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तशरीह के साथ हदीसें

नमाज़ का तरीक़ा

53 हदीसें

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ शुरू करते और जब रुकू के लिए "अल्लाहु अकबर" कहते, तो अपने दोनों हाथों को अपने दोनों कंधो के बरारब उठाते।

عَن ابْنِ عُمَرَ رضي الله عنهما: أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَرْفَعُ يَدَيْهِ حَذْوَ مَنْكِبَيْهِ إِذَا افْتَتَحَ الصَّلَاةَ، وَإِذَا كَبَّرَ لِلرُّكُوعِ، وَإِذَا رَفَعَ رَأْسَهُ مِنَ الرُّكُوعِ، رَفَعَهُمَا كَذَلِكَ أَيْضًا، وَقَالَ: «سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ، رَبَّنَا وَلَكَ الحَمْدُ»، وَكَانَ لاَ يَفْعَلُ ذَلِكَ فِي السُّجُودِ.
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ शुरू करते और जब रुकू के लिए "अल्लाहु अकबर" कहते, तो अपने दोनों हाथों को अपने दोनों कंधो के बरारब उठाते। रूकू से सिर उठाते समय भी इसी तरह दोनों हाथों को उठाते और कहते : "سَمِعَ الله لمن حَمِدَهُ رَبَّنَا ولك الحمد" (अल्लाह ने उसकी सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की। ऐ हमारे रब, तेरी ही प्रशंसा है।) लेकिन सजदे में दोनों हाथों को उठाते नहीं थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ में तीन स्थानों पर अपने हाथों को कंधे के बराबर उठाया करते थे। पहला स्थान : नमाज़ के आरंभ में तकबीर-ए-तहरीमा के समय। दूसरा स्थान : रुकू के लिए तकबीर कहते समय। तीसरा स्थान : रुकू से सर उठाते एवं "سمع الله لمن حمده ربنا ولك الحمد" कहते समय। आप सजदे में जाते और सजदे से उठते समय हाथ नहीं उठाते थे।

फ़ायदे
  1. दोनों हाथों को उठाने की एक हिकमत यह है कि यह नमाज़ की शोभा और अल्लाह का सम्मान है।
  2. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से एक चौथे स्थान में भी हाथ उठाना साबित है। उसका उल्लेख सुनन अबू दाऊद आदि में अबू हुमैद साइदी की एक रिवायत में है। यह स्थान है तीन और चार रकात वाली माज़ों में पहले तशह्हुद से खड़े होने का स्थान।
  3. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह बात भी साबित है कि आप दोनों हाथों को, दोनों कानों के निचले भाग तक, उनको छूए बग़ैर, उठाया करते थे। सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में मालिक बिन हुवैरिस रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब तकबीर कहते, तो दोनों हाथों को उठाकर दोनों कानों के निचले भाग तक ले जाते।
  4. "سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ" और "رَبَّنَا وَلَكَ الحَمْدُ" दोनों केवल इमाम और अकेले नमाज़ पढ़ने वाला कहेंगे। मुक़तदी केवल "رَبَّنَا وَلَكَ الحَمْدُ" कहेगा।
  5. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रुकू के बाद "رَبَّنَا وَلَكَ الحَمْدُ" के शब्द चार तरह से आए हैं। बेहतर यह है कि इन्सान चारों को पढ़ने का प्रयास करे। कभी इसे तो कभी उसे।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 148) (735). صحيح مسلم (1/ 292) (390). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 122). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص151). تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (2/ 192).

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अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझे उसी तरह तशह्हुद सिखाया, जैसे क़ुरआन की सूरा सिखाते थे। उस समय मेरी हथेली आपकी दोनों हथेलियों के बीच में थी

