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तशरीह के साथ हदीसें

नबवी तरीक़ा

28 हदीसें

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जूता पहनना, कंघी करना, पवित्रता प्राप्त करना तथा अपने सभी कार्यों को दाएँ से करना पसंद करते थे।

عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤمنينَ رضي الله عنها قَالَتْ: كَانَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يُعْجِبُهُ التَّيَمُّنُ، فِي تَنَعُّلِهِ، وَتَرَجُّلِهِ، وَطُهُورِهِ، وَفِي شَأْنِهِ كُلِّهِ.
मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जूता पहनना, कंघी करना, पवित्रता प्राप्त करना तथा अपने सभी कार्यों को दाएँ से करना पसंद करते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सम्मान योग्य कार्यों को दाएँ जानिब से आरंभ करना पसंद करते थे। मसलन : जूता पहनते समय पहले दाएँ पाँव में पहनना, सर एवं दाढ़ी के बालों को कंघी करते, सँवारते और तेल लगाते समय दाएँ जानिब से शुरू करना, वज़ू करते समय दाएँ हाथ एवं दाएँ पाँव को बाएँ हाथ एवं बाएँ पाँव से पहले धोना।

फ़ायदे
  1. इमाम नववी कहते हैं : शरीयत का एक साधारण सिद्धांत यह है कि हर सम्मान योग्य कार्य जैसे कपड़ा और जूता पहनना, मस्जिद में प्रवेश करना, मिसवाक करना, सुरमा लगाना, नाखून काटना, मोंछें तराशना, बाल में कंघी करना, बगल के बाल उखाड़ना, सर मुंड़वाना, नमाज़ से सलाम फेरना, तहारत के अंगों को धोना, शौचालय से निकलना, खाना और पीना, मुसाफ़हा करना एवं हजर-ए-असवद को बोसा देना आदि को दाएँ हाथ से दाएँ जानिब से करना मुसतहब है। जबकि इसके विपरीत कार्यों, जैसे शौचालय में प्रवेश करना, मस्जिद से निकलना, नाक साफ़ करना, इस्तिंजा करना एवं कपड़ा तथा मोज़ा उतारना आदि को बाएँ हाथ से या बाएँ जानबि से शुरू करना मुसतहब है। यह सब कुछ दरअसल दाएँ के सम्मान एवं प्रतिष्ठा के कारण है।
  2. हदीस के शब्दों "दाएँ से करना पसंद करते थे" के अंदर: कार्यों का आरंभ दाएँ हाथ से, दाएँ पाँव और दाएँ जानिब से करना तथा किसी चीज़ का लेनदेन दाएँ हाथ से करना, सब शामिल है।
  3. इमाम नववी कहते हैं : जान लें कि वज़ू के कुछ अंगों के बारे में दाएँ से आरंभ मुसतहब नहीं हैं। ये अंग हैं, दोनों कान, दोनों हथेलियाँ और दोनों गाल। इन अंगों को एक साथ पाक किया जाएगा। अगर ऐसा करना संभव न हो, तो दाएँ को प्राथमिकता दी जाएगी।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 45) (168). صحيح مسلم (1/ 226) (268).

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अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का दायाँ हाथ पवित्रता प्राप्त करने और खाने के लिए था। जबकि बायाँ हाथ इस्तिंजा करने (पेशाब एवं शोच करने के बाद, अंगों को धोने) एवं अन्य सफ़ाई के कामों के लिए होता था

عن عائشة رضي الله عنها قالت: "كَانَت يَدُ رسُولِ الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- اليُمنَى لِطُهُورِهِ وطَعَامِهِ، وكَانَت اليُسْرَى لِخَلاَئِهِ، ومَا كَانَ مِنْ أَذَى". عن حفصة رضي الله عنها "أَنَّ رَسُولَ الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- كَانَ يَجْعَلُ يَمِينَهُ لِطَعَامِهِ وَشَرَابِهِ وَثِيَابِهِ، وَيَجْعَلُ يَسَارَهُ لِمَا سِوَى ذَلِك".
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) कहती हैंः अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का दायाँ हाथ पवित्रता प्राप्त करने और खाने के लिए था। जबकि बायाँ हाथ इस्तिंजा करने एवं अन्य सफ़ाई के कामों के लिए होता था। हफ़सा (रज़ियल्लाहु अनहा) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने दाएँ हाथ को खाने-पीने और कपड़े पहनने के लिए इस्तेमाल करते थे, जबकि बाएँ हाथ को अन्य कार्यों के लिए रखते थे।
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، أبو زكريا محيي الدين النووي، تحقيق ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، الطبعة: الأولى، 1428هـ، 2007م. سنن أبي داود، سليمان بن الأشعث أبوداود، المحقق: شعَيب الأرنؤوط، محَمَّد كامِل قره بلل، الناشر: دار الرسالة العالمية. صحيح أبي داود، محمد ناصر الدين الألباني، الناشر: مؤسسة غراس للنشر والتوزيع، الكويت، الطبعة: الأولى، 1423هـ، 2002م. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، محمد علي بن البكري بن علان، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة، بيروت، الطبعة: الرابعة، 1425هـ. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الدمام، الطبعة: الأولى، 1415هـ. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الرابعة عشر،1407هـ، 1987م. شرح رياض الصالحين، محمد بن صالح العثيمين، دار الوطن، الرياض، الطبعة: 1426هـ. مسند الإمام أحمد بن حنبل، أحمد بن حنبل أبو عبدالله الشيباني، تحقيق: شعيب الأرنؤوط و عادل مرشد، وآخرون، تحت إشراف: عبد الله بن عبد المحسن التركي، مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى،1421هـ، 2001م.

