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तशरीह के साथ हदीसें

सूरों एवं आयतों की फ़ज़ीलत

16 हदीसें

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक व्यक्ति को एक सैन्यदल का अमीर बनाकर भेजा। वह अपने साथियों को नमाज़ पढ़ाते समय कुरआन पढ़ता, तो अंत में "قل هو الله أحد" पढ़ता।

عن عائشة رضي الله عنها «أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث رجلا على سَرِيَّةٍ فكان يَقْرَأ لأصحابه في صلاتهم، فَيَخْتِمُ بـ«قل هو الله أحد» فلما رجعوا ذكروا ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: سَلُوهُ لأَيِّ شيء صَنَع ذلك؟ فسألُوه، فقال: لِأنَّها صِفَةُ الرحمن عز وجل ، فأنا أُحِب أَنْ أَقْرَأ بها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم : أَخْبِرُوه: أنَّ الله تعالى يُحِبُّه».
आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक व्यक्ति को एक सैन्यदल का अमीर बनाकर भेजा। वह अपने साथियों को नमाज़ पढ़ाते समय कुरआन पढ़ता, तो अंत में "قل هو الله أحد" पढ़ता। चुनांनचे जब लोग वापस आए, तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने इसकी चर्चा की। सो, आपने फ़रमायाः "उससे पूछो कि उसने ऐसा क्यों किया?" लोगों ने उससे पूछा, तो बतायाः क्योंकि यह सूरा अल्लाह की विशेषताओं पर आधारित है और मुझे इस सूरा को पढ़ना पसंद है। यह सुन अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "उसे बता दो कि अल्लाह उससे प्रेम करता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने एक साथी को किसी युद्ध का अमीर बनाया, ताकि प्रबंध देखने तथा निर्णय लेने का काम कर सकें और व्यवस्था में कोई गड़बड़ी न आने पाए। अमीर के तौर पर आप किसी ऐसे व्यक्ति का चयन करते थे, जो दीनदारी, ज्ञान एवं प्रबंध के मामले में सबसे सटीक होता। यही कारण है कि अमीर ही नमाज़ पढ़ाते और वही फ़तवा देते थे। उस व्यक्ति से जुड़ी हुई एक खास बात यह थी कि वह हर नमाज़ की दूसरी रकात में सूरा "क़ुल हुवल्लाहु अहद" पढ़ते थे। कारण यह था कि उनको अल्लाह, उसके नामों एवं गुणों से प्रेम था और जिसे किसी चीज़ से प्रेम होता है, वह उसका ज़िक्र ज़्यादा से ज़्यादा करता है। जब सब लोग युद्ध से लौटकर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आए और आपके सामने इसका ज़िक्र किया, तो आपने कहा : उससे पूछो कि वह ऐसा क्यों करता था? जब लोगों ने पूछा तो उन्होंने बताया कि मैं ऐसा इसलिए करता था, क्योंकि उस सूरा में सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के सद्गुणों का ज़िक्र है और मुझे उनको दोहराना अच्छा लगता है। यह सुन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : उसे बता दो कि जिस तरह उसे अल्लाह के महान गुणों पर आधारित होने के कारण इस सूरा से प्रेम है, उसी तरह अल्लाह को भी उससे प्रेम है।

हवाला

تيسير العلام للبسام الناشر: مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة الطبعة- العاشرة، 1426 هـ - 2006 م. تنبيه الأفهام للعثيمين، طبعة مكتبة الصحابة - الإمارات - مكتبة التابعين- القاهرة- الطبعة الأولى 1426. الإلمام بشرح عمدة الأحكام لإسماعيل الأنصاري -طبعة دار الفكر- دمشق -الأولى 1381. صحيح البخاري، أبو عبد الله محمد بن إسماعيلالجعفي البخاري - تحقيق محمد زهير بن ناصر الناصر -الناشر : دار طوق النجاة - الطبعة الأولى 1422هـ. صحيح مسلم، أبو الحسين مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. تأسيس الأحكام، أحمد بن يحيى النجمي- دار المنهاج- القاهرة- مصر -الطبعة الأولى.

