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तशरीह के साथ हदीसें

भाग्य एवं नियति पर ईमान

26 हदीसें

''मोमिन पुरुष एवं मोमिन स्त्री के साथ परीक्षाएँ सदा लगी रहती हैं; उसकी जान, उसकी संतान और उसके माल में। ताकि वह अल्लाह से मिले और उसपर कोई गुनाह न हो।''

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَا يَزَالُ البَلاَءُ بِالمُؤْمِنِ وَالمُؤْمِنَةِ فِي نَفْسِهِ وَوَلَدِهِ وَمَالِهِ حَتَّى يَلْقَى اللَّهَ وَمَا عَلَيْهِ خَطِيئَةٌ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : ''मोमिन पुरुष एवं मोमिन स्त्री के साथ परीक्षाएँ सदा लगी रहती हैं; उसकी जान, उसकी संतान और उसके माल में। ताकि वह अल्लाह से मिले और उसपर कोई गुनाह न हो।''
इसे तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि परीक्षाएँ कभी मोमिन पुरुष एवं मोमिन स्त्री का साथ नहीं छोड़तीं। परीक्षा कभी उसकी जान से जुड़ी हुई होती है, जैसे तबीयत खराब हो गई शरीर ठीक नहीं रहा। कभी बाल-बच्चों से जुड़ी हुई होती है, जैसे कोई बीमार हो गया, किसी मृत्यु हो गई, कोई नाफ़रमान निकल गया वग़ैरह वग़ैरह। कभी धन से जुड़ी हुई होती है, जैसे निर्धनता का सामना करना पड़ा, व्यवसाय बैठ गया, चोरी हो गई, मंदी शुरू हो गई और रोज़ी में तंगी का सामना होने लगा। फिर इन परीक्षाओं के नतीजे में अल्लाह उसके तमाम गुनाहों को मिटा देता है और अंत में जब वह अल्लाह से मिलता है, तो अपने किए हुए तमाम गुनाहों से पाक-साफ़ हो चुका होता है।

फ़ायदे
  1. मोमिन बंदों पर अल्लाह की दया का एक दृश्य यह है कि वह दुनिया की मुसीबतों एवं विपत्तियों द्वारा दुनिया में किए हुए उनके गुनाहों को मिटा देता है।
  2. मुसीबत गुनाहों को मिटाने का काम करती है। बस शर्त यह है कि इन्सान के पास ईमान हो। बंदा धैर्य रखे और अल्लाह के निर्णय से विक्षुब्ध न हो, तो उसे सवाब मिल ही जाता है।
  3. इन्सान को प्रिय एवं अप्रिय सभी परिस्थितियों में धैर्य रखना चाहिए। धैर्य के साथ अल्लाह के द्वारा अनिवार्य किए गए कार्यों को करे और धैर्य के साथ उसकी हराम की हुई चीज़ों से दूर रहे। अल्लाह के सवाब की आशा रखे और उसके दंड से डरता रहे।
  4. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्द "बिल मोमिनि वल मोमिनह" में "अल मोमिनह" शब्द की वृद्धि, महिला के हक़ में ताकीद लाने के लिए की गई है। वरना केवल "अल मोमिन" कहते, तब भी उसमें महिला दाख़िल हो जाती। क्योंकि मोमिन शब्द पुरुष के साथ खास नहीं है। यदि कोई स्त्री किसी विपत्ति से पीड़ित है, तो उसे भी पापों और अपराधों को मिटाने के द्वारा समान पुरस्कार देने का वादा किया गया है।
  5. मुसीबतों के नतीजे में मिलने वाले सवाब का वादा इन्सान के लिए मुसीबतों का सामना करना आसान कर देता है।
हवाला

سنن الترمذي (4/ 204) (2399). مسند أحمد (13/ 248) (7859). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 113). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص51). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 273). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 80).

