عن عبد الله بن بُحَيْنَةَ رضي الله عنه وكان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم «أن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى بهم الظهر فقام في الركعتين الأُولَيَيْنِ، ولم يَجْلِسْ، فقام الناس معه، حتى إذا قضى الصلاة وانتظر الناس تسليمه: كَبَّرَ وهو جالس فسجد سجدتين قبل أن يُسَلِّمَ ثُمَّ سَلَّمَ».
अब्दुल्लाह बिन बुहैना- रज़ियल्लाहु अन्हु- जो अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सहाबी थे का वर्णन है कि नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उन्हें ज़ुहर की नमाज़ पढ़ाते समय दो रअतों के बाद बैठने के बजाय खड़े हो गए, तो लोग भी आपके सााथ खड़े हो गए, यहाँ तक कि जब नमाज़ पूरी कर ली और लोग आपके सलाम फेरने की प्रतीक्षा करने लगे, तो बैठकर ही "अल्लाहु अकबर" कहा और सलाम फेरने से पहले दो सजदे किए, फिर सलाम फेरा )।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने साथियों को ज़ोहर की नमाज़ पढ़ाई। जब पहली दो रकअतें पढ़ चुके, तो पहले तशह्हुद के लिए बैठने के बजाय खड़े हो गए। मुक़तदी भी आपके साथ-साथ खड़े हो गए।
यहाँ तक कि जब बाद की दो रकअतें पढ़ चुके तथा आखिरी तशह्हुद के लिए बैठ गए और उससे भी फ़ारिग हो गए एवं लोग आपके सलाम फेरने की प्रतीक्षा करने लगे, तो बैठे-बैठे ही आप ने 'अल्लाहु अकबर' कहा और सलाम फेरने से पहले नमाज़ के सजदों के जैसे दो सजदे किए, जो 'सह्व के सजदे' कहलाते हैं, फिर सलाम फेर दिया। दरअसल यह सजदे छूटे हुए तशह्हुद की भरपाई के लिए थे।
हवाला
الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري، ط1، دار الفكر، دمشق، 1381هـ.
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة،1426هـ
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين، ط1، مكتبة الصحابة، الإمارات، 1426هـ.
عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم، لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408هـ.
صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة، (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قال: «صلَّى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم إحدى صَلاتَيْ الْعَشِيِّ -قال ابن سِيرِينَ وسمَّاها أبو هُرَيْرَةَ، ولكن نسيت أنا- قال: فصلَّى بنا ركعتين، ثم سلَّم، فقام إلى خَشَبَةٍ مَعْرُوضَةٍ في المسجد، فَاتَّكَأَ عليها كأنه غضبان ووضع يده اليُمنى على اليُسرى، و شَبَّكَ بين أصابعه، وخرجت السَّرَعَانُ من أبواب المسجد فقالوا: قَصُرَتِ الصلاة -وفي القوم أبو بكر وعمر- فهابا أن يكلماه، وفي القوم رجل في يديه طُول، يقال له: ذو اليدين فقال: يا رسول الله، أنسيت؟ أم قَصُرَتِ الصلاة؟ قال: لم أَنْسَ وَلَمْ تُقْصَرْ، فقال: أكما يقول ذو اليدين؟ فقالوا: نعم، فتقدَّم فصلَّى ما ترك، ثم سلَّمَ، ثم كبَّر وسجد مثل سجوده أو أطول، ثم رفع رأسه فكبَّر، ثم كبَّر وسجد مثل سجوده أو أطول، ثم رفع رأسه وكبَّر، فربما سألوه: ثم سلّم؟ قال: فَنُبِّئْتُ أن عِمْرَانَ بْنَ حُصَيْنٍ قال: ثم سلَّمَ».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें ज़ुहर अथवा अस्र की नमाज़ पढ़ाई। (इब्ने सीरीन कहते हैं कि अबू हुरैरा ने नमाज़ का नाम लेकर बताया था, लेकिन मुझे याद नहीं रहा) वह कहते हैं कि आपने हमें दो रकअत पढ़ाकर सलाम फेर दिया। उसके बाद मस्जिद के अंदर पड़ी हुई एक लकड़ी के पास जा कर, नाराज़ व्यक्ति के अंदाज़ में उससे टेक लगा लिया, अपने दाएँ हाथ को बाएँ हाथ पर रखा और दोनों हाथों की उँगलियों को एक-दूसरी में घुसा दिया। उधर, जल्दबाज़ लोग मस्जिद से निकल गए और कहना शुरू किया कि नमाज़ कम हो गई है। (उस समय वहाँ अबू बक्र और उमर भी मौजूद थे), लेकिन उन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से बात करने में भय महसूस किया। लोगों के अंदर एक लंबे हाथ वाला व्यक्ति भी था, जिसे "ज़ुल यदैन"- दो हाथों वाला- कहा जाता था। उसने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! क्या आपसे भूल हुई है या नमाज़ कम कर दी गई है? आपने उत्तर दियाः न मुझसे भूल हुई है और न नमाज़ कम की गई है। फिर फ़रमायाः क़्या ज़ुल यदैन की बात सही है? लोगों ने कहाः हाँ। अतः, आप आगे बढ़े, छूटी हुई नमाज़ पढ़ी, फिर सलाम फेरा, फिर तकबीर कही और अपने सजदे की तरह या उससे लंबा सजदा किया, फिर सिर उठाया और तकबीर कही, फिर तकबीर कही और अपने सजदे की तरह या उससे लंबा सजदा किया, फिर सिर उठाया और तकबीर कही। कभी-कभी लोग पूछ लेते कि क्या उसके बाद आपने सलाम फेरा? तो कहतेः मुझे बताया गया है कि इमरान बिन हुसैन ने कहाः फिर सलाम फेरा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
रसूलगण, मानव जाति के सबसे विवेकी, स्थिर दिल व दिमाग के मालिक, सहनशील और सबसे अधिक अल्लाह का हक़ अदा करने वाले लोग होते हैं। लेकिन, इन सब बातों के बावजूद वे होते तो इनसान ही हैं। अंतिम रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इन गुणों में अन्य रसूलों की तुलना में अधिक परिपूर्ण थे, लेकिन इसके बावजूद इनसान होने के नाते कई बार नमाज़ की कुछ चीज़ें भूले भी हैं। ऐसा इसलिए, ताकि अल्लाह बंदों के लिए सह्व के अहकाम (भूलने से संबंधित विधि-विधान) जारी कर सके। अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि एक बार अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने साथियों को ज़ोहर अथवा अस्र की नमाज़ पढ़ाई। यहाँ अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने निश्चित रूप से बता दिया था कि नमाज़ कौन-सी थी, लेकिन इब्न-ए-सीरीन भूल गए। नमाज़ के दौरान हुआ यह कि आपने पहली दो रकातें पढ़ने के बाद सलाम फेर दिया। चूँकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एक संपूर्ण व्यक्तित्व के मालिक इनसान थे और आधे-अधूरे अमल से आपका हृदय संतुष्ट नहीं होता था, इसलिए आपको कुछ कमी महसूस हुई। मगर यह पता न चल सका कि वह है क्या? आप मस्जिद के अंदर रखी हुई एक लकड़ी के पास गए, उसपर व्याकुल मन से टेक लगाया और अपने एक हाथ की उंगलियों को दूसरे हाथ की उंगलियों में घुसा दिया।
