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तशरीह के साथ हदीसें

परिधान के आदाब

15 हदीसें

अल्लाह के रसूल- सल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सोने की एक अँगूठी बनवाई।

عن عبد الله بن عمر رضي الله عنهما «أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - اصْطَنَعَ خَاتَمًا من ذهب، فكان يجعل فَصَّهُ في باطن كَفِّهِ إذا لَبِسَهُ، فصنع الناس كذلك، ثم إنه جلس على المنبر فَنَزَعَهُ فقال: إني كنت أَلْبَسُ هذا الخَاتَمَ ، وأجعل فَصَّهُ من داخل، فرمى به ثم قال: والله لا أَلْبَسُهُ أبدا فَنَبَذَ الناس خَواتِيمَهُمْ». وفي لفظ «جعله في يده اليمنى».
अब्दुल्लाह बिन उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल- सल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सोने की एक अँगूठी बनवाई। जब उसे पहनते, तो उसके नगीने को हथेली के भीतरी भाग में रखते। लोगों ने भी ऐसा करना शुरू कर दिया। फिर एक दिन आप मिंबर पर बैठे और उसे निकालते हुए कहाः "मैं इस अँगूठी को पहनता था और इसके नगीने को अंदर की ओर रखता था।" फिर उसे फेंकते हुए फरमायाः "अल्लाह की क़सम, मैं इसे कभी नहीं पहनूँगा।" अतः, लोगों ने भी अपनी अँगूठियाँ फेंक दीं। एक रिवायत में है किः उसे अपने दाहिने हाथ में पहने थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने आदेश दिया कि आप के लिए सोने की एक अँगूठी बनाई जाए। जब आप उसे पहनते थे, तो उसका नगीना दाहिनी हथेली के भीतर कर लेते। सहाबा ने भी आप की तरह अँगूठियाँ बनवा लीं। कुछ दिनों के पश्चात नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मिंबर पर बैठे, ताकि लोग आप को देख सकें। उसके बाद फ़रमायाः मैं यह अंगूठी पहनता था और उसका नगीना भीतर की ओर रखा था। यह फरमाकर -उसे फेंक दिया और फ़रमायाः अल्लाह की सौगंध! कदापि मैं उसे नहीं पहनूँगा। ऐसा आप ने अंगूठी के हराम होने के बाद किया, तो सहाबा ने भी अल्लाह के रसूल का अनुसरण करते हुए अपनी अंगूठियाँ फेंक दीं।

हवाला

تأسيس الأحكام للنجمي، ط2، دار علماء السلف، 1414هـ. تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ. عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق ، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408هـ. صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423 هـ. الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري، نشر: مطبعة السعادة، الطبعة: الثانية 1392هـ 1972م.

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न रेशम पहनो और न दीबाज (मोटे रेशमी वस्त्र)। न सोने-चाँदी के बरतन में पियो और न उनकी थाली में खाओ। क्योंकि यह वस्तुएँ दुनिया में उन (काफ़िरों) के लिए हैं और आख़िरत में हमारे लिए।

عَن عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبِي لَيْلَى أَنَّهُمْ كَانُوا عِنْدَ حُذَيْفَةَ، فَاسْتَسْقَى فَسَقَاهُ مَجُوسِيٌّ، فَلَمَّا وَضَعَ القَدَحَ فِي يَدِهِ رَمَاهُ بِهِ، وَقَالَ: لَوْلاَ أَنِّي نَهَيْتُهُ غَيْرَ مَرَّةٍ وَلاَ مَرَّتَيْنِ -كَأَنَّهُ يَقُولُ: لَمْ أَفْعَلْ هَذَا-، وَلَكِنِّي سَمِعْتُ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «لاَ تَلْبَسُوا الحَرِيرَ وَلاَ الدِّيبَاجَ، وَلاَ تَشْرَبُوا فِي آنِيَةِ الذَّهَبِ وَالفِضَّةِ، وَلاَ تَأْكُلُوا فِي صِحَافِهَا، فَإِنَّهَا لَهُمْ فِي الدُّنْيَا وَلَنَا فِي الآخِرَةِ».
अब्दुर रहमान बिन अबू लैला से रिवायत है कि वह हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अनहु के पास मौजूद थे कि उसी दौरान उन्होंने पीने के लिए पानी माँगा तो एक मजूसी ने पानी प्रस्तुत किया। जब उसने पानी का प्याला उनके हाथ में रखा, तो उन्होंने उसे उसी प्याले से मार दिया और फ़रमाया : अगर मैंने इसे एक-दो बार (सोने एवं चाँदी के बर्तन के प्रयोग से) मना न किया होता, तो मैं ऐसा न करता। मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फ़रमाते हुए सुना है : "न रेशम पहनो और न दीबाज (मोटे रेशमी वस्त्र)। न सोने-चाँदी के बरतन में पियो और न उनकी थाली में खाओ। क्योंकि यह वस्तुएँ दुनिया में उन (काफ़िरों) के लिए हैं और आख़िरत में हमारे लिए।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पुरुषों को हर प्रकार के रेश्मी वस्त्र पहनने से मना किया है। इसी तरह पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों को सोने और चाँदी के बर्तनों में खाने और पीने से मना किया है। साथ ही बताया कि यह चीज़ें क़यामत के दिन विशेष रूप से ईमान वालों को नसीब होंगी। क्योंकि वे दुनिया में उनसे अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए बचते रहे हैं। जबकि अविश्वासियों को आख़िरत में यह चीज़ें नसीब नहीं होंगी। क्योंकि वे सांसारिक जीवन में अल्लाह के आदेश की अवहेलना करते हुए इन चीज़ों का उपभोग कर लेते हैं।

