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तशरीह के साथ हदीसें

सलाम करने तथा प्रवेश की अनुमति लेने के आदाब

24 हदीसें

यदि कोई व्यक्ति तुम्हारी अनुमति के बिना तुम्हें झाँके और तुम कंकड़ मारकर उसकी आँख फोड़ दो, तो तुम्हें कोई गुनाह न होगा

عن أبي هُريرة -رضي اللهُ عنه- مرفوعًا: «لو أن رجلا -أو قال: امْرَأً- اطَّلَعَ عليك بغير إِذْنِكَ؛ فَحَذَفْتَهُ بحَصَاةٍ، فَفَقَأْتَ عينه: ما كان عليك جُنَاحٌ».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से मरफ़ूअन वर्णित है कि यदि कोई व्यक्ति तुम्हारी अनुमति के बिना तुम्हें झाँके और तुम कंकड़ मारकर उसकी आँख फोड़ दो, तो तुम्हें कोई गुनाह न होगा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बताया है कि यदि कोई इनसान किसी को उसकी अनुमति के बिना, उसके घर के द्वार से अथवा दीवार आदि के ऊपर से झाँके और वह उसकी ओर कंकड़ फेंककर उसकी आँख फोड़ दे या किसी लोहे से उसकी आँख को ज़ख़्मी कर दे, तो इस फोड़ने तथा ज़ख़्मी करने वाले पर न गुनाह है और न प्रतिकार। क्योंकि असल क़सूर झाँकने वाले का है।

हवाला

1- صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ. 2- صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ. 3- تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الإمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة 1426هـ. 4- تأسيس الأحكام، أحمد بن يحيى النجمي، دار علماء السلف، الطبعة: الثانية 1414هـ.

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मैंने अपने मन में सोचा कि आज मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का द्वारपाल बनने का सौभाग्य प्राप्त करूँगा। इतने में अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहु) आए और दरवाज़ा खटखटाया। मैंने कहाः कौन हैं? तो फ़रमायाः अबू बक्र। मैंने कहाः तनिक रुकिए। फिर मैं आपके पास गया और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहु) अनुमति माँग रहे हैं। आपने फ़रमायाः "उन्हें अनुमति दो तथा जन्नत की शुभ सूचना भी दो।"