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कुछ लोगों को क्या हो गया है कि वह इस प्रकार की बात करने लगे हैं। मैं तो नमाज़ भी पढ़ता हूँ और सोता भी हूँ। कभी रोज़ा रखता हूँ, कभी नहीं भी रखता। औरतों से शादी भी करता हूँ। जिसने मेरी सुन्नत से मुँह मोड़ा, उसका मुझसे कोई संबंध नहीं है।

عَنْ أَنَسٍ رضي الله عنه: أَنَّ نَفَرًا مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ سَأَلُوا أَزْوَاجَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَنْ عَمَلِهِ فِي السِّرِّ؟ فَقَالَ بَعْضُهُمْ: لَا أَتَزَوَّجُ النِّسَاءَ، وَقَالَ بَعْضُهُمْ: لَا آكُلُ اللَّحْمَ، وَقَالَ بَعْضُهُمْ: لَا أَنَامُ عَلَى فِرَاشٍ، فَحَمِدَ اللهَ وَأَثْنَى عَلَيْهِ، فَقَالَ: «مَا بَالُ أَقْوَامٍ قَالُوا كَذَا وَكَذَا؟ لَكِنِّي أُصَلِّي وَأَنَامُ، وَأَصُومُ وَأُفْطِرُ، وَأَتَزَوَّجُ النِّسَاءَ، فَمَنْ رَغِبَ عَنْ سُنَّتِي فَلَيْسَ مِنِّي».
अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सहाबा में से कुछ लोगों ने आपकी पत्नियों से एकांत में आपके द्वारा किए जाने वाले कार्यों के बारे में पूछा और उसके बाद उनमें से किसी ने कहा कि मैं औरतों से शादी नहीं करूँगा, किसी ने कहा कि मैं मांस नहीं खाऊँगा और किसी ने कहा कि मैं बस्तर पर नहीं सोऊँगा। (नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तक जब यह बात पहुँची) तो आपने अल्लाह की प्रशंसा की और उसके बाद फ़रमाया : "कुछ लोगों को क्या हो गया है कि वह इस प्रकार की बात करने लगे हैं। मैं तो नमाज़ भी पढ़ता हूँ और सोता भी हूँ। कभी रोज़ा रखता हूँ, कभी नहीं भी रखता। औरतों से शादी भी करता हूँ। जिसने मेरी सुन्नत से मुँह मोड़ा, उसका मुझसे कोई संबंध नहीं है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कुछ सहाबा आपकी पत्नियों के घरों तक आए। उनका उद्देश्य यह जानना था कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- घर के अंदर किस तरह इबादत करते हैं। जब उनको आपकी इबादत के बारे में बताया गया, तो गोया उन्होंने उसे कम समझा और कहने लगे : कहाँ अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और कहाँ हम? आपके तो अगले एवं पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए गए हैं। इसके विपरीत जिसे मालूम न हो कि उसे क्षमा किया जाएगा या नहीं, उसे ज़्यादा से ज़्यादा इबादत की ज़रूरत है, इस उम्मीद में कि क्षमा प्राप्त हो जाए। उसके बाद उनमें से किसी ने कहा : मैं शादी नहीं करूँगा। किसी ने कहा : मैं मांस नहीं खाऊँगा। जबकि किसी ने कहा : मैं बिस्तर पर नहीं सोऊँगा। इसकी सूचना जब अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को मिली, तो आपने नाराज़गी व्यक्त की। लोगोंं को संबोधित किया। अल्लाह की प्रशंसा की और फ़रमाया : कुछ लोगों को क्या हो गया है कि इस और इस प्रकार की बात कर रहे हैं? अल्लाह की क़सम, तुम्हारे बीच अल्लाह से सबसे अधिक डरने वाला और उसका सबसे अधिक भय रखने वाला व्यक्ति मैं हूँ। लेकिन इसके बावजूद मैं सोता हूँ, ताकि पूरी चुस्ती के साथ तहज्जुद की नमाज़ पढ़ सकूँ, रोज़े के बिना रहता हूँ, ताकि रोज़े की शक्ति प्राप्त कर सकूँ और औरतों से शादी भी करता हूँ। अतः जिसने मेरे तरीक़े से मुँह मोड़ा, किसी और तरीक़े को संपूर्ण जाना और उसपर अमल किया, वह मुझमें से नहीं है।

