عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : إذا قرأتم: الحمد لله فاقرءوا: ﴿بسم الله الرحمن الرحيم﴾ إنها أم القرآن، وأم الكتاب، والسبع المثاني، و﴿بسم الله الرحمن الرحيم﴾ إحداها.
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “जब तुम लोग {अल-ह़म्दु लिल्लाह} पढ़ो, तो {बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम} (शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जो बड़ा दयालु और कृपाशील है) पढ़ो। निश्चय यह उम्म-उल-क़ुरआन (क़ुरआन का सार), उम्म-उल-किताब (किताब का सार) और अस-सब-अल-मसानी (बा-रबार दुहराई जाने वाली सात आयतें) है तथा {बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम} उनमें से एक है।"
इसे बैहक़ी ने रिवायत किया है। - इसे दारक़ुतनी ने रिवायत किया है ।दर्जासह़ीह़
हवाला
سنن الدارقطني، تحقيق: شعيب الأرنؤوط وآخرون، ط1، مؤسسة الرسالة، بيروت، لبنان، 1424 هـ.
صحيح الجامع الصغير وزيادته للألباني، ط3، المكتب الإسلامي، بيروت، 1408هـ.
سنن البيهقي الكبرى، أحمد بن الحسين أبو بكر البيهقي، مكتبة دار الباز، مكة المكرمة، 1414هـ – 1994م، تحقيق: محمد عبد القادر عطا.
توضيح الأحكام من بلوغ المرام، لعبدالله بن عبد الرحمن البسام، مكتبة الأسدي، مكة، ط الخامسة 1423هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن علي بن أبي طالب رضي الله عنه أنه قال: «أنا أَوَّلُ من يَجْثُو بين يَدَيِ الرحمن للخُصُومة يوم القيامة» وقال قيس بن عباد: وفيهم أُنْزِلَتْ : {هذان خصمان اخْتَصَمُوا في ربهم} [الحج: 19] قال: "هم الذين تَبَارَزُوا يوم بَدْرٍ: حمزة، وعلي، وَعُبَيْدَةُ، أو أبو عبيدة بن الحارث، وَشَيْبَةُ بن رَبِيعَةَ، وعتبة بن رَبِيعَةَ، والوليد بن عُتْبَةُ".
अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहु) से वर्णित है, उन्होंने कहाः मैं पहला व्यक्ति हूँ, जो अत्यंत कृपाशील अल्लाह के सामने झगड़ने के लिए क़यामत के दिन अपने घुटनों के बल बैठेगा। क़ैस बिन अब्बाद कहते हैंः इन्हीं लोगों के बारे में यह आयत उतरी हैः (यह दो पक्ष हैं, जो अपने पालनहार के विषय में झगड़े।) [सूरा हजः 19] वह कहते हैंः यही लोग अर्थात हमज़ा, अली, उबैदा अथवा अबू उबैदा बिन हारिस, शैबा बिन रबीआ, उतबा बिन रबीआ और वलीद बिन उतबा ही हैं, जो बद्र के दिन मुक़ाबले के लिए आगे निकलकर लड़े।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح البخاري -الجامع الصحيح-؛ للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ.
البدرُ التمام شرح بلوغ المرام، الحسين بن محمد بن سعيد، المعروف بالمَغرِبي، المحقق: علي بن عبد الله الزبن: دار هجر الطبعة: الأولى، 1414 هـ - 1994 م.
إرشاد الساري لشرح صحيح البخاري، أحمد بن محمد بن أبى بكر القسطلاني القتيبي المصري، المطبعة الكبرى الأميرية، مصر- الطبعة: السابعة، 1323 هـ.
منحة العلام في شرح بلوغ المرام: تأليف عبد الله الفوزان، طبعة دار ابن الجوزي، الطبعة الأولى 1428.
توضيح الأحكام شرح بلوغ المرام: تأليف عبد الله البسام، مكتبة الأسدي، مكة المكرمة، الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م.
تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام: تأليف الشيخ صالح الفوزان، عناية عبد السلام السليمان، مؤسسة الرسالة الطبعة الأولى.
فتح ذي الجلال والإكرام بشرح بلوغ المرام، للشيخ ابن عثيمين، المكتبة الإسلامية بالقاهرة، تحقيق صبحي رمضان وأم إسراء بيومي، الطبعة الأولى 1427.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عقبة بن عامر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على المنبر، يقول: "{وأعدوا لهم ما استطعتم من قوة} [الأنفال: 60]، ألا إن القُوَّةَ الرَّميُ، ألا إن القوة الرمي، ألا إن القوة الرمي".