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जिबरील (अलैहिस्सलाम) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास बैठे हुए थे कि ऊपर से एक आवाज़ सुनी।

عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رضي الله عنهما قَالَ: «بَيْنَمَا جِبْرِيلُ قَاعِدٌ عِنْدَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ سَمِعَ نَقِيضًا مِنْ فَوْقِهِ، فَرَفَعَ رَأْسَهُ، فَقَالَ: هَذَا بَابٌ مِنَ السَّمَاءِ فُتِحَ الْيَوْمَ لَمْ يُفْتَحْ قَطُّ إِلَّا الْيَوْمَ، فَنَزَلَ مِنْهُ مَلَكٌ، فَقَالَ: هَذَا مَلَكٌ نَزَلَ إِلَى الْأَرْضِ لَمْ يَنْزِلْ قَطُّ إِلَّا الْيَوْمَ، فَسَلَّمَ، وَقَالَ: أَبْشِرْ بِنُورَيْنِ أُوتِيتَهُمَا لَمْ يُؤْتَهُمَا نَبِيٌّ قَبْلَكَ: فَاتِحَةُ الْكِتَابِ، وَخَوَاتِيمُ سُورَةِ الْبَقَرَةِ، لَنْ تَقْرَأَ بِحَرْفٍ مِنْهُمَا إِلَّا أُعْطِيتَهُ».
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि जिबरील (अलैहिस्सलाम) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास बैठे हुए थे कि ऊपर से एक आवाज़ सुनी, तो अपना सिर उठाया और फ़रमायाः यह आकाश का एक द्वार है, जो आज खोला गया है और इससे पूर्व कभी खोला नहीं गया था और उससे एक फ़रिश्ता उतरा। तथा (जिबरील ने आगे) कहा : यह धरती पर उतरने वाला एक फरिश्ता है, जो इससे पूर्व कभी नहीं उतरा था। उसने सलाम किया और कहाः दो नूर की शुभसूचना लीजिए, जो आपको दिए गए हैं आपसे पूर्व किसी नबी को नहीं दिए गए थे। दोनों नूर हैं, सूरा फ़ातिहा और सूरा बक़रा की अंतिम आयतें। इनका जो भी शब्द आप पढ़ेंगे, उनके अंदर माँगी गई चीज़ें आपको दी जाएँगी।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

صحيح مسلم (1/ 554) (806). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 244). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 700). مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (4/ 1464). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 760). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (13/ 122).

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एक व्यक्ति सूरा कह्फ़ पढ़ रहा था और उसके निकट ही एक घोड़ा रस्सियों से बंधा हुआ था।

عن البراء بن عازب –رضي الله عنهما- قال: كانَ رجلٌ يَقرَأُ سُورةَ الكهفِ، وعندَه فَرَسٌ مَربُوطٌ بِشَطَنَيْنِ، فَتَغَشَّتْهُ سَحَابَةٌ فَجَعَلَتْ تَدْنُو، وجَعلَ فَرَسُه يَنفِرُ منها، فلمّا أصبحَ أتَى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فَذَكرَ ذلك له، فقالَ: «تِلكَ السَّكِينةُ تَنَزَّلَتْ للقُرآنِ».
बरा बिन आज़िब (रज़ियल्लाहु अनहुमा) का वर्णन है, वह कहते हैंः एक व्यक्ति सूरा कह्फ़ पढ़ रहा था और उसके निकट ही एक घोड़ा रस्सियों से बंधा हुआ था। अल्लाह का करना कि एक बादल ने उसे ढाँप लिया और धीरे-धीरे उसके निकट आने लगा तथा उसका घोड़ा उससे बिदकने लगा। जब सुब्ह हुई और वह अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया तथा आपको पूरी घटना बताई तो आपने फ़रमायाः यह सकीनत (शांति) थी, जो क़ुरआन के लिए उतरी थी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. - شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. - صحيح البخاري –الجامع الصحيح-؛ للإمام أبي عبدالله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. - صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبدالباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. - فتح الباري، تأليف الحافظ أحمد بن علي بن حجر العسقلاني، دار المعرفة. -كنوز رياض الصالحين؛ فريق علمي برئاسة أ.د. حمد العمار، دار كنوز إشبيليا-الرياض، الطبعة الأولى، 1430هـ. - نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. - صحيح مسلم المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. - بهجة الناظرين, سليم بن عيد الهلالي، الناشر: دار ابن الجوزي ، سنة النشر: 1418 هـ- 1997م. - دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين, محمد علي بن محمد البكري الصديقي الشافعي, اعتنى بها: خليل مأمون شيحا, الناشر: دار المعرفة للطباعة والنشر والتوزيع، بيروت – لبنان، الطبعة: الرابعة، 1425 هـ - 2004 م.

