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तशरीह के साथ हदीसें

निफ़ाक़ (अंदर कुफ़्र छुपाए रखना और बाहर ईमान का दिखावा करना)

10 हदीसें

मुनाफ़िक़ों पर सबसे भारी नमाज़ इशा और फ़ज्र की नमाज़ है और अगर उन्हें इन नमाज़ों के सवाब का अंदाज़ा हो जाए, तो घुटनों को बल चलकर आएँ

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «‌إِنَّ ‌أَثْقَلَ صَلَاةٍ عَلَى الْمُنَافِقِينَ صَلَاةُ الْعِشَاءِ وَصَلَاةُ الْفَجْرِ، وَلَوْ يَعْلَمُونَ مَا فِيهِمَا لَأَتَوْهُمَا وَلَوْ حَبْوًا، وَلَقَدْ هَمَمْتُ أَنْ آمُرَ بِالصَّلَاةِ فَتُقَامَ، ثُمَّ آمُرَ رَجُلًا فَيُصَلِّيَ بِالنَّاسِ، ثُمَّ أَنْطَلِقَ مَعِي بِرِجَالٍ مَعَهُمْ حُزَمٌ مِنْ حَطَبٍ إِلَى قَوْمٍ لَا يَشْهَدُونَ الصَّلَاةَ، فَأُحَرِّقَ عَلَيْهِمْ بُيُوتَهُمْ بِالنَّارِ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मुनाफ़िक़ों पर सबसे भारी नमाज़ इशा और फ़ज्र की नमाज़ है और अगर उन्हें इन नमाज़ों के सवाब का अंदाज़ा हो जाए, तो घुटनों को बल चलकर आएँ। मैंने तो (एक बार) इरादा कर लिया था कि किसी को नमाज़ पढ़ाने का आदेश दूँ और वह नमाज़ पढ़ाए, फिर कुछ लोगों को साथ लेकर, जो लकड़ी गट्ठर लिए हुए हों, ऐसे लोगों के यहाँ जाऊँ, जो नमाज़ के लिए नहीं आते और उनको उनके घरों के साथ जला डालूँ।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मुनाफ़िक़ों तथा नमाज़ में और ख़ास तौर से इशा तथा फ़ज्र की नमाज़ में उनकी सुस्ती के बारे में बता रहे हैं। आप यह भी बता रहे हैं कि अगर मुनाफ़िक़ों को पता हो जाए कि इन दो नमाज़ों को मुसलमानों के साथ जमात में शरीक होकर पढ़ने पर कितनी बड़ी मात्रा में नेकी मिलनी है, तो वे उसी तरह घुटनों तथा हाथों के बल चलकर इन दो नमाज़ों में शरीक हों, जिस तरह चलना सीखने से पहले बच्चा घुटनों तथा हाथों के बल पर आगे बढ़ता है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक बार इस बात का इरादा कर लिया था कि किसी को अपनी जगह पर नमाज़ पढ़ाने का आदेश दे दें, फिर कुछ लोगों को साथ लेकर, जो लकड़ियों के गट्ठर लिए हुए हों, उन लोगों के पास जाएँ, जो नमाज़ पढ़ने के लिए जमात में शामिल नहीं होते और उनके समेत उनके घरों को जला डालें। क्योंकि उन्होंने जमात में शामिल न होकर जो गुनाह किया है, वह बहुत बड़ा है। लेकिन आपने ऐसा नहीं किया, क्योंकि घरों में मासूम औरतें, बच्चे और माज़ूर (अक्षम) लोग भी होते हैं, जिनका कोई गुनाह नहीं है।

फ़ायदे
  1. मस्जिद में उपस्थित होकर जमात के साथ नमाज़ न पढ़ने की भयानकता।
  2. मुनाफ़िक़ इबादत केवल दिखावे के तौर पर करते हैं। यही कारण है कि वह मस्जिद उसी समय जाते हैं, जब लोग देख रहे हों।
  3. इशा तथा फ़ज्र की नमाज़ जमात के साथ पढ़ने का बड़ा सवाब, और इस बात का उल्लेख कि यह दोनों नमाज़ें इस लायक़ हैं कि इन्सान इनमें अवश्य आए चाहे उसे घुटनों के बल चलकर आना पड़े।
  4. इशा तथा फ़ज्र की नमाज़ की पाबंदी मुनाफिकत से सुरक्षित होने की निशानी है और इन दो नमाज़ों में शामिल न होना मुनाफ़िक़ों की विशेषता है।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 451) (651). صحيح البخاري (1/ 132) (657). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 88). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص107). تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (1/ 136).

