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तशरीह के साथ हदीसें

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के गुण तथा आचरण

100 हदीसें

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब छींकते, तो अपना हाथ या कपड़ा अपने मुँह पर रख लेते और अपनी आवाज़ धीमी (या नीची) रखते।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا عَطَس وضَعَ يَدَه -أو ثوبَهُ- على فيهِ، وخَفَضَ -أو غضَّ- بها صوتَهُ.
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब छींकते, तो अपना हाथ या कपड़ा अपने मुँह पर रख लेते और अपनी आवाज़ धीमी (या नीची) रखते।
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब छींकते, तो निम्नलिखित काम करते : 1- मुँह पर अपना हाथ या कपड़ा रखते, ताकि मुँह या नाक से कोई ऐसी चीज़ न निकले, जिससे पास बैठे हुए व्यक्ति को कष्ट हो। 2- आवाज़ धीमी कर लेते।

फ़ायदे
  1. छींकते समय अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े का बयान और उसमें आपका अनुसरण।
  2. छींकते समय मुँह या नाक पर कपड़ा या रूमाल आदि रख लेना मुसतहब है, ताकि उससे कोई ऐसी चीज़ न निकले, जिससे पास बैठे हुए इन्सान को कष्ट हो।
  3. छींकते समय आवाज़ धीमी कर लेनी चाहिए। यह अदब एवं अच्छे आचरण का हिस्सा है।
हवाला

سنن أبي داود (7/ 375) (5029). سنن الترمذي (4/ 461) (2745). مسند أحمد (15/ 412) 9662). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 440). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص528). بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (2/ 149). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 678). كنوز رياض الصالحين لمجموعة من الباحثين (11/ 432).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

यदि मुसलमानों पर -या : मेरी उम्मत पर- कठिन न होता, तो मैं उन्हें आदेश देता कि प्रत्येक नमाज़ के समय मिसवाक कर लिया करें।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «لَوْلَا أَنْ أَشُقَّ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ -أَوْ: عَلَى أُمَّتِي- لَأَمَرْتُهُمْ بِالسِّوَاكِ عِنْدَ كُلِّ صَلَاةٍ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "यदि मुसलमानों पर -या : मेरी उम्मत पर- कठिन न होता, तो मैं उन्हें आदेश देता कि प्रत्येक नमाज़ के समय मिसवाक कर लिया करें।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि अगर आपको अपनी उम्मत के मशक़्क़त में पड़ने का भय न होता, तो उनपर हर नमाज़ के समय मिस्वाक को अनिवार्य कर देते।

फ़ायदे
  1. अपनी उम्मत पर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दया और इस बात का डर कि कहीं उन्हें कठिनाई का सामना न करना पड़े।
  2. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आदेश मूलतः अनिवार्यता को बतलाता है, जब तक कि उसके नफ़ल होने का कोई प्रमाण न आ जाए।
  3. हर नमाज़ के समय मिस्वाक करने का मुसतहब होना और उसकी फ़ज़ीलत।
  4. इब्न-ए-दक़ीक़ अल-ईद कहते हैं : नमाज़ के समय मिस्वाक को मुसतहब क़रार दिए जाने के पीछे हिकमत यह है कि नमाज़ दरअसल अल्लाह की निकटता प्राप्त करने की अवस्था है। इसलिए इस महत्वूर्ण इबादत के सम्मान में इन्सान को पूरी साफ़-सफ़ाई के साथ उपस्थित होना चाहिए।
  5. इस हदीस की व्यापकता में रोज़ा रखे हुए व्यक्ति का मिस्वाक करना भी शामिल है, सूरज ढलने के बाद ही क्यों न हो। जैसे ज़ुहर तथा अस्र की नमाज़ के लिए मिस्वाक करना।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 220) (252). صحيح البخاري (2/ 4) (887). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص46). تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (1/ 50).

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नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब फ़ज्र की नमाज़ पढ़ लेते, तो अपनी नमाज़ की जगह पर बैठे रहते, यहाँ तक कि सूरज अच्छी तरह निकल आता

عَنْ جَابِرِ بْنِ سَمُرَةَ رَضيَ اللهُ عَنْهُ: أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ إِذَا صَلَّى الفَجْرَ جَلَسَ فِي مُصَلَّاهُ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ حَسَنًا، وَقَالَ: كَانَ لَا يَقُومُ مِنْ مُصَلَّاهُ الَّذِي يُصَلِّي فِيهِ الصُّبْحَ أَوِ الغَدَاةَ، حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ، فَإِذَا طَلَعَتِ الشَّمْسُ قَامَ، وَكَانُوا يَتَحَدَّثُونَ فَيَأْخُذُونَ فِي أَمْرِ الجَاهِلِيَّةِ، فَيَضْحَكُونَ وَيَتَبَسَّمُ.
जाबिर बिन समुरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब फ़ज्र की नमाज़ पढ़ लेते, तो अपनी नमाज़ की जगह पर बैठे रहते, यहाँ तक कि सूरज अच्छी तरह निकल आता, और (वर्णनकर्ता ने) कहा : आप अपनी उस जगह से जहाँ सुबह की नमाज़ पढ़ते थे, सूरज निकलने तक नहीं उठते थे। जब सूरज निकल आता, तो उठ जाते। सहाबा बात करते हुए अज्ञानता काल की बातों को छेड़ देते और हँसते तो आप मुस्कुरा देते।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत यह है कि जब आप फ़ज्र की नमाज़ पढ़ लेते, तो अपनी नमाज़ की जगह पर सूरज के बुलंद होने तक बैठे रहते थे। आप अपनी उस नमाज़ की जगह से, जहाँ आप फ़ज्र की नमाज़ पढ़ते थे, सूरज निकलने तक नहीं उठते थे। फिर जब सूरज निकल आता, तो खड़े हो जाते। सहाबा बात करते हुए इस्लाम से पहले के अपने कुछ मामलों का ज़िक्र करने लगते, तो आप ख़ामोश रहते। जब वे हँसते तो कभी-कभी आप भी उनके साथ मुस्कुरा देते।

फ़ायदे
  1. सुबह के बाद सूरज निकलने तक ज़िक्र करना, और बिना किसी उज़्र (उचित कारण) के अपनी जगह पर बैठे रहना मुसतहब है।
  2. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के उत्तम आचरण और कोमल स्वभाव का बयान कि आप अपने साथियों के साथ बैठते थे, उनकी बातें और क़िस्से सुनते थे और कभी-कभी मुस्कुराते भी देते थे।
  3. मस्जिद में बात करना और अज्ञानता काल की बातों का ज़िक्र करना जायज़ है।
  4. हँसना और मुस्कुराना जायज़ है; क्योंकि मना तो ज़्यादा हँसना है।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 464) (670). البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (14/ 407). المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (2/ 296).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com