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अपने घरों को क़ब्रिस्तान मत बनने दो। शैतान उस घर से भाग जाता है, जिस घर में सूरा बक़रा पढ़ी जाती है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «لَا تَجْعَلُوا بُيُوتَكُمْ مَقَابِرَ، إِنَّ الشَّيْطَانَ يَنْفِرُ مِنَ الْبَيْتِ الَّذِي تُقْرَأُ فِيهِ سُورَةُ الْبَقَرَةِ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अपने घरों को क़ब्रिस्तान मत बनने दो। शैतान उस घर से भाग जाता है, जिस घर में सूरा बक़रा पढ़ी जाती है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने घरों को नमाज़ से खाली रखने से मना किया है कि वे क़ब्रिस्तान की तरह हो जाएँ, जहाँ नमाज़ नहीं पढ़ी जाती। फिर बताया कि शैतान उस घर से दूर भागता है, जिसमें सूरा बक़रा पढ़ी जाती है।

फ़ायदे
  1. घरों में ज़्यादा से ज़्यादा इबादतें करना और नफ़ल नमाज़ पढ़ना मुसतहब है।
  2. क़ब्रिस्तानों में नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं है। क्योंकि यह शिर्क तथा क़ब्रों में दफ़न लोगों के बारे में अतिशयोक्ति का ज़रिया है। लेकिन जनाज़े की नमाज़ की बात इससे अलग है।
  3. चूँकि क़ब्रों के पास नमाज़ न पढ़ने की बात सहाबा के यहाँ स्थापित थी, इसलिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि घरों को क़ब्रिस्तान की तरह न बनाओ कि वहाँ नमाज़ पढ़ना छोड़ दो।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 539) (780). بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (2/ 240). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 682). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمصطفى الخِن وغيره (2/ 757). مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (4/ 1460).

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क़ुरआन में एक सूरत है, जिसमें तीस आयतें हैं, वह अपने पढ़ने वाले व्यक्ति के लिए सिफ़ारिश करती रहेगी यहाँ तक कि उसे क्षमा कर दिया जाएगा

عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «مِنَ القُرْآنِ سُورَةٌ ثَلاثُونَ آيَةً شَفَعَتْ لِرَجُلٍ حَتَّى غُفِرَ لَهُ، وَهِي: تبارك الذي بيده الملك». وفي رواية أبي داود: «تشفع».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः क़ुरआन में एक ऐसी सूरत है जिसमें तीस आयतें हैं। वह किसी व्यक्ति के लिए सिफ़ारिश करती रहेगी यहाँ तक कि उसे क्षमा कर दिया जाएगा और वह تبارك الذي بيده الملك है । अबू दाऊद की एक रिवायत में हैः तो उसकी सिफ़ारिश स्वीकार की जाएगी।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन
हवाला

1/ بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي. 2/ تحفة الأحوذي بشرج جامع الترمذي؛ للإمام محمد عبدالرحمن المباركفوري، أشرف عليه عبدالوهاب عبداللطيف، دار الفكر. 3/ جامع الأصول في أحاديث الرسول؛ للإمام مجد الدين ابن الأثير الجزري، حققه عبدالقادر الأرناؤوط، نشر مكتبة الحلواني وغيرها، 1392هـ. 4/ سنن أبي داود, أبو داود سليمان بن الأشعث بن إسحاق بن بشير بن شداد بن عمرو الأزدي السِّجِسْتاني, المحقق: محمد محيي الدين عبد الحميد, المكتبة العصرية، صيدا – بيروت. 5/ سنن الترمذي، تأليف: محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق أحمد شاكر وغيره ، الناشر: شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي، الطبعة: الثانية، 1395 هـ. 6/ مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م. 7/ دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين؛ لمحمد بن علان الشافعي، دار الكتاب العربي-بيروت. 8/ رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. 9/ سنن ابن ماجه؛ للحافظ محمد بن يزيد القزويني، حققه محمد فؤاد عبدالباقي، دار إحياء الكتب العربية. 10/ صحيح سنن أبي داود؛ تأليف الشيخ محمد ناصر الدين الألباني، غراس-الكويت، الطبعة الأولى، 1423هـ. 11/ كنوز رياض الصالحين؛ فريق علمي برئاسة أ.د. حمد العمار، دار كنوز إشبيليا-الرياض، الطبعة الأولى، 1430هـ. 12/ نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.