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अगर तुम चाहो, तो सब्र करो, तुम्हें जन्नत मिलेगी और अगर चाहो, तो मैं अल्लाह से तुम्हारे लिए स्वास्थ्य लाभ की दुआ कर दूँ।

عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رضيَ اللهُ عنهما: أنَّهُ قَالَ لعَطَاءِ بْنِ أَبِي رَبَاحٍ: أَلَا أُرِيكَ امْرَأَةً مِنْ أَهْلِ الْجَنَّةِ؟ قُلْتُ: بَلَى، قَالَ: هَذِهِ الْمَرْأَةُ السَّوْدَاءُ، أَتَتِ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَتْ: إِنِّي أُصْرَعُ وَإِنِّي أَتَكَشَّفُ، فَادْعُ اللهَ لِي، قَالَ: «إِنْ شِئْتِ صَبَرْتِ وَلَكِ الْجَنَّةُ، وَإِنْ شِئْتِ دَعَوْتُ اللهَ أَنْ يُعَافِيَكِ» قَالَتْ: أَصْبِرُ، قَالَتْ: فَإِنِّي أَتَكَشَّفُ فَادْعُ اللهَ أَنْ لَا أَتَكَشَّفَ، فَدَعَا لَهَا.
अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि उन्होंने अता बिन अबू रबाह से कहाः क्या मैं तुम्हें जन्नती स्त्रियों में से एक स्त्री न दिखाऊँ? अता कहते हैं कि मैंने कहाः अवश्य दिखाएँ। उन्होंने कहाः यह काली-कलोटी स्त्री, नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आई और कहने लगीः मुझपर मिर्गी का दौरा पड़ता है और मेरा शरीर खुल जाता है। अतः अल्लाह से मेरे लिए दुआ फ़रमाएँ। आपने कहाः "अगर तुम चाहो, तो सब्र करो, तुम्हें जन्नत मिलेगी और अगर चाहो, तो मैं अल्लाह से तुम्हारे लिए स्वास्थ्य लाभ की दुआ कर दूँ।" यह सुनकर उसने कहाः मैं सब्र करूँगी। फिर उसने कहाः मेरा शरीर खुल जाता है। अतः, अल्लाह से दुआ करें कि मेरा शरीर न खुले। चुनांचे आपने उसके लिए दुआ फ़रमाई।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

صحيح البخاري (7/ 116) (5652). صحيح مسلم (4/ 1994) (2576). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 95). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 235).

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निश्चय ही बड़ा बदला बड़ी परीक्षा के साथ है। जब अल्लाह किसी समुदाय से प्रेम करता है, तो उसकी परीक्षा लेता है। अतः, जो अल्लाह के निर्णय से संतुष्ट रहेगा, उससे अल्लाह प्रसन्न होगा और जो असंतुष्टी दिखाएगा, उससे अल्लाह नाराज रहेगा

عن أنس بن مالك رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "إن عِظَمَ الجزاءِ مع عِظَمِ البلاءِ، وإن الله تعالى إذا أحب قوما ابتلاهم، فمن رَضِيَ فله الرِضا، ومن سَخِطَ فله السُّخْطُ".
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अनहु) रिवायत करते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : निश्चय ही बड़ा बदला बड़ी परीक्षा के साथ है। जब अल्लाह किसी समुदाय से प्रेम करता है, तो उसकी परीक्षा लेता है। अतः, जो अल्लाह के निर्णय से संतुष्ट रहेगा, उससे अल्लाह प्रसन्न होगा और जो असंतोष प्रकट करेगा, उससे अल्लाह नाराज़ होगा।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) इस हदीस में हमें बता रहे हैं कि मोमिन को कभी-कभी शारीरिक, आर्थिक अथवा अन्य परेशानियाँ आती हैं। ऐसे में यदि वह धैर्य से काम लेता है, तो अल्लाह उसे उन परेशानियों का अच्छा बदला देगा। संकट जितना बड़ा और पीड़ादायक होगा, उसका बदला भी उतना ही बड़ा मिलेगा। फिर बताया कि यह परेशानियाँ बंदे से अल्लाह के प्रेम की निशानी हैं और अल्लाह का निर्णय हर हाल में लागू होकर रहता है। लेकिन जो धैर्य से काम लेगा और संतुष्ट रहेगा, तो बदले के तौर पर अल्लाह उससे प्रसन्न होगा और उसे यथेष्ट बदला प्रदान करेगा। तथा जो असंतोष प्रकट करेगा और अल्लाह के निर्णय को नापसंद करेगा, अल्लाह उससे नाराज़ होगा और यथेष्ट सज़ा देगा।

