عَنْ سَهْلِ بْنِ سَعْدٍ السَّاعِدِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «رِبَاطُ يَوْمٍ فِي سَبِيلِ اللَّهِ خَيْرٌ مِنَ الدُّنْيَا وَمَا عَلَيْهَا، وَمَوْضِعُ سَوْطِ أَحَدِكُمْ مِنَ الجَنَّةِ خَيْرٌ مِنَ الدُّنْيَا وَمَا عَلَيْهَا، وَالرَّوْحَةُ يَرُوحُهَا العَبْدُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَوِ الغَدْوَةُ خَيْرٌ مِنَ الدُّنْيَا وَمَا عَلَيْهَا».
सह्ल बिन साद साइदी -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : अल्लाह के मार्ग में एक दिन की पहरेदारी दुनिया और उसकी तमाम चीज़ों से बेहतर है जन्नत में तुम में से किसी एक के कोड़ा के रखने के बराबर स्थान दुनिया और उसकी सारी वस्तुओं से बेहतर है तथा एक शाम एवं एक सुबह जो बंदा अल्लाह के रास्ते में निकले दुनिया तथा उसकी सारी वस्तुओं से बेहतर है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि मुसलमानों की रक्षा के लिए मुसलमानों एवं काफ़िरों के बीच के सरहदी क्षेत्र में अल्लाह के प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए एक दिन पहरेदारी करना दुनिया और उसकी तमाम चीज़ों से बेहतर है। जन्नत में ऐसे कोड़े के बराबर स्थान, जिससे अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया गया हो, दुनिया और उसकी तमाम चीज़ों से बेहतर है। दिन आरंभ से ज़ुहर के समय के आरंभ तक या ज़ुहर से रात तक के बीच एक बार अल्लाह के मार्ग में चलने का प्रतिफल दुनिया और उसकी तमाम चीज़ों से बेहतर है।
फ़ायदे
- अल्लाह की राह में पहरेदारी करना बड़े पुण्य का काम है, क्योंकि इसके लिए जान को ज़ोखिम में डालना पड़ता है और इसके नतीजे में अल्लाह के दीन का वर्चस्व स्थापित होता है। इन्हीं बातों के मद्देनज़र एक दिन पहरेदारी का सवाब दुनिया और उसकी तमाम चीज़ों से बेहतर है।
- आख़िरत की तुलना में दुनिया का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि जन्नत के अंदर एक कोड़ा रखने के बराबर स्थान दुनिया और उसकी तमाम चीज़ों से बेहतर है।
- अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने का प्रतिफल और उसका बड़ा सवाब। इस राह में एक सुबह या एक शाम निकलने का सवाब दुनिया और उसकी तमाम चीज़ों से बेहतर है।
- हदीस के शब्द "फ़ी सबीलिल्लाह" केवल अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए काम करने का महत्व सिद्ध करते और बताते हैं कि प्रतिफल इसी के कारण मिलता है।
हवाला
صحيح البخاري (4/ 35) (2892).
صحيح مسلم (3/ 1500) (1881).
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص739).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن كَعْب بن مالك رضي الله عنه قال: قلتُ: يا رسولَ الله، إن مِن تَوبتي أن أَنْخَلِعَ مِنْ مالي؛ صدقةً إلى الله وإلى رسولِه، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم : "أمسِكْ عليك بعضَ مالِكَ؛ فهو خيرٌ لكَ".
काब बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैं अपनी तौबा क़बूल होने की खुशी में अपना सारा धन अल्लाह और उसके रसूल की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए सदक़ा करता हूँ। उनकी बात सुनकर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अपना कुछ माल रखे रहो, यह तुम्हारे लिए बेहतर है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
काब बिन मालिक -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- उन तीन सहाबा में से एक हैं, जो बिना किसी उचित कारण और बिना निफ़ाक़ के तबूक युद्ध से पीछे रह गए थे। जब नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- युद्ध से वापस आए, तो उनका बहिष्कार किया तथा लोगों को भी उनके बहिष्कार का आदेश दिया। इस तरह, वे अलग-थलग पड़े रहे, यहाँ तक कि उनकी क्षमा से संबंधित आयत अवतरित हुई और अल्लाह उनसे प्रसन्न हो गया। फिर, रसूल और सहाबा भी उनसे संतुष्ट हो गए। चुनांचे काब -रज़ियल्लाहु अनहु- अल्लाह के प्रसन्न होने और उनकी तौबा स्वीकार होने से इतना उत्साहित हुए कि अपना सारा धन अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए सदक़ा कर देने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनकी रहनुमाई करते हुए फ़रमाया कि कुछ धन अपने पास रख लो। क्योंकि अल्लाह ने उनकी सच्ची नीयत एवं पूरी निष्ठा के साथ क्षमा याचना के कारण उन्हें क्षमा कर दिया था और अब इसकी आवश्यकता नहीं रह गई थी। साथ ही अल्लाह किसी पर उसकी ताक़त से अधिक बोझ भी नहीं डालता। इसके बाद उन्होंने अपना कुछ धन अल्लाह की प्रसन्नता से संतुष्ट होकर और आख़िरत के लिए जमा रखने के इरादे से खर्च कर दिया और कुछ अपने पास रखा, ताकि अपनी और अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। अल्लाह अपने बंदों पर बड़ा दयालु है।
हवाला
-صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه.
-صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ.
-عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق ، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408هـ.
-تأسيس الأحكام للنجمي، ط2، دار علماء السلف، 1414ه.
-تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ.
-الإلمام بشرح عمدة الأحكام, إسماعيل الأنصاري, الطبعة الثانية 1392هـ.
-الشرح الممتع على زاد المستقنع، محمد بن صالح بن محمد العثيمين، دار ابن الجوزي، الطبعة: الأولى، 1422- 1428هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المؤْمِنين رَضيَ اللهُ عنها قَالَتْ: جَاءَتْنِي مِسْكِينَةٌ تَحْمِلُ ابْنَتَيْنِ لَهَا، فَأَطْعَمْتُهَا ثَلَاثَ تَمَرَاتٍ، فَأَعْطَتْ كُلَّ وَاحِدَةٍ مِنْهُمَا تَمْرَةً، وَرَفَعَتْ إِلَى فِيهَا تَمْرَةً لِتَأْكُلَهَا، فَاسْتَطْعَمَتْهَا ابْنَتَاهَا، فَشَقَّتِ التَّمْرَةَ الَّتِي كَانَتْ تُرِيدُ أَنْ تَأْكُلَهَا بَيْنَهُمَا، فَأَعْجَبَنِي شَأْنُهَا، فَذَكَرْتُ الَّذِي صَنَعَتْ لِرَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: «إِنَّ اللهَ قَدْ أَوْجَبَ لَهَا بِهَا الْجَنَّةَ، أَوْ أَعْتَقَهَا بِهَا مِنَ النَّارِ».
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैंः मेरे पास एक निर्धन स्त्री आई। उसके साथ उसकी दो बेटियाँ भी थीं। मैंने उसे तीन खजूरें दीं। उसने दोनों बच्चियों को एक-एक खजूर दी और एक खजूर स्वयं खाने के लिए मुँह की ओर ले जा रही थी कि दोनों बच्चियों ने उससे खाने को कुछ और माँग लिया। अतः, उसने जो खजूर खुद खाना चाहती थी, उसके दो टुकड़े करके दोनों को दे दिए। मुझे उसके इस कार्य से बड़ा ताज्जुब- आश्चर्य- हुआ (और बड़ा पसंद आया)। अतः, उसके इस कार्य का ज़िक्र- वर्णन- अल्लाह के रसूल-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से किया, तो आपने फ़रमायाः "अल्लाह ने उसके लिए, इस कार्य के कारण, जन्नत अनिवार्य कर दी अथवा उसके लिए इस कार्य के कारण जहन्नम से मुक्ति प्रदान कर दी।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح مسلم (4/ 2027) (2630).
تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص199).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (3/ 111).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 278).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه مرفوعًا: «يقول الله تعالى : ما لِعَبدِي المُؤمن عِندِي جَزَاء إِذَا قَبَضتُ صَفِيَّه مِنْ أَهلِ الدُّنيَا ثُمَّ احْتَسَبَه إِلاَّ الجنَّة».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से रिवायत करते हैं कि अल्लाह -तआला- कहता हैः जब मैं अपने मोमिन बंदे से दुनिया वालों में से उसके किसी प्रिय को उठा लेता हूँ, फिर वह सवाब की आशा में धैर्यवान रहता है, उसके लिए जन्नत के सिवा कोई और बदला नहीं है।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस हदीस-ए-क़ुदसी में बताया है कि अल्लाह की ओर से जिस व्यक्ति की परीक्षा इस प्रकार ली जाए कि उसके किसी प्रिय, जैसे संतान, भाई, चचा, पिता, माता या मित्र की मृत्यु हो जाए और वह अल्लाह के यहाँ प्रतिफल प्राप्त होने की आशा में उसकी जुदाई पर सब्र कर ले, तो उसका प्रतिफल जन्नत के सिवा कुछ और नहीं है।
हवाला
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415هـ.