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जिसने सूरा कह्फ़ के आरंभ की दस आयतें कंठस्थ कर लीं, वह दज्जाल से सुरक्षित रहेगा।" एक रिवायत में है : "सूरा कह्फ़ के अंत की।

عن أبي الدرداء رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «مَنْ حَفِظَ عَشْرَ آيَاتٍ مِنْ أَوَّلِ سُورَةِ الكَهْفِ، عُصِمَ مِنَ الدَّجَّالِ». وفي رواية: «مِنْ آخِرِ سُورَةِ الكَهْف».
अबू दरदा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिसने सूरा कह्फ़ के आरंभ की दस आयतें कंठस्थ कर लीं, वह दज्जाल से सुरक्षित रहेगा।" एक रिवायत में है : "सूरा कह्फ़ के अंत की।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जिसने सूरा कह्फ़ के शुरू की दस आयतें ज़बानी याद कर लीं, वह दज्जाल के फ़ितने से सुरक्षित रहेगा, जो अंतिम काल में निकलेगा और पूज्य होने का दावा करेगा। उसका फ़ितना इस धरती पर आदम की सृष्टि से लेकर क़यामत तक की अवधि में सामने आने वाला सबसे बड़ा फ़ितना होगा। क्योंकि अल्लाह उसे कुछ ऐसी असाधारण चीज़ें प्रदान करेगा, जिनके द्वारा वह लोगों को फ़ितने में डालेगा। सूरा कह्फ़ के शुरू की दस आयतें याद कर लेने से दज्जाल के फ़ितने से सुरक्षा इसलिए मिलेगी कि इन आयतों के अंदर कुछ ऐसी अजीब व ग़रीब और असाधारण चीज़ों का ज़िक्र हुआ है, जो दज्जाल के हाथों ज़ाहिर होने वाली असाधारण चीज़ों से कहीं बढ़कर हैं। अतः जो उनपर ग़ौर व फ़िक्र कर लेगा, वह दज्जाल के फ़ितने का शिकार नहीं होगा। एक रिवायत में है : सूरा के अंत की दस आयतें, जो {أفحسب الذين كفروا أن يتخذوا…} से शुरू होती हैं।

फ़ायदे
  1. सूरा कह्फ़ की फ़ज़ीलत। इसकी आरंभिक एवं अंतिम आयतें दज्जाल के फ़ितने से सुरक्षित रखती हैं।
  2. इस हदीस में दज्जाल के प्रकट होने की सूचना दी गई है और उससे सुरक्षा का तरीक़ा बताया गया है।
  3. पूरी सूरा कह्फ़ को याद कर लेने की प्रेरणा। कोई पूरी सूरा याद न कर सके, तो शुरू और अंत की दस-दस आयतें याद कर ले।
  4. क़ुर्तुबी इसका कारण बताते हुए कहते हैं : कहा गया है : चूँकि कह्फ़ वालों के क़िस्से में बहुत-सी आश्चर्यजनक घटनाएँ और निशानियाँ बयान हुई हैं, इसलिए जो व्यक्ति इस क़िस्से से अवगत होगा, वह न दज्जाल के फ़ितने से आश्चर्यचकित होगा, न डरेगा और न उसका शिकार होगा। इसी तरह कहा गया है : इसका कारण अल्लाह का यह कथन है : {لينذر بأسًا شديدًا من لدنه} (अर्थात, ताकि अपने पास के कठोर दंड से होशियार कर दे।) क्योंकि यहाँ दंड के कठोर तथा अल्लाह की ओर से होने की बात कही गई है, जो कि दज्जाल के पूज्य होने के दावे, प्रभुत्व तथा महान फ़ितने से मुनासबत रखती है। यही कारण है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैैहि व सल्लम ने दज्जाल के फ़ितने को एक बड़ा फ़ितना बताया है, उससे डराया है और अल्लाह की शरण माँगी हैै। इस तरह इस हदीस का अर्थ होगा : जिसने इन आयतों को पढ़ा, इनपर ग़ौर व फ़िक्र किया तथा इनके अर्थ से अवगत हुआ, वह दज्जाल से सावधान और फलस्वरूप सुरक्षित भी रहेगा।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 555) (809). بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (2/ 243). شرح النووي على مسلم (6/ 92). فيض القدير شرح الجامع الصغير، لعبدالرؤوف المناوي (6/ 119). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (13/ 115). مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لملا القاري (4/ 1465). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمصطفى الخن (2/ 760).