फ़ायदे
  1. यदि मुसीबतों के समय किसी वाजिब काम, जैसे धैर्य रखना और संयम से काम लेना आदि न छोड़ा जाए या कोई हराम काम, जैसे गरीबान फाड़ना और गालों को नोचना न किया जाए, तो मुसीबतें गुनाहों का कफ़्फ़ारा (परायशचित) बन जाती हैं।
  2. इससे अल्लाह तआला का अपनी शान के अनुसार, अपने बंदों से प्रेम करने का गुण साबित होता है।
  3. मोमिन की आज़माइश, ईमान की निशानियों में से एक है।
  4. इससे अल्लाह तआला का अपनी शान के अनुसार, अपने बंदों से प्रसन्न और नाराज़ होने का गुण साबित होता है।
  5. अल्लाह तआला के लिखे भाग्य एवं तक़दीर पर राज़ी और ख़ुश रहना, पुण्यकारी है।
  6. अल्लाह तआला के लिखे भाग्य एवं तक़दीर पर नाराज़ और नाख़ुश रहना, हराम है।
  7. इसमें मुसीबतों के समय धैर्य एवं संयम रखने पर उभारा गया है।
  8. कभी-कभी इंसान किसी चीज़ को नापसंद करता है, जबकि वह उसके लिए बेहतर होती है।
  9. इससे अल्लाह तआला की, अपने सभी कामों में हिकमत साबित होती है।
  10. बदला, कर्म ही के वर्ग का होगा।
हवाला

كتاب التوحيد للإمام محمد بن عبد الوهاب، ت: د. دغش العجمي، مكتبة أهل الأثر, الطبعة الخامسة, 1435ه. الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد بن عبد العزيز السليمان القرعاوي, ت: محمد بن أحمد سيد, مكتبة السوادي، الطبعة: الخامسة، 1424ه. الملخص في شرح كتاب التوحيد، دار العاصمة، الرياض، الطبعة: الأولى 1422هـ - 2001م. جامع الترمذي، ت: أحمد شاكر, شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي, الطبعة: الثانية، 1395هـ. صحيح الجامع الصغير , للألباني , المكتب الإسلامي.

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हर चीज़ तक़दीर के अनुसार सामने आती है, यहाँ तक कि अक्षमता तथा सक्षमता भी या सक्षमता तथा अक्षमता भी।

عَنْ طَاوُسٍ أَنَّهُ قَالَ: أَدْرَكْتُ نَاسًا مِنْ أَصْحَابِ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، يَقُولُونَ كُلُّ شَيْءٍ بِقَدَرٍ، قَالَ: وَسَمِعْتُ عَبْدَ اللهِ بْنَ عُمَرَ رضي الله عنهما يَقُولُ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «كُلُّ شَيْءٍ بِقَدَرٍ، حَتَّى الْعَجْزِ وَالْكَيْسِ، أَوِ الْكَيْسِ وَالْعَجْزِ».
ताऊस का वर्णन है, उन्होंने कहा : मैंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कुछ साथियों को पाया, वे कहते थे कि हर चीज़ तक़दीर के अनुसार सामने आती है। ताऊस कहते हैं कि मैंने अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा को कहते हुए सुना है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "हर चीज़ तक़दीर के अनुसार सामने आती है, यहाँ तक कि अक्षमता तथा सक्षमता भी या सक्षमता तथा अक्षमता भी।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि हर चीज़ तक़दीर में लिखे के अनुसार समाने आती है। यहाँ तक कि "العجز" (अक्षमता) यानी दुनिया एवं आख़िरत से संबंधित ज़रूरी कामों को न करना, उन्हें टालते रहना और समय बीत जाने देना भी। इसी तरह "الْكَيْسُ" (सक्षमता) यानी दुनिया तथा आख़िरत से संबंधित कामों में चुस्ती दिखाना और महारत रखना भी। अल्लाह ने अक्षमता तथा सक्षमता और इसी तरह हर चीज़ को तक़दीर (भाग्य) में लिख दिया है। दुनिया में जो भी घटना घटती है, वह अल्लाह की जानकारी और उसके इरादे से घटती है।

फ़ायदे
  1. तक़दीर के बारे में सहाबा के अक़ीदे का बयान।
  2. हर चीज़ अल्लाह की लिखी तक़दीर के अनुसार सामने आती है, यहाँ तक कि अक्षमता तथा सक्षमता भी।
  3. सहाबा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों को नक़ल करने के संबंध में पूरी सावधानी बरतते थे और छानबीन से काम लिया करते थे।
  4. हर भली-बुरी तक़दीर पर ईमान।
हवाला

صحيح مسلم (4/ 2045) (2655)، إكمال المعلم (8/143)، شرح النووي على مسلم (16/205)، الفتح الرباني لترتيب مسند الإمام أحمد بن حنبل الشيباني (1/ 122).