फ़ायदे
  1. सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- अच्छे कामों से प्रेम करते थे तथा उनकी और नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के अनुसरण की चाहत रखते थे।
  2. इस्लामी शरीयत की सहनशीलता और आसानी। उसकी यह ख़ूबी उसके नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के अमल एवं तरीक़े से स्पष्ट है।
  3. भलाई तथा बरकत अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और आप के तमाम हालात के अनुसरण में निहित है।
  4. अपने ऊपर शक्ति से अधिक इबादत का बोझ डालने की मनाही और इस बात का उल्लेख कि यह बिदअतियों का तरीक़ा है।
  5. इबादत के प्रति अतिवादी रवैया से उकताहट पैदा होती है, जिससे इबादत से विमुखता आती है। इसके विपरीत केवल फ़र्ज़ इबादतों पर बस कर लेने और नफ़ल इबादतों से बचने से आलस्य आता है। बीच का मार्ग ही बेहतर मार्ग है।
  6. इस हदीस से मालूम होता है कि बुज़ुर्गों के हालात, उनके पद्चिह्नों पर चलने के लिए, मालूम किए जा सकते हैं। अगर पुरुषों से मालूम करना कठिन हो, तो महिलाओं से भी पता किए जा सकते हैं।
  7. इस हदीस से शिक्षा देने, ज्ञान-विज्ञान से संबंधित तथा शरई मसायल बयान करने और शरई ज्ञान में दक्ष लोगों के संदेहों को दूर करने की शिक्षा मिलती है।
  8. इबादत, विशेष रूप से फ़र्ज़ एवं नफ़ल इबादतों की पाबंदी के साथ संतुलित मार्ग पर चलना चाहिए, ताकि दूसरों को भी उनके अधिकार दिए जा सकें।
  9. यह हदीस निकाह की फ़ज़ीलत और उसके प्रोत्साहन को इंगित करती है।
हवाला

صحيح البخاري (7/ 2) (5063). صحيح مسلم (2/ 1020) (1401). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص566). خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص282).

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मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घर वालों ने एक दिन में कभी दो बार पेट भरकर भोजन नहीं किया, परंतु उनमें से एक बार का भोजन अनिवार्य रूप से खजूर होता था।

عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمِنينَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ: مَا أَكَلَ آلُ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَكْلَتَيْنِ فِي يَوْمٍ إِلَّا إِحْدَاهُمَا تَمْرٌ.
मोमिनों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का वर्णन है, वह कहती हैं : मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घर वालों ने एक दिन में कभी दो बार पेट भरकर भोजन नहीं किया, परंतु उनमें से एक बार का भोजन अनिवार्य रूप से खजूर होता था।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

उम्मुल मोमिनीन आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा बताती हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घर वालों ने एक ही दिन में कभी भी दो समय का ऐसा भोजन नहीं किया जिसमें से एक समय का भोजन खजूर न रहा हो।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके घर वालों का सादा रहन-सहन कि उन्हें दिन में कभी-कभी सिर्फ़ एक वक़्त का खाना ही मिल पाता था।
  2. खजूर उनके लिए अन्य चीज़ों से अधिक सुलभ था।
  3. ज़ुह्द और थोड़े पर संतोष करने की फ़ज़ीलत। यह नबियों का अख़लाक़ और रसूलों के सरदार की सीरत है।
  4. एक दिन में दो बार भोजन करना एक जायज़ और अनुमत कार्य है। यह अरबों की एक प्रसिद्ध आदत थी। वे दिन में दो भोजन करते थे : दोपहर का भोजन और रात का भोजन।
हवाला

صحيح البخاري (8/ 97) (6455). صحيح مسلم (4/ 2282) (2971). فتح الباري لابن حجر (11/ 292).