फ़ायदे
  1. पुरुषों पर रेशम और दीबाज के कपड़े हराम हैं और इनके वस्त्र पहनने वालों को बड़ी सख़्त चेतावनी दी गई है।
  2. स्त्रियों के लिए रेशम और दीबाज के कपड़े हलाल हैं।
  3. सोने और चाँदी की प्लेटों और बर्तनों में खाना और पीना मर्दों और औरतों दोनों पर हराम है।
  4. यहाँ हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अनहु ने बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया दी और कारण यह बताया कि उन्होंने एक से अधिक बार सोने एवं चाँदी के बर्तन के प्रयोग से मना किया था, लेकिन वह अपनी हरकत से बाज़ नहीं आया।
हवाला

صحيح البخاري (7/ 77) (5426). صحيح مسلم (3/ 1638) (2067). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله البسام (ص729).

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जिसने दुनिया में रेशमी वस्त्र पहना, वह उसे आख़िरत में नहीं पहनेगा।

عَنْ عُمَرَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَنْ لَبِسَ الحَرِيرَ فِي الدُّنْيَا لَمْ يَلْبَسْهُ فِي الآخِرَةِ».
उमर रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने दुनिया में रेशमी वस्त्र पहना, वह उसे आख़िरत में नहीं पहनेगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जिस पुरुष व्यक्ति ने दुनिया में रेशमी वस्त्र पहना और तौबा किए बिना मर गया, वह दंड स्वरूप आख़िरत में उसे पहनने से वंचित रखा जाएगा।

फ़ायदे
  1. रेशम से मुराद शुद्ध प्राकृतिक रेशम है। कृतिम रेशम इसमें शामिल नहीं है।
  2. पुरुषों के लिए रेशमी वस्त्र हराम है।
  3. रेशम पहनने की मनाही में उसे पहनना और बिछाना दोनों शामिल है।
  4. पुरुषों के लिए कपड़े में थोड़े-बहुत रेशम की अनुमति है, जिसकी चौड़ाई दो से चार उंगलियों से अधिक न हो और जो कपड़े में नक़्श व निगार या हाशिया के तौर पर प्रयुक्त हुआ है।
हवाला

صحيح البخاري (7/ 150) (5834). صحيح مسلم (3/ 1641) (2069). منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (4/ 207).

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अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने दो अथवा तीन अथवा चार अंगुल समान रेशम पहनने की अनुमति दी है

عن عمر بن الخطاب رضي الله عنه أَنَّ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم «نهى عن لُبُوسِ الحَرِيرِ إلا هكذا، ورَفَعَ لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أُصْبُعَيْهِ: السَّبَّابَةَ، والوُسْطَى». ولمسلم «نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن لُبْس ِالحَرِيرِ إلا مَوْضِعَ أُصْبُعَيْنِ، أو ثلاثٍ، أو أربعٍ».
उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने रेशम पहनने से मना किया है, परन्तु इतना-सा। तथा अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें शहादत की और बीच वाली दो अंगुलियाँ उठाकर दिखाईं। तथा मुस्लिम की रिवायत में है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रेशम पहनने से मना किया है। यह और बात है कि दो, तीन या चार अंगुल के बराबर हो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मर्दों को रेशमी कपड़े के प्रयोग से मना किया है, सिवाय उसके जिसे अपवाद घोषित किया गया है। वैसे बुख़ारी तथा मुस्लिम की रिवायत में दो ऊँगली तक की छूट दी गई है, जबकि मुस्लिम की रिवायत में तीन या चार उँगली की छूट दी गई है। ऐसे में अधिकतर को लिया जाएगा। इसलिए वस्त्र में चार उँगली तक रेशम होने में कोई नुक़सान नहीं है।

हवाला

1- صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ. 2- صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ. 3- تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الأمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة 1426هـ. 4- تأسيس الأحكام، أحمد بن يحيى النجمي، دار علماء السلف، الطبعة: الثانية 1414هـ.