इस बीच जल्दबाज़ किस्म के नमाज़ीगण मस्जिद के विभिन्न द्वारों से बाहर निकल गए। वे आपस में चुपके-चुपके बात कर रहे थे कि ज़रूर कुछ नया आदेश आया होगा। दरअसल वे नमाज़ आधी हो जाने की बात कर रहे थे। एक तरह से वे अल्लाह के नबी को इससे परे समझ रहे थे कि आप भी कुछ भूल सकते हैं। उनके दिलों में आपका इस क़दर रुआब था कि कोई इस महत्वपूर्ण विषय में भी आपसे बात करने की जुर्रत न कर सका। हालाँकि वहाँ अबू बक्र और उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- भी मौजूद थे और उन्होंने आपके अंदर असंतुष्टि और बेइतमीनानी के भाव भी देखे थे।
इतने में एक सहाबी ने, जिसे ज़ुल-यदैन कहा जाता था, इस ख़ामोशी को तोड़ते हुए कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, क्या आप भूल रहे हैं या नमाज़ कम हो गई है? उन्होंने यक़ीन के साथ कोई एक बात नहीं कही, क्योंकि उस समय दोनों बातों की संभावना थी। यह सुन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाह अलैहि व सल्लम- ने अपने गुमान के आधार पर उत्तर दिया कि न तो मैं कुछ भूला हूँ और न नमाज़ कम हुई है। अब ज़ुल-यदैन आश्वस्त हो गए कि नमाज़ कम नहीं हुई है। चूँकि उन्हें इस बात का भी यक़ीन था कि आपने दो रकात ही पढ़ी है, इसलिए यह नतीजा निकाल लिया कि आप भूले ज़रूर हैं। अतः उन्होंने कहा : वास्तविकता यह है कि आप भूले हैं। चूँकि ज़ुल-यदैन का यह दावा आपके इस ख़याल के विपरीत था कि आपने नमाज़ पूरी पढ़ी है, इसलिए आप उसकी पुष्टि कर लेना चाहते थे। अतः, अपने आस-पास मौजूद साथियों से पूछा कि क्या ज़ुल-यदैन की यह बात सही है कि मैंने दो ही रकात पढ़ी है? जब सबने हाँ में उत्तर दिया, तो आप आगे बढ़े और छूटी हुई नमाज़ पढ़ी।
फिर तशह्हुद के बाद सलाम फेरा, फिर बैठे-बैठे ही तकबीर कही और नमाज़ के सजदे जैसा या उससे ज़रा लंबा एक सजदा किया, फिर सजदे से सर उठाया और तकबीर कही, फिर तकबीर कही और आम सजदों की तरह या उनसे ज़रा लंबा सजदा किया, फिर सर उठाया औऱ तकबीर कही, फिर तशह्हुद पढ़े बिना सलाम फेर दिया।
हवाला
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الأمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة 1426هـ، 2006م.
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة، الإمارات، الطبعة: الأولى 1426هـ، 2005م.
الإفهام في شرح عمدة الأحكام لابن باز، تحقيق: سعيد القحطاني، مؤسسة عبد العزيز بن باز الخيرية، الرياض، الطبعة: الأولى 1435هـ.
الإلمام بشرح عمدة الأحكام، إسماعيل بن محمد الأنصاري، دار الفكر، دمشق، الطبعة: الأولى 1381هـ.
خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام، فيصل بن عبد العزيز المبارك، الطبعة: الثانية 1412هـ، 1992م.
صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ.
صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ.