عَنِ ابْنَ مَسْعُودٍ رضي الله عنه قَالَ: عَلَّمَنِي رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، وَكَفِّي بَيْنَ كَفَّيْهِ، التَّشَهُّدَ، كَمَا يُعَلِّمُنِي السُّورَةَ مِنَ القُرْآنِ: «التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ، وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلاَمُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلاَمُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللَّهِ الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ». وفي لفظ لهما: «إِنَّ اللهَ هُوَ السَّلَامُ، فَإِذَا قَعَدَ أَحَدُكُمْ فِي الصَّلَاةِ فَلْيَقُلْ: التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللهِ الصَّالِحِينَ، فَإِذَا قَالَهَا أَصَابَتْ كُلَّ عَبْدٍ لِلَّهِ صَالِحٍ فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، ثُمَّ يَتَخَيَّرُ مِنَ الْمَسْأَلَةِ مَا شَاءَ».
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझे उसी तरह तशह्हुद सिखाया, जैसे क़ुरआन की सूरा सिखाते थे। उस समय मेरी हथेली आपकी दोनों हथेलियों के बीच में थी। (तशह्हुद के शब्द कुछ इस तरह थे :) التَّحِيَّاتُ للَّه, وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ، السلام عليك أيها النبي ورحمة الله وبركاته، السلام علينا وعلى عباد الله الصالحين، أشهد أن لا إله إلا الله وأشهد أن محمدا عبده ورسوله (सारे सम्मान सूचक कथन एवं कार्य, नमाज़ें और सारे पवित्र कथन, कार्य एवं गुण अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपके लिए शांति तथा सुरक्षा हो, अल्लाह की कृपा हो और उसकी बरकतें हों। हमारे तथा अल्लाह के सदाचारी बंदों के लिए भी शांति तथा सुरक्षा हो। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं।) बुख़ारी एवं मुस्लिम की एक अन्य रिवायत में है : "बेशक अल्लाह ही शांति का स्रोत है। जब तुममें से कोई नमाज़ में बैठे, तो कहे : " التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللهِ الصَّالِحِينَ" (सारे सम्मान सूचक कथन एवं कार्य, नमाज़ें और सारे पवित्र कथन, कार्य एवं गुण अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपके लिए शांति तथा सुरक्षा हो, अल्लाह की कृपा हो और उसकी बरकतें हों। हमारे तथा अल्लाह के सदाचारी बंदों के लिए भी शांति तथा सुरक्षा हो।) "जब किसी ने इस वाक्य को कहा, तो आकाश और धरती का हर सदाचारी बंदा इसमें शामिल हो गया।" "أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ" (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं।) फिर जो दुआ चाहे करे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु को तशह्हुद सिखाया, जिसे नमाज़ में पढ़ा जाता है। उस समय अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का हाथ आपके दोनों हाथों के बीच में था, ताकि उनका पूरा ध्यान आपपर केंद्रित रहे। आपने उनको तशह्हुद इस तरह सिखाया, जिस तरह उनको क़ुरआन की सूरा सिखाया करते थे, जो इस बात का प्रमाण है कि आपको इस तशह्हुद के शब्दों एवं अर्थ दोनों का ख़्याल था। अतः आपने कहा : "التَّحِيَّات لله" : हर सम्मान सूचक कथन एवं कार्य का हक़दार सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह है। "الصَّلَوَاتُ" : फ़र्ज़ एवं नफ़ल नमाज़ें अल्लाह के लिए हैं। "الطَّيِّبَاتُ" : पवित्र तथा संपूर्णता के परिचायक कथनों, कार्यों एवं गुणों का हक़दार अल्लाह है। "السلام عليك أيها النبي ورحمة الله وبركاته" : यह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए हर आफ़त एवं अप्रिय वस्तु से सुरक्षा तथा हर प्रकार की भलाई में वृद्धि एवं प्राचुर्य की दुआ है। "السلام علينا وعلى عباد الله الصالحين" : नमाज़ी तथा आकाश एवं धरती के हर सदाचारी बंदे के लिए सुरक्षा की दुआ। "أشهد أن لا إله إلا الله" : मैं पूरी दृढ़ता से इस बात का इक़रार करता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। "وأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ ورسولُهُ" : मैं आपके लिए बंदगी और अंतिम दूतत्व का इक़रार करता हूँ। फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस बात की प्रेरणा दी कि जो दुआ चाहे करे।

फ़ायदे
  1. इस तशह्हुद का स्थान हर नमाज़ के अंतिम सजदे के बाद की बैठक और तीन एवं चार रकात वाली नमाज़ों में दूसरी रकात के बाद की बैठक है।
  2. तशह्हुद में 'अल-तहिय्यात' पढ़ना वाजिब है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित शब्दों में से किसी भी शब्द द्वारा तशह्हुद पढ़ना जायज़ है।
  3. नमाज़ में इन्सान जो दुआ चाहे माँग सकता है, जब तक उसमें कोई गुनाह की बात न हो।
  4. दुआ के आरंभ में अपने लिए दुआ करना मुसतहब है।
हवाला

صحيح البخاري (8/ 59) (6265). صحيح مسلم (1/ 301) (402). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 168). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص206). خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص94).

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अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब नमाज़ का इरादा करते, तो खड़े होते समय "अल्लाहु अकबर" कहते, फिर रुकू में जाते समय "अल्लाहु अकबर" कहते, फिर रुकू से उठते समय कहते "समिअल्लाहु लि-मन हमिदह"।

عن أبي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قام إلى الصلاة يُكَبِّرُ حين يقوم، ثم يُكَبِّرُ حين يركع، ثم يقول: سَمِعَ اللَّه لِمَنْ حَمِدَهُ، حين يَرْفَعُ صُلْبَهُ من الرَّكْعَةِ، ثم يقول وهو قائم: ربنا ولك الحمد، ثم يُكَبِّرُ حين يَهْوِي، ثم يُكَبِّرُ حين يَرْفَعُ رأسه، ثم يُكَبِّرُ حين يَسْجُدُ، ثم يُكَبِّرُ حين يَرْفَعُ رأسه، ثم يفعل ذلك في صلاته كلها حتى يقضيها، ويُكَبِّرُ حين يقوم من الثِّنْتَيْنِ بعد الجلوس، ثم يقول: أبو هريرة «إني لأشَبَهُكم صلاة برسول الله صلى الله عليه وسلم ».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, कहते हैंः अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब नमाज़ का इरादा करते, तो खड़े होते समय "अल्लाहु अकबर" कहते, फिर रुकू में जाते समय "अल्लाहु अकबर" कहते, फिर रुकू से उठते समय कहते "समिअल्लाहु लि-मन हमिदह" फ़िर खड़े होकर कहते "रब्बना व लकल-हम्द", फिर सजदे के लिए झुकते समय "अल्लाहु अकबर" कहते, फिर सजदे से सिर उठाते समय "अल्लाहु अकबर" कहते, फिर दूसरे सजदे में जाते समय "अल्लाहु अकबर" कहते, फिर सिर उठाते समय "अल्लाहु अकबर" कहते। फिर ऐसा अंत तक पूरी नमाज़ में करते। दो रकअतों के बाद बैठकर उठते समय भी "अल्लाहु अकबर" कहते। (पूरी हदीस सुनाने के बाद) अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं: मेरी नमाज़ तुम लोगों में अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़ से सबसे अधिक मिलती-जुलती है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

