، الطبعة: الأولى 1422هـ - 2001م. 4- الجديد في شرح كتاب التوحيد، مكتبة السوادي، جدة، المملكة العربية السعودية، الطبعة: الخامسة، 1424هـ - 2003م. 5- التمهيد لشرح كتاب التوحيد، دار التوحيد، تاريخ النشر: 1424هـ. 6- جامع البيان في تأويل القرآن، المؤلف: محمد بن جرير أبو جعفر الطبري، المحقق: أحمد محمد شاكر، الناشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1420هـ - 2000م.

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, ऐसे व्यक्ति को अल्लाह जन्नत में दाख़िल करेगा, चाहे उसका अमल जैसा भी रहा हो।

عَنْ عُبَادَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «مَنْ شَهِدَ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، وَأَنَّ عِيسَى عَبْدُ اللهِ وَرَسُولُهُ وَكَلِمَتُهُ أَلْقَاهَا إِلَى مَرْيَمَ وَرُوحٌ مِنْهُ، وَالْجَنَّةُ حَقٌّ، وَالنَّارُ حَقٌّ، أَدْخَلَهُ اللهُ الْجَنَّةَ عَلَى مَا كَانَ مِنَ الْعَمَلِ».
उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने इस बात की गवाही दी कि केवल अल्लाह ही सत्य पूज्य है, उसका कोई साझी नहीं है, एवं मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं, और ईसा भी अल्लाह के बंदे, उसके रसूल तथा उसका शब्द हैं, जिसे उसने मरयम की ओर डाला था और उसकी ओर से भेजी हुई आत्मा हैं, तथा जन्नत और जहन्नम सत्य हैं, ऐसे व्यक्ति को अल्लाह जन्नत में दाख़िल करेगा, चाहे उसका अमल जैसा भी रहा हो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने कलिमा-ए-तौहीद के अर्थ को जानते हुए और उसके तक़ाज़ों (मांगों) पर अमल करते हुए उसका उच्चारण अपनी ज़बान से किया, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में अल्लाह के बंदा और उसके रसूल होने की गवाही दी, ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में अल्लाह के बंदा तथा रसूल होने को स्वीकार किया, और इस बात को भी स्वीकार किया कि अल्लाह ने उनको "كن" शब्द से पैदा किया है और वह अल्लाह की ओर से भेजी गई और उसकी पैदा की हुई एक आत्मा हैं, उनकी माता को यहूदियों द्वारा लगाए गए आरोपों से बरी माना, और इस बात पर विश्वास रखा कि जन्नत तथा जहन्नम दोनों सत्य हैं, दोनों के अस्तित्व पर विश्वास रखा और उनको अल्लाह की नेमतों तथा यातनाओं का स्थान माना और इसी अवस्था में मृत्यु को प्राप्त हुआ, तो उसका ठिकाना जन्नत होगा, यद्यपि उससे अल्लाह की इबादत में कुछ त्रुटियाँ हुई हों और उसके कुछ गुनाह भी रहे हों।

फ़ायदे
  1. अल्लाह ने मरयम के पुत्र ईसा को बिना पिता के "كُنْ" शब्द से पैदा किया।
  2. ईसा अलैहिस्सलाम तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दोनों अल्लाह के बंदे तथा रसूल थे। अतः दोनों रसूल थे, इस लिए इन्हें झुटलाया नहीं जा सकता, और यह दोनों अल्लाह के बंदे थे, इसलिए उनकी इबादत नहीं की जासकती।
  3. तौहीद (एकेश्वरवाद) की फ़ज़ीलत तथा उसका गुनाहों को मिटना देना। साथ ही यह कि एकेश्वरवादी का ठिकाना जन्नत है, चाहे उससे कुछ गुनाह क्यों न हो गए हों।
हवाला

صحيح البخاري (4/ 165) (3435). صحيح مسلم (1/ 57) (28). الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص25). الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص36).