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हम एक सफ़र में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ एक ऐसी यात्रा पर गए जिसमें लोगों को बड़ी मुश्किलें झेलना पड़ीं।

عن زيد بن أَرْقَم رضي الله عنه قال: خَرَجْنَا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سَفَر أَصَاب الناس فيه شِدَّة، فقال عبد الله بن أُبَيٍّ: لاَ تُنْفِقُوا على من عِندَ رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى يَنْفَضُّوا، وقال: لَئِنْ رَجَعْنَا إلى المدينة لَيُخْرِجَنَّ الأَعَزُّ منها الأَذَلَّ، فَأَتَيْتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فَأَخْبَرْتُه بذلك، فأَرْسَل إلى عبد الله بن أُبي، فاجْتَهَدَ يَمِينَه: ما فعل، فقالوا: كَذَب زَيْدٌ رسول الله صلى الله عليه وسلم فَوَقَعَ في نَفْسِي ممَّا قَاَلُوه شِدَّة حتَّى أَنْزَل الله تعالى تَصْدِيقِي: (إذا جاءك المنافقون) ثم دعاهُم النبي صلى الله عليه وسلم لِيَسْتَغْفِرَ لهم فَلَوَّوْا رُؤُوسَهُم.
ज़ैद बिन अरक़म- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि हम एक सफ़र में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ एक ऐसी यात्रा पर निकले जिसमें लोगों को बहुत कठिनाइयाँ झेलना पड़ीं। ऐसे में अब्दुल्लाह बिन उबै ने कहाः तुम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास जो लोग हैं, उनपर खर्च न करो, यहाँ तक कि वे अस्त-व्यस्त हो जायें। उसने यह भी कहाः अगर हम मदीना लौटकर गए तो वहाँ से सम्मानित लोग अपमानित लोगों को खदेड़ देंगे। अतः, मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया और सब कुछ बता दिया। आपने अब्दुल्लाह बिन उबै को बुला भेजा। परन्तु, उसने क़सम खा ली कि उसकी ओर से इस तरह की कोई बात कही नहीं गई है। अतः, लोग कहने लगे कि ज़ैद ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से झूठ बोला है। उनकी इस बात से मुझे बड़ा कष्ट हुआ। यहाँ तक कि अल्लाह ने मेरी पुष्टि करते हुए कह दियाः "إذا جاءك المنافقون" फिर अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें बुलाया, ताकि उनके लिए क्षमा याचना कर सकें। परन्तु उन्होंने अपने सिरों को (इनकार के तौर पर) मोड़ लिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415ه. كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، ط1، كنوز إشبيليا، الرياض، 1430هـ. رياض الصالحين للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428 هـ. رياض الصالحين، ط4، تحقيق: عصام هادي، وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية القطرية، دار الريان، بيروت، 1428هـ. صحيح البخاري، ط1، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت. دار البيان، دمشق، مكتبة المؤيد، الطائف ، ط 1410 هـ. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ. شرح رياض الصالحين للشيخ ابن عثيمين، دار الوطن للنشر، الرياض، 1426هـ.

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मैं नहीं समझता कि अमुक एवं अमुक हमारे धर्म के बारे में कुछ जानते हैं।

عن عائشة رضي الله عنها قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «ما أُظُن فُلَانا وفُلَانا يَعْرِفَان من دِيِننَا شَيْئَا». قال اللَّيث بن سعد أحد رُواة هذا الحديث: هذان الرجلان كانا من المنافقين.
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः मैं नहीं समझता कि अमुक एवं अमुक हमारे धर्म के बारे में कुछ जानते हैं। लैस बिन सअद, इस हदीस के एक वर्णनकर्ता, कहते हैंः यह दोनों व्यक्ति मुनाफ़िकों में से थे।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415ه. رياض الصالحين، للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428هـ. رياض الصالحين، ط4، تحقيق: عصام هادي، وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية القطرية، دار الريان، بيروت، 1428هـ. صحيح البخاري، ط1، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ. شرح صحيح البخاري، لابن بطال، تحقيق: أبو تميم ياسر بن إبراهيم، ط2، مكتبة الرشد - السعودية، الرياض، 1423هـ.

