अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस बात की प्रेरणा दे रहे हैं कि एक मुसलमान जब भी अपने भाई से मिले तो उसे सलाम करे। यहाँ तक कि अगर दोनों साथ चल रहे हों और इसी दौरान बीच में पेड़, दीवार या कोई बड़ा पत्थर आ जाए, तो दोबारा मिलते समय फिर से उसे सलाम करे।
- सलाम को आम करना और हर स्थिति परिवर्तन के बाद फिर से सलाम करना मुसतहब है।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मुसलमानों के बीच सलाम की सुन्नत को आम करने के लिए प्रयासरत रहा करते थे, क्योंकि इससे मुसलमानों के बीच प्रेम पैदा होता है।
- सलाम करने से मुराद "अस्सलामु अलैकुम" या "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू" कहना है। इसके अंदर मुसाफ़हा शामिल नहीं है, जो पहली बार मिलते समय किया जाता है।
- सलाम दुआ है और ज़रूरत इस बात की है कि मुसलमान एक-दूसरे के लिए बार-बार दुआ करें।
سنن أبي داود (7/ 494) (5200). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص520). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 138). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 667). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 410).