उक़बा बिन आमिर (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मिंबर पर कहते हुए सुना हैः (तथा तुमसे जहाँ तक हो सके, उनके लिए शक्ति तैयार रखो।) [सूरा अल-अनफ़ालः 60] सुन लो, शक्ति से आशय तीरंदाज़ी है। सुन लो, शक्ति से आशय तीरंदाज़ी है। सुन लो, शक्ति से आशय तीरंदाज़ी है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
इस हदीस में उस शक्ति की व्याख्या की गई है, जिसे शत्रुओं एवं काफ़िरों का मुक़ाबला करने के लिए अपनाने का आदेश दिया गया है। हदीस में कहा गया है कि उससे मुराद "फेंकना" है, जिससे आघात भी बड़ा सख़्त होता है और शत्रुओं का ख़तरा भी बहुत कम रहता है। यह आयत जिस समय उतरी थी, उस समय तीर फेंक कर आक्रमण किया जाता था। लेकिन इस आयत के वाक्पटु अर्थ रखने में से है कि इसमें शक्ति शब्द का प्रयोग किया गया है, ताकि उसके अंतर्गत हर ज़माने एवं हर स्थान की शक्ति आ जाए। इसी तरह हदीस के वैज्ञानिक चमत्कार को यह बात स्पष्ट करती है कि उसमें "फेंकने" का शब्द प्रयुक्त हुआ है, जिसके अंदर हर प्रकार का फेंकना सम्मिलित है, चाहे हथियार कोई भी हो और किसी भी समय तैयार हुआ हो।
हवाला
- صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ.
- منحة العلام في شرح بلوغ المرام: تأليف عبد الله الفوزان، طبعة دار ابن الجوزي، الطبعة الأولى 1428.
- توضيح الأحكام شرح بلوغ المرام: تأليف عبد الله البسام، مكتبة الأسدي، مكة المكرمة، الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م.
- تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام:تأليف الشيخ صالح الفوزان- عناية عبد السلام السليمان - مؤسسة الرسالة الطبعة الأولى.
- فتح ذي الجلال والإكرام بشرح بلوغ المرام للشيخ ابن عثيمين، المكتبة الإسلامية القاهرة، تحقيق صبحي رمضان وأم إسراء بيومي، الطبعة الأولى 1427.
- بلوغ المرام من أدلة الأحكام، لابن حجر، دار القبس للنشر والتوزيع، الرياض - المملكة العربية السعودية الطبعة: الأولى، 1435 هـ - 2014 م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ: أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «لاَ تَقُومُ السَّاعَةُ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ مِنْ مَغْرِبِهَا، فَإِذَا طَلَعَتْ فَرَآهَا النَّاسُ آمَنُوا أَجْمَعُونَ، فَذَلِكَ حِينَ: {لاَ يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِنْ قَبْلُ، أَوْ كَسَبَتْ فِي إِيمَانِهَا خَيْرًا} [الأنعام: 158] وَلَتَقُومَنَّ السَّاعَةُ وَقَدْ نَشَرَ الرَّجُلاَنِ ثَوْبَهُمَا بَيْنَهُمَا فَلاَ يَتَبَايَعَانِهِ، وَلاَ يَطْوِيَانِهِ، وَلَتَقُومَنَّ السَّاعَةُ وَقَدِ انْصَرَفَ الرَّجُلُ بِلَبَنِ لِقْحَتِهِ فَلاَ يَطْعَمُهُ، وَلَتَقُومَنَّ السَّاعَةُ وَهُوَ يَلِيطُ حَوْضَهُ فَلاَ يَسْقِي فِيهِ، وَلَتَقُومَنَّ السَّاعَةُ وَقَدْ رَفَعَ أَحَدُكُمْ أُكْلَتَهُ إِلَى فِيهِ فَلاَ يَطْعَمُهَا».