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सुनन नसाई

नंबर 1668

नंबर 1668किताब 20, नंबर 71
أَخْبَرَنَا عَمْرُو بْنُ عُثْمَانَ، وَمُحَمَّدُ بْنُ صَدَقَةَ، قَالاَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ حَرْبٍ، عَنِ الزُّبَيْدِيِّ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ سَالِمٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ صَلاَةُ اللَّيْلِ مَثْنَى مَثْنَى فَإِذَا خِفْتَ الصُّبْحَ فَأَوْتِرْ بِوَاحِدَةٍ ‏"‏ ‏.‏
It was narrated from Salim, from his father, that :The Prophet (ﷺ) said: "Prayers at night are two by two, then if you fear that dawn will come, pray witr with one rak'ah
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihAbu Ghuddah
  • SahihAl-Albani
  • Sahih - Agreed UponZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 20 · The Book of Qiyam Al-Lail (The Night Prayer) and Voluntary Prayers During the Day

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।