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जिसने सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें रात में पढ़ लीं, वह उसके लिए काफ़ी हो जाती हैं।

عن أبي مسعود رضي الله عنه قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم: «مَنْ قَرَأَ بِالْآيَتَيْنِ مِنْ آخِرِ سُورَةِ الْبَقَرَةِ فِي لَيْلَةٍ كَفَتَاهُ».
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें रात में पढ़ लीं, वह उसके लिए काफ़ी हो जाती हैं।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने रात में सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें पढ़ लीं, तो अल्लाह उसे बुराई तथा अप्रिय चीज़ों से बचाने के लिए काफ़ी हो जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि यह दोनों आयतें उसके लिए तहज्जुद की नमाज़ के बदले में काफ़ी हो जाती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि अन्य अज़कार के बदले में काफ़ी हो जाती हैं। जबकि कुछ लोगों का कहना है कि रात की नमाज़ में कम से कम इन दो आयतों को पढ़ लेना ही काफ़ी है। कुछ और भी बातें कही गई हैं। हो सकता है कि ऊपर कही गई सारी बातें सही हों और सब हदीस के शब्दों के दायरे में आ जाती हों।

फ़ायदे
  1. सूरा बक़रा की अंतिम आयतों की फ़ज़ीलत का बयान। यह आयतें इस तरह हैं : {ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّن رُّسُلِهِۦۚ وَقَالُواْ سَمِعۡنَا وَأَطَعۡنَاۖ غُفۡرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيۡكَ ٱلۡمَصِيرُ. لا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفۡسًا إِلَّا وُسۡعَهَاۚ لَهَا مَا كَسَبَتۡ وَعَلَيۡهَا مَا ٱكۡتَسَبَتۡۗ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذۡنَآ إِن نَّسِينَآ أَوۡ أَخۡطَأۡنَاۚ رَبَّنَا وَلَا تَحۡمِلۡ عَلَيۡنَآ إِصۡرٗا كَمَا حَمَلۡتَهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِنَاۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلۡنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِۦۖ وَٱعۡفُ عَنَّا وَٱغۡفِرۡ لَنَا وَٱرۡحَمۡنَآۚ أَنتَ مَوۡلَىٰنَا فَٱنصُرۡنَا عَلَى ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡكَٰفِرِينَ.} (रसूल उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनकी तरफ़ उनके रब की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले भी। हर एक अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी पुस्तकों और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (वे कहते हैं) हम उसके रसूलों में से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते। और उन्होंने कहा हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। हम तेरी क्षमा चाहते हैं ऐ हमारे रब! और तेरी ही ओर लौटकर जाना है। अल्लाह किसी प्राणी पर भार नहीं डालता परंतु उसकी क्षमता के अनुसार। उसी के लिए है जो उसने (नेकी) कमाई और उसी पर है जो उसने (पाप) कमाया। ऐ हमारे रब! हमारी पकड़ न कर यदि हम भूल जाएँ या हमसे चूक हो जाए। ऐ हमारे रब! और हमपर कोई भारी बोझ न डाल, जैसे तूने उसे उन लोगों पर डाला जो हमसे पहले थे। ऐ हमारे रब! और हमपर उसका बोझ न डाल जिसके (उठाने) की हम में शक्ति न हो। तथा हमें माफ़ कर और हमें क्षमा कर दे और हमपर दया कर। तू ही हमारा स्वामी (संरक्षक) है, इसलिए काफ़िरों के मुक़ाबले में हमारी मदद कर।)
  2. सूरा बक़रा की अंतिम आयतों को रात में पढ़ने से इन्सान बुराई तथा शैतान से सुरक्षित रहता है।
  3. रात सूरज डूबने के बाद से शुरू होती है और फ़ज्र प्रकट होने तक रहती है।
हवाला

صحيح البخاري (6/ 188) (5008-5009). صحيح مسلم (1/ 554) (807). فتح الباري بشرح صحيح البخاري، لابن حجر (9/ 56). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 240). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص593). مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لملا علي القاري (4/ 1465). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمصطفى الخِن وغيره (2/ 757).

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क्या मैं तुम्हें, क़ुरआन की महानतम सूरा न सिखाऊँ?