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "क़यामत उस समय तक नहीं आएगी, जब तक सूरज अपने डूबने के स्थान से न निकले। जब सूरज अपने डूबने के स्थान से निकलेगा और लोग देखेंगे, तो सब लोग ईमान ले आएँगे। ऐसा उस समय होगा, जब : " किसी प्राणी को उसका ईमान लाभ नहीं देगा, जो पहले ईमान न लाया हो या अपने ईमान की हालत में कोई सत्कर्म न किया हो।" [सूरा अल-अनआम : 158] क़यामत इस तरह आएगी कि दो लोगों ने अपने बीच कपड़े फैला रखे होंगे, न उसकी खरीद-बिक्री कर सकेंगे और न उसे समेट सकेंगे। क़यामत इस तरह आएगी कि आदमी अपनी ऊँट को दूह चुका होगा, लेकिन दूध पी नहीं सकेगा। क़यामत इस तरह आएगी कि आदमी अपने हौज़ को ठीक कर रहा होगा, लेकिन उसका पानी पी नहीं सकेगा। क़यामत इस तरह आएगी कि आदमी निवाला मुँह तक उठा चुका होगा, लेकिन उसे खा नहीं सकेगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि क़यामत की निशानियों में से एक बड़ी निशानी यह है कि सूर्ज पूरब की बजाय पश्चिम से निकल आए। इस निशानी को देखने के बाद सारे लोग ईमान ले आएँगे। लेकिन उस समय न तो काफ़िर को ईमान लाने का लाभ मिलेगा और न सत्कर्म तथा तौबा ही कुछ काम आएगी। फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि क़यामत इस तरह अचानक आएगी कि लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त होंगे और कोई अपना काम पूरा नहीं कर सकेगा। क़यामत इस तरह अचानक आएगी कि खरीदने वाले के लिए बेचने वाले ने कपड़ा सामने फैला रखा होगा, लेकिन न तो सौदा कर सकेंगे और न उसे समेट सकेंगे। क़यामत इस तरह अचानक आएगी कि आदमी दूध देने वाली ऊँटनी का दूध हाथ में ले लिया होगा, लेकिन पी नहीं सकेगा। क़यामत इस तरह अचानक आएगी कि आदमी पानी का तालाब ठीक कर चुका होगा, लेकिन उसका पानी पीने का अवसर नहीं मिलेगा। समय इतना कम होगा कि एक व्यक्ति ने निवाला मुँह तक उठा लिया होगा, लेकिन खा नहीं सकेगा।
फ़ायदे
- इस्लाम तथा तौबा उस समय तक ग्रहण योग्य हैं, जब तक सूरज पश्चिम से निकल न आए।
- ईमान तथा सत्कर्म द्वारा क़यामत की तैयारी की प्रेरणा, क्योंकि क़यामत अचानक आ जाएगी।
हवाला
صحيح البخاري (8/ 106) (6506)، صحيح مسلم (1/ 137) (157)، عمدة القاري شرح صحيح البخاري (23/ 92).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي سَعِيدٍ الخُدْرِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «يُؤْتَى بِالْمَوْتِ كَهَيْئَةِ كَبْشٍ أَمْلَحَ، فَيُنَادِي مُنَادٍ: يَا أَهْلَ الجَنَّةِ، فَيَشْرَئِبُّونَ وَيَنْظُرُونَ، فَيَقُولُ: هَلْ تَعْرِفُونَ هَذَا؟ فَيَقُولُونَ: نَعَمْ، هَذَا المَوْتُ، وَكُلُّهُمْ قَدْ رَآهُ، ثُمَّ يُنَادِي: يَا أَهْلَ النَّارِ، فَيَشْرَئِبُّونَ وَيَنْظُرُونَ، فَيَقُولُ: وهَلْ تَعْرِفُونَ هَذَا؟ فَيَقُولُونَ: نَعَمْ، هَذَا المَوْتُ، وَكُلُّهُمْ قَدْ رَآهُ، فَيُذْبَحُ ثُمَّ يَقُولُ: يَا أَهْلَ الجَنَّةِ خُلُودٌ فَلاَ مَوْتَ، وَيَا أَهْلَ النَّارِ خُلُودٌ فَلاَ مَوْتَ، ثُمَّ قَرَأَ: {وَأَنْذِرْهُمْ يَوْمَ الحَسْرَةِ إِذْ قُضِيَ الأَمْرُ وَهُمْ فِي غَفْلَةٍ} [مريم: 39]، وَهَؤُلاَءِ فِي غَفْلَةٍ أَهْلُ الدُّنْيَا {وَهُمْ لاَ يُؤْمِنُونَ} [مريم: 39]».