पूरी की पूरी नमाज़ दरअसल बंदे के क्रियाकलाप एवं कथन के द्वारा अल्लाह की गौरव गाथा है। इस हदीस में नमाज़ की उस चीज़ का ज़िक्र है, जो उसकी असल पहचान है। अल्लाह की महिमा का वर्णन। अल्लाह ने तकबीर को नमाज़ की असल पहचान केवल इसलिए बनाया है, ताकि उसकी महानता और गौरव को सिद्ध किया जा सके। चुनांचे बंदा अल्लाहु अकबर कहते हुए सीधा खड़ा हो जाता है। फिर जब क़िराअत से फ़ारिग़ होकर रुकू के लिए झुकता है, तो अल्लाहु अकबर कहता है। फिर जब रुकू से उठता है, तो समिअल्लाहु लिमन हमिदह कहता है और बिलकुल सीधे खड़ा हो जाता है। फिर खड़े-खड़े अल्लाह की प्रशंसा करता है। फिर सजदे के लिए झुकते समय अल्लाहु अकबर कहता है। फिर सजदे से सिर उठाते समय अल्लाहु अकबर कहता है। फिर अंत तक पूरी नमाज़ में ऐसा ही करता है। दो तशह्हुद वाली नमाज़ में जब पहले तशह्हुद से खड़ा होता है, तो खड़े होते समय अल्लाहु अकबर कहता है। इस तरह से देखा जाए तो शरीयत ने रुकू से उठने को छोड़कर हर स्थिति परिवर्तन के समय अल्लाहु अकबर कहने का आदेश दिया है।

हवाला

الإلمام بشرح عمدة الأحكام لإسماعيل الأنصاري، ط1، دار الفكر، دمشق، 1381ه تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426 هـ تنبيه الأفهام شرح عمدة لأحكام لابن عثيمين، ط1، مكتبة الصحابة، الإمارات، 1426ه عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق ، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408 هـ صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423 هـ.

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सज्दे में संतुलित रहो और तुम में से कोई अपने बाज़ुओं को कुत्ते की तरह न बिछाए।

عن أَنَس بن مالك رضي الله عنه عَنْ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ: «اعْتَدِلُوا في السجود، ولا يَبْسُطْ أحدكم ذِرَاعَيْهِ انْبِسَاطَ الكلب».
अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "सज्दे में संतुलित रहो और तुम में से कोई अपने बाज़ुओं को कुत्ते की तरह न बिछाए।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने आदेश दिया है कि आदमी सजदे की अवस्था में संतुलित रहे। वह इस तरह कि सजदे की अवस्था में अच्छा आसन अपनाए। सो दोनों हथेलियों को धरती पर रखे और बाज़ुओं को उठाकर पहलुओं से अलग रखे। यह आसन इनसान की चुस्ती और अभिरुचि को दर्शाती है, जो नमाज़ में वांछनीय हैं। साथ ही, इस बेहतरीन आसन में सजदे के सभी अंगों को इबादत में शामिल होने का अवसर भी मिलता है। सजदे के समय दोनों बाज़ुओं को बिछाने से मना किया गया है। क्योंकि इससे सुस्ती और उकताहट झलकती है। साथ ही इसमें कुत्ते से मुशाबहत भी पाई जाती है, जो एक बुरी मुशाबहत है।

हवाला

- صحيح البخاري -الجامع الصحيح-؛ للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. - صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب، الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. - الإلمام بشرح عمدة الأحكام للشيخ إسماعيل الأنصاري -مطبعة السعادة- الطبعة الثانية 1392ه. - تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام -محمد بن صالح العثيمين -رحمه الله- مكتبة الصحابة -الشارقة- الإمارات العربية المتحدة، الطبعة الأولى، 1426هـ. - تيسير العلام شرح عمدة الأحكام -عبد الله البسام- تحقيق محمد صبحي حسن حلاق -مكتبة الصحابة- الشارقة، الطبعة العاشرة، 1426هـ.

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मैंने मुहम्मद- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़ को ध्यान से देखा, तो पाया कि आपका क़याम, रुकू, रुकू के बाद सीधे खड़ा होना, सजदा, दो सजदों के बीच बैठना, उसके बाद का सजदा और सलाम एवं नमाज़ के स्थान से निकलने के बीच का अंतराल, यह सब लगभग बराबर होते थे।

عن الْبَرَاءِ بْنِ عَازِبٍ رضي الله عنهما قال: «رَمَقْتُ الصلاة مع محمد صلى الله عليه وسلم فوجدت قيامه، فَرَكْعَتَهُ، فاعتداله بعد ركوعه، فسجدته، فَجِلْسَتَهُ بين السجدتين، فسجدته، فَجِلْسَتَهُ ما بين التسليم والانصراف: قريبا من السَّوَاء». وفي رواية: «ما خلا القيام والقعود، قريبا من السَّوَاءِ».
बरा बिन आज़िब- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि मैंने मुहम्मद- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़ को ध्यान से देखा, तो पाया कि आपका क़याम, रुकू, रुकू के बाद सीधे खड़ा होना, सजदा, दो सजदों के बीच बैठना, उसके बाद का सजदा और सलाम एवं नमाज़ के स्थान से निकलने के बीच का अंतराल, यह सब लगभग बराबर होते थे। एक रिवायत में है कि क़याम और तशह्हुद के सिवा सारे कार्य लगभग बराबर होते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

बरा बिन आज़िब (रज़ियल्लाहु अंहु) जो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को ध्यान से देखते रहते थे, ताकि आपकी नमाज़ को सीख सकें और उसी जैसी नमाज़ पढ़ सकें, कहते हैं कि आपकी नमाज़ के सभी अंग तुलनात्मक दृष्टि से मुनासिब और एक-दूसरे के करीब होते थे। आपका क़िराअत के लिए क़याम और तशह्हुद के लिए बैठना, दोनों रुकू, उसके बाद के क़याम और सजदे के अनुरूप होते थे। ऐसा नहीं होता था कि क़याम लंबा करें और रुकू हल्का, या सजदा लंबा करें और क़याम या बैठक हल्की। बल्कि हर रुक्न दूसरे रुक्न के अनुरूप होता। इसका मतलब यह नहीं है कि क़याम और तशह्हुद की बैठक रुकू और सजदे के बराबर होते थे। बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप एक रुक्न को लंबा और दूसरे को हल्का नहीं करते थे।