عن أبي موسى الأشعري رضي الله عنه أَنَّهُ تَوَضَّأ في بيتِهِ، ثُمَّ خَرَج، فقَال: لَأَلْزَمَنَّ رسُول الله صلى الله عليه وسلم ولَأَكُونَنَّ مَعَهُ يَومِي هَذَا، فَجَاءَ الْمَسْجِدَ، فَسَألَ عَنِ النبيِّ -صلَّى الله عليه وسلَّم- فَقَالُوا وَجَّهَ هَاهُنَا، قال: فَخَرَجْتُ عَلَى أَثَرِهِ أَسأَلُ عنْهُ، حتَّى دخَلَ بِئْرَ أَرِيسٍ، فَجَلَستُ عِندَ البَابِ حتَّى قَضَى رسُولُ الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- حَاجَتَهُ وَتَوَضَّأ، فَقُمتُ إِلَيهِ، فَإِذَا هُوَ قَدْ جَلَسَ عَلَى بِئْرِ أَرِيسٍ وَتَوَسَّطَ قُفَّهَا، وكَشَفَ عَنْ سَاقَيهِ وَدلَّاهُمَا فِي البِئرِ، فَسَلَّمتُ علَيه ثُمَّ انْصَرَفْتُ، فَجَلَسْتُ عِند البَابِ، فقُلتُ: لأَكُونَنَّ بَوَّابَ رسُول الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- اليَومَ، فجَاءَ أَبُو بَكر -رضِيَ الله عنْهُ- فَدَفَعَ البَابَ، فقُلتُ: مَنْ هَذَا؟ فَقَالَ: أَبُو بَكْرٍ، فقُلتُ: عَلَى رِسْلِكَ، ثُمَّ ذَهَبتُ، فَقُلْتُ: يَا رسُولَ الله، هَذَا أبُو بكرٍ يَسْتَأذِنُ، فقَالَ: «ائْذَنْ لَهُ وَبَشِّرْهُ بِالجَنَّةِ» فَأَقْبَلْتُ حتَّى قُلتُ لَأَبِي بَكْرٍ: ادْخُلْ وَرَسُولُ الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- يُبَشِّرُكَ بِالْجَنَّةِ، فَدَخَلَ أَبُو بَكرٍ حَتَّى جَلَسَ عَن يَمِينِ النبيِّ -صلَّى الله عليه وسلَّم- مَعَهُ فِي القُفِّ، ودَلَّى رِجْلَيهِ فِي البِئْرِ كَمَا صَنَعَ رَسُولُ الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- وَكَشَفَ عَنْ سَاقَيهِ، ثُمَّ رَجَعْتُ وَجَلَسْتُ، وَقَدْ تَرَكْتُ أَخِي يَتَوَضَّأ وَيَلْحَقُنِي، فَقُلْتُ: إِنْ يُرِدِ اللهُ بِفُلاَنٍ - يُريِدُ أَخَاهُ - خَيرًا يَأتِ بِهِ، فَإِذَا إِنسَانٌ يُحَرِّكُ البَّابَ، فقُلتُ: مَنْ هَذَا؟ فقَالَ: عُمَرُ بن الخَطَّابِ، فقُلتُ: عَلَى رِسْلِكَ، ثُمَّ جِئْتُ إِلَى رسُول الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- فَسَلَّمْتُ عَلَيهِ وقُلْتُ: هَذَا عُمَرُ يَسْتَأْذِنُ؟ فَقَال: «ائْذَنْ لَهُ وَبَشِّرْهُ بِالجَنَّةِ» فَجِئْتُ عُمَرَ، فَقُلتُ: أَذِنَ وَيُبَشِّرُكَ رَسُولُ الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- بِالجَنَّةِ، فَدَخَلَ فَجَلَسَ مَعَ رسُولِ الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- فِي القُفِّ عَنْ يَسَارِهِ وَدَلَّى رِجْلَيهِ فِي البِئْرِ، ثُمَّ رَجَعْتُ فَجَلَسْتُ، فَقُلتُ: إِن يُرِدِ اللهُ بِفُلاَنٍ خَيرًا -يعنِي أَخَاهُ- يَأتِ بِهِ، فَجَاءَ إِنسَانٌ فَحَرَّكَ البَابَ، فقُلتُ: مَنْ هَذَا؟ فقَالَ: عُثمَانُ بنُ عَفَّان، فقُلتُ: عَلَى رِسْلِكَ، وَجِئتُ النبِيَّ -صلَّى الله عليه وسلَّم- فَأَخبَرتُهُ، فقَالَ: «ائْذَنْ لَهُ وَبَشِّرهُ بِالجَنَّةِ مَعَ بَلوَى تُصِيبُهُ» فَجِئتُ، فقُلتُ: ادْخُل وَيُبَشِّرُكَ رسُول الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- بِالجَنَّةِ مَعَ بَلوَى تُصِيبُكَ، فَدَخَلَ فَوَجَدَ القُفَّ قَدْ مُلِئَ، فَجَلَسَ وِجَاهَهُم مِنَ الشِقِّ الآخَرِ. قال سعيد بنُ الْمُسَيِّبِ: فَأَوَّلْتُهَا قُبُورَهُم. وزاد في رواية: وَأَمَرَنِي رسُول الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- بِحفظِ البابِ، وفيها: أنَّ عُثمَانَ حِينَ بَشَّرَهُ حَمِدَ الله -تَعَالَى-، ثُمَّ قَالَ: اللهُ الْمُسْتَعَانُ.
अबू मूसा अशअरी (रज़ियल्लाहु अंहु) से वर्णित है कि उन्होंने अपने घर में वज़ू किया और फिर यह कहते हुए निकले कि मैं आज दिन भर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ रहूँगा। चुनांचे मस्जिद आए और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बारे में पूछा, तो लोगों ने कहा कि आप उधर गए हैं। वह कहते हैंः मैं आपके बारे में पूछते हुए आपकी तलाश में निकल पड़ा, यहाँ तक कि आप अरीस नामी कुएँ के पास गए। मैं कुएँ वाले बाग़ के द्वार पर बैठ गया। जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी हाजत पूरी कर चुके और वज़ू कर लिया, तो मैं आपके पास आया। देखा कि