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "क़यामत के दिन मौत को एक चितकबरे मेंढे के रूप में लाया जाएगा। फिर एक आवाज़ देने वाला आवाज़ देगा : ऐ जन्नत वासियो! चुनांचे वे ऊपर नज़र उठाकर देखेंगे। आवाज़ देने वाला कहेगा : क्या तुम इसको पहचानते हो? वे कहेंगे: हाँ। यह मौत है और सब ने उसको देखा है। फिर वह आवाज़ देगा : ऐ जहन्नम वासियो! चुनांचे वह भी अपनी गर्दन उठाकर देखेंगे। फिर वह कहेगा : क्या तुम इसको पहचानते हो? वे कहेंगे : हाँ। सब ने उसे देखा है। फिर उस मेंढे को ज़बह कर दिया जाएगा और आवाज़ देने वाला कहेगा : ऐ जन्नत वासियो! तुम्हें हमेशा यहाँ रहना है, अब किसी को मौत नहीं आएगी । ऐ जहन्नम वासियो! तुम्हें भी यहाँ हमेशा रहना है, अब किसी को मौत नहीं आएगी। फिर आपने यह आयत तिलावत फरमाई : “और (ऐ नबी!) आप उन्हें पछतावे के दिन से डराएँ, जब हर काम का फैसला कर दिया जाएगा, और वे पूरी तरह से ग़फ़लत में हैं और वे ईमान नहीं लाते।" [सूरा मरयम : 39]
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस हदीस में बयान कर रहे हैं कि क़यामत के दिन मौत को चितकबरे रंग के मेंढे के रूप में लाया जाएगा। फिर एक आवाज़ लगाने वाला आवाज़ लगाएगा कि ऐ जन्नत में रहने वालो! चुनांचे वे अपनी गर्दनों को लंबा करके और अपने सरों को उठाकर देखेंगे। इसके बाद आवाज़ लगाने वाला उनसे कहेगा कि क्या तुम इसे पहचान रहे हो? लोग उत्तर देंगे कि हाँ हम इसे पहचान रहे हैं। यह मौत है। सब ने उसे देख रखा था। इसलिए पहचान लेंगे। फिर आवाज़ देने वाला आवाज़ देगा कि ऐ जहन्नम में रहने वालो! चुनांचे वे अपनी गर्दनों को लंबा और अपने सरों को उठाकर देखेंगे। पुकारने वाला कहेगा कि क्या तुम इसे पहचान रहे हो? वे उत्तर देंगे कि हाँ, हम इसे पहचान रहे हैं। यह मौत है। दरअसल सबने पहले उसे देख रखा होगा। इसके बाद मौत को ज़बह कर दिया जाएगा। फिर आवाज़ देने वाला आवाज़ देगा : ऐ जन्नत वासियो! अब तुम हमेशा ज़िंदा रहोगे। तुमको मौत नहीं आएगी। ऐ जहन्नम वासियो! अब तुम हमेशा ज़िंदा रहोगे। तुमको मौत नहीं आएगी। यह ऐलान इसलिए किया जाएगा, ताकि ईमान वाले अधिक आनंद ले सकें और ईमान न रखने वालों को कष्ट का अधिक एहसास हो। फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : "और (ऐ नबी!) आप उन्हें पछतावे के दिन से डराएँ, जब हर काम का फैसला कर दिया जाएगा, और वे पूरी तरह से ग़फ़लत में हैं और वे ईमान नहीं लाते।" क़यामत के दिन जन्नतियों एवं जहन्नमियों के बीच निर्णय कर दिया जाएगा और हर एक अपने ठिकाने में चला जाएगा, जहाँ उसे हमेशा रहना है। उस दिन गुनहगार इस बात पर अफ़सोस करेगा कि वह दुनिया से नेकी के काम करके नहीं आया है। इसी तरह कोताही करने वाले को भी अफ़सोस होगा कि अधिक नेकी करके क्यों नहीं आए।
फ़ायदे
- आख़िरत में इन्सान का जन्नत अथवा जहन्नम का ठिकाना अनंत काल के लिए होगा।
- इसमें क़यामत के दिन की ख़ौफ़नाकी से सावधान किया गया है, क्योंकि वह आकांक्षा एवं पश्चाताप का दिन होगा।
- इस बात का बयान कि जन्नतियों को प्राप्त होने वाली खुशियाँ हमेशा रहेंगी और जहन्नमियों को प्राप्त होने वाले दुःख भी हमेशा रहेंगे।
हवाला
صحيح البخاري (6/ 93) (4730)، صحيح مسلم (4/ 2188) (2849)، التوضيح شرح الجامع الصحيح (22/595)، عمدة القاري شرح صحيح البخاري (19/ 52)، البحر المحيط الثجاج (43/686).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَدِيِّ بْنِ حَاتِمٍ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «الْيَهُودُ مَغْضُوبٌ عَلَيْهِمْ، وَالنَّصَارَى ضُلَّالٌ».