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जब अल्लाह किसी बंदे के बारे में निर्णय करता है कि वह किस ज़मीन में मृत्यु पाएगा, तो वहाँ उसकी ज़रूरत रख देता है।

عَنْ مَطَرِ بْنِ عُكَامِسٍ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِذَا قَضَى اللَّهُ لِعَبْدٍ أَنْ يَمُوتَ بِأَرْضٍ جَعَلَ لَهُ إِلَيْهَا حَاجَةً».
मतर बिन उकामिस रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब अल्लाह किसी बंदे के बारे में निर्णय करता है कि वह किस ज़मीन में मृत्यु पाएगा, तो वहाँ उसकी ज़रूरत रख देता है।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जब अल्लाह किसी के बारे में निर्णय कर देता है कि वह किसी जगह मृत्यु पाएगा, परंतु वह वहां उपस्थित नहीं होता, तो अल्लाह वहाँ उसकी ज़रूरत रख देता है तो वह वहाँ वह जाता है और वहाँ उसकी जान निकाली जाती है।

फ़ायदे
  1. यह हदीस क़ुरआन की इस आयत की पुष्टि करती है : "किसी प्राणी को नहीं पता कि उसकी मृत्यु कहाँ होनी है।"
हवाला

سنن الترمذي (4/ 23) (2146)، تحفة الأحوذي (6/ 299).

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आप ला इलाहा इल्लल्लाह कह दें, मैं क़यामत के दिन आपके लिए इसकी गवाही दूँगा

عَنْ ‌أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ لِعَمِّهِ: «قُلْ: لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ، أَشْهَدُ لَكَ بِهَا يَوْمَ الْقِيَامَةِ»، قَالَ: لَوْلَا أَنْ تُعَيِّرَنِي قُرَيْشٌ، يَقُولُونَ: إِنَّمَا حَمَلَهُ عَلَى ذَلِكَ الْجَزَعُ لَأَقْرَرْتُ بِهَا عَيْنَكَ. فَأَنْزَلَ اللهُ: {إِنَّكَ لا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَكِنَّ اللهَ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ } [القصص: 56].
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने चचा से कहा : "आप ला इलाहा इल्लल्लाह कह दें, मैं क़यामत के दिन आपके लिए इसकी गवाही दूँगा।"यह सुन उन्होंने कहा : अगर क़ुरैश के लोग मुझे यह कहकर शर्म न दिलाते कि मैंने घबराकर ऐसा किया है, तो मैं तुम्हारी बात मानकर तुम्हारी आँख ठंडी कर देता। इसी परिदृश्य में अल्लाह ने यह आयत उतारी : "निःसंदेह आप उसे हिदायत नहीं दे सकते जिसे आप चाहें, परंतु अल्लाह हिदायत देता है जिसे चाहता है।" [सूरा अल-क़सस : 56]
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने चचा अबू तालिब से, जब वह मरणासन्न थे, आग्रह किया कि वह ला इलाहा इल्लल्लाह कह दें, ताकि इसके आधार पर क़यामत के दिन आप उनके लिए सिफ़ारिश कर सकें और उनके मुसलमान होने की गवाही दे सकें। लेकिन अबू तालिब ने इस भय से ऐसा करने से इनकार कर दिया कहीं क़ुरैश के लोग उनकी निंदा न करें और यह न कहें कि वह मौत तथा कमज़ोरी के भय से मुसलमान हो गए। उन्होंने कहा : अगर इस बात का भय न होता, तो कलिमा-ए-शहादत पढ़कर तुम्हारे दिल को ठंडा कर देता और तुम्हारी तमन्ना पूरी कर देता। इसी परिदृश्य में वह आयत उतरी, जो बताती है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम किसी को इस्लाम ग्रहण करने का सुयोग प्रदान करने की क्षमता नहीं रखते। यह सुयोग अल्लाह जिसे चाहता है, प्रदान करता है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का काम बस राह दिखाना और सत्य की ओर बुलाना है।