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अल्लाह ने मेरे लिए, मेरी उम्मत के गलती से तथा भूलवश किए हुए और ज़बरदस्ती कराए गए कार्यों को क्षमा कर दिया है।

عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «إنَّ اللَّهَ تَجَاوَزَ لِي عَنْ أُمَّتِي الخَطَأَ وَالنِّسْيَانَ وَمَا اسْتُكْرِهُوا عَلَيْهِ».
अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "अल्लाह ने मेरे लिए, मेरी उम्मत के गलती से तथा भूलवश किए हुए और ज़बरदस्ती कराए गए कार्यों को क्षमा कर दिया है।"
इसे इब्न-ए-माजह और बैहक़ी आदि ने रिवायत किया हैदर्जाअल्लामा नववी रह़िमहुल्लाह कहते हैं : ह़दीस़ ह़सन है।
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि अल्लाह ने आपकी उम्मत से निम्नलिखित तीन परिस्थितियों में होने वाले गुनाहों को माफ़ कर दिया है : 1- ग़लती से होने वाले गुनाह : यानी ऐसे गुनाह जो जान-बूझकर न किए गए हों। मसलन कोई मुसलमान इरादा तो किसी काम का करे, लेकिन उससे हो कुछ और जाए। 2- भूलवश होने वाले गुनाह : यानी किसी मुसलमान को कोई बात याद तो हो, लेकिन जब करने का समय आए, तो भूल जाए। ऐसा होने पर उसे कोई गुनाह नहीं होगा। 3- ज़ोर-ज़बरदस्ती से कराए गए गुनाह : कभी-कभी ऐसा होता है कि इन्सान कोई ऐसा काम करने पर मजबूर कर दिया जाता है, जिसे वह करना नहीं चाहता और उसके पास परिस्थिति का मुक़ाबला करने की शक्ति भी नहीं होती। इस तरह की परिस्थिति में उसे कोई गुनाह नहीं होगा। यहाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि यह हदीस उन गुनाहों से जुड़ी है जो बंदे और उसके रब से जुड़े हैं। जहाँ तक भूल जाने के कारण किसी आदेशित कार्य को छोड़ देने की बात है, तो इससे उस कार्य की अनिवार्यता समाप्त नहीं हो जाती। इसी प्रकार अगर किसी के भूलवश कोई काम कर देने से किसी सृष्टि का कुछ नुक़सान हो जाए, तो उसकी भरपाई की अनिवार्यता ख़त्म नहीं हो जाती। मसलन कोई ग़लती से किसी इन्सान का क़त्ल कर दे, तो दियत देनी होगी। इसी तरह किसी की गाड़ी का नुक़सान कर दे, तो हर्जाना देना होगा।

फ़ायदे
  1. यह अल्लाह की अपने बन्दों पर असीम कृपा और दया है कि उसने उपरोक्त तीनों परिस्थितियों में किए गए गुनाहों को क्षमा कर दिया है।
  2. अंतिम नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और आपकी उम्मत पर अल्लाह का अनुग्रह।
  3. गुनाह न होने का मतलब यह नहीं कि हुक्म लागू नहीं होगा और कोई मुआवज़ा नहीं देना पड़ेगा। मिसाल के तौर पर, अगर कोई वज़ू करना भूल जाए और यह सोचकर नमाज़ पढ़े कि उसने वज़ू कर लिया है, तो उसे कोई गुनाह नहीं होगा, लेकिन उसे वज़ू करके दोबारा नमाज़ पढ़नी होगी।
  4. ज़ोर-ज़बरदस्ती की अवस्था में गुनाह न होने के लिए उसकी शर्तों का पाया जाना ज़रूरी है। मसलन यह कि ज़बरदस्ती करने वाला वह काम करने की शक्ति भी रखता हो, जिसकी वह धमकी दे रहा है।
हवाला

الأربعون النووية (ص127) (ح39). سنن ابن ماجه (3/ 200) (2045). السنن الكبرى للبيهقي (7/ 584) (15094). التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثًا النووية، لإسماعيل الأنصاري (ص89). شرح الأربعين النووية، لابن عثيمين (ص382).

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इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है

عَنْ عَبْدِ اللهِ بنِ عُمَر رضي الله عنهما قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: «بُنِيَ الْإِسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، وَإِقَامِ الصَّلَاةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَحَجِّ الْبَيْتِ، وَصَوْمِ رَمَضَانَ».
अब्दुल्लाह बिन अमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज करना और रमज़ान मास के रोज़े रखना।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस्लाम को पाँच स्तंभों पर खड़े एक भवन के समान दर्शाया है। याद रहे कि इस्लाम के शेष काम इस भवन के पूरक की भूमिका रखते हैं। इन पाँच स्तंभों में से पहला स्तंभ इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। यह दोनों गवाहियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और एक ही स्तंभ की हैसियत रखती हैं। बंदा इनका उच्चारण अल्लाह के एक होने और बस उसी के इबादत का हक़दार होने को स्वीकार करते हुए, उनके तक़ाजों (मांगों) पर अमल करते हुए, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने का विश्वास रखते हुए और आपका अनुसरण करते हुए करेगा। दूसरा स्तंभ नमाज़ स्थापित करना है। दिन और रात में पाँच फ़र्ज़ नमाज़ें हैं। फ़ज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब तथा इशा। इन पाँच नमाज़ों को इनकी शर्तों, स्तंभों और अनिवार्य कार्यों के साथ अदा किया जाएगा। तीसरा स्तंभ फ़र्ज़ ज़कात निकालना है। ज़कात एक आर्थिक इबादत है, जो शरीयत द्वारा धन की एक निर्धारित मात्रा पर वाजिब होती है और जिसे उसके हक़दारों को दिया जाता है। चौथा स्तंभ हज है। हज कुछ निश्चित कार्यो को अल्लाह की इबादत के तौर पर करने के लिए मक्का जाने का इरादा करने का नाम है। पाँचवाँ स्तंभ रमज़ान के रोज़े रखना है। रोज़ा नाम है खाने, पीने और इस तरह की अन्य रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से फ़ज्र प्रकट होने से लेकर सूरज डूबने तक अल्लाह की इबादत की नीयत से रुके रहने का।