رياض الصالحين للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428هـ.
رياض الصالحين، ط4، تحقيق: عصام هادي، وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية القطرية، دار الريان، بيروت، 1428هـ.
كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، ط1، كنوز إشبيليا، الرياض، 1430هـ.
شرح رياض الصالحين، للشيخ ابن عثيمين، دار الوطن للنشر، الرياض، 1426هـ.
صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ ثَوْبَانَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «أَفْضَلُ دِينَارٍ يُنْفِقُهُ الرَّجُلُ، دِينَارٌ يُنْفِقُهُ عَلَى عِيَالِهِ، وَدِينَارٌ يُنْفِقُهُ الرَّجُلُ عَلَى دَابَّتِهِ فِي سَبِيلِ اللهِ، وَدِينَارٌ يُنْفِقُهُ عَلَى أَصْحَابِهِ فِي سَبِيلِ اللهِ» قَالَ أَبُو قِلَابَةَ: وَبَدَأَ بِالْعِيَالِ، ثُمَّ قَالَ أَبُو قِلَابَةَ: وَأَيُّ رَجُلٍ أَعْظَمُ أَجْرًا مِنْ رَجُلٍ يُنْفِقُ عَلَى عِيَالٍ صِغَارٍ، يُعِفُّهُمْ أَوْ يَنْفَعُهُمُ اللهُ بِهِ وَيُغْنِيهِمْ.
स़ौबान रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णनित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "सबसे उत्तम दीनार जिसे इंसान ख़र्च करता है, वह दीनार है जिसे वह अपने परिवार पर ख़र्च करता है, फिर वह दीनार है जो वह अल्लाह की राह में जिहाद करने के लिए खास किए हुए जानवर पर ख़र्च करता है, और फिर वह दीनार है जिसे वह अल्लाह के रास्ते में अपने साथियों पर ख़र्च करता है।" अबू क़िलाबा कहते हैं कि शुरूआत परिवार से की। फिर अबू क़िलाबा ने कहा कि भला कौन व्यक्ति, उस आदमी से पुण्य में बढ़ सकता है, जो अपने छोटे-छोटे बच्चों पर खर्च करता है, ताकि वे दूसरों के सामने हाथ फैलाने पर मजबूर न हों या अल्लाह तआला उन्हें उसके द्वारा लाभ पहुँचाए तथा उनको निस्पृह कर दे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
यहाँ अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खर्च करने के कुछ रूप बयान किए हैं और बताया है कि जब खर्च करने के कई अवसर आपस में टकराने लगें, तो क्रमानुसार जो जितना महत्वपूर्ण हो, उसे महत्व दिया जाना चाहिए। आपने बताया कि एक मुसलमान द्वारा खर्च किया गया सबसे अधिक सवाब वाला धन वह है, जिसे उन लोगों पर खर्च किया जाए, जिनका भरण-पोषण उसपर अनिवार्य है। जैसे पत्नी और बच्चे आदि। उसके बाद नम्बर आता है अल्लाह की राह में जिहाद के लिए तैयार रखे गए सवारी पर खर्च करने का। उसके बाद नम्बर आता है अपने दोस्तों और साथियों पर खर्च करने का, जो अल्लाह की राह में जंग कर रहे हों।
फ़ायदे
- महत्व की दृष्टि से खर्च करने का क्रम वही है, जो इस हदीस में उल्लिखित है। टकराव की अवस्था में इस क्रम का ख़याल रखा जाएगा।
- बाल-बच्चों पर खर्च करना अन्य लोगों पर खर्च कने की तुलना में अधिक महत्व रखता है।
- अल्लाह की राह में जिहाद पर, जैसे हथियारों और मुजाहिदों को तैयार करने में किया जाने वाला खर्च, खर्च करने का एक बहुत बड़ा रूप है।
- कुछ लोगों का कहना है कि अल्लाह के मार्ग से मुराद हर नेकी का काम, जैसे हज आदि है।
हवाला
صحيح مسلم (2/ 691) (994).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (5/ 315).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (3/ 156).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 291).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 374).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «لَا تَجْعَلُوا بُيُوتَكُمْ قُبُورًا، وَلَا تَجْعَلُوا قَبْرِي عِيدًا، وَصَلُّوا عَلَيَّ؛ فَإِنَّ صَلَاتَكُمْ تَبْلُغُنِي حَيْثُ كُنْتُمْ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अपने घरों को क़ब्रिस्तान न बनाओ और न मेरी क़ब्र को मेला स्थल बनाओ। हाँ, मुझपर दुरूद भेजते रहो, क्योंकि तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा दुरूद मुझे पहुँच जाएगा।"