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जब सदक़े का महत्व बयान करने वाली आयत उतरी तो हम अपनी पीठ पर बोझ उठाते (और उससे प्राप्त मज़दूरी को दान करते थे)। फिर एक व्यक्ति आया और बहुत-सा धन दान किया तो मुनाफ़िकों ने कहाः यह रियाकार है तथा एक अन्य व्यक्ति आया और एक साअ दान किया तो कहने लगे कि अल्लाह को इसके एक साअ की ज़रूरत नहीं है। ऐसी परिस्थिति में यह आयत उतरीः "الذين يلمزون المطوعين من المؤمنين في الصدقات والذين لا يجدون إلا جهدهم" (अर्थात, जो लोग स्वेच्छा से देने वाले मोमिनों पर उनके दान के विषय में चोटें करते हैं और उन लोगों का उपहास करते हैं, जिनके पास उसके सिवा कुछ नहीं, जो वे मशक्कत उठाकर देते हैं, उनका उपहास अल्लाह ने किया और उनके लिए दुखदायी यातना है।)

عن أبي مسعود عقبة بن عمرو الأنصاري البدري رضي الله عنه قال: لما نزلت آية الصدقة كنَّا نُحَامِلُ على ظُهُورِنَا، فجاء رجل فتصدق بشيء كثير، فقالوا: مُراءٍ، وجاء رجل آخر فتصدق بصاع، فقالوا: إن الله لَغَنيٌّ عن صاع هذا!؛ فنزلت: (الذين يلمزون المطوعين من المؤمنين في الصدقات والذين لا يجدون إلا جهدهم).
अबू मसऊद उक़बा बिन अम्र अंसारी बदरी- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि जब सदक़े का महत्व बयान करने वाली आयत उतरी तो हम अपनी पीठ पर बोझ उठाते (और उससे प्राप्त मज़दूरी को दान करते थे)। फिर एक व्यक्ति आया और बहुत सा धन दान किया तो मुनाफ़िकों ने कहाः यह रियाकार है तथा एक अन्य व्यक्ति आया और एक साअ दान किया तो कहने लगे कि अल्लाह को इसके एक साअ की ज़रूरत नहीं है। ऐसी परिस्थिति में यह आयत उतरीः "الذين يلمزون المطوعين من المؤمنين في الصدقات والذين لا يجدون إلا جهدهم" (अर्थात, जो लोग स्वेच्छा से देने वाले मोमिनों पर उनके दान के विषय में चोटें करते हैं और उन लोगों का उपहास करते हैं, जिनके पास उसके सिवा कुछ नहीं, जो वे मशक्कत उठाकर देते हैं, उनका उपहास अल्लाह ने किया और उनके लिए दुखदायी यातना है।)
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

تطريز رياض الصالحين، فيصل بن عبد العزيز المبارك، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة للنشر والتوزيع، الرياض، الطبعة: الأولى 1423هـ، 2002م. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الرابعة عشر 1407هـ، 1987م. شرح رياض الصالحين، محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ. صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ.

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हम लोग जब अपने बादशाहों के पास जाते हैं, तो ऐसी बातें करते हैं, जो बातें वहाँ से निकलने के बाद नहीं करते। उन्होंने उत्तर दिया : हम इसे अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के युग में निफ़ाक़ -पाखंड तथा ढ़ोंग- समझते थे।