हवाला

تيسير العلام، للبسام، الناشر: مكتبة الصحابة، الإمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة العاشرة، 1426هـ - 2006 م. تنبيه الأفهام، للعثيمين، طبعة مكتبة الصحابة الإمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة الأولى، 1426. تهذيب اللغة, المؤلف: محمد بن أحمد بن الأزهري الهروي، المحقق: محمد عوض مرعب, الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت, الطبعة: الأولى، 2001م. - تأسيس الأحكام، لأحمد بن يحيى النجمي, طبعة دار المنهاج. صحيح البخاري، لأبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق محمد زهير بن ناصر الناصر، الناشر: دار طوق النجاة، الطبعة: الأولى 1422هـ. صحيح مسلم، المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.

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वापस जाकर फिर से नमाज़ पढ़ो, क्योंकि तुमने नमाज़ पढ़ी ही नहीं।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه: أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ دَخَلَ المَسْجِدَ فَدَخَلَ رَجُلٌ، فَصَلَّى، فَسَلَّمَ عَلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَرَدَّ وَقَالَ: «ارْجِعْ فَصَلِّ، فَإِنَّكَ لَمْ تُصَلِّ»، فَرَجَعَ يُصَلِّي كَمَا صَلَّى، ثُمَّ جَاءَ، فَسَلَّمَ عَلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: «ارْجِعْ فَصَلِّ، فَإِنَّكَ لَمْ تُصَلِّ» ثَلاَثًا، فَقَالَ: وَالَّذِي بَعَثَكَ بِالحَقِّ مَا أُحْسِنُ غَيْرَهُ، فَعَلِّمْنِي، فَقَالَ: «إِذَا قُمْتَ إِلَى الصَّلاَةِ فَكَبِّرْ، ثُمَّ اقْرَأْ مَا تَيَسَّرَ مَعَكَ مِنَ القُرْآنِ، ثُمَّ ارْكَعْ حَتَّى تَطْمَئِنَّ رَاكِعًا، ثُمَّ ارْفَعْ حَتَّى تَعْدِلَ قَائِمًا، ثُمَّ اسْجُدْ حَتَّى تَطْمَئِنَّ سَاجِدًا، ثُمَّ ارْفَعْ حَتَّى تَطْمَئِنَّ جَالِسًا، وَافْعَلْ ذَلِكَ فِي صَلاَتِكَ كُلِّهَا».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मस्जिद में दाखिल हुए। इसी बीच एक आदमी ने मस्जिद में प्रवेश किया, नमाज़ पढ़ी और नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आकर सलाम किया, तो आपने उसके सलाम का जवाब दिया और फ़रमाया : "वापस जाकर फिर से नमाज़ पढ़ो, क्योंकि तुमने नमाज़ पढ़ी ही नहीं।" चुनांचे वह वापस गया, पहले ही की तरह दोबारा नमाज़ पढ़ी और नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आकर सलाम किया। दोबारा आपने कहा : "वापस जाकर फिर से नमाज़ पढ़ो, क्योंकि तुमने नमाज़ पढ़ी ही नहीं।" (ऐसा तीन बार हुआ।) अंततः उसने कहा : उस अल्लाह की क़सम जिसने आपको सत्य के साथ भेजा है, मुझे इससे अच्छी नमाज़ नहीं आती! अतः मुझे सिखा दीजिए। इसपर आपने कहा : "जब तुम नमाज़ के लिए खड़े हो, तो 'अल्लाहु अकबर' कहो। फिर जितना हो सके, कुरआन पढ़ो। फिर इतमीनान के साथ रुकू करो। फिर उठो और संतुलित होकर खड़े हो जाओ। फिर इतमीनान के साथ सजदा करो। फिर उठो और इतमीनान से बैठो। और ऐसा अपनी पूरी नमाज़ में करो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मस्जिद में दाख़िल हुए। आपके बाद एक व्यक्ति दाख़िल हुआ और जल्दी-जल्दी दो रकात नमाज़ पढ़ ली। न कियाम इत्मीनान से किया, न रुकू और न सजदा। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उसे नमाज़ पढ़ते हुए देख रहे थे। आप उस समय मस्जिद के एक किनारे में बैठे हुए थे। वह व्यक्ति आपके पास आया और सलाम किया, तो आपने सलाम का जवाब देने के बाद फ़रमाया : वापस जाओ और दोबारा नमाज़ पढ़ो, क्योंकि तुमने नमाज़ पढ़ी ही नहीं है। वह वापस गया, पहले ही की तरह दोबारा जल्दी-जल्दी नमाज़ पढ़ी, वापस आया और आपको सलाम किया, तो आपने कहा : तुम वापस जाओ और दोबारा नमाज़ पढ़ो। क्योंकि तुमने नमाज़ पढ़ी ही नहीं है। आपने ऐसा तीन बार किया। तब उस व्यक्ति ने कहा : उस अल्लाह की क़सम जिसने आपको सत्य के साथ भेजा है, मुझे इससे बेहतर नमाज़ पढ़ना नहीं आता। अतः आप मुझे नमाज़ सिखा दें। तब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उससे कहा : जब नमाज़ के लिए खड़े हो जाओ, तो तकबीर-ए-तहरीमा कहो, फिर फ़ातिहा और जो अल्लाह चाहे पढ़ो, फिर इस तरह इत्मीनान से रुकू करो कि दोनों हथेलियों को दोनों घुटनों पर रख लो, अपनी पीठ फैला लो और इत्मीनान से रुकू करो, फिर उठ जाओ और अपनी पीठ इस तरह सीधी कर लो कि सारी हड्डियाँ अपने-अपने जोड़ों तक पहुँच जाएँ और सीधे खड़े हो जाओ, फिर इत्मीनान से सजदा करो और पेशानी तथा नाक एवं दोनों हाथों, घुटनों और पैरों की उंगलियों के किनारों को ज़मीन पर रखो, फिर उठो और इत्मीनान से दोनों सजदों के बीच बैठो और उसके बाद ऐसा ही अपनी नमाज़ की हर रकात में करो।

