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तशरीह के साथ हदीसें

क़ुरआन की तफ़सीर

17 हदीसें

उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) मुझे बद्र युद्ध में शरीक होने वाले बड़े-बूढ़े सहाबा की मजलिस में शामिल करते थे। इससे ऐसा लगा कि उनमें से किसी के मन में कुछ नाराज़गी पाई गई।

عن عبد الله ابن عباس رضي الله عنهما كان عمر رضي الله عنه يُدْخِلُنِي مع أَشْيَاخِ بَدْرٍ فَكَأَنَّ بَعْضَهُم وَجَدَ في نفسه، فقال: لم يُدْخِلُ هذا معنا ولنا أبناءٌ مثله؟! فقال عمر: إنه من حَيْثُ عَلِمْتُمْ! فدعاني ذاتَ يومٍ فأَدَخَلَنِي مَعَهُمْ فما رأيتُ أنه دعاني يَوْمَئِذٍ إلا لِيُرِيَهُم، قال: ما تقولون في قول الله:(إذا جاء نصر الله والفتح)، [الفتح: 1]، فقال بعضهم: أَمَرَنَا نَحْمَدُ اللهَ ونَسْتَغْفِرُهُ إذا نصرنا وفَتَحَ علينا، وسكتَ بعضُهُم فَلَمْ يَقُلْ شيئًا، فقال لي: أكذلك تقولُ يا ابنَ عباس؟ فقلت: لا، قال: فما تقول؟ قلت: هو أَجَلُ رسولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَعْلَمَهُ له، قال: "إذا جاء نصر الله والفتح" وذلك علامةُ أجلِكَ، "فسبح بحمد ربك واستغفره إنه كان توابا" فقال عمر رضي الله عنه : مَا أَعْلَمُ مِنْهَا إلَّا مَا تَقُولُ.
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से वर्णित है, वह कहते हैं कि उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) मुझे बद्र युद्ध में शरीक होने वाले बड़े-बूढ़े सहाबा की मजलिस में शामिल करते थे। इससे ऐसा लगा कि उनमें से किसी के मन में कुछ नाराज़गी पाई गई। किसी ने कहाः इसे वह हमारे साथ क्यों शामिल करते हैं, जबकि उसके बराबर हमारे बच्चे हैं? यह सुन उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने कहाः वह कहाँ से हैं, यह तो तुम जानते ही हो। चुनांचे एक दिन मुझे बुलाया और उनके साथ प्रामर्श में शरीक किया। मुझे लगता है कि उन्होंने उस दिन मुझे केवल इसलिए बुलाया था, ताकि उन्हें वास्तविकता से अवगत करा सकें। उन्होंने कहाः आप लोग अल्लाह के इस फ़रमान के बारे में क्या कहते हैंः "إذا جاء نصر الله والفتح" (सूरा अल-फ़त्ह़ः 1)? उनमें से किसी ने कहा कि अल्लाह ने हमें आदेश दिया है कि जब अल्लाह ने हमारी सहायता कर दी और हमें विजय प्रदान कर दिया, तो हम उसकी प्रशंसा करें और उससे क्षमा याचना करें। जबकि कुछ लोग ख़ामोश रहे और कुछ नहीं बोले।यह देख उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने मुझसे कहाः ऐ अब्बास के बेटे, क्या तुम भी ऐसा ही कहते हो? मैंने कहाः नहीं। फ़रमायाः फिर तुम क्या कहते हो? मैंने कहाः यह अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का मृत्यु-संदेश है, जिससे अल्लाह ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अवगत कराया है। अल्लाह ने कहाः "إذا جاء نصر الله والفتح" (जब अल्लाह की मदद और विजय आ गया) यह आपकी मृत्यु की निशानी है, "فسبح بحمد ربك واستغفره إنه كان توابا" (तो आप अपने रब की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता बयान करें और उससे क्षमा याचना करें। निश्चय वह बहुत ज़्यादा तौबा क़बूल करने वाला है।) यह सुन उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने कहाः मैं भी इस सूरा के बारे में वही जानत हूँ, जो तुम कह रहे हो।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

صحيح البخاري، للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. - صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب، الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. - كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا، الطبعة الأولى، 1430ه. - شرح رياض الصالحين، للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. - نزهة المتقين بشرح رياض الصالحين، تأليف مصطفى سعيد الخن، مصطفى البغا، محي الدين مستو، علي الشربجي، محمد أمين لطفي، مؤسسة الرسالة، بيروت، لبنان، الطبعة الرابعة عشرة، 1407ه. - بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الطبعة الأولى، 1418ه. - دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، المؤلف: محمد علي بن محمد بن علان الصديقي، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة للطباعة والنشر والتوزيع، بيروت – لبنان - الطبعة: الرابعة، 1425هـ - 2004م.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