تأسيس الأحكام، أحمد بن يحيى النجمي، دار المنهاج، القاهرة، الطبعة: الأولى 1427هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «إذا قَرَأ ابنُ آدم السجدةَ فسجد اعْتَزَل الشيطانُ يبكي، يقول: يا وَيْلَه -وفي روايةٍ: يا وَيْلي- أُمِر ابنُ آدمَ بالسجودِ فسجدَ فله الجنة، وأُمِرتُ بالسجود فأبَيْتُ فَلِيَ النارُ».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु् अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जब आदम की संतान सजदे वाली आयत पढ़ती है और सजदा करती है, तो शैतान रोता हुआ दूर हट जाता है। वह कहता है: हाय मेरी बरबादी! आदम की संतान को सजदे का आदेश दिया गया और उसने सजदा किया, तो उसके लिए जन्नत है, जबकि मुझे सजदे का आदेश दिया गया, तो मैंने इनकार कर दिया, अतः मेरे लिए जहन्नम है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
जब कोई व्यक्ति सजदे की आयतों में से कोई आयत पढ़ता है, जिसमें सजदे का आदेश होता है और वह अल्लाह के आदेश के पालन और उसके अनुसरण की चाहत में सजदा करता है, तो शैतान क़ुरआन पढ़ने वाले उस व्यक्ति के पास से भाग जाता है और आदम की संतान को प्राप्त होने वाले सम्मान पर ईर्ष्या के कारण वह जिस प्रकार सम्मान से वंचित हुआ है और धिक्कार तथा नाकामी का हक़दार बना है, उसपर अफ़सोस करते हुए कहता है : "हाय मेरी बरबादी! आदम की संतान को सजदे का आदेश दिया गया और उसने सजदा किया, तो उसके लिए जन्नत है, जबकि मुझे सजदे का आदेश दिया गया, तो मैंने इनकार कर दिया।" यानी हाय मेरा विनाश! अल्लाह ने आदम की संतान को सजदे का आदेश दिया और उसने अपने प्रभु के आदेश का पालन करते हुए सजदा किया, तो उसके लिए जन्नत है, जबकि मुझे सजदे का आदेश दिया और मैंने अभिमान के कारण सजदे से इनकार कर दिया तो मेरे लिए जहन्नम है।
हवाला
- صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.
- الإفصاح عن معاني الصحاح، ليحيى بن هبيرة بن محمد بن هبيرة الذهلي الشيباني، المحقق: فؤاد عبد المنعم أحمد، الناشر: دار الوطن، سنة النشر: 1417هـ.
- مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي بن سلطان الملا الهروي القاري، الناشر: دار الفكر، بيروت – لبنان، الطبعة الأولى، 1422هـ - 2002م.
- إكمال المعلم بفوائد مسلم لعياض بن موسى بن عياض بن عمرون اليحصبي السبتي، المحقق: الدكتور يحيى إسماعيل، الناشر: دار الوفاء للطباعة والنشر والتوزيع، مصر، الطبعة الأولى، 1419هـ - 1998م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: صَلَّى النبي صلى الله عليه وسلم إِحْدَى صَلاَتَيِ العَشِيّ -قال محمد: وَأَكْثَرُ ظَنِّي العصر- رَكْعَتَيْنِ، ثُمَّ سَلَّمَ، ثم قام إلى خَشَبَةٍ فِي مُقَدَّمِ المَسْجِدِ، فَوَضَعَ يَدَهُ عَلَيْهَا، وفيهم أبو بكر، وعمر رضي الله عنهما ، فَهَابَا أَنْ يُكَلِّمَاهُ، وخرج سَرَعَانُ النَّاسِ فَقَالُوا: أَقَصُرَتِ الصلاة؟ وَرَجُلٌ يَدْعُوهُ النبي صلى الله عليه وسلم ذُو اليَدَيْنِ، فَقَالَ: أَنَسِيتَ أَمْ قَصُرَتْ؟ فَقَالَ: لَمْ أَنْسَ وَلَمْ تُقْصَرْ، قَالَ: «بَلَى قَدْ نَسِيتَ، فَصَلَّى رَكْعَتَيْنِ، ثُمَّ سَلَّمَ، ثُمَّ كَبَّرَ، فَسَجَدَ مِثْلَ سُجُودِهِ أَوْ أَطْوَلَ، ثُمَّ رَفَعَ رَأْسَهُ، فَكَبَّرَ، ثُمَّ وَضَعَ رَأْسَهُ، فكبر، فَسَجَدَ مِثْلَ سُجُودِهِ أَوْ أَطْوَلَ، ثُمَّ رَفَعَ رَأْسَهُ وَكَبَّرَ».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जुहर अथवा अस्र की नमाज़ -मुहम्मद बिन सीरीन कहते हैं कि मुझे यही लगता है कि वह अस्र की नमाज़ थी- दो रकात पढ़ी और सलाम फेर दिया। उसके बाद मस्जिद के अगले भाग में गड़ी हुई एक लकड़ी के पास गए और उस पर अपना हाथ रखा। लोगों के बीच अबू बक्र और उमर -रज़ियल्लाहु अंहुमा- भी उपस्थित थे। लेकिन, दोनों ने आपसे बात करने में भय महसूस किया। उधर, जल्दबाज़ लोग निकल गए और कहने लगे कि क्या नमाज़ कम कर दी गई है? उस समय एक व्यक्ति, जिसे नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- 'ज़ुल-यदैन' (दो हाथ वाले) कहकर पुकारते थे, भी मौजूद थे । उन्होंने कहाः (ऐ अल्लाह के रसूल) क्या आप भूल गए हैं या नमाज़ कम हो गई है? आपने उत्तर दियाः "न मैं भूला हूँ और न नमाज़ कम की गई है।" उन्होंने कहाः नहीं, आप ज़रूर भूले हैं। तब आपने दो रकात पढ़ी, फिर सलाम फेरा, फिर तकबीर कही और अपने आम सजदों के समान या उनसे लंबा सजदा किया, फिर अपना सर उठाया, तकबीर कही, फिर अपना सर रखा, तकबीर कही और अपने आम सजदों के समान या उनसे लंबा सजदा किया, फिर अपना सर उठाया और तकबीर कही।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح مسلم، المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.