आप अरीस कुएँ की मुंडेर के बीच मे बैठे हैं और अपनी पिंडलियों को खोलकर कुएँ में पाँव लटकाए हुए हैं। मैं आपको सलाम करके वापस आ गया और द्वार के पास बैठ गया। मैंने अपने मन में सोचा कि आज मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का द्वारपाल बनने का सौभाग्य प्राप्त करूँगा। इतने में अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहु) आए और दरवाज़ा खटखटाया। मैंने कहाः कौन हैं? तो फ़रमायाः अबू बक्र। मैंने कहाः तनिक रुकिए। फिर मैं आपके पास गया और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहु) अनुमति माँग रहे हैं। आपने फ़रमायाः "उन्हें अनुमति दो तथा जन्नत की शुभ सूचना भी दो।" मैं आया और अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहु) से कहाः ऐ अबू बक्र, अंदर जाईए तथा अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आपको जन्नत की शुभ सूचना दी है। चुनांचे अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहु) अंदर गए और आपके साथ मुंडेर पर आपकी दाएँ ओर बैठ गए और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ही की तरह दोनों पिंडलियों को खोलकर दोनों पाँव कुएँ में लटका दिए। फिर मैं वापस आकर बैठ गया। चूँकि मैं अपने भाई को वज़ू करते हुए छोड़ आया था और उसे भी मेरे पीछे आना था, इसलिए दिल में सोचा कि यदि अल्लाह अमुक (उनका आशय अपने भाई से था) के साथ भलाई चाहता है, तो उसे ले आएगा। इसी बीच किसी ने द्वार खटखटाया। मैंने कहाः कौन हैं? कहाः उमर बिन ख़त्ताब। मैंने कहाः ज़रा रुकिए। फिर मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास गया, सलाम किया और कहाः उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) अनुमति माँग रहे हैं। आपने फ़रमायाः अनुमति दो और जन्नत की शुभ सूचना सुना दो। मैंने उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) के पास वापस आकर कहाः अनुमति दी है तथा अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) आपको जन्नत की शुभ सूचना दे रहे हैं। चुनांचे उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) अंदर गए और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ मुंडेर पर आपकी बाएँ जानिब बैठ गए और दोनों पाँव कुएँ में लटका दिए। फिर मैं वापस आकर बैठ गया और सोचा कि यदि अल्लाह अमुक (उनका आशय़ अपने भाई से था) के साथ भलाई का इरादा करे, तो उसे ले आएगा। इतने में एक आदमी आए और द्वार हिलाया। मैंने कहाः कौन हैं? उत्तर मिलाः उसमान बिन अफ़्फ़ान। मैंने कहाः ज़रा रुकिए। फिर मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास गया और बताया, तो फ़रमायाः अनुमति दो और उन्हें जन्नत की शुभ सूचना सुना दो, मगर एक आज़माइश के साथ, जिसका सामना उनको करना पड़ेगा। मैं आया और बोलाः अंदर जाईए और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) आपको जन्नत की शुभ सूचना दे रहे हैं, एक आज़माइश के साथ, जिसका सामना आपको करना पड़ेगा। वह अंदर गए, तो देखा कि मुंडेर भर गई है। अतः, उनके सामने दूसरे किनारे पर बैठ गए। सईद बिन मुसय्यिब कहते हैं कि मैंने इसका अर्थ उनकी क़ब्रों से लिया। एक अन्य रिवायत में यह इज़ाफ़ा हैः अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मुझे द्वार की सुरक्षा करने का आदेश दिया। तथा उसी रिवायत में हैः उसमान (रज़ियल्लाहु अंहु) को जब जन्नत की शुभ सूचना दी, तो अल्लाह (तआला) की प्रशंसा की और फिर फ़रमायाः अल्लाह ही सहायक है।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415ه. تطريز رياض الصالحين للشيخ فيصل المبارك، ط1، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة، الرياض، 1423هـ. رياض الصالحين للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428هـ. شرح رياض الصالحين للشيخ ابن عثيمين، دار الوطن للنشر، الرياض، 1426هـ. صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت. كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، ط1، كنوز إشبيليا، الرياض، 1430هـ. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.

