जब अल्लाह ने अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अपना यह कथन उतारा : {لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ} (आकाशों तथा धरती में जो कुछ है, सब अल्लाह का है) रचना, स्वामित्व, नियंत्रण और प्रबंधन की दृष्टि से, {وَإِنْ تُبْدُوا} (और यदि तुम प्रकट करो) यानी उसे ज़ाहिर और घोषित करो {مَا فِي أَنْفُسِكُمْ} (जो तुम्हारे दिलों में है) और सीनों में {أَوْ تُخْفُوهُ} (या उसे छिपाओ) यानी उसे गुप्त रखो और अपने दिलों में छिपा लो (يُحَاسِبْكُمْ بِهِ اللَّهُ} (अल्लाह तुमसे उसका हिसाब लेगा) क़यामत के दिन। {فَيَغْفِرُ لِمَنْ يَشَاءُ} (तो वह जिसे चाहे, क्षमा करे) अपने अनुग्रह और अपनी दया से, {وَيُعَذِّبُ مَنْ يَشَاءُ} (और जिसे चाहे, दण्ड दे) अपने न्याय से, {وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ} (तथा अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है) कोई चीज़ उसे विवश नहीं कर सकती। जब सहाबा ने यह सुना, तो यह बात उनपर बहुत भारी गुज़री; क्योंकि इसमें दिल में आने वाले ख़्यालों पर भी पकड़ की बात थी। अतः, वे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए, फिर घुटनों के बल बैठ गए और कहने लगे : ऐ अल्लाह के रसूल! इससे पहले हमपर ऐसे शारीरिक कर्म अनिवार्य किए गए थे, जिन्हें करने की हम शक्ति रखते थे; जैसे नमाज़, रोज़ा, जिहाद और सदक़ा। लेकिन अब आपपर यह आयत नाज़िल हुई है और हम में इसे करने की शक्ति नहीं है। तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे कहा : क्या तुम वैसा ही कहना चाहते हो जैसा यहूदियों और ईसाइयों ने कहा : {سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا} ''हमने सुना और हमने अवज्ञा की''? बल्कि कहो : {سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ المَصِيرُ} ''हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। हम तेरी क्षमा चाहते हैं ऐ हमारे रब! और तेरी ही ओर लौटकर जाना है।'' सहाबा ने अल्लाह और उसके रसूल के आदेश को स्वीकार किया, और कहा : ''हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। हम तेरी क्षमा चाहते हैं ऐ हमारे रब! और तेरी ही ओर लौटकर जाना है।'' जब मुसलमानों ने अपनी ज़ुबानों से यह कह दिया और उनके दिलों ने इसे स्वीकार कर लिया; तो अल्लाह ने नबी और उनकी उम्मत की प्रशंसा में यह आयत उतारी : {آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْهِ مِنْ رَبِّهِ وَالمُؤْمِنُونَ} और उनकी ज़ुबानों और दिलों ने अल्लाह के आदेश को स्वीकार कर लिया। ''हरेक अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी पुस्तकों और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (वे कहते हैं) हम उसके रसूलों में से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते।'' बल्कि हम उन सब पर ईमान लाते हैं {और उन्होंने कहा, हमने सुना} आपकी बात {और हमने आज्ञा का पालन किया} आपके आदेश का, और हम {तेरी क्षमा, ऐ हमारे पालनहार} और तेरी माफ़ी माँगते हैं, {और तेरी ही ओर लौटना है} और (अंतिम) ठिकाना उस दिन है, जब हिसाब क़ायम होगा। तो जब उन्होंने ऐसा किया, और अल्लाह के आदेशों के प्रति सुनने और आज्ञापालन को प्रकट करने के लिए वह कहा जिसका उन्हें आदेश दिया गया था; तो अल्लाह ने इस उम्मत से (भार) हल्का कर दिया और उस आयत को अपने इस कथन से निरस्त कर दिया: {अल्लाह किसी प्राणी पर उसकी क्षमता}, सामर्थ्य, शक्ति और प्रयास से अधिक भार नहीं डालता। {उसी के लिए} उसका पुण्य है {जो उसने कमाया} अर्थात भलाई के कार्य का प्रतिफल है, {और उसी पर} उसका दण्ड है {जो उसने कमाया} अर्थात पाप और गुनाह का दण्ड है। और अल्लाह किसी को दूसरे के पाप के लिए नहीं पकड़ता, और न ही उसके लिए जो उसके मन में वसवसा (बुरा विचार) आता है। {ऐ हमारे पालनहार! हमारी पकड़ न कर} और हमें सज़ा न दे {यदि