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जब तुम वस्त्र धारण करो अथवा वज़ू करो तो दाहिने ओर से प्रारंभ करो

عن أبي هريرة رضي الله عنه مرفوعًا: «إِذَا لَبِسْتُم، وَإِذَا تَوَضَّأتُم، فَابْدَأُوا بَأَيَامِنُكُم».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "जब तुम वस्त्र धारण करो अथवा वज़ू करो, तो दाहिने ओर से प्रारंभ करो।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- की यह हदीस सभी अच्छे कार्यों को दाएँ हाथ से करने पर ज़ोर देती है। उनका वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जब तुम वस्त्रधारण करो" यानी जब कपड़ा पहनने का इरादा करो। "तथा जब तुम वज़ू करो" यानी जब वज़ू करने का इरादा करो। "तो दाहिने ओर से प्रारंभ करो।" इस हदीस में आया हुआ शब्द 'أيامن' बहुवचन है 'أيمن' का। यह बाएँ के विपरीत को कहते हैं। इस हदीस का आशय यह है कि कुर्ता आदि पहनते समय दाएँ हाथ को पहले घुसाया जाएगा और वज़ू करते समय दाएँ हाथ एवं पाँव को बाएँ हाथ एवं पाँव से पहले धोया जाएगा। याद रहे कि वज़ू के कुछ अंग ऐसे भी हैं, जिनमें दाएँ-बाएँ का ख़याल रखना मुसतहब नहीं है। वह हैं, दोनों कान, दोनों हथेलियाँ और दोनों गाल। इन्हें एक साथ पाक किया जाएगा। यदि ऐसा संभव न हो, मसलन किसी का एक हाथ कटा हुआ हो, तो वह दाएँ अंग से आरंभ करेगा।

हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415هـ. تطريز رياض الصالحين، للشيخ فيصل المبارك، ط1، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة، الرياض، 1423هـ. جامع الترمذي، تحقيق وتعليق: أحمد محمد شاكر وآخرون، ط2، شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي ، مصر، 1395هـ. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين لمحمد علي بن محمد بن علان، ط4، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة، بيروت، 1425هـ. رياض الصالحين للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428هـ. رياض الصالحين، ط4، تحقيق: عصام هادي، وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية القطرية، دار الريان، بيروت، 1428هـ. سنن أبي داود ،تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد، المكتبة العصرية، بيروت. سنن ابن ماجه، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء الكتب العربية، فيصل عيسى البابي الحلبي. الشرح الممتع على زاد المستقنع، لمحمد بن صالح بن محمد العثيمين، ط1، دار ابن الجوزي، 1422 - 1428هـ. كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، ط1، كنوز إشبيليا، الرياض، 1430هـ. مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط و عادل مرشد، وآخرون، تحت إشراف: د عبد الله بن عبد المحسن التركي، ط1، مؤسسة الرسالة، 1421هـ. مشكاة المصابيح للتبريزي، تحقيق: محمد ناصر الدين الألباني، ط3، المكتب الإسلامي، بيروت، 1985م. المنهاج شرح صحيح مسلم بن الحجاج، للنووي، ط2، دار إحياء التراث العربي - بيروت، 1392هـ. شرح رياض الصالحين، للشيخ ابن عثيمين، دار الوطن للنشر، الرياض، 1426هـ. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.

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मुसलमान का तहबंद आधी पिंडली तक होना चाहिए और यदि आधी पिंडली एवं टखने के बीच हो, तो भी कोई हर्ज (अथवा गुनाह) नहीं है। हाँ, जो दोनों टखनों से नीचे होगा, वह जहन्नम में होगा, तथा जो अपना तहबंद अभिमान के तौर पर लटकाएगा, अल्लाह उसपर अपनी नज़र नहीं डालेगा।