फ़ायदे
  1. नमाज़ के ये स्तंभ ग़लती से या अनजाने में छूट जाने से क्षमा नहीं होते। प्रमाण यह है कि आपने अपने सामने नमाज़ पढ़ रहे इस व्यक्ति को इसे दोहराने का आदेश दिया। सिखा देने मात्र पर बस नहीं किया।
  2. इत्मीनान से नमाज़ पढ़ना नमाज़ का एक स्तंभ है।
  3. नववी कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि जिसने नमाज़ के किसी अनिवार्य कार्य को सही से अदा नहीं किया, उसकी नमाज़ सही नहीं होगी।
  4. नववी कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि विद्यार्थी एवं अज्ञान व्यक्ति के साथ विनम्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए, समस्या को समझाना चाहिए और उद्देश्यों का सारांश प्रस्तुत करना चाहिए। केवल महत्वपूर्ण बातें सिखाने पर ध्यान देना चाहिए और ऐसी अनुपूरकों में नहीं जाना चाहिए, जिन्हें याद रखना या उनपर अमल करना असंभव हो।
  5. नववी कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि जब मुफ़्ती से किसी चीज़ के बारे में पूछा जाए और कोई दूसरा विषय भी हो, जिसके बारे में प्रश्नकर्ता ने न पूछा हो, लेकिन उसके लिए उसकी जानकारी रखना आवश्यक हो, तो उसे बता देना वांछित है। ऐसा करना शुभचिंतन की श्रेणी में आता है। ग़ैर-ज़रूरी बात करने की श्रेणी में नहीं।
  6. अपनी कोताही एवं कमी को स्वीकार करने की फ़ज़ीलत। क्योंकि इस हदीस में उल्लिखित व्यक्ति ने कहा है : "मैं इससे बेहतर नमाज़ नहीं पढ़ सकता। इसलिए मुझे सिखा दें।"
  7. इब्न-ए-हजर कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि इन्सान को भलाई का आदेश देना चाहिए और बुराई से रोकना चाहिए, और सीखने वाले को विद्वान से मार्गदर्शन माँगना चाहिए।
  8. मुलाक़ात के समय सलाम करना मुसतहब और उसका उत्तर देना वाजिब है। मुलाक़ात बार-बार हो तो दोनों मुलाकातों के बीच का अंतराल कम होने पर भी बार-बार सलाम करना चाहिए। हर बार सलाम का उत्तर देना भी वाजिब है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 152) (757). صحيح مسلم (1/ 298) (397). تيسير العلام، للبسام (ص167). تنبيه الأفهام، للعثيمين (2/ 213). الإفهام في شرح عمدة الأحكام، عبد العزيز بن باز (ص203). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 138).

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अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उमामा बिंत ज़ैनब (अपनी नातिन) को उठाए हुए नमाज़ पढ़ लेते थे।

عن أبي قَتَادَةَ الأَنْصَارِيِّ رضي الله عنه قال: «أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي وهو حامل أُمَامَةَ بنت زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم ». ولأبي العاص بن الربيع بن عبد شَمْسٍ رضي الله عنه : «فإذا سجد وضعها، وإذا قام حملها».
अबू क़तादा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उमामा बिंत ज़ैनब (अपनी नातिन) को उठाए हुए नमाज़ पढ़ लेते थे। और अबुल-आस बिन रबी बिन अब्दे शम्स- रज़ियल्लाहु अन्हु- की रिवायत में है कि जब सजदे में जाते तो उन्हें रख देते और जब खड़े होते तो उठा लेते।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी नवासी उमामा बिंत ज़ैनब को नमाज़ की हालत में उठा लेते थे। जब खड़े होते तो अपने कंधे पर उठा लेते और जब रुकू या सजदा करते तो ज़मीन में रख देते।

हवाला

تيسير العلام للبسام الناشر: مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة الطبعة- العاشرة، 1426 هـ - 2006 م . تنبيه الأفهام للعثيمين -طبعة مكتبة الصحابة الامارات - مكتبة التابعين- القاهرة- الطبعة الأولى 1426. صحيح البخاري -أبو عبد الله محمد بن إسماعيل بن إبراهيم بن المغيرة الجعفي البخاري، تحقيق محمد زهير بن ناصر الناصر - الناشر : دار طوق النجاة -الطبعة : الأولى 1422هـ. صحيح مسلم المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. تأسيس الأحكام -أحمد بن يحيى النجمي- دار المنهاج- القاهرة- مصر -الطبعة الأولى.