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जब से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना तशरीफ लाए, आपके घर वालों ने तीन दिन तक लगातार कभी गेहूँ की रोटी पेट भरकर नहीं खाई। यहां तक कि आप दुनिया से चले गए।

عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمِنينَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ: مَا شَبِعَ آلُ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مُنْذُ قَدِمَ المَدِينَةَ مِنْ طَعَامِ البُرِّ ثَلاَثَ لَيَالٍ تِبَاعًا، حَتَّى قُبِضَ.
मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का वर्णन है, वह कहती हैं : जब से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना तशरीफ लाए, आपके घर वालों ने तीन दिन तक लगातार कभी गेहूँ की रोटी पेट भरकर नहीं खाई। यहां तक कि आप दुनिया से चले गए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

उम्मुल मोमिनीन आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा बताती हैं कि जब से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घर वाले मदीना आए, उन्होंने लगातार तीन दिन तक गेहूँ की रोटी पेट भरकर नहीं खाई, यहाँ तक कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मृत्यु को प्राप्त हो गए।

फ़ायदे
  1. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके घर वालों की तंगदस्ती का बयान। क्योंकि असल जीवन तो आख़िरत का जीवन है।
  2. इब्न-ए-हजर कहते हैं : ज़ाहिर बात यह है कि ज़्यादातर उनके पेट न भरने का कारण उनके पास चीज़ों की कमी थी। हालाँकि, कभी-कभी उन्हें कुछ मिल भी जाता था, लेकिन वे अपने ऊपर दूसरों को तरजीह देते थे।
हवाला

صحيح البخاري (7/ 75) (5416). صحيح مسلم (4/ 2282) (2970). المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (7/ 129). البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (45/ 129).

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रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का बिस्तर चमड़े का था और उसकी भराई खजूर की छाल की थी

عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمِنينَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ: كَانَ فِرَاشُ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مِنْ أَدَمٍ، وَحَشْوُهُ مِنْ لِيفٍ، وَلِمُسلمٍ: كَانَ وِسَادَةُ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الَّتِي يَتَّكِئُ عَلَيْهَا مِنْ أَدَمٍ حَشْوُهَا لِيفٌ.
मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का वर्णन है, वह कहती हैं : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का बिस्तर चमड़े का था और उसकी भराई खजूर की छाल की थी। जबकि मुस्लिम की रिवायत में है : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तकिया, जिस पर आप टेक लगाते थे, चमड़े का था, जिसकी भराई खजूर की छाल थी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

उम्मुल मोमिनीन आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने बताया कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का बिस्तर पकाए हुए (Tanned) चमड़े का था और खजूर की छाल से भरा हुआ था। आपका वह तकिया भी इसी प्रकार का था, जिसपर आप टेक लगाते थे।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़ुह्द और दुनिया के सुखों से विमुख रहने का बयान, जबकि अल्लाह ने आपको इतनी क्षमता दे रखी थी कि यदि आप चाहते तो उसका आनंद ले सकते थे।
  2. बिछौनों और तकियों का इस्तेमाल करने, उनपर सोने और उनपर टेक लगाने का वैध होना।
  3. एक मुसलमान को चाहिए कि वह अपनी हालत और जीवन को अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हालत के प्रकाश में देखे, क्योंकि वही उत्तम आदर्श हैं। जो उनका अनुसरण करेगा, वह हिदायत पाएगा और दुनिया तथा आख़िरत में सफल होगा।
  4. आख़िरत की तैयारी करने की प्रेरणा, और इस बात की प्रेरणा कि मोमिन दुनिया से केवल उतना ही ले जो अल्लाह की आज्ञाकारिता में सहायक हो, और उसमें ज़्यादा से ज़्यादा जमा करने में व्यस्त न हो। अल्लाह ने एक क़ौम की निंदा करते हुए फ़रमाया है : {तुम्हें अधिक (धन) के लोभ ने मगन कर दिया। यहाँ तक कि तुम क़ब्रिस्तान जा पहुँचे।} [अत्तकास़ुरः 1-2]।
हवाला

صحيح البخاري (8/ 97) (6456). صحيح مسلم (3/ 1650) (2082). البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (34/ 662). إرشاد الساري لشرح صحيح البخاري (9/ 264). المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (5/ 403). النهاية في غريب الحديث والأثر (971).