अदी बिन हातिम रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "यहूदी वह लोग हैं, जिनपर अल्लाह का प्रकोप हुआ और ईसाई वह लोग हैं, जो गुमराह हैं।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि यहूदी एक ऐसा संप्रदाय है, जिसे अल्लाह के प्रकोप का सामना करना पड़ा, क्योंकि उन्होंने हक़ को जानते हुए भी उसपर अमल नहीं किया। जबकि ईसाई एक गुमराह संप्रदाय है, जिन्होंने बिना ज्ञान के अमल किया।
फ़ायदे
- ज्ञान एवं अमल दोनों का एक साथ जमा होना प्रकोप के शिकार होने वाले और गुमराह लोगों के रास्ते से मुक्ति का कारण है।
- इसमें यहूदियों एवं ईसाइयों के रास्ते से सावधान किया गया है, और सीधे रास्ते यानी इस्लाम को अनिवार्य रूप से पकड़े रहने की प्रेरणा दी गई है।
- यहूदी एवं ईसाई दोनों गुमराह और प्रकोप के शिकार लोग हैं, लेकिन यहूदियों का सबसे विशिष्ट विशेषता प्रकोप का शिकार होना और ईसाइयों का सबसे विशिष्ट विशेषता गुमराह हो जाना है।
हवाला
سنن الترمذي (5/ 71) (2954)، النهاية في غريب الحديث و الأثر ( ص 548)، المنهل العذب المورود (5/250)، البحر المحيط الثجاج (9/248).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا قَالَتْ: تَلَا رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ هَذِهِ الْآيَةَ: {هُوَ الَّذِي أَنْزَلَ عَلَيْكَ الْكِتَابَ مِنْهُ آيَاتٌ مُحْكَمَاتٌ هُنَّ أُمُّ الْكِتَابِ وَأُخَرُ مُتَشَابِهَاتٌ فَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ زَيْغٌ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ ابْتِغَاءَ الْفِتْنَةِ وَابْتِغَاءَ تَأْوِيلِهِ، وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُ إِلَّا اللَّهُ، وَالرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ يَقُولُونَ آمَنَّا بِهِ كُلٌّ مِنْ عِنْدِ رَبِّنَا وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ} [آل عمران: 7]. قَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «فَإِذَا رَأَيْتِ الَّذِينَ يَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ فَأُولَئِكَ الَّذِينَ سَمَّى اللهُ، فَاحْذَرُوهُمْ».
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : "(ऐ नबी!) वही है जिसने आप पर यह पुस्तक उतारी, जिसमें से कुछ आयतें मुहकम हैं, वही पुस्तक का मूल हैं, तथा कुछ दूसरी (आयतें) मुतशाबेह हैं। फिर जिनके दिलों में टेढ़ है, तो वे फ़ितने की तलाश में तथा उसके असल आशय की तलाश के उद्देश्य से, सदृश अर्थों वाली आयतों का अनुसरण करते हैं। हालाँकि उनका वास्तविक अर्थ अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। तथा जो लोग ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं हम उसपर ईमान लाए, सब हमारे रब की ओर से है। और शिक्षा वही लोग ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं।" [सूरा आल-ए-इमरान : 7] उनका कहना है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो क़ुरआन की सदृश आयतों का अनुसरण करते हों, तो जान लो कि उन्हीं का नाम अल्लाह ने लिया है। अतः उनसे सावधान रहना।