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मैंने अबू बक्र, उमर तथा उसमान के साथ नमाज़ पढ़ी, लेकिन उनमें से किसी को "بسم الله الرحمن الرحيم" पढ़ते नहीं सुना।

عن أَنَس بن مالك رضي الله عنه «أنّ النبي صلى الله عليه وسلم وأبا بكر وعمر رضي الله عنهما : كانوا يَسْتَفْتِحُونَ الصلاة بـ"الحمد لله رب العالمين"». وفي رواية: « صَلَّيْتُ مع أبي بكر وعمر وعثمان، فلم أسمع أحدا منهم يقرأ "بسم الله الرحمن الرحيم"». ولمسلم: « صَلَّيْتُ خلف النبي صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر وعثمان فكانوا يَسْتَفْتِحُونَ بـ"الحمد لله رب العالمين"، لا يَذْكُرُونَ "بسم الله الرحمن الرحيم" في أول قراءة ولا في آخرها».
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), अबू बक्र और उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) नमाज़ "الحمد لله رب العالمين" से आरंभ करते थे। एक रिवायत में है कि मैंने अबू बक्र, उमर तथा उसमान के साथ नमाज़ पढ़ी, लेकिन उनमें से किसी को "بسم الله الرحمن الرحيم" पढ़ते नहीं सुना। तथा मुस्लिम में है कि मैंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), अबू बक्र, उमर तथा उसमान (रज़ियल्लाहु अंहुम) के पीछे नमाज़ पढ़ी है। वे "الحمد لله رب العالمين" से नमाज़ आरंभ करते थे। न तिलावत से पहले "بسم الله الرحمن الرحيم" पढ़ते थे और न बाद मेें।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अनस (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि नबी (सलल्लाहु अलैहि व सल्लम) और आपके ख़लीफ़ों के साथ लंबे समय तक रहने के बावजूद उन्होंने उनमें से किसी को नमाज़ में "بسم الله الرحمن الرحيم" पढ़ते हुए नहीं सुना। न सूरा फ़ातिहा पढ़ने से पहले न बाद में। बल्कि, वे नमाज़ "الحمد لله رب العالمين" से शुरु करते थे। ज्ञात हो कि बिस्मिल्लाह पढ़ने और ऊँची आवाज़ से पढ़ने के बारे में उलेमा के कई मत हैं। लेकिन, सबसे सही मत यह है कि नमाज़ी प्रत्येक रकअत में सूरा फ़ातिह़ा से पहले धीमी आवाज़ में बिस्मिल्लाह कहेगा, चाहे नमाज़ धीमी आवाज़ में क़िराअत वाली हो या ऊँची आवाज़ में क़िराअत वाली।

हवाला

تيسير العلام للبسام، الناشر: مكتبة الصحابة، الغمارات - مكتبة التابعين، القاهرة الطبعة- العاشرة، 1426 هـ - 2006 م . تنبيه الأفهام للعثيمين -طبعة مكتبة الصحابة الإمارات - مكتبة التابعين- القاهرة- الطبعة الأولى 1426. الإفهام في شرح عمدة الأحكام –عبد العزيز بن باز-اعتناء سعيد بن علي بن وهف القحطاني –الرياض –الطبعة الأولى -1435. الإلمام بشرح عمدة الأحكام لإسماعيل الأنصاري -طبعة دار الفكر- دمشق -الأولى 1381. خلاصة الكلام –فيصل المبارك الحريملي -الطبعة: الثانية، 1412 هـ - 1992 م. صحيح البخاري -أبو عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق محمد زهير بن ناصر الناصر -الناشر : دار طوق النجاة -الطبعة : الأولى 1422هـ. صحيح مسلم - المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.