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रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी मृत्यु के समय न कोई दिरहम छोड़ा, न दीनार, न कोई ग़ुलाम और न लौंडी, और न कोई चीज़, सिवाय अपने सफेद ख़च्चर, अपने हथियार और एक ज़मीन के, जिसे आप सदक़ा कर चुके थे।

عَنْ عَمْرِو بْنِ الحَارِثِ خَتَنِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخِي أُمِّ المؤمِنين جُوَيْرِيَةَ بِنْتِ الحَارِثِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُم، قَالَ: مَا تَرَكَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عِنْدَ مَوْتِهِ دِرْهَمًا وَلاَ دِينَارًا وَلاَ عَبْدًا وَلاَ أَمَةً وَلاَ شَيْئًا، إِلَّا بَغْلَتَهُ البَيْضَاءَ، وَسِلاَحَهُ، وَأَرْضًا جَعَلَهَا صَدَقَةً.
अम्र बिन हारिस, जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साले और उम्मुल मोमिनीन जुवैरिया बिन्ते हारिस के भाई हैं, -रज़ियल्लाहु अन्हुम- का वर्णन है, : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी मृत्यु के समय न कोई दिरहम छोड़ा, न दीनार, न कोई ग़ुलाम और न लौंडी, और न कोई चीज़, सिवाय अपने सफेद ख़च्चर, अपने हथियार और एक ज़मीन के, जिसे आप सदक़ा कर चुके थे।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वफ़ात हुई तो आपने न चाँदी का कोई दिरहम छोड़ा, न सोने का कोई दीनार, न कोई लौंडी ग़ुलाम (दासी एवं दास), न कोई बकरी और न कोई ऊँट, और न कोई अन्य प्रकार का धन। छोड़ा तो बस अपना सफ़ेद खच्चर, जिस पर आप सवार होते थे, अपने हथियार, और एक ज़मीन, जिसे अपनी सेहतमंदी में मुसाफ़िरों के लिए वक़्फ़ कर दिया था।

फ़ायदे
  1. नबीगण किसी को वारिस नहीं बनाते।
  2. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी मौत के बाद जो कुछ छोड़ा, उसका वर्णन।
  3. आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का देहांत हो गया तथा अपनी उदारता, दानशीलता और परोपकार के कारण आपने अपने पीछे कोई महत्वपूर्ण वस्तु नहीं छोड़ी।
  4. किर्मानी कहते हैं : हदीस के शब्द (وجعلها) में ज़मीर (सर्वनाम) तीनों, यानी खच्चर, हथियार और ज़मीन की ओर लौटता है, न कि केवल ज़मीन की ओर।
  5. अरबी शब्द (وجعلها) का अर्थ है : पत्नी का भाई। जबकि (الأختان) का अर्थ है : ससुराली संबंधी।
हवाला

صحيح البخاري (4/ 2) (2739). النهاية في غريب الحديث والأثر (254). فتح الباري لابن حجر (5/ 360). عمدة القاري شرح صحيح البخاري (14/ 31).

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बेशक मुझे लानत करने वाला बनाकर नहीं भेजा गया, बल्कि मुझे दया बनाकर भेजा गया है।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قِيلَ: يَا رَسُولَ اللهِ ادْعُ عَلَى المُشْرِكِينَ قَالَ: «إِنِّي لَمْ أُبْعَثْ لَعَّانًا، وَإِنَّمَا بُعِثْتُ رَحْمَةً».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं कि कहा गया : ऐ अल्लाह के रसूल! मुश्रिकों के विरुद्ध बद-दुआ कीजिए। तो आपने फ़रमाया : "बेशक मुझे लानत करने वाला बनाकर नहीं भेजा गया, बल्कि मुझे दया बनाकर भेजा गया है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुश्रिकों के लिए बद-दुआ करने को कहा गया, तो आपने फ़रमाया : "मुझे अल्लाह की ओर से लानत करने वाला बनाकर नहीं भेजा गया है कि मैं लोगों को अल्लाह की रहमत से दूर और निष्कासित होने की बद-दुआ दूँ और उन्हें भलाई से वंचित कर दूँ। मैं इस काम के लिए नहीं भेजा गया हूँ। बल्कि मैं तो सभी लोगों के लिए आम तौर पर, और मोमिनों के लिए ख़ास तौर पर, भलाई और रहमत का ज़रिया बनाकर भेजा गया हूँ।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अद्भुत आचरण।
  2. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करते हुए, ज़बान को गाली-गलौज और लानत से पवित्र रखने का महत्व।
  3. इसमें लानत करने की मनाही है।
  4. लोगों पर दया करने की प्रेरणा है।
हवाला

صحيح مسلم (4/ 2006) (2599). المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (6/ 582). البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (40/ 683).

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com