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : "(ऐ नबी!) वही है जिसने आप पर यह पुस्तक उतारी, जिसमें से कुछ आयतें मुहकम हैं, वही पुस्तक का मूल हैं, तथा कुछ दूसरी आयतें मुतशाबेह हैं। फिर जिनके दिलों में टेढ़ है, तो वे फ़ितने की तलाश में तथा उसके असल आशय की तलाश के उद्देश्य से, सदृश अर्थों वाली आयतों का अनुसरण करते हैं। हालाँकि उनका वास्तविक अर्थ अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। तथा जो लोग ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं हम उसपर ईमान लाए, सब हमारे रब की और से है। और शिक्षा वही लोग ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं।" इस आयत में अल्लाह पाक ने बताया है कि उसी ने अपने नबी पर क़ुरआन उतारा है, जिसकी कुछ आयतों का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है और यही आयतें क़ुरआन का मूल हैं तथा विभेद के समय इन्हीं की ओर लौटा जाएगा। जबकि उसकी कुछ आयतें एक से अधिक मायनों की संभावना रखती हैं, कुछ लोगों के सामने उनका अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता या ऐसा लगता है कि उनके तथा अन्य आयतों के बीच में टकराव है। फिर अल्लाह ने बताया कि इन आयतों के बारे में लोगों का रवैया कैसा रहता है? जिन लोगों के दिल सत्य से हटे हुए हैं, वे स्पष्ट अर्थ वाली आयतों को छोड़ कर एक से अधिक अर्थ की संभावना रखने वाली आयतों को लेते हैं। इससे उनका उद्देश्य संदेह पैदा करना और लोगों को गुमराह करना होता है। वे इन आयतों का अर्थ अपनी इच्छा अनुसार निकालते हैं। इसके विपरीत गहरे ज्ञान वाले लोगों को पता होता है कि यह आयतें एक से अधिक अर्थ की संभावना वाली हैं, इसलिए वे इनकी व्याख्या स्पष्ट अर्थ वाली आयतों के आलोक में करते हैं और इस बात पर विश्वास रखते हैं कि यह सारी आयतें उच्च एवं पवित्र अल्लाह की उतारी हुई हैं, इसलिए इनमें परस्पर टकराव नहीं हो सकता। लेकिन इससे शिक्षा वही लोग प्राप्त कर सकते हैं, जो स्वच्छ विवेक रखते हैं। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईमान वालों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से कहा कि जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो क़ुरआन की मुतशाबेह आयतों के पीछे पड़ते हों, तो समझ जाओ कि यही वह लोग हैं, जिनका ज़िक्र अल्लाह ने इन शब्दों में किया है : "फिर जिनके दिलों में टेढ़ है।" अतः इन लोगों से सचेत रहो और इनकी बात पर ध्यान न दो।
फ़ायदे
- क़ुरआन की मुहकम आयतों से मुराद वह आयतें हैं, जिनका अर्थ स्पष्ट हो। जबकि मुतशाबेह से मुराद वह आयतें हैं, जिनके एक से अधिक मायने होने की संभावना हो और जिनमें ग़ौर व फ़िक्र करने की ज़रूरत हो।
- इस हदीस में गुमराहों, बिदअतियों और लोगों को गुमराह करने और संदेह में डालने के लिए उलझनें खड़ी करने वालों के साथ उठने-बैछने से सावधान किया है।
- आयत के अंत में "और शिक्षा वही लोग ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं" कहकर गुमराह लोगों की भर्त्सना और मज़बूत ज्ञान वाले लोगों की प्रशंसा की गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिसने शिक्षा ग्रहण नहीं की और मनमानी करता रहा, वह बुद्धिमान नहीं है।
- मुतशाबेह आयतों का अनुसरण दिल की गुमराही का कारण है।