عن محمد بن زيد: أن نَاسًا قالوا لجده عبد الله بن عمر رضي الله عنهما : إنا ندخل على سَلاطِينِنَا فنقول لهم بخلاف ما نتكلم إذا خرجنا من عندهم، قال: كنا نَعُدُّ هذا نفاقا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم .
मुहम्मद बिन ज़ैद कहते हैं कि कुछ लोगों ने उनके दादा अब्दुल्लाह बिन उमर -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- से कहा : हम लोग जब अपने बादशाहों के पास जाते हैं, तो ऐसी बातें करते हैं, जो बातें वहाँ से निकलने के बाद नहीं करते। उन्होंने उत्तर दिया : हम इसे अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के युग में निफ़ाक़ -पाखंड तथा ढ़ोंग- समझते थे।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

رياض الصالحين للنووي، تحقيق: ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، ط1، 2007م. صحيح البخاري، بترقيم محمد فؤاد عبد الباقي. نزهة المتقين شرح رياض الصاحين، شرح الدكتور مصطفى الخن وآخرين، مؤسسة الرسالة، ط 1. 1987م. تطريز رياض الصالحين، لفيصل بن عبد العزيز آل مبارك، تحقيق: عبد العزيز آل حمد، دار العاصمة، ط1، الرياض، 2002م. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لابن علان، دار الكتاب العربي، بيروت. شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين، مؤسسة ابن عثيمين الخيرية، مدار الوطن للنشر، الرياض، ط1426هـ. كنوز رياض الصالحين، المجلس العلمي كنوز دار إشبيليا، الرياض، ط1، 2009م.

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(क़यामत के दिन) हमारा रब अपनी पिंडली खोलेगा, तो सभी मोमिन मर्द और औरतें सजदे में गिर पड़ेंगे। लेकिन, हर वह व्यक्ति ख़ड़ा रह जाएगा, जो दुनिया में दिखावे और शोहरत के लिए सजदा करता था। वह सजदा करने जाएगा, तो उसकी पीठ एक ही हड्डी की तरह सख्त बन जाएगी।

عن أبي سعيد الخدري رضي الله عنه مرفوعاً: «يكشِف ربُّنا عن ساقِه، فيسجدُ له كلُّ مؤمنٍ ومؤمنةٍ، فيبقى كلُّ مَن كان يسجدُ في الدنيا رياءً وسُمْعةً، فيذهبُ ليسجدَ، فيعودَ ظهرُه طبقًا واحدًا».
अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : “(क़यामत के दिन) हमारा रब अपनी पिंडली खोलेगा, तो सभी मोमिन मर्द और औरतें सजदे में गिर पड़ेंगे। लेकिन, हर वह व्यक्ति ख़ड़ा रह जाएगा, जो दुनिया में दिखावे और शोहरत के लिए सजदा करता था। वह सजदा करने जाएगा, तो उसकी पीठ एक ही हड्डी की तरह सख्त बन जाएगी।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

पवित्र एवं उच्च अल्लाह क़यामत के दिन अपनी सम्मानित पिंडली खोगेला, तो सारे मोमिन, पुरुष हों कि स्त्री, सजदे में गिर पड़ेंगे। लेकिन मुनाफ़िक़ लोग, जो दुनिया में लोगों को दिखाने के लिए सजदे किया करते थे, उन्हें सजदे से रोक दिया जाएगा और उनकी पीठ को रीढ़ की हड्डियों के विभिन्न टुकड़ों में से एक टुकड़ा बना दिया जाएगा। वे न झुक सकेंगे और न सजदा कर सकेंगे। क्योंकि दुनिया में वे अल्लाह के लिए नहीं, बल्कि सांसारिक उद्देश्यों के तहत सजदे किया करते थे। ज्ञात हो कि यहाँ पिंडली का अर्थ भीषणता और बेचैनी आदि बयान करना उचित नहीं है। उसे अल्लाह के एक गुण के रूप में, उसकी कैफ़ियत बयान किए बिना, उपमा दिए बिना, उसके अर्थ के साथ छेड़छाड़ किए बिना और इस संबंध में आए हुए शब्द को अर्थविहीन बनाए बिना, मानना ज़रूरी है।

हवाला

صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه. عمدة القاري شرح صحيح البخاري، لمحمود بن أحمد بن موسى الحنفى بدر الدين العينى، الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي بن سلطان الملا الهروي القاري، الناشر: دار الفكر، بيروت – لبنان، الطبعة: الأولى، 1422هـ - 2002م. شرح كتاب التوحيد من صحيح البخاري، لعبد الله بن محمد الغنيمان، الناشر: مكتبة الدار، المدينة المنورة، الطبعة: الأولى، 1405 هـ.

