अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि यदि मान लिया जाए कि मैं किसी बात पर अल्लाह की झूठी क़सम खा लेता हूँ, तो यह मेरे निकट इससे अधिक प्रिय है कि मैं किसी बात पर अल्लाह के सिवा किसी और की सच्ची क़सम खाऊँ। उन्होंने अल्लाह की झूठी कसम को किसी अन्य की सच्ची क़सम से बेहतर इसलिए समझा कि अल्लाह की क़सम में तौहीद की नेकी है और झूठ का गुनाह है। जबकि किसी और की सच्ची कसम में सच्चाई की नेकी है और शिर्क का गुनाह। ज़ाहिर सी बात है कि तौहीद की नेकी सच्चाई की नेकी से बड़ी है और झूठ का गुनाह शिर्क के गुनाह से कमतर है।
كتاب التوحيد للإمام محمد بن عبد الوهاب ص252 ت: د. دغش العجمي . مكتبة أهل الأثر , الطبعة الخامسة , 1435ه الجديد في شرح كتاب التوحيد لمحمد بن عبد العزيز السليمان القرعاوي, ت: محمد بن أحمد سيد , مكتبة السوادي، الطبعة: الخامسة، 1424ه الملخص في شرح كتاب التوحيد للشيخ صالح الفوزان , دار العاصمة , الطبعة الأولى 1422ه المصنف لابن أبي شيبة, ت: كمال يوسف الحوت, مكتبة الرشد, الطبعة: الأولى، 1409 إرواء الغليل للألباني , المكتب الإسلامي , ط2, 1405ه