- मुतशाबेह आयतों को मुहकम आयतों के आलोक में देखा एवं समझा जाना ज़रूरी है।
- अल्लाह ने क़ुरआन की कुछ आयतों को मुहकम और कुछ आयतों को मुतशाबेह बनाया है, ताकि इस बात की परख हो सके कि कौन ईमान वाला है और कौन ईमान वाला नहीं है।
- क़ुरआन के अंदर मुतशाबेह आयतों की उपस्थिति दरअसल उलेमा की ग़ैर-उलेमा पर उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है और मानव विवेक के सीमित होने को इंगित करती है। ताकि मनुष्य अपने पैदा करने वाले के आगे नतमस्तक होजाए, और अपनी अक्षमता को स्वीकार करे।
- मज़बूत ज्ञान की फ़ज़ीलत तथा उसपर जमे रहने की आवश्यकता।
- अल्लाह के कथन { وما يعلم تأويله إلا الله والراسخون في العلم } में {الله} शब्द पर रुकने के संबंध में मुफ़स्सिरों के दो मत हैं। जो लोग {الله} शब्द पर रुकते हैं, उनकी नज़र में {تأويل} से मुराद किसी चीज़ की हक़ीक़त और वास्तविकता तथा ऐसी बातों को जानना है, जिनको जानना इन्सान के लिए संभव नहीं है, जैसे आत्मा और क़यामत आदि चीज़ें, जिनका ज्ञान अल्लाह ने अपने पास रखा है। गहरे ज्ञान वाले लोग इन चीज़ों पर विश्वास रखते हैं और इनकी हक़ीक़त की जानकारी को अल्लाह के हवाले कर देते हैं। दूसरी तरफ़ जो लोग {الله} शब्द पर रुकते नहीं हैं और उसे आगे से मिलाकर पढ़ते हैं, उनकी नज़र में {تأويل} से मुराद तफ़सीर एवं व्याख्या है। उनके मुताबिक इन आयतों की व्याख्या अल्लाह के साथ-साथ गहरे ज्ञान वाले लोग भी जानते हैं, जो मुहकम आयतों के आलोक में उनकी व्याख्या करते हैं और उनपर विश्वास रखते हैं।
हवाला
صحيح البخاري (6/ 33) (4547)، صحيح مسلم (4/ 2053) (2665)، فتح الباري (8/211)، شرح النووي على مسلم (16/217)، النهاية في غريب الحديث والأثر (ص 407، 465)، فتح الودود في شرح سنن أبي داود (4/415)، تحفة الأبرار شرح مصابيح السنّة (1/129)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (41/ 559).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَائِشَةَ رضي الله عنها: أَنَّ رَجُلًا قَعَدَ بَيْنَ يَدَيِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، إِنَّ لِي مَمْلُوكِينَ يَكْذِبُونَنِي وَيَخُونُونَنِي وَيَعْصُونَنِي، وَأَشْتُمُهُمْ وَأَضْرِبُهُمْ، فَكَيْفَ أَنَا مِنْهُمْ؟ قَالَ: «يُحْسَبُ مَا خَانُوكَ وَعَصَوْكَ وَكَذَّبُوكَ وَعِقَابُكَ إِيَّاهُمْ، فَإِنْ كَانَ عِقَابُكَ إِيَّاهُمْ بِقَدْرِ ذُنُوبِهِمْ كَانَ كَفَافًا، لَا لَكَ وَلَا عَلَيْكَ، وَإِنْ كَانَ عِقَابُكَ إِيَّاهُمْ دُونَ ذُنُوبِهِمْ كَانَ فَضْلًا لَكَ، وَإِنْ كَانَ عِقَابُكَ إِيَّاهُمْ فَوْقَ ذُنُوبِهِمُ اقْتُصَّ لَهُمْ مِنْكَ الْفَضْلُ»، قَالَ: فَتَنَحَّى الرَّجُلُ فَجَعَلَ يَبْكِي وَيَهْتِفُ، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «أَمَا تَقْرَأُ كِتَابَ اللهِ: {وَنَضَعُ الْمَوَازِينَ الْقِسْطَ لِيَوْمِ الْقِيَامَةِ فَلا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْئًا}، الْآيَةَ»، فَقَالَ الرَّجُلُ: وَاللهِ يَا رَسُولَ اللهِ، مَا أَجِدُ لِي وَلهُمْ شَيْئًا خَيْرًا مِنْ مُفَارَقَتِهِمْ، أُشْهِدُكَ أَنَّهُمْ أَحْرَارٌ كُلُّهُمْ.