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जब तुममें से कोई सभा में आए, तो सलाम करे और जब सभा से निकलना चाहे तो सलाम करे, क्योंकि पहला सलाम दूसरे से अधिक हक़दार नहीं है।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضيَ اللهُ عنهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِذَا انْتَهَى أَحَدُكُمْ إِلَى الْمَجْلِسِ فَلْيُسَلِّمْ، فَإِذَا أَرَادَ أَنْ يَقُومَ فَلْيُسَلِّمْ، فَلَيْسَتِ الْأُولَى بِأَحَقَّ مِنَ الْآخِرَةِ».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जब तुममें से कोई सभा में आए, तो सलाम करे और जब सभा से निकलना चाहे तो सलाम करे, क्योंकि पहला सलाम दूसरे से अधिक हक़दार नहीं है।"
इसे अबू दावूद ने, तिर्मिज़ी ने तथा नसई ने अल-सुनन अल-कुबरा में एवं अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने निर्देश दिया है कि जो व्यक्ति किसी सभा में पहुँचे, वह वहाँ उपस्थित लोगों को सलाम करे और जब वहाँ से जाना चाहे, तो सलाम करके विदा हो। क्योंकि आगमन के समय सलाम करना विदा होते समय सलाम करने से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है।

फ़ायदे
  1. सलाम आम करने की प्रेरणा।
  2. सभा में पहुँचते और सभा से निकलते समय सभा में मौजूद लोगों को सलाम करने की प्रेरणा।
  3. सिंधी कहते हैं : हदीस के शब्दों "وإذا أراد أن يقوم" का अर्थ है : जब सभा से खड़ा होना चाहे। इसी प्रकार अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्दों "فليس الأول بأحق" का अर्थ है : इन दोनों स्थानों पर सलाम करना सुन्नत है और इसपर अमल होना चाहिए। अतः एक जगह सलाम करने और दूसरी जगह न करने का कोई औचित्य नहीं है।
हवाला

سنن أبي داود (7/ 500) (5208). سنن الترمذي (4/ 432) (2706). السنن الكبرى للنسائي (9/ 144) (10129). مسند أحمد (12/ 47) (7142). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (11/ 360). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 142). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص523). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 672).

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नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब कोई बात कहते, तो तीन बार कहते, ताकि आपकी बात को ठीक से समझ लिया जाए और जब किसी समूह के पास जाते और उन्हें सलाम करते, तो तीन बार सलाम करते।

عن أنس بن مالك رضي الله عنه أَنَّ النَبيَّ -صلَّى الله عليه وسلَّم- كَان إِذَا تَكَلَّمَ بِكَلِمَةٍ أَعَادَهَا ثَلاَثًا حَتَّى تُفْهَمَ عَنْهُ، وَإِذَا أَتَى عَلَى قَوْمٍ فَسَلَّمَ عَلَيهِم سَلَّمَ عَلَيهِم ثَلاَثًا.
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब कोई बात कहते, तो तीन बार कहते, ताकि आपकी बात को ठीक से समझ लिया जाए और जब किसी समूह के पास जाते और उन्हें सलाम करते, तो तीन बार सलाम करते।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الدمام، الطبعة: الأولى، 1415هـ. تطريز رياض الصالحين، فيصل بن عبد العزيز المبارك، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة للنشر والتوزيع، الرياض، الطبعة: الأولى، 1423ه - 2002م. رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، أبو زكريا محيي الدين النووي، تحقيق ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، الطبعة: الأولى، 1428هـ. رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، أبو زكريا محيي الدين النووي، تحقيق: عصام هادي، وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية القطرية، دار الريان، بيروت، الطبعة: الرابعة، 1428هـ. شرح رياض الصالحين، محمد بن صالح العثيمين، دار الوطن، الرياض، الطبعة: 1426هـ. صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة: الأولى، 1422هـ. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الرابعة عشر، 1407هـ.

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जब तुममें से कोई अपने भाई से मिले, तो उसे सलाम करे। फिर, अगर दोनों के बीच पेड़, दीवार या पत्थर आ जाए और वह उससे (दोबारा) मिले, तो फिर उसे सलाम करे।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «إِذَا لَقِيَ أَحَدُكُمْ أَخَاهُ فَلْيُسَلِّمْ عَلَيْهِ، فَإِنْ حَالَتْ بَيْنَهُمَا شَجَرَةٌ أَوْ جِدَارٌ أَوْ حَجَرٌ ثُمَّ لَقِيَهُ فَلْيُسَلِّمْ عَلَيْهِ أَيْضًا».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुममें से कोई अपने भाई से मिले, तो उसे सलाम करे। फिर, अगर दोनों के बीच पेड़, दीवार या पत्थर आ जाए और वह उससे (दोबारा) मिले, तो फिर उसे सलाम करे।"
इसे अबू दावूद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस बात की प्रेरणा दे रहे हैं कि एक मुसलमान जब भी अपने भाई से मिले तो उसे सलाम करे। यहाँ तक कि अगर दोनों साथ चल रहे हों और इसी दौरान बीच में पेड़, दीवार या कोई बड़ा पत्थर आ जाए, तो दोबारा मिलते समय फिर से उसे सलाम करे।