हम भूल जाएँ} और याद न रख सकें, {या हमसे चूक हो जाए} और हमसे अनजाने में सही बात छूट जाए, तो अल्लाह ने उनकी यह दुआ क़बूल फ़रमाई और फ़रमाया : हाँ, मैंने ऐसा कर दिया है। {ऐ हमारे पालनहार! और हमपर कोई भारी बोझ न डाल} यानी कठिनाई और बोझ {जैसे तूने उन लोगों पर डाला जो हमसे पहले थे} यानी बनी इस्राईल और उनके अलावा दूसरों पर, तो अल्लाह ने दुआ क़बूल की और फ़रमाया : हाँ, मैंने ऐसा कर दिया है। {ऐ हमारे पालनहार! और हमपर वह बोझ न डाल, जिसे उठाने की हमारे अंदर शक्ति न हो} अर्थात ऐसे दायित्वों, परीक्षाओं और मामलों का, जिन्हें उठाने में हम असमर्थ हैं। अल्लाह ने कहा : हाँ, मैंने ऐसा कर दिया, {और हमारे पापों की अनदेखी कर दे} अर्थात हमारे पापों को हमसे मिटा दे, {हमें क्षमा कर दे} अर्थात हमारे पापों को हम पर छिपा दे और उन्हें अनदेखा कर दे, {तथा हमपर दया कर} अपनी विस्तृत दया से, {तू ही हमारा स्वामी है} और हमारा सरदार है; {अतः हमारी सहायता कर} तर्क स्थापित करके और प्रभुत्व देकर {काफ़िरों के विरुद्ध} उनके साथ युद्ध और जिहाद में। तो अल्लाह ने दुआ स्वीकार कर ली और कहा : हाँ, मैंने ऐसा कर दिया।
- अपने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के कारण इस उम्मत पर अल्लाह तआला की दया का वर्णन, जिनकी शान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : {وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِلْعَالَمِينَ} (ऐ नबी!) हमने आपको समस्त संसारों के लिए दया बनाकर भेजा है। [अल-अंबिया : 107]।
- पवित्र क़ुरआन की कुछ आयतों के निरस्त होने का सबूत तथा इस बात का प्रमाण कि क़ुरआन की कुछ आयतें ऐसी हैं, जिनका पाठ तो किया जाता है, लेकिन उनका हुक्म निरस्त कर दिया गया है। अतः उनपर अमल नहीं किया जाता।
- सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम की फ़ज़ीलत, अल्लाह के आदेश के प्रति उनकी आज्ञाकारिता व समर्पण, तथा उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश का अनुपालन।
- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपनी उम्मत के बारे में बहुत अधिक भय था कि कहीं वह पिछली उम्मतों के रास्ते पर चलकर अल्लाह के आदेशों को रद्द न कर दे।
- अल्लाह के आदेश के सामने आत्मसमर्पण करना और उसपर आपत्ति जताने से सावधान रहना अनिवार्य है, क्योंकि आपत्ति जताना पूर्ववर्ती ग्रंथों वाले समुदायों का तरीक़ा है।
- पिछली उम्मतों पर इस उम्मत की श्रेष्ठता का बयान कि उन्होंने अपने अंबिया से कहा : हमने सुना और हमने अवज्ञा की, और इस उम्मत ने कहा : हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया।
- इस उम्मत की यह फज़ीलत (श्रेष्ठता) कि उससे कठिनाइयों को दूर कर दिया गया है; भूल-चूक और अनजाने में हुई गलती पर पकड़ न होने की दुआ स्वीकार कर ली गई है; उन भारी बोझों को हटा दिया गया है जो उनसे पहले के लोगों पर थे; और उन्हें उस चीज़ का पाबंद नहीं बनाया गया है जिसे सहने की उनके अंदर शक्ति नहीं है।
- अल्लाह हमपर उस चीज़ का भार नहीं डालता, जिसे हम सहन न कर सकें, और वह हम पर हमारी क्षमता से अधिक दायित्यों का बोझ नहीं डालता। तथा जो वसवसे हमारे दिलों में आते हैं, यदि हम उनकी ओर न झुकें, उनपर संतुष्ट न हों और उनपर अमल न करें, तो वे कोई हानि नहीं पहुँचाते।
- इस दुआ के बारे में अल्लाह ने बताया है कि यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और मोमिनों की दुआ है, और उसने इसे अपनी किताब में इसलिए रखा है; ताकि यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के बाद आने वालों के लिए भी एक दुआ बन जाए। अतः, यह उन दुआओं में से है, जिन्हें याद कर लेना चाहिए और बारंबार पढ़ना चाहिए।
صحيح مسلم (1/ 115) (125). المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (1/ 336). البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (3/ 547).