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है : एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने बैठा और बोला : ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे कुछ ग़ुलाम हैं। वह मुझसे झूठ बोलते हैं, मेरे साथ विश्वासघात करते हैं और मेरी अवज्ञा करते हैं। जबकि मैं उनको गाली देता हूँ और मारता हूँ। उनके साथ मेरे इस बर्ताव के कारण मेरा हाल क्या होगा? आपने कहा : "उनके द्वारा की गई तुम से विश्वासघात, अवज्ञा तथा तुमसे झूठ बोलने और तुम्हारे द्वारा उनको दी गई सज़ा का हिसाब होगा। अगर तुम्हारे द्वारा उनको दी गई सज़ा उनके गुनाहों के बराबर होगी, तो काफ़ी होगी। न तुम्हारे हक़ में जाएगी और न तुम्हारे विरुद्ध। लेकिन अगर तुम्हारे द्वारा उनको दी गई सज़ा उनके गुनाहों से कम होगी, तो तुम्हारे हक़ में जाएगी। जबकि अगर तुम्हारे द्वारा उनको दी गई सज़ा उनके गुनाहों से अधिक होगी, तो उनको दी गई अधिक सज़ा का तुमसे क़िसास लिया जाएगा।" वर्णनकर्ता कहते हैं : इतना सुनने के बाद वह व्यक्ति ज़रा हट के ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। यह देख अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "क्या तुमने अल्लाह की किताब नहीं पढ़ी है, जिसमें लिखा है : "और हम क़यामत के दिन न्याय के तराज़ू रखेंगे। फिर किसी पर कुछ भी अन्याय नहीं किया जाएगा। और अगर किसी का कोइ कर्म राई के एक दाने के बराबर भी होगा, तो हम उसे ले आएँगे। और हम हिसाब लेने वाले काफ़ी हैं।" इसपर उस व्यक्ति ने कहा : अल्लाह की क़सम, ऐ अल्लाह के रसूल! मैं अपने और उनके हक़ में इससे बेहतर कुछ नहीं पाता कि उनको आज़ाद कर दूँ। मैं आपको ग़वाह बनाकर कहता हूँ कि वे सारे आज़ाद हैं।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैदर्जाज़ईफ़ (दुर्बल)
तशरीह
एक व्यक्ति अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और अपने ग़ुलामों की हरकतों की शिकायत करने लगा। कहने लगा कि वे उसको ग़लत सूचना देते हैं, उसके साथ विश्वासघात करते हैं, लेन-देन एवं व्यवहार में धोखा करते हैं और उसके आदेशों की अवहेलना करते हैं, जबकि वह उनको गाली-गलौज करता है और शिष्ट बनाने के लिए मारता भी है। उसने पूछा कि अपने गुलामों के साथ इस बर्ताव की वजह से क़यामत के दिन उसका क्या हाल होगा? इसपर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : उनके द्वारा की गई तुम्हारे साथ विश्वासघात, तुमसे बोले गए झूठ और उनके द्वारा की गई तुम्हारी अवज्ञा तथा तुम्हारे द्वारा उनको दिए गए दंड का हिसाब होगा। ऐसे में अगर गुनाह तथा दंड दोनों बराबर होंगे, तो मामला बराबरी का होगा। न तुम्हारे हक़ में जाएगा और न तुम्हारे विरुद्ध। जबकि अगर तुम्हारे द्वारा दी गई सज़ा उनके गुनाह से कम होगी, तो मामला तुम्हारे हक़ में जाएगा और तुमको इसका प्रतिफल मिलेगा। इसके विपरीत अगर तुम्हारे द्वारा दी गई सज़ा उनके गुनाह से अधिक होगी, तो इसकी सज़ा तुमको भुगतनी पड़ेगी। यह सुन वह व्यक्ति ज़रा दूर हट गया और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। यह देख अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : क्या तुम अल्लाह की किताब नहीं पढ़ते, जिसमें लिखा है : "और हम क़यामत के दिन न्याय के तराज़ू रखेंगे। फिर किसी पर कुछ भी अन्याय नहीं किया जाएगा। और अगर किसी का कोइ कर्म राई के एक दाने के बराबर भी होगा, तो हम उसे भी ले आएँगे। और हम हिसाब लेने वाले काफ़ी हैं।" इससे स्पष्ट है कि क़यामत के दिन किसी पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं होगा। वहाँ का हर फ़ैसला न्याय पर आधारित होगा। यह सुन उस व्यक्ति ने कहा : अल्लाह की क़सम, ऐ अल्लाह के रसूल! मैं खुद अपने तथा उनके हक़ में इससे उत्तम कुछ नहीं पाता कि उनको खुद से अलग कर दूँ। मैं आपको गवाह बनाकर कहता हूँ कि मैं उनको अल्लाह के लिए, हिसाब तथा अज़ाब के भय से, आज़ाद करता हूँ।
फ़ायदे
- सहाबी की सच्चाई कि उन्होंने अल्लाह के अज़ाब के भय से अपने ग़ुलामों को आज़ाद कर दिया।
- ज़ालिम से लिया गया बदला अगर ज़ुल्म के बराबर या उससे कम होगा, तब तो जायज़ है, लेकिन अगर ज़्यादा हो गया, तो जायज़ नहीं है।
- नौकर-चाकर तथा कमज़ोर लोगों के साथ अच्छा बर्ताव करने की प्रेरणा।
हवाला
سنن الترمذي (5/ 227) (3165)، النهاية في غريب الحديث والأثر (ص 804)، مرقاة المفاتيح (8/3533)، تحفة الأحوذي (9/3).
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