फ़ायदे
  1. दोनों गवाहियाँ एक-दूसरे के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई हैं। इनमें से एक को छोड़ दिया जाए, तो दूसरी सही नहीं होगी। इसी लिए दोनों को एक स्तंभ बनाया गया है।
  2. यह दोनों गवाहियाँ दीन की बुनियाद हैं। इनके बिना कोई कथन अथवा कार्य ग्रहण योग्य नहीं है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 11) (8)، صحيح مسلم (1/ 45) (16)، و(1/ 88) (82)، فتح الباري لابن رجب (1/ 22)، جامع العلوم والحكم (1/147)، شرح الأربعين لابن العطّار (ص 62)، شرح الأربعين النووية لعبد الكريم الخضير (ص 87)، فتح القوي المتين في شرح الأربعين للعباد (ص 29)، شرح الأربعين النووية لصالح آل الشيخ (ص 91 - 95)، التحفة الربانية لإسماعيل الأنصاري (ص 12).

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जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी बनाता रहा, वह जहन्नम में जाएगा।

عَنْ جَابِرٍ رضي الله عنه قَالَ: أَتَى النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ رَجُلٌ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، مَا الْمُوجِبَتَانِ؟ فَقَالَ: «مَنْ مَاتَ لَا يُشْرِكُ بِاللهِ شَيْئًا دَخَلَ الْجَنَّةَ، وَمَنْ مَاتَ يُشْرِكُ بِاللهِ شَيْئًا دَخَلَ النَّارَ»
जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! दो वाजिब करने वाली चीज़ें क्या हैं? आपने उत्तर दिया : "जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी बनाता रहा, वह जहन्नम में जाएगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

एक व्यक्ति ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दो ऐसी बातों के बारे में पूछा, जो जन्नत में प्रवेश या जहन्नम में प्रवेश को अनिवार्य करती हैं। आपने उत्तर दिया कि जन्नत अनिवार्य करने वाली बात यह है कि इन्सान इस हालत में मरे कि केवल एक अल्लाह की इबादत करता हो और किसी को उसका साझी न बनाता हो। जबकि जहन्नम में प्रवेश को अनिवार्य करने वाली बात यह है कि इन्सान इस हालत में मरे कि किसी को पूज्य बनाकर, पालनहार समझकर या उसे अल्लाह के नाम तथा विशेषताएँ प्रदान करके उसका साझी बनाता हो।

फ़ायदे
  1. तौहीद (एकेश्वरवाद) की फ़ज़ीलत और इस बात का स्पष्ट उल्लेख कि जो व्यक्ति ईमान की हालत में इस तरह मरेगा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाएगा, वह जन्नत में प्रवेश केरगा।
  2. शिर्क की भयावहता तथा इस बात का स्पष्ट उल्लेख कि जो व्यक्ति किसी को अल्लाह का साझी बनाते हुए मरेगा, वह जहन्नम में जाएगा।
  3. अवज्ञाकारी एकेश्वरवादी लोग अल्लाह की इच्छा के अधीन होंगे। अल्लाह अगर चाहेगा, तो उनको अज़ाब देगा और अगर चाहेगा, तो उनको माफ़ कर देगा और फिर उनका ठिकाना जन्नत होगा।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 94) (93)، إكمال المعلم بفوائد مسلم (1/ 363)، شرح النووي على مسلم (2/96) المفهم للقرطبي (1/290)، تطريز رياض الصالحين (ص 281)، الكوكب الوهاج شرح صحيح مسلم بن الحجاج (3/63).