ऐ चचा जान, आप 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कह दें, मैं इस कलिमा को अल्लाह के पास प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत करूँगा।

عن سَعِيدِ بْنِ الْمُسَيَّبِ، عَنْ أَبِيهِ قَالَ: لَمَّا حَضَرَتْ أَبَا طَالِبٍ الْوَفَاةُ، جَاءَهُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَوَجَدَ عِنْدَهُ أَبَا جَهْلٍ وَعَبْدَ اللهِ بْنَ أَبِي أُمَيَّةَ بْنِ الْمُغِيرَةِ، فَقَالَ: «أَيْ عَمِّ، قُلْ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ، كَلِمَةً أُحَاجُّ لَكَ بِهَا عِنْدَ اللهِ»، فَقَالَ أَبُو جَهْلٍ وَعَبْدُ اللهِ بْنُ أَبِي أُمَيَّةَ: أَتَرْغَبُ عَنْ مِلَّةِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ، فَلَمْ يَزَلْ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَعْرِضُهَا عَلَيْهِ، وَيُعِيدَانِهِ بِتِلْكَ الْمَقَالَةِ، حَتَّى قَالَ أَبُو طَالِبٍ آخِرَ مَا كَلَّمَهُمْ: عَلَى مِلَّةِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ، وَأَبَى أَنْ يَقُولَ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم: «وَاللهِ لَأَسْتَغْفِرَنَّ لَكَ مَا لَمْ أُنْهَ عَنْكَ»، فَأَنْزَلَ اللهُ: {مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ} [التوبة: 113]، وَأَنْزَلَ اللهُ فِي أَبِي طَالِبٍ، فَقَالَ لِرَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم: {إِنَّكَ لا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَكِنَّ اللهَ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ} [القصص: 56].
सईद बिन मुसय्यिब अपने पिता से रिवायत करते हैं, वह कहते हैं : जब अबू तालिब की मृत्यु का समय निकट आया, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनके पास आए। उस समय आपने उनके पास अब्दुल्लाह बिन अबू उमय्या बिन मुग़ीरा और अबू जह्ल को पाया। आपने कहा : "ऐ चचा जान, आप 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कह दें, मैं इस कलिमा को अल्लाह के पास प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत करूँगा।" यह सुन अबू जह्ल और अब्दुल्लाह बिन अबू उमय्या ने कहा : क्या तुम अब्दुल मुत्तलिब का धर्म छोड़ दोगे? अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बार-बार निवेदन करते रहे और दोनों रोकने के प्रयास में लगे रहे। अंततः अबू तालिब ने यही कहा कि वह अब्दुल मुत्तलिब के धर्म पर कायम हैं। इस तरह 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहने से इनकार कर दिया। वर्णनकर्ता कहते हैं : परन्तु, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तक मुझे रोका न जाए, मैं आपके लिए क्षमा माँगता रहूँगा।" चुनांचे अल्लाह ने यह आयत उतारी : {مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قربى...} (नबी और ईमान लाने वालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों के लिए क्षमा की प्रपर्थना करें, यद्यपि वे नातेदार ही क्यों न होंं) [अत-तौबा : 113] तथा अबू तालिब के बारे में यह आयत उतारी : {إِنَّكَ لا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ} (तुम जिसे चाहो सुपथ पर नहीं ला सकते, किंतु अल्लाह जिसे चाहता है राह दिखाता है, और वह राह पाने वालों को भली-भाँति जानता है।) [अल-क़सस : 56]
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अबू तालिब की मृत्यु का समय निकट आया, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनके पास आए और उनसे फ़रमाया : चचा जान! आप ला इलाहा इल्लल्लाह कह दें। इस एक वाक्य के आधार पर मैं अल्लाह के यहाँ आपके लिए गवाही दूँगा। यह सुन अबू जह्न और अब्दुल्लाह बिन अबू उमय्या ने कहा : अबू तालिब! आप अपने पिता अब्दुल मुत्तलिब का धर्म छोड़ देंगे? वह धर्म दरअसल मूर्ति पूजा का धर्म था। दोनों उनसे बात करते रहे, यहाँ तक कि उन्होंने उनसे जो अंतिम बात कही, वह इस प्रकार थी : मैं अब्दुल मुत्तलिब के धर्म पर रहते हुए दुनिया से जा रहा हूँ। यानी शिर्क और मूर्ति पूजा के धर्म पर। यह सुन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : मैं आपके लिए उस समय तक क्षमा याचना करता रहूँगा, जब तक मेरा रब मुझे मना न कर दे। चुनांचे इसी परिदृश्य में क़ुरआन की यह आयत उतरी : "किसी नबी के लिए तथा उनके लिए जो ईमान लाए हों, योग्य नहीं है कि मुश्रिकों (मिश्रणवादियों) के लिए क्षमा की प्रार्थना करें। यद्यपि वे समीपवर्ती हों, जब ये स्पष्ट हो गया कि वास्तव में वह जहन्नमी हैं।" [अत-तौबा : 113] अबू तालिब के बारे में यह आयत उतरी : "(हे नबी!) आप जिसे चाहें उसे सुपथ नहीं दर्शा सकते, परन्तु अल्लाह जिसे चाहे सुपथ दर्शाता है, और वह भली-भाँति जानता है सुपथ प्राप्त करने वालों को।" [अल-क़सस : 56] आप जिसे सत्य के मार्ग पर चलाना चाहें, उसे सत्य के मार्ग पर चला नहीं सकते। आपका काम केवल पहुँचा देना है। अल्लाह जिसे चाहता है, सत्य के मार्ग पर चलाता है।

