حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الصَّبَّاحِ، حَدَّثَنَا عَبَّادُ بْنُ الْعَوَّامِ، عَنْ عَوْفٍ، عَنْ أَبِي الْمِنْهَالِ، عَنْ أَبِي بَرْزَةَ، ح وَحَدَّثَنَا سُوَيْدٌ، حَدَّثَنَا مُعْتَمِرُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنْ أَبِيهِ، حَدَّثَهُ أَبُو الْمِنْهَالِ، عَنْ أَبِي بَرْزَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ كَانَ يَقْرَأُ فِي الْفَجْرِ مَا بَيْنَ السِّتِّينَ إِلَى الْمِائَةِ .
It was narrated from Abu Barzah that the Messenger of Allah (ﷺ) used to recite between sixty and one hundred (Verses) in Fajr prayer
स्रोत में दर्ज दर्जे
SahihAl-Albani
SahihMuhammad Fouad Abd al-Baqi
SahihShuaib Al Arnaut
Sahih MuslimZubair Ali Zai
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।