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53 में से 8
53 हदीसें
  1. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ शुरू करते और जब रुकू के लिए "अल्लाहु अकबर" कहते, तो अपने दोनों हाथों को अपने दोनों कंधो के बरारब उठाते।
  2. अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझे उसी तरह तशह्हुद सिखाया, जैसे क़ुरआन की सूरा सिखाते थे। उस समय मेरी हथेली आपकी दोनों हथेलियों के बीच में थी
  3. अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब नमाज़ का इरादा करते, तो खड़े होते समय "अल्लाहु अकबर" कहते, फिर रुकू में जाते समय "अल्लाहु अकबर" कहते, फिर रुकू से उठते समय कहते "समिअल्लाहु लि-मन हमिदह"।
  4. सज्दे में संतुलित रहो और तुम में से कोई अपने बाज़ुओं को कुत्ते की तरह न बिछाए।
  5. मैंने मुहम्मद- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़ को ध्यान से देखा, तो पाया कि आपका क़याम, रुकू, रुकू के बाद सीधे खड़ा होना, सजदा, दो सजदों के बीच बैठना, उसके बाद का सजदा और सलाम एवं नमाज़ के स्थान से निकलने के बीच का अंतराल, यह सब लगभग बराबर होते थे।
  6. वापस जाकर फिर से नमाज़ पढ़ो, क्योंकि तुमने नमाज़ पढ़ी ही नहीं।
  7. अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उमामा बिंत ज़ैनब (अपनी नातिन) को उठाए हुए नमाज़ पढ़ लेते थे।
  8. मैंने अबू बक्र, उमर तथा उसमान के साथ नमाज़ पढ़ी, लेकिन उनमें से किसी को "بسم الله الرحمن الرحيم" पढ़ते नहीं सुना।
  9. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक व्यक्ति को एक सैन्यदल का अमीर बनाकर भेजा। वह अपने साथियों को नमाज़ पढ़ाते समय कुरआन पढ़ता, तो अंत में "قل هو الله أحد" पढ़ता।
  10. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नमाज़ तकबीर से और क़िरात "अल-हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन" से आरंभ करते थे। जब रुकू करते, तो न अपने सर को उठाए रखते और न बहुत ज़्यादा झुकाते, बल्कि इन दोनों के बीच रखते।
  11. कूफ़ा वालों ने उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के यहाँ साद बिन अबू वक़्क़ास (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शिकायत की, तो उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उनको हटाकर अम्मार बिन यासिर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) को उनका हाकिम बना दिया।
  12. मैं और इमरान बिन हुसैन ने अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहुम) के पीछे नमाज़ पढ़ी। जब वह सजदे में जाते, तो तकबीर कहते, जब सर उठाते, तो तकबीर कहते और जब दूसरी रकात के बाद खड़े होते, तो तकबीर कहते।
  13. मैंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मग़रिब की नमाज़ में सूरा-ए-तूर पढ़ते सुना।
  14. मैं तुम्हें नमाज़ पढाऊँगा। हालाँकि मेरा नमाज़ पढ़ने का इरादा नहीं था। मैं दरअसल, नमाज़ पढ़के दिखाना चाहता हूँ कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कैसे नमाज़ पढ़ते देखा है।
  15. जब इमाम आमीन कहे, तो तुम आमीन कहो। क्योंकि जिसका आमीन कहना फ़रिश्तों के आमीन के साथ होगा, उसके पिछले सारे पाप क्षमा कर दिए जाएँगे।
  16. अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फ़ज्र की अंतिम रकात में, रुकू से सिर उठाने और 'سَمِعَ الله لمن حَمِدَه رَبَّنا ولك الحَمْدُ' कहने के बाद कहतेः ऐ अल्लाह, अमुक, अमुक और अमुक पर लानत कर। इसी पर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारीः (لَيْسَ لَكَ مِنَ الأَمْرِ شَيْءٌ) (ऐ रसूल! आपका इसमें कुछ बस नहीं)।
  17. ऐ अल्लाह! मैंने जो पहले किया और जो बाद में किया, जो छिपाकर किया तथा जो दिखाकर किया और जिसमें मैंने अति की और जिसको तू मुझसे भी बेहतर जानने वाला है, उन सभी गुनाहों को माफ़ कर दे। तू ही आदेशपालन का सामर्थ्य देकर आगे करता है और तू ही अवज्ञा के कारण पीछे करता है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।
  18. ऐ अल्लाह! अय्याश बिन अबू रबीआ, सलमा बिन हिशाम, वलीद बिन वलीद और दुर्बल मोमिनों को मुक्ति दिला दे। ऐ अल्लाह! मुज़र पर अपनी पकड़ सख्त कर। ऐ अल्लाह! उन्हें यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के युग में होने वाले सूखे जैसे सूखे से ग्रस्त कर।
  19. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नमाज़ पढ़ने कि लिए क़ुबा की ओर निकले।
  20. मैंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को देखा कि आप लोगों को नमाज़ पढ़ा रहे थे और उमामा बिंत अबुल आस, जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुपुत्री ज़ैनब की बेटी थीं, आपके कंधे पर थीं। जब आप रुकू करते, तो उनको उतार देते और जब सजदे से उठते, तो उनको दोबारा कंधे पर उठा लेते।
  21. दो काली वस्तुओं को नमाज़ की अवस्था में भी मार दो : साँप तथा बिच्छू।
  22. अच्छे ढंग से नमाज़ न पढ़ने वाले की हदीस, रिफ़ाआ (रज़ियल्लाहु अंहु) के वर्णन अनुसार।
  23. अबू हुमैद साइदी (रज़ियल्लाहु अंहु) का अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दस सहाबा की उपस्थिति में, जिनमें अबू क़तादा भी शामिल थे, यह कहना कि मैं तुम लोगों में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की नमाज़ को सबसे अधिक जानता हूँ।
  24. अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ तकबीर से और क़ुरआन पाठ "अल-ह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन
  25. रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहते, तो अपने दोनों हाथों को कानों के बराबर उठाते और जब रुकू करते, तो अपने दोनों हाथों को कानों तक उठाते।
  26. मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ नमाज़ पढ़ी, तो (देखा कि) आपने अपने दाहिने हाथ को अपने बाएँ हाथ पर, सीने के ऊपर रखा।
  27. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तथा अबू बक्र एवं उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) नमाज़ का आरंभ "अल-ह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन" से करते थे।