फ़ायदे
  1. सलाम को आम करना और हर स्थिति परिवर्तन के बाद फिर से सलाम करना मुसतहब है।
  2. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मुसलमानों के बीच सलाम की सुन्नत को आम करने के लिए प्रयासरत रहा करते थे, क्योंकि इससे मुसलमानों के बीच प्रेम पैदा होता है।
  3. सलाम करने से मुराद "अस्सलामु अलैकुम" या "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू" कहना है। इसके अंदर मुसाफ़हा शामिल नहीं है, जो पहली बार मिलते समय किया जाता है।
  4. सलाम दुआ है और ज़रूरत इस बात की है कि मुसलमान एक-दूसरे के लिए बार-बार दुआ करें।
हवाला

سنن أبي داود (7/ 494) (5200). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص520). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 138). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 667). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 410).

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जब अल्लाह ने आदम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पैदा किया तो कहा कि जाओ और उन (बैठे हुए फ़रिश्तों) को सलाम करो और सुनो कि वे क्या उत्तर देते हैं, क्योंकि वही तुम्हारा और तुम्हारी संतान का सलाम होगा।

عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «لما خلق الله آدم صلى الله عليه وسلم قال: اذهب فَسَلِّمْ على أولئك -نَفَرٍ من الملائكة جلوس- فاستمع ما يُحَيُّونَكَ؛ فإنها تَحِيَّتُكَ وتحية ذُرِّيتِكَ. فقال: السلام عليكم، فقالوا: السلام عليك ورحمة الله، فَزَادُوهُ: ورحمة الله».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जब अल्लाह ने आदम (अलैहिस्सलाम) को पैदा किया तो कहा कि जाओ और उन (बैठे हुए फ़रिश्तों) को सलाम करो और सुनो कि वे क्या उत्तर देते हैं, क्योंकि वही तुम्हारा और तुम्हारी संतान का सलाम होगा। आदम- अलैहिस्लाम- ने कहाः 'السلام عليكم' और फ़रिश्तों ने उत्तर में कहाः 'السلام عليك ورحمة الله' इस तरह उन्होंने उनके उत्तर में 'ورحمة الله' बढ़ाकर कहा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، للهلالي، نشر: دار ابن الجوزي. صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه. منار القاري شرح مختصر صحيح البخاري، لحمزة محمد قاسم، عني بتصحيحه ونشره: بشير محمد عيون، الناشر: مكتبة دار البيان، دمشق - الجمهورية العربية السورية، مكتبة المؤيد، الطائف - المملكة العربية السعودية، عام النشر: 1410 هـ - 1990 م.

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ऐ अबू बत्न, हम केवल शांति स्थापित करने के लिए जाते हैं और इसी लिए हर मिलने वाले को सलाम करते हैं।