फ़ायदे
  1. सत्य को लोगों की आलोचना के भय से छोड़ा नहीं जा सकता।
  2. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का काम रास्ता दिखाना था, इस्लाम ग्रहण करने का सुयोग प्रदान करना नहीं।
  3. किसी काफ़िर बीमार का हाल जानने के लिए जाया जा सकता है, ताकि उसे इस्लाम की ओर बुलाया जा सके।
  4. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह दीन की ओर बुलाने के हर अवसर का उपयोग करते थे।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 55) (25)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (1/ 539)، النهاية في غريب الحديث والأثر (ص 742).

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“तुममें से हर व्यक्ति की सृष्टि-सामग्री उसकी माँ के पेट में चालीस दिनों तक वीर्य के रूप में एकत्र की जाती है

عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: حَدَّثَنَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَهُوَ الصَّادِقُ المَصْدُوقُ: «إِنَّ أَحَدَكُمْ يُجْمَعُ خَلْقُهُ فِي بَطْنِ أُمِّهِ أَرْبَعِينَ يَوْمًا، ثُمَّ يَكُونُ عَلَقَةً مِثْلَ ذَلِكَ، ثُمَّ يَكُونُ مُضْغَةً مِثْلَ ذَلِكَ، ثُمَّ يُرْسَلُ إلَيْهِ المَلَكُ فَيَنْفُخُ فِيهِ الرُّوحَ، وَيُؤْمَرُ بِأَرْبَعِ كَلِمَاتٍ: بِكَتْبِ رِزْقِهِ، وَأَجَلِهِ، وَعَمَلِهِ، وَشَقِيٍّ أَوْ سَعِيدٍ؛ فَوَالَّذِي لَا إلَهَ غَيْرُهُ إنَّ أَحَدَكُمْ لَيَعْمَلُ بِعَمَلِ أَهْلِ الجَنَّةِ حَتَّى مَا يَكُونُ بَيْنَهُ وَبَيْنَهَا إلَّا ذِرَاعٌ فَيَسْبِقُ عَلَيْهِ الكِتَابُ فَيَعْمَلُ بِعَمَلِ أَهْلِ النَّارِ فَيَدْخُلُهَا، وَإِنَّ أَحَدَكُمْ لَيَعْمَلُ بِعَمَلِ أَهْلِ النَّارِ حَتَّى مَا يَكُونُ بَيْنَهُ وَبَيْنَهَا إلَّا ذِرَاعٌ، فَيَسْبِقُ عَلَيْهِ الكِتَابُ فَيَعْمَلُ بِعَمَلِ أَهْلِ الجَنَّةِ فَيَدْخُلُهَا».
अबू अब्दुर्रहमान अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने, जो कि सच्चे थे और जिनकी सच्चाई सर्वमान्य थी, हमें बताया है : “तुममें से हर व्यक्ति की सृष्टि-सामग्री उसकी माँ के पेट में चालीस दिनों तक वीर्य के रूप में एकत्र की जाती है। फिर इतने ही समय वह जमे हुए रक्त के रूप में रहती है। फिर इतने ही दिन वह मांस के लोथड़े के रूप में रहती। फिर उसकी ओर एक फ़रिश्ता भेजा जाता है, जो उसमें रूह फूँकता है। फिर उसे चार बातों का आदेश दिया जाता है; उसे कहा जाता है कि उसकी रोज़ी, उसकी मौत, उसके कर्म तथा उसके अच्छे या बुरे होने को लिख दे। अतः, उस अल्लाह की क़सम, जिसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तुममें से कोई जन्नत वालों के काम करता रहता है, यहाँ तक कि उसके और जन्नत के बीच केवल एक हाथ की दूरी रह जाती है कि इतने में उसपर तक़दीर का लिखा आगे बढ़ जाता है और वह जहन्नम वालों के काम करने लगता है और उसमें प्रवेश कर जाता है। इसी तरह तुममें से कोई जहन्नम वालों के काम करता रहता है, यहाँ तक उसके और जहन्नम के बीच केवल एक हाथ की दूरी रह जाती है कि इतने में उसपर तक़दीर का लिखा आगे बढ़ जाता है और वह जन्नत वालों के काम करने लगता है और जन्नत में प्रवेश कर जाता है।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अब्दुल्लाह बिन मसऊद कहते हैं कि हमें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है, जिनकी हर बात सच्ची है और जिनको अल्लाह तआला ने सच्चा कहा है। आपने फ़रमाया : तुममें से हर व्यक्ति की सृष्टि-समाग्री एकत्र की जाती है। यानी जब कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ संभोग करता है, तो उसका बिखरा हुआ वीर्य औरत के गर्भाशय में चालीस दिनों तक वीर्य के रूप में एकत्र किया जाता है। फिर वह खून का लौथड़ा यानी गाढ़ा रक्त बन जाता है। यह काम दूसरे चालीस दिनों में होता है। फिर वह मांस का एक टुकड़ा बन जाता है, जिसे एक बार में चबाया जा सके। यह तीसरे चालीस दिनों में होता है। फिर उसकी ओर अल्लाह एक फ़रिश्ता भेजता है, जो उसमें तीसरे चालीस दिन समाप्त होने के बाद रूह (जान) फूँकता है। फ़रिश्ते को आदेश दिया जाता है कि चार बातें लिख दें। पहली बात उसकी रोज़ी (जीविका) है। यानी यह लिख दे कि उसे जीवन में कितनी सुख-सुविधाएँ प्राप्त होंगी। दूसरी बात उसकी आयु है। यानी यह लिख दे कि वह दुनिया में कितने दिन जीवित रहेगा। तरीसरी बात उसके कर्म हैं। यानी अच्छा काम करने वाला होगा यह बुरा। जबकि चौथी बात यह कि वह सौभाग्यशाली होगा या दुर्भाग्यशाली? फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़सम खाकर बताया कि एक व्यक्ति जन्नतियों के काम करता रहता है और उसके काम लोगों को अच्छे दिखाई पड़ते हैं, यहाँ तक कि उसके तथा जन्नत तक पहुँचने के बीच बस इतनी दूरी रह जाती है, जैसे किसी व्यक्ति और उसके गनतव्य के बीच केवल एक हाथ की दूरी रह गई हो, ऐसे समय में उसपर अल्लाह का लिखा और उसका निर्णय ग़ालिब आ जाता है और वह जहन्नमियों के काम करने लगता है और बुरे काम पर अंत होने की वजह से उसे जहन्नम जाना पड़ता है। क्योंकि अमल क़बूल होने के लिए शर्त यह है कि इन्सान उसपर क़ायम रहे और उसके स्थान पर बुरा करने न लगे। जबकि दूसरी ओर एक व्यक्ति जहन्नमियों के काम करता रहता है, यहाँ तक कि उसमें दाख़िल होने के निकट पहुँच जाता है, मानो कि उसके तथा जहन्नम के बीच केवल एक हाथ की दूरी रह गई हो, इतने में उसपर अल्लाह का लिखा और उसका निर्णय ग़ालिब आ जाता है और वह जहन्नतियों के काम करना शुरू कर देता है और फलस्वरूप जन्नत में प्रवेश करता है।