عن أبي سعيد رافع بن المعلى رضي الله عنه قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم : «أَلاَ أُعَلِّمُكَ أَعْظَمَ سُورَةٍ في القُرْآن قَبْلَ أنْ تَخْرُجَ مِنَ الْمَسْجِد؟» فَأخَذَ بِيَدِي، فَلَمَّا أرَدْنَا أنْ نَخْرُجَ، قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ، إنَّكَ قُلْتَ: لأُعَلِّمَنَّكَ أعْظَمَ سُورَةٍ في القُرْآنِ؟ قالَ: «الحَمْدُ للهِ رَبِّ العَالَمِينَ، هِيَ السَّبْعُ المَثَانِي وَالقُرْآنُ العَظِيمُ الَّذِي أُوتِيتُهُ».
अबू सईद राफ़े बिन मुअल्ला (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मुझसे फ़रमाया: क्या मैं तुम्हें, तुम्हारे मस्जिद से निकलने से पहले- पहले क़ुरआन की महानतम सूरा न सिखाऊँ? आपने मेरा हाथ पकड़ लिया। जब हम मस्जिद से निकलने लगे, तो मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! आपने कहा था कि आप हमें क़ुरआन की महानतम सूरा सिखाएँगे? तो फ़रमाया: यह सूरा है: अल- हमदु लिल्लाहि रब्बिल- आलमीन, यह सब-अल-मसानी (बार- बार दोहराई जाने वाली सात आयतें) और महान क़ुरआन का सार है, जो मुझे दिया गया है।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अबू सईद राफ़े बिन मुअल्ला -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मुझसे फ़रमाया : "ألا", यह शब्द मुख़ातब का आकर्षण बाद में आने वाली बात की ओर केंद्रित करने के लिए कहा जाता है। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का कथन; "क्या मैं तुम्हें, तुम्हारे मस्जिद से निकलने से पहले-पहले क़ुरआन की महानतम सूरा न सिखाऊँ?", आपने उनको सीधा सिखा देने के बजाय सिखाने से पहले यह बात इसलिए कही, ताकि उनका ज़ेहन उसे ग्रहण करने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाए और वह उसकी ओर अच्छी तरह मुतवज्जेह हो जाएँ। "आपने मेरा हाथ पकड़ लिया।" यानी इसके पश्चात कि आपने यह बात कही और हम चल पड़े। "जब हम मस्जिद से निकलने लगे, तो मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! आपने कहा था कि आप हमें क़ुरआन की महानतम सूरा सिखाएँगे? तो फ़रमाया: यह सूरा है: अल- हमदु लिल्लाहि रब्बिल- आलमीन" यानी सूरा फ़ातिहा। इसे क़ुरआन की महानतम सूरा इसलिए कहा गया है कि इसमें क़ुरआन के सारे उद्देश्य समाहित हैं। इसी बिंदु को ध्यान में रखते हुए इसे उम्म अल-क़ुरआन भी कहा जाता है। फिर आपने क़ुरआन की उस विशेषता को चिह्नित कर दिया, जिसके कारण वह क़ुरआन की शेष सूरों से भिन्न है। फ़रमाया : "यह सब्अ-अल-मसानी (बार- बार दोहराई जाने वाली सात आयतें) है" यानी इसका नाम सब-अल-मसानी है। इसमें प्रयुक्त "المثاني" शब्द "مثناة" का बहुवचन है, जो "التثنية" से लिया गया है। इस सूरा को "सब्अ अल-मसानी" इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह नमाज़ की हर रकात में दोहराई जाती है। या फिर इसलिए कि इसके साथ एक दूसरी सूरा मिलाई जाती है। या फिर इसलिए कि इसके अंदर प्रशंसा एवं दुआ जैसी दो प्रकार की चीज़ें हैं। या फिर इसलिए कि इसमें प्रवाहशील भाषा एवं सुगम वर्णन शैली दोनों एकत्र हैं। या फिर इसलिए कि इसे उस समय से आज तक बार-बार दोहराया जा रहा है और यह सिलसिला टूटता नहीं है तथा इसका पठन-पाठन किया जा रहा है और यह ख़त्म नहीं होती। या फिर इसलिए कि समय के साथ इसके नए-नए लाभ सामने आते रहते हैं, जिसका कोई अंत नहीं है। जबकि ऐसा भी हो सकता है कि "المثاني" शब्द "مثناة" का बहुवचन हो, जो "الثناء" से लिया गया है। ऐसा इसलिए कि यह उच्च एवं महान अल्लाह की प्रशंसा पर आधारित है। गोया यह सूरा अल्लाह के सुंदर एवं अद्भुत नामों एवं गुणों के द्वारा उसकी प्रशंसा करती है। जबकि ऐसा भी संभव है "الثنايا" से लिया गया हो। ऐसा इसलिए कि अल्लाह ने इसे अपनी उम्मत के लिए चुन लिया है। आपके शब्द "और महान क़ुरआन है।" यानी उसका एक नाम यह भी है। आपके शब्द "जो मुझे दिया गया है।" यानी जो मुझे प्रदान किया है। इस सूरा को "महान क़ुरआन" का नाम इसलिए दिया गया है कि इसके अंदर लोक एवं परलोक तथा अहकाम एवं अक़ाइद आदि सारी चीज़ों का विवरण मौजूद है।