عَنْ أبي سَعيدٍ الخُدريَّ رضي الله عنه قال: قال رسولُ الله صلَّى الله عليه وسلم ِ: «إزْرَةُ المُسْلمِ إلى نصفِ السَّاق، وَلَا حَرَجَ -أو لا جُنَاحَ- فيما بينَهُ وبينَ الكعبينِ، وما كان أسفلَ منَ الكعبين فهو في النار، مَن جرَّ إزارَهُ بطرًا لم يَنْظُرِ اللهُ إليه».
अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "मुसलमान का तहबंद आधी पिंडली तक होना चाहिए और यदि आधी पिंडली एवं टखने के बीच हो, तो भी कोई हर्ज (अथवा गुनाह) नहीं है। हाँ, जो दोनों टखनों से नीचे होगा, वह जहन्नम में होगा, तथा जो अपना तहबंद अभिमान के तौर पर लटकाएगा, अल्लाह उसपर अपनी नज़र नहीं डालेगा।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यहाँ बताया है कि एक मुसलमान की लुंगी यानी पुरुषों के शरीर के निचले आधे भाग को ढाँकने वाले कपड़े की तीन हालतें हुआ करती हैं : 1- लुंगी को आधी पिंडली तक रखना मुसतहब है। 2- आधी पिंडली से टखनों यानी पिंडली और क़दम के जोड़ के पास की दो उभरी हुई हड्डियों के बीच रखना जायज़ है और इसमें कोई कराहत नहीं है। 3- टखनों से नीचे लटकाना हराम है। डर इस बात का है कि उसे आग की यातना का सामना करना पड़े। ऐसा अगर अभिमान एवं सरकशी में किया जाता है, तो अल्लाह उसकी ओर देखेगा तक नहीं।

फ़ायदे
  1. यह चेतावनी केवल पुरुषों के साथ खास है। महिलाएँ इसके दायरे में नहीं आतीं, क्योंकि उनको पूरा शरीर छुपाकर रखने का आदेश है।
  2. पुरुषों के शरीर के निचले आधे भाग को ढाँकने वाले हर कपड़े, जैसे पाजामाम और उसकी तरह के अन्य कपड़ों को इज़ार कहा जाएगा और ये सारे कपड़े इस हदीस में बयान किए गए शरई निर्देश के दायरे में आएँगे।
हवाला

سنن أبي داود (6/ 191) (4093). سنن ابن ماجه (4/ 583) (3573). مسند أحمد (17/ 52) (11010). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 637). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 95). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (10/ 582). المعجم الوسيط، (1/ 16).

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जब तुममें से कोई जूता पहने, तो दाएँ पाँव से शुरू करे और जब जूता उतारे, तो बाएँ पाँव से शुरू करे। दाएँ पाँव में पहले जूता पहना जाए और बाद में उतारा जाए।

عن علي بن أبي طالب رضي الله عنه مرفوعاً: «إذا انْتَعَل أحدكم فليبدأ باليمين، وإذا نَزَعَ فليبدأ بالشمال، ولْتَكُن اليُمنى أولَهُما تُنْعَل، وآخِرَهُما تُنْزَع».
अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हुए कहते हैंः "जब तुममें से कोई जूता पहने, तो दाएँ पाँव से शुरू करे और जब जूता उतारे, तो बाएँ पाँव से शुरू करे। दाएँ पाँव में पहले जूता पहना जाए और बाद में उतारा जाए।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

जूता पहनने का मुसतहब तरीक़ा यह है कि पहले दाएँ पाँव में पहना जाए और जूता उतारने का मुसतहब तरीक़ा यह है कि पहले बाएँ पाँव का जूता उतारा जाए। क्योंकि इसमें दाएँ पाँव के सम्मान का पक्ष निहित है।

हवाला

منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان، دار ابن الجوزي. ط1، 1428هـ. توضِيحُ الأحكَامِ مِن بُلوُغ المَرَام، للبسام. مكتَبة الأسدي، مكّة المكرّمة، الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م. صحيح البخاري, تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري, تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر, دار طوق النجاة ترقيم محمد فؤاد عبدالباقي, ط 1422هـ. صحيح مسلم, تأليف: مسلم بن حجاج النيسابوري, تحقيق: محمد فؤاد عبدالباقي, دار إحياء التراث العربي.