  28. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ज़ुहर की पहली दो रकातों में सूरा फ़ातिहा और दो सूरतें पढ़ते थे और बाद की दो रकातों में सिर्फ़ सूरा फ़ातिहा पढ़ते थे और कभी कभी कोई आयत हमें सुना भी देते थे।
  29. हम लोग ज़ुहर और अस्र में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के क़याम (खड़े होने) का अनुमान लगाते थे। हमने अनुमान लगाया कि आप ज़ुहर की पहली दो रकातों में {الم تنزيل السجدة} (अलिफ लाम मीम तंज़ीन अस-सजदा) के बराबर खड़े होते थे, तथा हमने अंदाज़ा लगाया कि उसकी बाद की दो रकातों में उसके आधा खड़े होते थे।
  30. मैंने अमुक व्यक्ति के मुकाबले में किसी के भी पीछे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से अधिक मिलती-जुलती नमाज़ नहीं पढ़ी। चुनांचे हमने उस व्यक्ति के पीछे नमाज़ पढ़ी और पाया कि वह ज़ुहर की प्रथम दो रकातों को लंबा करते थे तथा अंतिम दो रकातों को हल्का करते थे।
  31. मैंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मग़रिब की नमाज़ में सूरा अत-तूर पढ़ते सुना। जब आप इस आयत पर पहुँचे : (أم خُلِقُوا من غير شيء أم هم الخالقون، أم خَلَقُوا السموات والأرض بل لا يوقنون، أم عندهم خزائن ربك أم هم المسيطرون) (क्या वे बिना किसी के पैदा किए ही पैदा हो गए हैं या वे स्वयं पैदा करने वाले हैं? या उन्होंने ही उत्पत्ति की है आकाशों तथा धरती की? वास्तव में वे विश्वास ही नहीं रखते। या उनके पास आपके पालनहार के कोषागार हैं या वही उसके अधिकारी हैं?) तो ऐसा लग रहा था कि मेरा दिल उड़ जाएगा।
  32. नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़, और आप का रुकू, तथा जब आप रुकू से सिर उठाते (उस के बाद का समय), और आप का सज्दे तथा दो सज्दों के मध्य बैठने का समय, सभी लग-भग बराबर होते।
  33. मुझे ‏शरीर के सात अंगों पर सजदा करने का हुक्म दिया गया है
  34. जब तुम सजदा करो, तो अपनी हथेलियों को ज़मीन पर रख दिया करो और अपनी कोहनियों को ऊपर उठाए रखो।
  35. नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब नमाज़ में रुकू करते तो अपनी ऊंगलियों को फैला कर रखते तथा जब सज्दा करते तो अपनी ऊंगलियों को मिला लेते थे।
  36. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो सजदों के बीच में यह दुआ पढ़ते थे : "ऐ अल्लाह! तू मुझे माफ कर दे, मेरे ऊपर रहम कर, मुझे आफियत (स्वास्थ्य इत्यादि) दे तथा मुझे रोज़ी प्रदान कर।
  37. नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब नमाज़ की एकल रकअतों में होते तो उस वक़्त तक खड़े न होते जब तक सीधे बैठ न जाते।
  38. नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक मास तक रुकू के बाद क़ुनूत (नाज़िला) पढ़ा, (इस में) आप बनू सुलैम के कुछ क़बीलों- पर बद्दुआ करते थे।
  39. नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- क़ुनूत उसी समय पढ़ा करते थे जब आप किसी के लिए दुआ करते या किसी पर बद्दुआ करते।
  40. हे मेरे पिता, आप ने रसूलुल्लाह- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, तथा अबू बकर, उमर, उस्मान एवं यहां कूफा में अली- रज़ियल्लाहु अन्हुम- के पीछे नमाज़ पढ़ी है, क्या वो लोग फज्र में (दुआ -ए-) क़ुनूत पढ़ते थे? उन्होंने उत्तर देते हुए कहा किः यह बिदअत है।
  41. जब तुम में का कोई सज्दा करे तो उस प्रकार से न बैठे जैसे ऊँट बैठता है और धुटने से पुर्व अपने हाथों को रखे।
  42. इब्ने उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- अपने हाथों को घुटनों से पहले रखते थे, और फरमाया किः नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- भी ऐसा ही करते थे।
  43. नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब बैठते थे तो दुआ किया करते थे, अपने दाहिने हाथ को अपने दाहिने जांघ पर रखा करते थे तथा बाएं हाथ को बाएं जांघ पर रखा करते थे, और तर्जनी (शहादत वाली ) उंगली से इशारा करते रहते थे, तथा अपने उंगूठे को मध्यमा (बीच वाली उंगली) पर रखते थे, और अपने बाएं हाथ का गोला बनाकर उस से घुटने को पकड़ते।
  44. मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ नमाज़ पढ़ी। आप अपनी दाईं ओर "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बकरकातुह" और बाईं ओर "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बकरकातुह" कहकर सलाम फेरते थे।
  45. अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़ज्र की दो रकातों में {قُلْ يَا أَيُّهَا الْكَافِرُونَ} और {قُلْ هُوَ اللهُ أَحَدٌ} पढ़ी।
  46. लोगो! मैंने ऐसा इसलिए किया, ताकि तुम मेरा अनुसरण कर सको और मेरी नमाज़ सीख सको।
  47. जब तुम नमाज़ पढ़ो तो अपनी सफ़ें सठीक कर लो। फिर तुममें से एक व्यक्ति तुम्हारी इमामत करे। फिर जब वह तकबीर कहे, तो तुम तकबीर कहो
  48. उस हस्ती की क़सम, जिसके हाथ में मेरी जान है, मैं तुम्हारे बीच अल्लाह के रसूल से सबसे ज़्यादा मिलती-जुलती नमाज़ पढ़ने वाला व्यक्ति हूँ। दुनिया छोड़ने तक आप इसी तरह नमाज़ पढ़ते रहे।
  49. सबसे बुरा चोर वह है, जो अपनी नमाज़ में चोरी करता है।" किसी सहाबी ने पूछा कि नमाज़ में चोरी करने का क्या मतलब है? आपने उत्तर दिया : "रुकू एवं सजदा संपूर्ण रूप से न किया जाए।
  50. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब रुकू से पीठ उठाते, तो यह दुआ पढ़ते : "سَمِعَ اللهُ لِمَنْ حَمِدَهُ، اللَّهُمَّ رَبَّنَا لَكَ الْحَمْدُ، مِلْءَ السَّمَاوَاتِ وَمِلْءَ الْأَرْضِ وَمِلْءَ مَا شِئْتَ مِنْ شَيْءٍ بَعْدُ" (अल्लाह ने उसकी सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की
  51. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो सजदों के बीच यह दुआ पढ़ा करते थे : "رَبِّ اغْفِرْ لِي، رَبِّ اغْفِرْ لِي" (ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे। ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे।
  52. यह एक शैतान है, जिसे ख़िंज़िब कहा जाता है। जब तुम्हें उसके व्यवधान डालने का आभास हो, तो उससे अल्लाह की शरण माँगो और तीन बार अपने बाएँ ओर थुत्कारो
  53. मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को दाईं और बाईं ओर सलाम फेरते हुए देखता था, यहाँ तक कि मैं आपके गाल का उजलापन देख लेता।

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com