صحيح البخاري، لأبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري, تحقيق محمد زهير بن ناصر الناصر، الناشر: دار طوق النجاة، الطبعة الأولى 1422هـ.
توضيح الأحكام من بلوغ المرام، لعبدالله بن عبد الرحمن البسام، مكتبة الأسدي، مكة، ط الخامسة 1423هـ.
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، (ط10)، مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِذَا شَكَّ أَحَدُكُمْ فِي صَلَاتِهِ، فَلَمْ يَدْرِ كَمْ صَلَّى ثَلَاثًا أَمْ أَرْبَعًا، فَلْيَطْرَحِ الشَّكَّ، وَلْيَبْنِ عَلَى مَا اسْتَيْقَنَ، ثُمَّ يَسْجُدُ سَجْدَتَيْنِ قَبْلَ أَنْ يُسَلِّمَ، فَإِنْ كَانَ صَلَّى خَمْسًا شَفَعْنَ لَهُ صَلَاتَهُ، وَإِنْ كَانَ صَلَّى إِتْمَامًا لِأَرْبَعٍ كَانَتَا تَرْغِيمًا لِلشَّيْطَانِ».
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब तुममें से किसी को नमाज़ में संदेह हो जाए और याद न रहे कि कितनी रकात पढ़ी है, तीन अथवा चार? तो संदेह को परे डाल दे और जिस पर यक़ीन हो, उसे आधार बनाए। फिर सलाम फेरने से पहले दो सजदे कर ले। ऐसे में, अगर उसने पाँच रकातें पढ़ ली हैं, तो दो सजदे उसकी नमाज़ को सम संख्या वाली नमाज़ बना देंगे और अगर उसने पूरी चार रकात पढ़ी है, तो दोनों सजदे शैतान के अपमान का सामान बन जाएँगे।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जब किसी नमाज़ी को अपनी नमाज़ की रकातों के बारे में संदेह हो जाए और पता न चल सके कि तीन रकात पढ़ी है या चार रकात, तो जिस अतिरिक्त रकात के बारे में संदेह हो, उसे शुमार न करे। मसलन अगर तीन और चार के बारे में संदेह हो, तो तीन रकात यक़ीनी हैं, इसलिए चौथी रकात पढ़ ले और सलाम फेरने से पहले दो सजदे कर ले।
ऐसे में अगर उसने पहले ही चार रकातें पढ़ ली थीं, तो बाद की एक रकात मिलाकर पाँच रकातें हो गईं, और सह्व के दो सजदे एक रकात के स्थान पर हो गए। इस तरह रकातें विषम नहीं, सम हो गईं। इसके विपरीत अगर अतिरिक्त रकात को मिलाकर चार रकात पढ़ी है, तो उसने ठीक उतनी रकातें पढ़ ली हैं, जितनी पढ़नी चाहिए थीं।
ऐसे सह्व के दोनों सजदे शैतान की ज़िल्लत व रुस्वाई का सामान और उसे नाकाम व नामुराद वापस करने की निशानी होंगे। क्योंकि शैतान ने नमाज़ पढ़ रहे व्यक्ति की नमाज़ ख़राब करने की कोशिश तो की थी, लेकिन उसने उसे उसी सजदे द्वारा दुरुस्त कर लिया, जिसे करने से इबलीस ने इन्कार कर दिया था, जब उसने आदम को सजदा करने के संबंध में अल्लाह के आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया था।
फ़ायदे