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मेरी उम्मत के अधिकतर मुनाफ़िक़ क़ारी (क़ुरआन पढ़ने वाले लोग) होंगे।

عن عبد الله بن عمرو بن العاصي رضي الله عنهما قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «إنَّ أكثرَ مُنافِقي أُمَّتي قُرَّاؤها».
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते सुना हैः “मेरी उम्मत के अधिकतर मुनाफ़िक़ क़ारी (क़ुरआन पढ़ने वाले लोग) होंगे।”
इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

- مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م. - فيض القدير شرح الجامع الصغير، للمناوي، المكتبة التجارية الكبرى – مصر، الطبعة: الأولى. - سلسلة الأحاديث الصحيحة وشيء من فقهها وفوائدها، تأليف محمد ناصر الدين الألباني، الناشر: مكتبة المعارف للنشر والتوزيع، الرياض، الطبعة: الأولى، لمكتبة المعارف. - التيسير بشرح الجامع الصغير, زين الدين محمد المدعو بعبد الرؤوف بن تاج العارفين بن علي بن زين العابدين الحدادي ثم المناوي, مكتبة الإمام الشافعي – الرياض, الطبعة: الثالثة، 1408هـ - 1988م. - الفتح الرباني لترتيب مسند الإمام أحمد بن حنبل الشيباني ومعه بلوغ الأماني من أسرار الفتح الرباني, أحمد بن عبد الرحمن بن محمد البنا الساعاتي, دار إحياء التراث العربي, الطبعة: الثانية. - شرح الطيبي على مشكاة المصابيح المسمى بـ (الكاشف عن حقائق السنن), شرف الدين الحسين بن عبد الله الطيبي, المحقق: د. عبد الحميد هنداوي, الناشر: مكتبة نزار مصطفى الباز، مكة المكرمة - الرياض، الطبعة: الأولى، 1417 هـ - 1997 م.

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मुनाफ़िक़ की मिसाल दो रेवड़ों के बीच चक्कर लगाने वाली बकरी की जैसी है, जो एक बार इस रेवड़ की ओर जाती है, तो एक बार उस रेवड़ की ओर।

عَنِ ابْنِ عُمَرَ رضي الله عنهما عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَ: «مَثَلُ الْمُنَافِقِ، كَمَثَلِ الشَّاةِ الْعَائِرَةِ بَيْنَ الْغَنَمَيْنِ تَعِيرُ إِلَى هَذِهِ مَرَّةً وَإِلَى هَذِهِ مَرَّةً».
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मुनाफ़िक़ की मिसाल दो रेवड़ों के बीच चक्कर लगाने वाली बकरी की जैसी है, जो एक बार इस रेवड़ की ओर जाती है, तो एक बार उस रेवड़ की ओर।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि मुनाफ़िक़ का हाल दुविधा में पड़ी हुई बकरी की तरह है, जिसे पता न हो कि दो रेवड़ों में से किसके साथ रहना है? कभी इस रेवड़ की ओर जाती हो, तो कभी उस रेवड़ की ओर। बिल्कुल इसी तरह मुनाफ़िक़ ईमान और कुफ़्र के विषय में दुविधा में पड़े होते हैं। न तो ईमान वालों के साथ अंदर और बाहर दोनों तरह से होते हैं और न काफ़िरों के साथ अंदर और बाहर दोनों तरह से होते हैं। वैसे तो ज़ाहिरी तौर पर ईमान वालों के साथ होते हैं, लेकिन मन में असमंजस की स्थिति होती है। कभी मुसलमानों की ओर झुक जाते हैं और कभी काफ़िरों की ओर।

फ़ायदे
  1. बात अच्छी तरह समझ में आए, इसके लिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उदाहरण दिया करते थे।
  2. इस हदीस में मुनाफ़िक़ों की दुविधा, संदेह और अस्थिरता को बयान किया गया है।
  3. इसमें मुनाफ़िक़ के हाल से सावधान किया गया है और ज़ाहिरी एवं अंदरूनी तौर पर पक्का-सच्चा मुसलमान बनने की शिक्षा दी गई है।
हवाला

صحيح مسلم (4/ 2146) (2784)، إكمال المعلم بفوائد مسلم (8/ 313)، عمدة القاري شرح صحيح البخاري (16/ 69).

