सीधे कंटेंट पर जाएँ
सुनन नसाई

नंबर 2013

नंबर 2013किताब 21, नंबर 196
أَخْبَرَنَا عَمْرُو بْنُ عَلِيٍّ، قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّحْمَنِ، قَالَ حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ عُلَىِّ بْنِ رَبَاحٍ، قَالَ سَمِعْتُ أَبِي قَالَ، سَمِعْتُ عُقْبَةَ بْنَ عَامِرٍ الْجُهَنِيَّ، قَالَ ‏:‏ ثَلاَثُ سَاعَاتٍ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَنْهَانَا أَنْ نُصَلِّيَ فِيهِنَّ، أَوْ نَقْبُرَ فِيهِنَّ مَوْتَانَا ‏:‏ حِينَ تَطْلُعُ الشَّمْسُ بَازِغَةً حَتَّى تَرْتَفِعَ، وَحِينَ يَقُومُ قَائِمُ الظَّهِيرَةِ حَتَّى تَزُولَ الشَّمْسُ، وَحِينَ تَضَيَّفُ الشَّمْسُ لِلْغُرُوبِ ‏.‏
Uqbah bin 'Amir Al-Juhani said:"There are three times at which the Messenger of Allah forbade us to pray or to bury our dead: When the sun has risen fully until it is higher, when it reaches its zenith until it has passed the zenith, and when the sun starts to set" (Sahib)
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihAbu Ghuddah
  • SahihAl-Albani
  • HasanZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 21 · The Book of Funerals

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।