रसूलगण, मानव जाति के सबसे विवेकी, स्थिर दिल व दिमाग के मालिक, सहनशील और सबसे अधिक अल्लाह का हक़ अदा करने वाले लोग होते हैं। लेकिन, इन सब बातों के बावजूद वे होते तो इनसान ही हैं। अंतिम रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इन गुणों में अन्य रसूलों की तुलना में अधिक परिपूर्ण थे, लेकिन इसके बावजूद इनसान होने के नाते कई बार नमाज़ की कुछ चीज़ें भूले भी हैं। ऐसा इसलिए, ताकि अल्लाह बंदों के लिए सह्व के अहकाम (भूलने से संबंधित विधि-विधान) जारी कर सके। अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि एक बार अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने साथियों को ज़ोहर अथवा अस्र की नमाज़ पढ़ाई। यहाँ अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने निश्चित रूप से बता दिया था कि नमाज़ कौन-सी थी, लेकिन इब्न-ए-सीरीन भूल गए। नमाज़ के दौरान हुआ यह कि आपने पहली दो रकातें पढ़ने के बाद सलाम फेर दिया। चूँकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एक संपूर्ण व्यक्तित्व के मालिक इनसान थे और आधे-अधूरे अमल से आपका हृदय संतुष्ट नहीं होता था, इसलिए आपको कुछ कमी महसूस हुई। मगर यह पता न चल सका कि वह है क्या? आप मस्जिद के अंदर रखी हुई एक लकड़ी के पास गए, उसपर व्याकुल मन से टेक लगाया और अपने एक हाथ की उंगलियों को दूसरे हाथ की उंगलियों में घुसा दिया। इस बीच जल्दबाज़ किस्म के नमाज़ीगण मस्जिद के विभिन्न द्वारों से बाहर निकल गए। वे आपस में चुपके-चुपके बात कर रहे थे कि ज़रूर कुछ नया आदेश आया होगा। दरअसल वे नमाज़ आधी हो जाने की बात कर रहे थे। एक तरह से वे अल्लाह के नबी को इससे परे समझ रहे थे कि आप भी कुछ भूल सकते हैं। उनके दिलों में आपका इस क़दर रुआब था कि कोई इस महत्वपूर्ण विषय में भी आपसे बात करने की जुर्रत न कर सका। हालाँकि वहाँ अबू बक्र और उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- भी मौजूद थे और उन्होंने आपके अंदर असंतुष्टि और बेइतमीनानी के भाव भी देखे थे। इतने में एक सहाबी ने, जिसे ज़ुल-यदैन कहा जाता था, इस ख़ामोशी को तोड़ते हुए कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, क्या आप भूल रहे हैं या नमाज़ कम हो गई है? उन्होंने यक़ीन के साथ कोई एक बात नहीं कही, क्योंकि उस समय दोनों बातों की संभावना थी। यह सुन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाह अलैहि व सल्लम- ने अपने गुमान के आधार पर उत्तर दिया कि न तो मैं कुछ भूला हूँ और न नमाज़ कम हुई है। अब ज़ुल-यदैन आश्वस्त हो गए कि नमाज़ कम नहीं हुई है। चूँकि उन्हें इस बात का भी यक़ीन था कि आपने दो रकात ही पढ़ी है, इसलिए यह नतीजा निकाल लिया कि आप भूले ज़रूर हैं। अतः उन्होंने कहा : वास्तविकता यह है कि आप भूले हैं। चूँकि ज़ुल-यदैन का यह दावा आपके इस ख़याल के विपरीत था कि आपने नमाज़ पूरी पढ़ी है, इसलिए आप उसकी पुष्टि कर लेना चाहते थे। अतः, अपने आस-पास मौजूद साथियों से पूछा कि क्या ज़ुल-यदैन की यह बात सही है कि मैंने दो ही रकात पढ़ी है? जब सबने हाँ में उत्तर दिया, तो आप आगे बढ़े और छूटी हुई नमाज़ पढ़ी। फिर तशह्हुद के बाद सलाम फेरा, फिर बैठे-बैठे ही तकबीर कही और नमाज़ के सजदे जैसा या उससे ज़रा लंबा एक सजदा किया, फिर सजदे से सर उठाया और तकबीर कही, फिर तकबीर कही और आम सजदों की तरह या उनसे ज़रा लंबा सजदा किया, फिर सर उठाया औऱ तकबीर कही, फिर तशह्हुद पढ़े बिना सलाम फेर दिया।
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الأمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة 1426هـ، 2006م. تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة، الإمارات، الطبعة: الأولى 1426هـ، 2005م. الإفهام في شرح عمدة الأحكام لابن باز، تحقيق: سعيد القحطاني، مؤسسة عبد العزيز بن باز الخيرية، الرياض، الطبعة: الأولى 1435هـ. الإلمام بشرح عمدة الأحكام، إسماعيل بن محمد الأنصاري، دار الفكر، دمشق، الطبعة: الأولى 1381هـ. خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام، فيصل بن عبد العزيز المبارك، الطبعة: الثانية 1412هـ، 1992م. صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ. صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ. تأسيس الأحكام، أحمد بن يحيى النجمي، دار المنهاج، القاهرة، الطبعة: الأولى 1427هـ.