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तशरीह के साथ हदीसें

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की यात्रा

2 हदीसें

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मक्का में कदा की ओर से, बतहा की ऊँची घाटी से होते हुए दाखिल हुए और नीची घाटी से निकले

عن عبد الله بن عمر رضي الله عنهما «أنَّ رسُول الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- دَخَل مكَّة مِن كَدَاٍء، مِن الثَنِيَّة العُليَا التِّي بالبَطحَاءِ، وخرج من الثَنِيَّة السُفلَى».
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) वर्णन करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मक्का में कदा की ओर से, बतहा की ऊँची घाटी से होते हुए दाखिल हुए और नीची घाटी से निकले।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब 'हज्जतुल वदा' के लिए निकले, तो चार ज़िल-हिज्जा की रात 'ज़ी तुवा' नामी स्थान में गुज़ारी। अगली सुबह ऊँची घाटी से होते हुए मक्का में दाखिल हुए। क्योंकि आप मदीने से आए थे और आपके लिए इधर से प्रवेश करना अधिक आसान था। फिर जब हज के सारे कार्य पूरे कर चुके, तो मक्का के निचले भाग से मदीने की ओर निकले। यह वही रास्ता है, जो 'जरवल' से होकर गुज़रता है। शायद रास्ता बदलने के पीछे यह उद्देश्य रहा हो कि अधिक से अधिक स्थानों में इबादत के अवसर प्राप्त हों। ऐसा आपने 'अरफ़ा' जाते-आते समय भी किया था। ईदगाह जाते-आते समय भी आप रास्ता बदल लिया करते थे और नफ़ल नमाज़ के लिए भी फ़र्ज़ नमाज़ के स्थान से हटकर खड़े होते थे। ताकि धरती उस दिन उन के अमल की गवाही दे, जिस दिन वह अपने सीने में दफ़न सारी बातें सामने रख देगी। और ऐसा भी हो सकता है कि आपने आने-जाने के लिए वही रास्ते चुने हों, जो यात्रा के लिए उचित थे। बाकी, अल्लाह अधिक जानता है।

हवाला

صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ. صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ. تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة، الإمارات، الطبعة: الأولى 1426هـ، 2005م. تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، دار الميمان، الطبعة: الأولى 1426هـ، 2005م. عمدة الأحكام من كلام خير الأنام -صلى الله عليه وسلم- لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، دار الثقافة العربية، دمشق، بيروت، مؤسسة قرطبة، الطبعة: الثانية 1408هـ، 1988م.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एक सफर में थे। इशा की नमाज़ पढ़ी, तो एक रकअत में सूरा वत्-तीनि वज़्-ज़ैतून की तिलावत की। मैंने आपसे उत्तम आवाज़ अथवा उत्तम क़िराअत किसी की नहीं सुनी।

عن الْبَرَاء بْن عَازِبٍ رضي الله عنهما «أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في سفر، فصلى العشاء الآخِرَةَ، فقرأ في إحدى الركعتين بِالتِّينِ وَالزَّيْتُون فما سمعت أحدًا أحسن صوتًا أو قراءة منه».
बरा बिन आज़िब- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैंः नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एक सफर में थे। इशा की नमाज़ पढ़ी, तो एक रकअत में सूरा वत्-तीनि वज़्-ज़ैतून की तिलावत की। मैंने आपसे उत्तम आवाज़ अथवा उत्तम क़िराअत किसी की नहीं सुनी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इशा की नमाज़ की पहली रकात में सूरा 'वत्-तीन वज़़्-ज़ैतून' पढ़ी; क्योंकि आप सफ़र में थे और सफ़र की परेशानी एवं तकान ज़्यादा लंबी क़िरात की अनुमति नहीं देती। लेकिन सफ़र में होने के बावजूद नमाज़ के अंदर अच्छी आवाज़ में क़ुरआन पढ़ने से नहीं रुके, जो कुरान सुनते समय, विनीत होने का कारण बनता है और जिस कारण दिल के न भटकने की कैफ़ियत पैदा होती है।

हवाला

تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الإمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة 1426هـ. تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة، الإمارات، الطبعة: الأولى، 1426هـ. الإلمام بشرح عمدة الأحكام، إسماعيل بن محمد الأنصاري، دار الفكر، دمشق، الطبعة: الأولى، 1381هـ. صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422هـ. صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com