फ़ायदे
  1. बहुदेववादियों के लिए अल्लाह से क्षमा की प्रार्थन करना जायज़ नहीं है, चाहे वह कितने ही क़रीबी रिश्तेदार क्यों न हों और उनका अमल एवं उपकार कितना ही बड़ा क्यों न हो।
  2. पूर्वजों एवं बड़े लोगों का कोरा अनुसरण अज्ञानता काल का काम है।
  3. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की करुणा की पूर्णता और लोगों और लोगों को आमंत्रित करने और उनका मार्गदर्शन करने की उनकी उत्सुकता।
  4. इस बात का दावा करने वालों का खंडन कि अबू तालिब मुसलमान हो गए थे।
  5. कर्मों का दारोमदार अंत पर है।
  6. लाभ प्राप्त करने या नुक़सान से बचने के लिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से लौ लगाना ग़लत है।
  7. जिसने ज्ञान, यक़ीन और विश्वास के साथ ला इलाहा इल्लल्लाह कह दिया, वह मुसलमान हो गया।
  8. बुरे साथियों का नुक़सान।
  9. ला इलाहा इल्लल्लाह का अर्थ है, बुतों, औलिया और अल्लाह के सदाचारी बंदों की इबादत से दामन बचाना और केवल एक अल्लाह की इबादत करना। बहुदेववादी भी कलिमा-ए-तौहीद के इस अर्थ को समझते थे।
  10. बहुदेववादी रोगी को देखने के लिए जाना जायज़ है, जब उसके मुसलमान हो जाने की आशा हो।
  11. सुपथ पर चलने का सुयोग देना अल्लाह का काम है। रसूल का काम केवल राह बता देना और संदेश पहुँचा देना है।
हवाला

صحيح البخاري (6/ 112) (4772). صحيح مسلم (1/ 54) (24). الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص155). الجديد في شرح كتاب التوحيد، للقرعاوي (ص169).

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जब कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को अपने ऊपर हराम कर ले, तो उसे कुछ नहीं माना जाएगा। वह यह आयत भी पढ़ते थेः {لقد كان لكم في رسول الله أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} (अर्थात तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है।)

عن ابن عباس رضي الله عنهما أنه كان يقول: «إذا حَرَّمَ امرأته ليس بشيء» وقال: {لقد كان لكم في رسول الله أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} [الأحزاب: 21]
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुमा) से वर्णित है कि वह कहा करते थेः जब कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को अपने ऊपर हराम कर ले, तो उसे कुछ नहीं माना जाएगा। वह यह आयत भी पढ़ते थेः {لقد كان لكم في رسول الله أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} (अर्थात तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है।) [अल-अहज़ाबः 21]
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

- البدرُ التمام شرح بلوغ المرام، للمغربي. الناشر: دار هجر. الطبعة: الأولى. - توضِيحُ الأحكَامِ مِن بُلوُغ المَرَام، للبسام. مكتَبة الأسدي، مكّة المكرّمة.الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م - بلوغ المرام من أدلة الأحكام، لابن حجر. دار القبس للنشر والتوزيع، الرياض - المملكة العربية السعودية الطبعة: الأولى، 1435 هـ - 2014 م - فتح ذي الجلال والاكرام بشرح بلوغ المرام، للشيخ ابن عثيمين، المكتبة الإسلامية - الطبعة الأولى 1427 - 2006م - صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ. - عمدة القاري شرح صحيح البخاري، للعيني. الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. - اللامع الصبيح بشرح الجامع الصحيح، للبِرْماوي. الناشر: دار النوادر، سوريا.الطبعة: الأولى، 1433 هـ - 2012 م - فتاوى اللجنة الدائمة - المجموعة الأولى- : اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والإفتاء- جمع وترتيب: أحمد بن عبد الرزاق الدويش.

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com