عن الطُّفَيْلَ بن أُبَيِّ بْنِ كَعْبٍ: أنه كان يأتي عبد الله بن عمر، فيَغْدُو معه إلى السوق، قال: فإذا غَدَوْنَا إلى السوق، لم يَمُرَّ عبد الله على سَقَّاطٍ ولا صاحب بَيْعَةٍ ، ولا مسكين، ولا أحد إلا سَلَّمَ عليه، قال الطُفيل: فجئت عبد الله بن عمر يوما، فَاسْتَتْبَعَنِي إلى السوق، فقلت له: ما تصنع بالسوق، وأنت لا تَقِف على البيع، ولا تسأل عن السِّلَعِ، ولا تَسُومُ بها، ولا تجلس في مجالس السوق؟ وأقول: اجلس بنا هاهنا نَتَحَدَثُ، فقال: يا أبا بَطْنٍ -وكان الطفيل ذا بَطْنٍ- إنما نَغْدُو من أجل السلام، فنُسَلِّمُ على من لَقيْنَاهُ.
तुफ़ैल बिन उबै बिन कअब का वर्णन है कि वह अब्दुल्लाह बिन उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- के पास आते और उनके साथ बाज़ार जाते थे। वह कहते हैंः जब हम बाज़ार जाते, तो अब्दुल्लाह बिन उमर जब किसी रद्दी सामान बेचने वाले, दुकानदार, निर्धन तथा अन्य व्यक्ति से होकर गुज़रते, उसे सलाम करते। तुफैल कहते हैंः एक दिन मैं अब्दुल्लाह बिन उमर के पास आया और उन्होंने मुझे अपने साथ बाज़ार जाने को कहा। मैंने कहाः आप बाज़ार में करते क्या हैं, जबकि आप न तो किसी बिकने वाले सामान के पास रुकते हैं, न किसी वस्तु के बारे में पूछते हैं, न उसका मोल-तोल करते हैं और न बाज़ार की बैठकों में बैठते हैं? मैं तो आपसे कहता हूँ कि यहाँ हमारे साथ बैठ जाएँ, ताकि कुछ बातें कर सकें। उन्होंने कहाः ऐ अबू बत्न, (वास्तव में, तुफ़ैल का बत्न अर्थात पेट बढ़ा हुआ था, इसलिए उन्हें इस उपनाम से संबोधित किया) हम केवल सलाम करने के लिए जाते हैं और हर मिलने वाले को सलाम करते हैं।
इसे मालिक ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

كنوز رياض الصالحين، تأليف: حمد بن ناصر بن العمار، الناشر: دار كنوز أشبيليا، الطبعة الأولى: 1430 هـ بهجة الناظرين، تأليف: سليم بن عيد الهلالي، نسخة الكترونية ، لا يوجد بها بيانات نشر. نزهة المتقين، تأليف: جمعٌ من المشايخ، الناشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة الأولى: 1397 هـ، الطبعة الرابعة عشر 1407 هـ دليل الفالحين، تأليف: محمد بن علان، الناشر: دار الكتاب العربي، نسخة الكترونية، لا يوجد بها بيانات نشر. رياض الصالحين، تأليف: محيي الدين يحيى بن شرف النووي، تحقيق: د. ماهر بن ياسين الفحل، الطبعة: الأولى، 1428 هـ الموطأ، تأليف: مالك بن أنس الأصبحي، تحقيق: محمد مصطفى الأعظمي ، الناشر: مؤسسة زايد بن سلطان آل نهيان للأعمال الخيرية والإنسانية، الطبعة: الأولى، 1425 هـ الأدب المفرد، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق : محمد ناصر الدين الألباني، الناشر: دار الصديق للنشر والتوزيع، الطبعة: الرابعة، 1418 هـ.

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एक व्यक्ति अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और कहा : 'अस्सलामु अलैकुम' (आपपर शांति अवतरित हो)। आपने उसके सलाम का उत्तर दिया और वह बैठ गया। फिर आपने कहा : "इसके लिए दस नेकियाँ लिखी गईं।

عَنْ عِمْرَانَ بْنِ حُصَيْنٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: جَاءَ رَجُلٌ إِلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ: السَّلَامُ عَلَيْكُمْ، فَرَدَّ عَلَيْهِ ثُمَّ جَلَسَ، فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «عَشْرٌ» ثُمَّ جَاءَ آخَرُ فَقَالَ: السَّلَامُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللَّهِ، فَرَدَّ عَلَيْهِ فَجَلَسَ، فَقَالَ: «عِشْرُونَ» ثُمَّ جَاءَ آخَرُ فَقَالَ: السَّلَامُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، فَرَدَّ عَلَيْهِ فَجَلَسَ، فَقَالَ: «ثَلَاثُونَ».
इम्रान बिन हुसैन -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं : एक व्यक्ति अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और कहा : 'अस्सलामु अलैकुम' (आपपर शांति अवतरित हो)। आपने उसके सलाम का उत्तर दिया और वह बैठ गया। फिर आपने कहा : "इसके लिए दस नेकियाँ लिखी गईं।" फिर दूसरा व्यक्ति आया और बोला : 'अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह' (आप पर शांति एवं अल्लाह की दया अवतरित हो)। तो आपने कहा : "इसके लिए बीस नेकियाँ लिखी गईं।" फिर तीसरा व्यक्ति आया और बोला : 'अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह' (आप पर शांति, अल्लाह की दया और उसकी बरकतें अवतरित हों।) तो आपने कहा : "इसके लिए तीस नेकियाँ लिखी गईं।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, अह़मद और दारिमी ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह