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तुममें से कोई एक जूता पहनकर न चले। या तो दोनों पहनकर चले या दोनों उतार दे।

عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «لا يمش أحدكم في نعل واحدة، لِيُنْعِلهما جميعًا، أو لِيَخْلَعْهُمَا جميعًا».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः "तुममें से कोई एक जूता पहनकर न चले। या तो दोनों पहनकर चले या दोनों उतार दे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक जूता पहनकर चलने से मना किया है। इनसान या तो दोनों जूता पहनकर चले या फिर दोनों को उतारकर पैदल चले। यह शिष्टाचार इस बात का प्रमाण है कि इस्लामी शरीयत ने छोटी-छोटी बातों का भी ख़याल रखा है, और उसने जीवन के सभी भागों पर प्रकाश डाला है।

हवाला

صحيح البخاري، المحقق: محمد زهير بن ناصر الناصر، الناشر: دار طوق النجاة، الطبعة: الأولى 1422هـ. صحيح مسلم بن الحجاج، المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي، بيروت. شرح رياض الصالحين، محمد بن صالح العثيمين، الناشر: دار الوطن للنشر، الطبعة: 1426 هـ. فتح ذي الجلال والإكرام شرح بلوغ المرام،محمد بن صالح بن محمد العثيمين، تحقيق: صبحي بن محمد رمضان، وأُم إسراء بنت عرفة، المكتبة الإسلامية، القاهرة، الطبعة الأولى، 1427هـ. توضيح الأحكام من بلوغ المرام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، مكتبة الأسدي، مكة، الطبعة الخامسة، 1423. رياض الصالحين، للنووي، الطبعة الأولى، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428 هـ.

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15 में से 8
15 हदीसें
  1. अल्लाह के रसूल- सल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सोने की एक अँगूठी बनवाई।
  2. न रेशम पहनो और न दीबाज (मोटे रेशमी वस्त्र)। न सोने-चाँदी के बरतन में पियो और न उनकी थाली में खाओ। क्योंकि यह वस्तुएँ दुनिया में उन (काफ़िरों) के लिए हैं और आख़िरत में हमारे लिए।
  3. जिसने दुनिया में रेशमी वस्त्र पहना, वह उसे आख़िरत में नहीं पहनेगा।
  4. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने दो अथवा तीन अथवा चार अंगुल समान रेशम पहनने की अनुमति दी है
  5. जब तुम वस्त्र धारण करो अथवा वज़ू करो तो दाहिने ओर से प्रारंभ करो
  6. मुसलमान का तहबंद आधी पिंडली तक होना चाहिए और यदि आधी पिंडली एवं टखने के बीच हो, तो भी कोई हर्ज (अथवा गुनाह) नहीं है। हाँ, जो दोनों टखनों से नीचे होगा, वह जहन्नम में होगा, तथा जो अपना तहबंद अभिमान के तौर पर लटकाएगा, अल्लाह उसपर अपनी नज़र नहीं डालेगा।
  7. जब तुममें से कोई जूता पहने, तो दाएँ पाँव से शुरू करे और जब जूता उतारे, तो बाएँ पाँव से शुरू करे। दाएँ पाँव में पहले जूता पहना जाए और बाद में उतारा जाए।
  8. तुममें से कोई एक जूता पहनकर न चले। या तो दोनों पहनकर चले या दोनों उतार दे।
  9. अल्लाह उस व्यक्ति की ओर नहीं देखेगा, जो अभिमान के कारण अपना कपड़ा लटकाकर चलता हो।
  10. जिसने अल्लाह के लिए विनम्रता दिखाते हुए ऐसा वस्त्र पहनने से गुरेज़ किया, जिसे पहनने की वह शक्ति रखता है, अल्लाह क़यामत के दिन उसे सारी सृष्टियों के सामने बुलाएगा और अख़्तियार देगा कि ईमान का जो जोड़ा वह पहनने चाहे, पहन ले।
  11. मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास से गुजरा। उस समय मेरी लुँगी ढ़ीली होकर नीचे लटक चुकी थी। अतः, आपने फ़रमायाः ऐ अब्दुल्लाह, अपनी लुँगी ऊपर उठाओ। मैंने उसे ऊपर उठाया, तो आपने फिर फ़रमायाः और उठाओ। चुनांचे मैंने और उठा लिया। उसके पश्चात मैं सर्वदा इसका ध्यान रखता हूँ। किसी ने पूछा कि आपको कहाँ तक लुँगी उठाने का आदेश मिला था? तो कहाः आधी पिंडलियों तक।
  12. अभिमान तथा अहंकार का हराम होना और इसका बुरा अंत
  13. एक मर्द दूसरे मर्द के गुप्तांग और एक महिला दूसरी महिला के गुप्तांग को न देखे
  14. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आदमी को खड़े होकर जूता पहनने से मना फ़रमाया है
  15. अपने कपड़ों में से सफ़ेद कपड़े पहना करो। ये तुम्हारे सबसे अच्छे कपड़ों में से हैं। तथा इन्हीं में अपने मुर्दों को दफ़न किया करो।

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com