फ़ायदे
  1. मानव रचना के विभिन्न चरणों का बयान।
  2. अल्लाह के निर्णयों और उसके लिखे हुए भाग्य पर ईमान।
  3. इन्सान का अंजाम अंत में जाकर वही करता है, जो तक़दीर में लिखा हो।
  4. इसमें ज़ाहिरी आमाल के धोखे में आने से मना किया गया है। क्योंकि आमाल का दारोमदार (निर्भरता) अंत पर होता है।
हवाला

صحيح البخاري (9/ 135) (7454)، (4/ 111) (3208). صحيح مسلم (4/ 2036) (2643). عمدة القاري شرح صحيح البخاري (15/ 130). شرح الأربعين النووية للعثيمين (ص: 84).

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“ऐ बच्चे! मैं तुम्हें कुछ बातें बताता हूँ (इन्हें याद रखना) : अल्लाह (के आदेशों और निषेधों) की रक्षा करो, अल्लाह तुम्हारी रक्षा करेगा। अल्लाह (के आदेशों और निषेधों) की रक्षा करो, तुम उसे अपने सामने पाओगे। जब माँगो, तो अल्लाह से माँगो और जब मदद चाहो, तो अल्लाह से मदद चाहो।

عَنْ أَبِي العَبَّاسِ، عَبْدِ الله بْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ: كُنْت خَلْفَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَوْمًا، فَقَالَ: «يَا غُلَامِ! إنِّي أُعَلِّمُك كَلِمَاتٍ: احْفَظِ اللَّهَ يَحْفَظْكَ، احْفَظِ الله تَجِدْهُ تُجَاهَكَ، إذَا سَأَلْتَ فَاسْأَلِ اللهَ، وَإِذَا اسْتَعَنْتَ فَاسْتَعِنْ بِاَللهِ، وَاعْلَمْ أَنَّ الأُمَّةَ لَوْ اجْتَمَعَتْ عَلَى أَنْ يَنْفَعُوكَ بِشَيْءٍ لَمْ يَنْفَعُوكَ إلَّا بِشَيْءٍ قَدْ كَتَبَهُ اللَّهُ لَكَ، وَإِنِ اجْتَمَعُوا عَلَى أَنْ يَضُرُّوكَ بِشَيْءٍ لَمْ يَضُرُّوكَ إلَّا بِشَيْءٍ قَدْ كَتَبَهُ اللَّهُ عَلَيْكَ؛ رُفِعَتِ الأَقْلَامُ، وَجَفَّتِ الصُّحُفُ». وَفِي رِوَايَةِ غَيْرِ التِّرْمِذِيِّ: «احْفَظِ اللهَ تَجِدْهُ أَمَامَكَ، تَعَرَّفْ إلَى اللهِ فِي الرَّخَاءِ يَعْرِفْكَ فِي الشِّدَّةِ، وَاعْلَمْ أَنَّ مَا أَخْطَأَكَ لَمْ يَكُنْ لِيُصِيبَكَ، وَمَا أَصَابَك لَمْ يَكُنْ لِيُخْطِئَكَ، وَاعْلَمْ أَنَّ النَّصْرَ مَعَ الصَّبْرِ، وَأَنْ الفَرَجَ مَعَ الكَرْبِ، وَأَنَّ مَعَ العُسْرِ يُسْرًا».
अबू अब्बास अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं : एक दिन मैं अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पीछे सवारी पर बैठा हुआ था कि आपने फ़रमाया : “ऐ बच्चे! मैं तुम्हें कुछ बातें बताता हूँ (इन्हें याद रखना) : अल्लाह (के आदेशों और निषेधों) की रक्षा करो, अल्लाह तुम्हारी रक्षा करेगा। अल्लाह (के आदेशों और निषेधों) की रक्षा करो, तुम उसे अपने सामने पाओगे। जब माँगो, तो अल्लाह से माँगो और जब मदद चाहो, तो अल्लाह से मदद चाहो। तथा जान लो, यदि सभी लोग तुम्हें कुछ लाभ पहुँचाने के लिए एकत्र हो जाएं, तो भी तुम्हें उससे अधिक लाभ नहीं पहुँचा सकते, जितना अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख रखा है। तथा यदि सब लोग तुम्हें हानि पहुँचाने के लिए एकत्र हो जाएं, तो