एक व्यक्ति अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और बोला : "अस्सलामु अलैकुम" आपने उसका उत्तर दे दिया और वह बैठ गया, तो आपने कहा : इसके लिए दस नेकियाँ लिख दी गईं। फिर दूसरा व्यक्ति आया और बोला : "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह" आपने उसका उत्तर दे दिया और वह बैठ गया, तो आपने कहा : इसके लिए बीस नेकियाँ लिख दी गईं। फिर एक अन्य व्यक्ति आया और बोला : "अस्सलामु अलैकुल व रहमतुल्लाहि व बरकातुह" आपने उसका भी उत्तर दिया और वह बैठ गया, तो फ़रमाया : इसके लिए तीस नेकियाँ लिख दी गईं। यानी एक-एक शब्द पर दस-दस नेकियाँ।

फ़ायदे
  1. आने वाला व्यक्ति बैठे हुए लोगों को सलाम करेगा।
  2. सलाम के शब्दों में वृद्धि होने से सवाब में वृद्धि हो जाती है।
  3. सलाम करने के सबसे संपूर्ण शब्द हैं : "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह" जबकि सलाम का उत्तर देने के सबसे संपूर्ण शब्द हैं : "व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह।"
  4. सलाम करने और सलाम का जवाब देने के स्तर अलग-अलग होते हैं, और प्रतिफल भी अलग-अलग होते हैं।
  5. लोगों को भलाई की शिक्षा देना और उत्कृष्ट को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना।
  6. इब्न-ए-हजर कहते हैं : अगर सलाम करने वाला "ورحمة الله" बढ़ाए, तो "وبركاته" बढ़ाकर जवाब देना मुसतहब है। अगर वह "وبركاته" की वृद्धि करे, तो उत्तर में कुछ और वृद्धि करना शरीयत सम्मत होगा या नहीं? इसी तरह अगर सलाम करने वाला "وبركاته" के आगे कुछ और जोड़कर सलाम करना चाहे, तो जायज़ होगा या नहीं? (इस सवाल का जवाब यह है कि) इमाम मालिक ने मुवत्ता में अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनुमा का यह कथन नक़ल किया है : सलाम "وبركاته" पर समाप्त हो जाता है।
हवाला

سنن أبي داود (7/ 491) (5195). سنن الترمذي (4/ 420) (2689). مسند أحمد (33/ 170) (19948). كنوز رياض الصالحين ، لمجموعة من الباحثين (11/ 246). بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (3/ 132). نزهة المتقين، لمجموعة من الباحثين (1/ 663). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 399).