- नमाज़ पढ़ रहे व्यक्ति को जब नमाज़ की रकातों के बारे में संदेह हो जाए और यक़ीन के साथ निर्णय न ले सके कि कितनी रकात पढ़ी है, तो संदेह को दूर रखकर यक़ीन के अनुसार काम करे। यानी कम को दुरुस्त मानकर नमाज़ पूरी करे और सलाम फेरने से पहले सह्व के सजदे करके सलाम फेरे।
- सह्व के दोनों सजदे दरअसल नमाज़ के अंदर आ जाने वाली कमी को दूर करने और शैतान को नाकाम व नामुराद वापस करने का ज़रिया हैं।
- इस हदीस में जिस संदेह का ज़िक्र है, उससे मुराद ऐसा शक है, जिसमें कोई रुझान न पाया जाए। अगर कोई रुझान पाया जाए और मन का झुकाव उसी की ओर हो, तो उसी पर अमल किया जाएगा।
- शैतान की ओर से दिल में डाले जाने वाले बुरे ख़्यालों से लड़ने और शरीयत के आदेश का पालन करके उन्हें दूर हटाने की प्रेरणा।
हवाला
صحيح مسلم (1/ 400) (571).
توضيح الأحكام شرح بلوغ المرام، للبسام (2/ 338).
منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (3/ 222).
مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (2/ 799).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عبد الله بن مسعود رضي الله عنه قال: صلى النبي صلى الله عليه وسلم -قال إبراهيم: لا أدري زاد أو نقص- فلما سلم قيل له: يا رسول الله، أحَدَثَ في الصلاة شيء؟ قال: «وما ذاك»، قالوا: صليتَ كذا وكذا، فَثَنَّى رِجليْهِ، واستقبل القبلة، وسَجَدَ سجدتين، ثم سلم، فلما أقبل علينا بوجهه، قال: «إنه لو حَدَثَ في الصلاة شيءٌ لنَبَّأَتُكُم به، ولكن إنما أنا بَشَرٌ مثلكم، أنسى كما تَنْسَوْن، فإذا نسَيِتُ فذَكِّرُوني، وإذا شَكَّ أحدكم في صلاته، فَلْيَتَحَرَّ الصَّوَابَ فليُتِمَّ عليه، ثم ليسلم، ثم يسجد سجدتين».
अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने नमाज़ पढ़ी। -इबराहीम कहते हैंः मुझे नहीं मालूम कि आपने नमाज़ में कुछ इज़ाफा कर दिया था या कमी कर दी थी।- जब सलाम फेरा, तो आपसे कहा गयाः ऐ अल्लाह के रसूल, क्या नमाज़ के बारे में कोई नया आदेश आया है? आपने फरमायाः "वह क्या है?" सहाबा ने कहाः आपने इतनी-इतनी रकात पढ़ी है! यह सुन आपने अपने दोनों पैरों को मोड़ा और क़िबले की ओर मुँह करके दो सजदे किए। फिर सलाम फेरा और हमारी तरफ़ मुँह करके फरमायाः "अगर नमाज़ के बारे में कोई नया आदेश आया होता, तो मैं तुम्हें ज़रूर बता देता। लेकिन मैं भी तुम्हारी तरह एक इनसान हूँ, जिस तरह तुम भूलते हो, मैं भी भूलता हूँ। इसलिए जब मैं भूल जाऊँ, तो मुझे याद दिला दिया करो। और तुममें से जिसे अपनी नमाज़ में शक हो, वह सोचकर यह जानने का प्रयास करे कि सही मायने में कितनी रकात पढ़ी है, फिर उसी के अनुसार अपनी नमाज़ पूरी करे। फिर सलाम फेरे और दो सजदे कर ले।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح مسلم، المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.
