"अल्लाह ने सृष्टियों की रचना की। जब उसने इस कार्य को पूरा कर लिया" यानी सृष्टियों की रचना का कार्य संपन्न हो गया। यह इस बात का प्रमाण है कि सृष्टियों की रचना का कार्य एक निर्धारित समय में संपन्न हो गया। यह सत्य है कि अल्लाह के पास असीम क्षमता है और एक कार्य में व्यस्तता उसे दूसरे कार्य से नहीं रोकती, लेकिन उसने अपनी हिकमत के तहत इसे एक निर्धारित समय सीमा के अंदर संपन्न कर लिया। इससे प्रमाणित होता है कि अल्लाह के कार्य उसकी चाहत और इरादे से जुड़े हुए हैं। जब वह किसी कार्य के करने का इरादा करता है, तो कर डालता है। आपके शब्द "पूरा कर लिया" का यह अर्थ नहीं है कि उसने सारी चीज़ों की रचना का कार्य संपन्न कर लिया। क्योंकि उसकी सृष्टियाँ एक के बाद एक वजूद में आती रहती हैं। यह अलग बात है कि वह उनसे पहले से अवगत होता है, उनसे संबंधित विवरणों का निर्धारण कर दिया होता है और उन्हें लिख चुका होता है। फिर जब वह चाहता है, तो उनका अस्तित्व सामने आता है। आपने फ़रमाया : "तो रहिम (खूनी रिश्ता) खड़ा हुआ और रहमान के तहबंद बाँधने के स्थान को पकड़ लिया। अल्लाह ने उससे कहाः यह क्या है?" यहाँ रहिम यानी खूनी रिश्ते से जो कार्य संबंद्ध किए गए हैं, जैसे खड़ा होना और कहना आदि, हदीस के ज़ाहिर से अंदाज़ा होता है कि उनसे उनका वास्तविक अर्थ ही मुराद है। यहाँ यह कहा जा सकता है कि खूनी रिश्ता अर्थ की दृष्टि से लोगों से जुड़ी हुई वस्तु है, लेकिन उसका उत्तर यह है कि अल्लाह के सामर्थ्य को इन्सानी अक़्ल के तराज़ू में तोला नहीं जा सकता। दरअसल यह हदीस अल्लाह के गुणों वाली हदीसों में से एक है, जिनके बारे में उलेमा ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्हें उसी तरह ग्रहण कर लिया जाएगा, जिस तरह वह आई हुई हैं। उन्होंने उन लोगों का खंडन भी किया है, जो इनके आशय को मानने से इनकार करते हैं। लेकिन इस हदीस का यह मतलब भी नहीं है कि अल्लाह के उसी प्रकार के चमड़े, लीनेन और कपास आदि से बने हुए तहबंद और चादर जैसे कपड़े हुआ करते हैं, जिस प्रकार के कपड़े लोग पहनते हैं। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "उसके जैसी कोई चीज़ नहीं है और वह सुनने वाला और देखने वाला है।" आपने फ़रमाया कि खूनी रिश्ते ने कहा : "यह संबंध विच्छेद करने वाले से तेरी शरण माँगने वाले का खड़ा होना है।" यह एक बहुत बड़े उद्देश्य के लिए खड़ा होना है, और सच्चाई यह है कि जो अल्लाह की शरण में चला गया, वह सबसे बड़े शरण देने वाले की शरण में चला गया। यह हदीस रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करने के महत्व को दर्शाती है और रिश्तेदारी का लिहाज़ न करने को एक बहुत बड़े गुनाह के रूप में चिह्नित करती है। इस हदीस में आए हुए शब्द 'القطيعة' का अर्थ है, रिश्ता जोड़कर न रखना। जबकि रिश्ता जोड़कर रखने से मुराद है, रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करना, उनसे प्रेम रखना, उनसे निकटता बनाए रखना, उनका सहयोग करना, उन्हें कष्ट से बचाना और उन्हें ऐसी चीज़ें देने का प्रयास करना जो उनके लिए दुनिया एवं आख़िरत में लाभकारी हों। आपने फ़रमाया : "अल्लाह ने कहा : क्या तू इस बात से प्रसन्न नहीं है कि जो तुझे जोड़े, उसे मैं जोड़ूँ और तुझे काटे उसे मैं काटूँ? उसने कहा : अवश्य ही, ऐ मेरे रब। अल्लाह ने कहा : तो ऐसा ही होगा।" अतः जो अपने रिश्तेदारों से संबंध जोड़कर रखेगा, अल्लाह उससे संबंध रखेगा और जिससे अल्लाह संबंध रखेगा, वह दुनिया एवं आख़िरत की हर भलाई तथा सौभाग्य प्राप्त करेगा और उसे फ़िरदौस यानी जन्नत के सबसे ऊपरी भाग में अपने पालनहार की निकटता प्राप्त होगी। क्योंकि जोड़ने का अंत यहीं पर आकर होगा और उसे अपने पालनहार के चेहरे को देखने का शुभ अवसर प्राप्त होगा। इसके विपरीत जो अपने रिश्तेदारों से संबंध तोड़कर रखेगा, अल्लाह उससे संबंध तोड़ लेगा और जिससे अल्लाह संबंध तोड़ ले, वह अल्लाह के श्त्रु तथा धुतकारे हुए शैतान के साथ हर भलाई एवं सौभाग्य से कटा हुआ रहेगा।
صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. مختار الصحاح، لزين الدين أبو عبد الله محمد بن أبي بكر بن عبد القادر الحنفي الرازي، تحقيق: يوسف الشيخ محمد، نشر: المكتبة العصرية - الدار النموذجية، بيروت – صيدا، لطبعة: الخامسة، 1420هـ / 1999م. النهاية في غريب الحديث والأثر، لابن الأثير، نشر: المكتبة العلمية - بيروت، 1399هـ - 1979م، تحقيق: طاهر أحمد الزاوى - محمود محمد الطناحي. عمدة القاري شرح صحيح البخاري، لمحمود بن أحمد بن موسى الحنفى بدر الدين العينى، الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. شرح كتاب التوحيد من صحيح البخاري، لعبد الله بن محمد الغنيمان، الناشر: مكتبة الدار، المدينة المنورة، الطبعة: الأولى، 1405 هـ.