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24 में से 8
24 हदीसें
  1. यदि कोई व्यक्ति तुम्हारी अनुमति के बिना तुम्हें झाँके और तुम कंकड़ मारकर उसकी आँख फोड़ दो, तो तुम्हें कोई गुनाह न होगा
  2. मैंने अपने मन में सोचा कि आज मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का द्वारपाल बनने का सौभाग्य प्राप्त करूँगा। इतने में अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहु) आए और दरवाज़ा खटखटाया। मैंने कहाः कौन हैं? तो फ़रमायाः अबू बक्र। मैंने कहाः तनिक रुकिए। फिर मैं आपके पास गया और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहु) अनुमति माँग रहे हैं। आपने फ़रमायाः "उन्हें अनुमति दो तथा जन्नत की शुभ सूचना भी दो।"
  3. जब तुममें से कोई सभा में आए, तो सलाम करे और जब सभा से निकलना चाहे तो सलाम करे, क्योंकि पहला सलाम दूसरे से अधिक हक़दार नहीं है।
  4. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब कोई बात कहते, तो तीन बार कहते, ताकि आपकी बात को ठीक से समझ लिया जाए और जब किसी समूह के पास जाते और उन्हें सलाम करते, तो तीन बार सलाम करते।
  5. जब तुममें से कोई अपने भाई से मिले, तो उसे सलाम करे। फिर, अगर दोनों के बीच पेड़, दीवार या पत्थर आ जाए और वह उससे (दोबारा) मिले, तो फिर उसे सलाम करे।
  6. जब अल्लाह ने आदम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पैदा किया तो कहा कि जाओ और उन (बैठे हुए फ़रिश्तों) को सलाम करो और सुनो कि वे क्या उत्तर देते हैं, क्योंकि वही तुम्हारा और तुम्हारी संतान का सलाम होगा।
  7. ऐ अबू बत्न, हम केवल शांति स्थापित करने के लिए जाते हैं और इसी लिए हर मिलने वाले को सलाम करते हैं।
  8. एक व्यक्ति अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और कहा : 'अस्सलामु अलैकुम' (आपपर शांति अवतरित हो)। आपने उसके सलाम का उत्तर दिया और वह बैठ गया। फिर आपने कहा : "इसके लिए दस नेकियाँ लिखी गईं।
  9. लोगों में अल्लाह से सबसे निकट वह व्यक्ति है, जो उन्हें सलाम करने में पहल करे
  10. एक व्यक्ति ने अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आने की अनुमति माँगी, तो फ़रमायाः उसे आने दो, वह अपने क़बीले का बहुत बुरा व्यक्ति है
  11. एक मुसलमान के दूसरे मुसलमान पर पाँच अधिकार हैं; सलाम का उत्तर देना, बीमार व्यक्ति का हाल जानने के लिए जाना, जनाज़े के पीछे चलना, निमंत्रण स्वीकार करना और छींकने वाले का उत्तर देना।
  12. हम दूध में से अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का हिस्सा उठाकर रख लेते थे। आप रात को आते और धीरे से सलाम करते ताकि सोने वाला तो न जागे, परन्तु जागने वाला सुन ले।
  13. अलैकस्सलाम न कहो, क्योंकि अलैकस्सलाम मरे हुए लोगों का सलाम है।
  14. सवार पैदल चलने वाले को सलाम करेगा, पैदल चलने वाला बैठे हुए को सलाम करेगा और छोटा समूह बड़े समूह को सलाम करेगा।
  15. यहूदियों तथा इसाइयों को पहले सलाम न करो और जब रास्ते में उनसे भेंट हो जाए, तो उन्हें तंग रास्ता अख़्तियार करने पर विवश कर दो।
  16. छोटा बड़े को, गुज़रने वाला बैठे हुए को और छोटा समूह बड़े समूह को सलाम करे।
  17. जब लोग समूह में जा रहे हों, तो यह काफ़ी है कि उनकी ओर से उनमें से एक आदमी सलाम करे तथा यह भी काफ़ी है कि समूह की ओर से एक व्यक्ति सलाम का उत्तर दे।
  18. किसी मुसलमान के लिए हलाल नहीं है कि अपने भाई से तीन दिन से अधिक बात-चीत बंद रखे, इस प्रकार कि दोनों मिलें, लेकिन यह भी मुँह फेर ले और वह भी मुँह फेर ले। उन दोनों में उत्तम वह है, जो पहले सलाम करे।
  19. मैंने अनस (रज़ियल्लाहु अंहु) से पूछाः क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सहाबा में मुसाफ़हे (मुलाक़ात के समय हाथ मिलाने) का चलन था? तो फ़रमायाः हाँ!
  20. वह कुछ बच्चों के पास से गुज़रे, तो उनको सलाम किया और कहा कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ऐसा किया करते थे।
  21. एक आदमी ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा कि इस्लाम का कौन-सा कार्य सबसे अच्छा है? आपने उत्तर दिया : "यह कि तुम खाना खिलाओ और जाने-पहचाने तथा अनजान सबको सलाम करो।
  22. ऐ अबुल हसन! अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने किस अवस्था में सुब्ह की? तो उन्होंने उत्तर दियाः अल-हमदुलिल्लाह (समस्त प्रकार की प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है) आपने स्वस्थ होकर सुब्ह की है।
  23. एक व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! क्या हममें से कोई अपने भाई अथवा अपने दोस्त से मिलते समय उसके लिए झुक जाए? फ़रमायाः नहीं। उसने कहाः क्या उसे गले से लगा ले और बोसा दे? फ़रमायाः नहीं। उसने कहाः फिर क्या उसका हाथ पकड़े और उससे मुसाफ़हा करे? फ़रमायाः हाँ।
  24. जब दो मुसलमान आपस में मिलते हैं और मुसाफ़हा करते हैं, तो उनके अलग होने से पहले-पहले उनको क्षमा कर दिया जाता है।

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com