صحيح البخاري، لأبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري, حقيق محمد زهير بن ناصر الناصر، الناشر: دار طوق النجاة، الطبعة الأولى 1422هـ.
توضيح الأحكام من بلوغ المرام، لعبدالله بن عبد الرحمن البسام، مكتبة الأسدي، مكة، ط الخامسة 1423هـ.
منحة العلام في شرح بلوغ المرام، تأليف: عبد الله بن صالح الفوزان، ط 1، 1427هـ، دار ابن الجوزي.
فتح ذي الجلال والإكرام بشرح بلوغ المرام، للشيخ ابن عثيمين، المكتبة الإسلامية، القاهرة، تحقيق صبحي رمضان وأم إسراء بيومي- الطبعة الأولى 1427هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن زياد بن علاقة قال: صَلَّى بِنَا المغيرة بنُ شُعْبَةَ فَنَهَضَ في الركعتين، قلنا: سبحان الله، قال: سبحان الله وَمَضَى، فَلَمَّا أَتَمَّ صَلَاتَهُ وَسَلَّمَ، سَجَدَ سَجْدَتَيِ السَّهْوِ، فَلَمَّا انْصَرَفَ، قَالَ: «رَأَيْتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يَصْنَعُ كَمَا صَنَعْتُ».
ज़ियाद बिन अलाक़ा कहते हैं कि हमें मुग़ीरा बिन शोबा ने नमाज़ पढ़ाई और दो रकात के बाद खड़े हो गए। हमने 'सुबहानल्लाह' कहा, तो उन्होंने भी 'सुबहानल्लाह' कहा और नमाज़ जारी रखी। जब नमाज़ पूरी करके सलाम फेर चुके तो, त्रुटि के दो सजदे कर लिए। जब नमाज़ से बाहर आ गए, तो फ़रमायाः मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को वैसा ही करते देखा है, जैसा मैंने किया है।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
سنن أبي داود، سليمان بن الأشعث أبوداود، دار الفكر، تحقيق : محمد محيي الدين عبد الحميد.
سنن الترمذي، محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق: أحمد محمد شاكر وآخرين، دار إحياء التراث العربي، بيروت.
مسند الإمام أحمد بن حنبل، أحمد بن حنبل أبو عبدالله الشيباني، تحقيق: شعيب الأرنؤوط و عادل مرشد، وآخرون، تحت إشراف: عبد الله بن عبد المحسن التركي، مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى1421هـ، 2001م.
سنن الدارمي، تحقيق: حسين سليم أسد الداراني، دار المغني للنشر والتوزيع، المملكة العربية السعودية، الطبعة: الأولى 1412هـ، 2000م.
توضيح الأحكام شرح بلوغ المرام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، مكتبة الأسدي، مكة المكرمة، الطبعة الخامِسَة، 1423هـ، 2003 م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن ثوبان رضي الله عنه : أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «لكل سهو سجدتان بعدما يُسَلِّمُ».
सौबान -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "हर त्रुटि के लिए सलाम फेरने के बाद दो सजदे हैं।"
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन
हवाला
مسند أحمد بن حنبل، لأبي عبد الله أحمد بن محمد بن حنبل، تحقيق أبو المعاطي النوري، عالم الكتب.
السنن، لأبي داود سليمان بن الأشعث السجستاني ، دار الفكر، تحقيق : محمد محيي الدين عبد الحميد.
صحيح أبي داود للألباني، ط1، مؤسسة غراس للنشر والتوزيع، الكويت، 1423 هـ.
توضيح الأحكام من بلوغ المرام للحافظ أحمد بن علي بن حجر العسقلاني، عبدالله بن عبد الرحمن البسام ، مكتبة الأسدي، مكة ، ط الخامسة 1423هـ .
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com