हवाला

1-بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي.ط 1-1415 2-دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين؛ لمحمد بن علان الشافعي، دار الكتاب العربي-بيروت. 3-رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. 4-صحيح البخاري –الجامع الصحيح-؛ للإمام أبي عبدالله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. 5-نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.

यह हदीस HadeethEnc.com पर
16 में से 8
16 हदीसें
  1. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक व्यक्ति को एक सैन्यदल का अमीर बनाकर भेजा। वह अपने साथियों को नमाज़ पढ़ाते समय कुरआन पढ़ता, तो अंत में "قل هو الله أحد" पढ़ता।
  2. जिबरील (अलैहिस्सलाम) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास बैठे हुए थे कि ऊपर से एक आवाज़ सुनी।
  3. एक व्यक्ति सूरा कह्फ़ पढ़ रहा था और उसके निकट ही एक घोड़ा रस्सियों से बंधा हुआ था।
  4. अपने घरों को क़ब्रिस्तान मत बनने दो। शैतान उस घर से भाग जाता है, जिस घर में सूरा बक़रा पढ़ी जाती है।
  5. क़ुरआन में एक सूरत है, जिसमें तीस आयतें हैं, वह अपने पढ़ने वाले व्यक्ति के लिए सिफ़ारिश करती रहेगी यहाँ तक कि उसे क्षमा कर दिया जाएगा
  6. जिसने सूरा कह्फ़ के आरंभ की दस आयतें कंठस्थ कर लीं, वह दज्जाल से सुरक्षित रहेगा।" एक रिवायत में है : "सूरा कह्फ़ के अंत की।
  7. जिसने सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें रात में पढ़ लीं, वह उसके लिए काफ़ी हो जाती हैं।
  8. क्या मैं तुम्हें, क़ुरआन की महानतम सूरा न सिखाऊँ?
  9. क्या तुम्हें मालूम नहीं कि जो आयतें आज रात उतरी हैं, उन जैसी आयतें कभी नहीं देखी गईं! ये आयतें हैं: क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिल फ़लक़ और क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिन्नास
  10. क़ुरआन पढ़ो; क्योंकि क़ुरआन क़यामत के दिन अपने पढ़ने वालों के लिए सिफ़ारिशी बनकर आएगा।
  11. अल्लाह की क़सम! ऐ अबुल मुंज़िर! तुमको यह ज्ञान मुबारक हो।
  12. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब प्रत्येक रात बिस्तर में जाते, तो अपनी दोनों हथेलियों को जमा करते, फिर उनमें फूँकते और उनमें "क़ुल हु-वल्लाहु अहद", "क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिल फ़लक़" और "क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिन नास
  13. उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : मैंने नमाज़ को अपने तथा अपने बंदे के बीच आधा-आधा बाँट दिया है, तथा मेरे बंदे के लिए वह सब कुछ है, जो वह माँगे
  14. उसकी क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, यह सूरा एक तिहाई क़ुरान के समान है।
  15. बल्कि कहो : हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। ऐ हमारे पालनहार! हम तेरी क्षमा चाहते हैं और तेरी ही ओर लौटना है।
  16. आपकी किताब (क़ुरआन) में एक ऐसी आयत है, जिसे आप पढ़ते रहते हैं, अगर वह आयत हम यहूदियों पर नाज़िल होती तो हम उस दिन को ईद का दिन ठहराते

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com