इसे अबू दावूद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने घरों को नमाज़ से खाली रखने से मना किया है कि वे क़ब्रिस्तान की तरह हो जाएँ, जहाँ नमाज़ नहीं पढ़ी जाती। इसी तरह बार-बार आपकी क़ब्र की ज़ियारत करने और नियमित रूप से वहाँ एकत्र होने से मना किया, क्योंकि इससे शिर्क का द्वार खुलता है। आपने अपने ऊपर धरती के किसी भी भाग से दरूद भेजने का आअदेश दिया है, क्योंकि दूर तथा निकट हर जगह से दरूद समान रूप से आप तक पहुँच जाती है। इसलिए बार-बार आपकी क़ब्र के पास आने की ज़रूरत नहीं है।
फ़ायदे
- घरों को अल्लाह की इबादत से खाली छोड़ने की मनाही।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारत के लिए सफ़र करने की मनाही, क्योंकि आपने अपने ऊपर दरूद भेजने का आदेश दिया है और बताया है कि उसे आप तक पहुँचा दिया जाता है। सफ़र मस्जिद-ए-नबवी के इरादे से और उसमें नमाज़ पढ़ने के लिए किया जा सकता है।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र की ज़ियारत को जश्न के रूप में लेना यानी एक खास तरीक़े से एक खास समय में बार-बार ज़ियारत करना, हराम है। यही हाल प्रत्येक क़ब्र की ज़ियारत का है।
- अल्लाह के पास नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान कि हर दौर तथा हर स्थान में आप पर दरूद को शरीयत सम्मत घोषित किया।
- चूँकि क़ब्रों के पास नमाज़ न पढ़ने की बात सहाबा के यहाँ स्थापित थी, इसलिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि घरों को क़ब्रिस्तान की तरह न बनाओ कि वहाँ नमाज़ पढ़ना छोड़ दो।
हवाला
سنن أبي داود (3/ 385) (2042).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص202).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص185).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَنْ عَالَ جَارِيَتَيْنِ حَتَّى تَبْلُغَا جَاءَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَنَا وَهُوَ» وَضَمَّ أَصَابِعَهُ.
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने दो लड़कियों का लालन-पालन किया, यहाँ तक कि वह बड़ी हो गईं, तो क़यामत के दिन वह तथा मैं इस तरह आएँगे।" फिर आपने अपनी ऊँगलियों को मिलाया।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि जिसने दो बेटियाँ या दो बहनें दी गईं और उसने उनका खर्च उठाया, उनकी तर्बियत की, अच्छाई सिखाई और बुराई से सचेत किया, फिर दोनों बड़ी और वयस्क हो गईं, तो वह और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़यामत के दिन कुछ इस तरह आएँगे। यह कहते समय आपने अपनी शहादत की उंगली और बीच वाली उंगली को मिलाकर दिखाया।
फ़ायदे
- बेटियों के विवाह या युवावस्था तक का खर्च उठाना तथा उनकी तर्बियत की व्यवस्था करना बहुत बड़ी नेकी और सवाब का काम है। यही हाल बहनों का भी है।
- लड़कियों के पालन-पोषण का सवाब लड़कों के पालन-पोषण से अधिक है। क्योंकि यहाँ लड़कियों के बारे में जो बातें कही गई हैं, वह लड़कों के बारे में नहीं कही गई हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लड़कियों का खर्चा और उनके मामलों में ध्यान देना लड़कों के मामलों से ज़्यादा (बड़ा) है, तथा अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है, क्योंकि वे 'छुपाने योग्य' (पर्दे और हिफाज़त के लायक) होती हैं, वे अपने मामलों को खुद सीधे तौर पर अंजाम नहीं दे सकतीं, साथ ही, पिता उनसे यह अपेक्षा नहीं करता कि अपने बेटों की तरह शत्रु का सामना करते समय वह उनसे शक्ति प्राप्त करेगा, उसका नाम अमर रहेगा और इनसे उसका वंश आगे बढ़ेगा। इसलिए, उनके पालन-पोषण और देखभाल के लिए धैर्य तथा निष्ठा की आवश्यकता होती है। इसलिए इसमें सवाब भी अधिक है और ऐसे व्यक्ति को क़यामत के दिन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का साथ नसीब होगा।
- महिला के वयस्क होने की निशानियाँ : पंद्रह वर्ष पूरे हो जाना, माहवारी आ जाना पंद्रह वर्ष से पहले ही क्यों न हो, जघन बाल उग आना या स्वप्नदोष होना यानी नींद का अवस्था में वीर्य का निकल जाना।