भी तुम्हारी उससे अधिक हानि नहीं कर सकते, जितनी अल्लाह ने तुम्हारे भाग्य में लिख रखी है। कलम उठा ली गई है और पुस्तकें सूख चुकी हैं।" तथा तिरमिज़ी की रिवायत के अलावा एक अन्य रिवायत में है : "अल्लाह (के आदेशों और निषेधों) की रक्षा करो, अल्लाह को अपने सामने पाओगे। खुशहाली के समय अल्लाह को पहचानो, परेशानी के समय वह तुम्हें पहचानेगा। जान लो, जो तुम्हें प्राप्त नहीं हुआ, वह तुम्हें मिलने वाला नहीं था और जो मिल गया वह तुम्हारे हाथ से जाने वाला नहीं था। जान लो, मदद सब्र के साथ है, कुशादगी तकलीफ़ के साथ है और तंगी के साथ आसानी है।"
इस ह़दीस़ को तिर्मिज़ी आदि ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा बता रहे हैं कि वह छोटे थे और एक दिन अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पीछे सवारी पर बैठे हुए थे कि आपने कहा : मैं तुम्हें कुछ बातें सिखाऊँगा, जिनसे अल्लाह तुम्हें फ़ायदा पहुँचाएगा : अल्लाह के आदेशों की रक्षा करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहकर इस तरह अल्लाह की रक्षा करो कि वह तुमको नेकी और अल्लाह से निकट करने वाले कामों में पाए, अवज्ञाकारियों और गुनाहों में न पाए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो बदले में अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत की अप्रिय चीज़ों से तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम जहाँ भी जाओगे, हर काम में तुम्हारी मदद करेगा। जब कुछ माँगना हो, तो केवल अल्लाह से माँगो। क्योंकि वही माँगने वालों की मुरादें पूरी करता है। जब मदद मांगना हो, तो केवल अल्लाह से मांगो। तुम्हारे दिल में इस बात का विश्वास होना चाहिए कि अगर धरती के ऊपर मौजूद सारे लोग तुम्हारा भला करना चाहें, तो उतना ही कर सकते हैं, जितना अल्लाह ने तुम्हारे भाग्य में लिख रखा है और धरती पर बसने वाले सारे लोग तुम्हारा बुरा करना चाहें, तो उससे ज़्यादा नहीं कर सकते, जितना अल्लाह ने तुम्हारे भाग्य में लिख रखा है। इन सारी बातों को अल्लाह ने अपनी हिकमत तथा ज्ञान के तक़ाज़े के अनुसार लिख रखा है और अल्लाह के लिखे में कोई बदलाव संभव नहीं है। जो अल्लाह की रक्षा करता है, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी निषिद्धताओं से बचकर, तो पाक एवं पवित्र अल्लाह उसके सामने होता है, जानता है कि वह किस स्थिति में है, तथा उसकी सहायता और समर्थन करता है। यदि मनुष्य सुख के समय में अल्लाह की आज्ञा का पालन करता है, तो अल्लाह कठिनाई के समय में उसके लिए राहत और निकास का मार्ग बनाता है। अतः हर बंदे को अल्लाह द्वारा निर्धारित भलाई और बुराई पर संतुष्ट रहना चाहिए। कठिनाइयों एवं परीक्षाओं के समय में बंदे को धैर्य रखना चाहिए, क्योंकि धैर्य ही राहत की कुंजी है, जब कठिनाई बढ़ती है, तो अल्लाह की ओर से सरलता आती है, और जब परेशानी आती है, तो अल्लाह उसके बाद आसानी लाता है।