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हम अपने दिलों में ऐसी बातें पाते हैं, जिनको बोलना हमें बहुत बड़ा (गुनाह) लगता है। यह सुन आपने कहा : "क्या तुम सचमुच ऐसा महसूस करते हो?" उन्होंने कहा : अवश्य महसूस करते हैं। आपने कहा : "यही स्पष्ट ईमान है।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قال: جَاءَ نَاسٌ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَسَأَلُوهُ: إِنَّا نَجِدُ فِي أَنْفُسِنَا مَا يَتَعَاظَمُ أَحَدُنَا أَنْ يَتَكَلَّمَ بِهِ، قَالَ: «وَقَدْ وَجَدْتُمُوهُ؟» قَالُوا: نَعَمْ، قَالَ: «ذَاكَ صَرِيحُ الْإِيمَانِ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कुछ साथी आपके पास आए और आपसे पूछा : हम अपने दिलों में ऐसी बातें पाते हैं, जिनको बोलना हमें बहुत बड़ा (गुनाह) लगता है। यह सुन आपने कहा : "क्या तुम सचमुच ऐसा महसूस करते हो?" उन्होंने कहा : अवश्य महसूस करते हैं। आपने कहा : "यही स्पष्ट ईमान है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियों का एक समूह आपके पास आया और पूछा कि वे अपने दिलों में कुछ ऐसी भयानक बातें पाते हैं, जो इतनी गलत तथा घृणित होती हैं कि वे उन्हें बयान नहीं कर सकते। यह सुनकर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : तुम्हारे दिल में पाई जाने वाली यही बात तो स्पष्ट ईमान और विश्वास है, जो तुम्हें शैतान द्वारा दिल के अंदर डाली गई बात को न मानने और उसे बोलने से बचने की प्रेरणा देता है तथा उसी के कारण तुम्हारे दिलों में यह बात बहुत बड़ी मालूम होती है। तुम्हारे अंदर इस प्रकार के भाव का पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि शैतान तुमपर हावी नहीं है। अगर वह तुमपर हावी हो जाता, तो तुम्हें इस तरह का ख़याल विचलित न करता।

फ़ायदे
  1. ईमान वालों के सामने शैतान कमज़ोर दिखाई पड़ता है और दिल के अंदर बुरे ख़याल डालने से आगे नहीं बढ़ पाता।
  2. दिल के अंदर बुरे ख़यालों की पुष्टि और उनको स्वीकार करने से बचना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार के ख़याल शैतान की ओर से दिल में डाले जाते हैं।
  3. शैतान के द्वारा दिल के अंदर डाले जाने वाले बुरे ख़यालों से ईमान वालों को कोई हानि नहीं होती है। लेकिन इसके बावजूद उसे इस तरह के ख़यालों से अल्लाह की शरण माँगनी चाहिए और इस प्रकार की बातें सोचने से बचना चाहिए।
  4. एक मुसलमान को दीन के संबंध में आने वाली कठिनाइयों के बारे में खामोश नहीं रहना चाहिए। उसे इस तरह की चीज़ों के बारे में पूछ लेना चाहिए।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 119) (132)، معالم السنن (4/174)، المفهم للقرطبي (1/344)، شرح النووي على مسلم (2/154)، البحر المحيط الثجاج (3/622).

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सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने शैतान के फ़रेब को बुरे ख़याल की ओर फेर दिया।

عن ابن عباس رضي الله عنهما قال: جاءَ رجُلُ إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسولَ اللهِ، إن أحدنا يجدُ في نفسِهِ -يُعرِّضُ بالشَّيءِ- لأَن يكونَ حُمَمَةً أحَبُّ إليه من أن يتكلَّم بِهِ، فقال: «اللهُ أكبرُ، اللهُ أكبرُ، الحمدُ لله الذي ردَّ كيدَه إلى الوسوسَةِ».
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, वह कहते हैं : एकि व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और कहने लगा : ऐ अल्लाह के रसूल! हम में से एक व्यक्ति अपने दिल में ऐसी बातें पाता है (वह इशारे में बात कर रहा था) कि कोयला बन जाना उनको बोलने से अधिक प्रिय लगता है। यह सुन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह सबसे बड़ा है। सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने शैतान के फ़रेब को बुरे ख़याल की ओर फेर दिया।"
इसे अबू दावूद ने तथा नसई ने अल-कुबरा में रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! हम में से किसी-किसी के दिल में ऐसी बातें आजाती हैं, जिसके बारे में बात करना इतना कठिन है कि राख बन जाना उसे बोलने से प्रिय लगता है। यह सुन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो बार अल्लाहु अकबर कहा और अल्लाह की प्रशंसा की कि उसने शैतान के षडयंत्र को बुरे ख़याल तक ही सीमित रख दिया।

