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सहीह मुस्लिम

नंबर 1344

नंबर 1344किताब 5, नंबर 181अरबी नंबरिंग 594.02
وَحَدَّثَنَاهُ أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا عَبْدَةُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، مَوْلًى لَهُمْ أَنَّ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ الزُّبَيْرِ، كَانَ يُهَلِّلُ دُبُرَ كُلِّ صَلاَةٍ ‏.‏ بِمِثْلِ حَدِيثِ ابْنِ نُمَيْرٍ وَقَالَ فِي آخِرِهِ ثُمَّ يَقُولُ ابْنُ الزُّبَيْرِ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُهَلِّلُ بِهِنَّ دُبُرَ كُلِّ صَلاَةٍ ‏.‏
Abu Zubair reported:Abdullah b Zubair used to say La ilaha il-Allah at the end of every prayer like the hadith narrated by Ibn Numair and he reported it in the end, and then reported Ibn Zubair saying: The Messenger of Allah (ﷺ) uttered La ilaha il-Allah at the end of every prayer

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 5 · The Book of Mosques and Places of Prayer

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।