फ़ायदे
  1. छोटे बच्चों को तौहीद तथा आदाब एवं इस प्रकार की दीन की अन्य बातें सिखाने का महत्व।
  2. अल्लाह बंदे को प्रतिफल उसी कोटि का देता है, जिस कोटि का उसका अमल रहता है।
  3. केवल अल्लाह पर भरोसा करने का आदेश, क्योंकि वही काम बनाने वाला है।
  4. अल्लाह के निर्णय तथा तक़दीर पर ईमान और उससे राज़ी रहना तथा इस बात का उल्लेख कि अल्लाह ने सारी चीज़ों का निर्णय पहले से ले रखा है।
  5. जो अल्लाह के आदेशों को नष्ट करेगा, अल्लाह उसे नष्ट कर देगा और उसकी रक्षा नहीं करेगा।
  6. एक बड़ा सुसमाचार यह कि जब इन्सान कठिनाई में पड़ा हुआ हो, तो उसे आसानी की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
  7. अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के शब्दों : "जान लो, जो तुम्हें प्राप्त नहीं हुआ, वह तुम्हें मिलने वाला नहीं था और जो मिल गया वह तुम्हारे हाथ से जाने वाला नहीं था।" में ऐसे व्यक्ति के लिए सांत्वना है, जिसपर कोई मुसीबात आई हुई हो या जिसके हाथ से कोई प्रिय वस्तु निकल गई हो। यहाँ पहला वाक्य किसी अप्रिय घटना के घटित होने पर सांत्वना है और दूसरा वाक्य किसी प्रिय वस्तु के खो जाने पर।
हवाला

سنن الترمذي (4/ 284) (2516). التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثًا النووية (ص42). شرح الأربعين النووية، لابن عثيمين (ص200). فتح القوي المتين في شرح الأربعين وتتمة الخمسين، للعباد (ص69).

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com