फ़ायदे
  1. शैतान को जैसे ही अवसर मिलता है, ईमान वालों के दिलों में बुरे ख़याल डाल देता है, ताकि उनको ईमान के मार्ग से हटाकर अविश्वास के मार्ग पर लगा सके।
  2. ईमान वालों के सामने शैतान कमज़ोर पड़ जाता है। वह दिल के अंदर बुरे ख़याल डालने से आगे नहीं बढ़ पाता।
  3. मोमिन को शैतान के द्वारा दिल में डाले गए बुरे ख़यालों को अस्वीकार करना और उनका मुक़ाबला करना चाहिए।
  4. कोई अच्छी चीज़ नज़र आने पर या किसी बात पर आश्चर्य होने पर अल्लाहु अकबर कहना चाहिए।
  5. एक मुसलमान को जो भी बात समझ में न आए, जानकार लोगों से उसके बारे में पूछ लेना चाहिए।
हवाला

سنن أبي داود (7/ 435) (5112) السنن الكبرى للنسائي (9/ 249) (10435)، شرح سنن أبي داود للعباد (580/ 28)، صحيح مسلم (1/ 119) (132)، شرح سنن أبي داود لابن رسلان (19/370)، ومرقاة الصعود (3/1301).

यह हदीस HadeethEnc.com पर
14 में से 8
14 हदीसें
  1. जो अल्लाह पर तथा क़यामत के दिन पर ईमान रखता हो, वह अतिथि का सम्मान करने के मामले में उसका हक़ अदा करे। सहाबा ने कहाः उसका हक़ क्या है, ऐ अल्लाह के रसूल? तो फ़रमायाः एक दिन और एक रात तथा अतिथि सत्कार तीन दिन है। जो इससे अधिक हो वह अतिथि के ऊपर सदक़ा है।
  2. अत्यंत कृपाशील अल्लाह की हथेली में सातों आसमान और सातों ज़मीन ऐसी हैं, जैसे तुममें से किसी के हाथ में राई का एक दाना हो।
  3. , ऐसे व्यक्ति को अल्लाह जन्नत में दाख़िल करेगा, चाहे उसका अमल जैसा भी रहा हो।
  4. अल्लाह ने मेरे लिए, मेरी उम्मत के गलती से तथा भूलवश किए हुए और ज़बरदस्ती कराए गए कार्यों को क्षमा कर दिया है।
  5. इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है
  6. जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो इस हाल में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी बनाता रहा, वह जहन्नम में जाएगा।
  7. हम अपने दिलों में ऐसी बातें पाते हैं, जिनको बोलना हमें बहुत बड़ा (गुनाह) लगता है। यह सुन आपने कहा : "क्या तुम सचमुच ऐसा महसूस करते हो?" उन्होंने कहा : अवश्य महसूस करते हैं। आपने कहा : "यही स्पष्ट ईमान है।
  8. सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने शैतान के फ़रेब को बुरे ख़याल की ओर फेर दिया।
  9. शैतान तुम में से किसी व्यक्ति के पास आता है और कहता है : इस चीज़ को किसने पैदा किया? इस चीज़ को किसने पैदा किया? यहाँ तक कि वह कहता है : तेरे रब को किसने पैदा किया? जब इस हद तक पहुँच जाए, तो अल्लाह की शरण माँगे और इस तरह की बातें सोचना बंद कर दे।
  10. मुझसे इस्लाम के बारे में एक ऐसी बात कहें, जिसके बारे में मुझे किसी और से पूछने की ज़रूरत न पड़े। आपने फ़रमाया : "तुम कहो कि मैं अल्लाह पर ईमान लाया और फिर इसपर मज़बूती से क़ायम रहो।
  11. अल्लाह ज़मीन को अपनी मुट्ठी में ले लेगा तथा आकाशों को अपने दाएँ हाथ में लपेट लेगा और फिर कहेगा : मैं ही बादशाह हूँ। कहाँ हैं धरती के बादशाह?
  12. और मैं साद बिन अबी बक्र नामी क़बीले से ताल्लुक़ रखता हूँ।
  13. इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है
  14. मुझसे इस्लाम के बारे में एक ऐसी बात कहें, जिसके बारे में मुझे किसी और से पूछने की ज़रूरत न पड़े। आपने फ़रमाया : "तुम कहो कि मैं अल्लाह पर ईमान लाया और फिर इसपर मज़बूती से क़ायम रहो।

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com