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10 में से 8
10 हदीसें
  1. मुनाफ़िक़ों पर सबसे भारी नमाज़ इशा और फ़ज्र की नमाज़ है और अगर उन्हें इन नमाज़ों के सवाब का अंदाज़ा हो जाए, तो घुटनों को बल चलकर आएँ
  2. हम एक सफ़र में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ एक ऐसी यात्रा पर गए जिसमें लोगों को बड़ी मुश्किलें झेलना पड़ीं।
  3. मैं नहीं समझता कि अमुक एवं अमुक हमारे धर्म के बारे में कुछ जानते हैं।
  4. जब सदक़े का महत्व बयान करने वाली आयत उतरी तो हम अपनी पीठ पर बोझ उठाते (और उससे प्राप्त मज़दूरी को दान करते थे)। फिर एक व्यक्ति आया और बहुत-सा धन दान किया तो मुनाफ़िकों ने कहाः यह रियाकार है तथा एक अन्य व्यक्ति आया और एक साअ दान किया तो कहने लगे कि अल्लाह को इसके एक साअ की ज़रूरत नहीं है। ऐसी परिस्थिति में यह आयत उतरीः "الذين يلمزون المطوعين من المؤمنين في الصدقات والذين لا يجدون إلا جهدهم" (अर्थात, जो लोग स्वेच्छा से देने वाले मोमिनों पर उनके दान के विषय में चोटें करते हैं और उन लोगों का उपहास करते हैं, जिनके पास उसके सिवा कुछ नहीं, जो वे मशक्कत उठाकर देते हैं, उनका उपहास अल्लाह ने किया और उनके लिए दुखदायी यातना है।)
  5. हम लोग जब अपने बादशाहों के पास जाते हैं, तो ऐसी बातें करते हैं, जो बातें वहाँ से निकलने के बाद नहीं करते। उन्होंने उत्तर दिया : हम इसे अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के युग में निफ़ाक़ -पाखंड तथा ढ़ोंग- समझते थे।
  6. (क़यामत के दिन) हमारा रब अपनी पिंडली खोलेगा, तो सभी मोमिन मर्द और औरतें सजदे में गिर पड़ेंगे। लेकिन, हर वह व्यक्ति ख़ड़ा रह जाएगा, जो दुनिया में दिखावे और शोहरत के लिए सजदा करता था। वह सजदा करने जाएगा, तो उसकी पीठ एक ही हड्डी की तरह सख्त बन जाएगी।
  7. मेरी उम्मत के अधिकतर मुनाफ़िक़ क़ारी (क़ुरआन पढ़ने वाले लोग) होंगे।
  8. मुनाफ़िक़ की मिसाल दो रेवड़ों के बीच चक्कर लगाने वाली बकरी की जैसी है, जो एक बार इस रेवड़ की ओर जाती है, तो एक बार उस रेवड़ की ओर।
  9. चार बातें जिस व्यक्ति के अंदर होंगी, वह शुद्ध मुनाफ़िक़ होगा। जिसके अंदर इनमें से एक बात होगी, उसके अंदर उसे छोड़ देने तक निफ़ाक़ की एक बात होगी। जब बात करे, तब झूठ बोले, जब वचन दे, तो तोड़ डाले और जब झगड़े तो बद-ज़बानी करे।
  10. चार बातें जिस व्यक्ति के अंदर होंगी, वह शुद्ध मुनाफ़िक़ होगा। जिसके अंदर इनमें से एक बात होगी, उसके अंदर उसे छोड़ देने तक निफ़ाक़ की एक बात होगी। जब बात करे, तब झूठ बोले, जब वचन दे, तो तोड़ डाले और जब झगड़े तो बद-ज़बानी करे।

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com