- क़ुर्तुबी कहते हैं : दोनों के वयस्क होने का अर्थ है ऐसी स्थिति तक पहुँचना, जहाँ दोनों अपने आप में मज़बूत हो जाएँ। और महिलाएँ तभी अपने आपमें मज़बूत होती हैं जब वे विवाहित हो जाती हैं। इसलिए, वयस्क होने का मतलब माहवारी आना या शरई ज़िम्मेवारियों के निर्वहन का पाबंद हो जाना नहीं है। क्योंकि यह भी संभव है कि विवाह वयस्क होने से पहले ही हो जाए और भरण-पोषण की जिम्मेदारी पति पर आ जाए। इसके विपरीत, ऐसा भी होता है कि माहवारी शुरू हो गई हो, लेकिन वह अपने बारे में सोचने और अपने हितों के बारे में निर्णय लेने में सक्षम न हो सकी हो। ऐसे में अगर उसे अकेला छोड़ दिया गया तो यह बर्बाद हो जाएगी और उसकी स्थिति खराब हो जाएगी। अतः ऐसी स्थिति में उसे अधिक सुरक्षा और देखभाल की आवश्यकता होती है, ताकि लोग उससे विवाह करने के लिए इच्छुक हों। इन्हीं बातों के मद्देनज़र उलेमा ने कहा है कि लड़की के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उसके वयस्क होने पर पिता से समाप्त नहीं हो जाती, बल्कि उसके जीवन में उसके पति के आने के बाद समाप्त होती है।
हवाला
صحيح مسلم (4/ 2027) (2631).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 352).
تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص198).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (5/ 144).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (3/ 105).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 276).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَبْدِ اللَّهِ بِن مَسْعُودٍ رضي الله عنه قَالَ: سَأَلْتُ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: أَيُّ العَمَلِ أَحَبُّ إِلَى اللَّهِ؟ قَالَ: «الصَّلاَةُ عَلَى وَقْتِهَا»، قَالَ: ثُمَّ أَيٌّ؟ قَالَ: «ثُمَّ بِرُّ الوَالِدَيْنِ» قَالَ: ثُمَّ أَيٌّ؟ قَالَ: «الجِهَادُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ» قَالَ: حَدَّثَنِي بِهِنَّ، وَلَوِ اسْتَزَدْتُهُ لَزَادَنِي.
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : मैंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि अल्लाह के निकट सबसे अधिक कौन-सा कर्म प्रिय है? आपने उत्तर दिया : "समय पर नमाज़ पढ़ना।" मैंने पूछा : फ़िर काैन-सा? फ़रमाया : "माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करना।" मैंने पूछा : फ़िर कौन-सा? फ़रमाया : "अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना।" अब्दुल्लाह बिन मसऊद कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे यह बातें बताईं। यदि मैं और पूछ्ता, तो आप और बताते।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा गया कि अल्लाह के निकट कौन-सा अमल सबसे ज़्यादा प्रिय है? तो आपने उत्तर दिया : फ़र्ज़ नमाज़ को उसके शरीयत द्वारा निर्धारित समय पर पढ़ना। फिर माता-पिता का आज्ञापालन करते हुए उनके साथ अच्छा व्यवहार करना, उनको उनका अधिकार देना और उनकी नाफ़रमानी न करना। फिर अल्लाह के पताका को ऊँचा करने, इस्लाम तथा मुसलमानों की रक्षा और इस्लामी प्रतीकों का वर्चस्व स्थापित करने के लिए तन एवं धन के साथ अल्लाह के मार्ग में युद्ध करना।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मेरे पूछने पर यह कार्य बताए और अगर में आगे पूछता, तो आप और भी बताते।
फ़ायदे
- आमाल (कार्यों) की प्रधानता में, अल्लाह के उनसे प्रेम के अनुसार कमी-बेशी पाई जाती है।
- प्रधानता के क्रम का ख़्याल रखते हुए अच्छे कामों में आगे बढ़ने की प्रेरणा।
- सबसे अच्छा अमल (कार्य) क्या है, इस प्रश्न के उत्तर में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अलग-अलग बातें व्यक्तियों एवं परिस्थितियों को देखते हुए कही हैं। जिसके लिए जो अमल अधिक लाभकारी था, उसके लिए उसे सबसे अच्छा अमल बताया।
हवाला
صحيح البخاري (1/ 112) (527).
صحيح مسلم (1/ 90) (85).
الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 70).
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص84).
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (1/ 108).
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com