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तशरीह के साथ हदीसें

रोज़े की सुन्नतें

7 हदीसें

लोग उस समय तक भलाई में रहेंगे, जब तक इफ़तार करने में जल्दी करते रहेंगे।

عَنْ سَهْلِ بْنِ سَعْدٍ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «لَا يَزَالُ النَّاسُ بِخَيْرٍ مَا عَجَّلُوا الْفِطْرَ».
सह्ल बिन साद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "लोग उस समय तक भलाई में रहेंगे, जब तक इफ़तार करने में जल्दी करते रहेंगे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया हैै कि लोग उस समय तक भलाई में रहेंगे, जब तक सूरज डूबने का यक़ीन हो जाने के बाद फ़ौरन इफ़तार कर लिया करेंगे। ऐसा करना इस बात की निशानी है कि इन्सान सुन्नत का अक्षरशः पालन करता है और उसकी ओर से निर्धारित सीमा पर रुक जाता है।

फ़ायदे
  1. नववी कहते हैं : इस हदीस में सूरज डूबने का यक़ीन हो जाने के बाद जल्दी इफ़तार करने की प्रेरणा दी गई है। इस हदीस का अर्थ यह है कि इस उम्मत के अंदर उस समय तक अनुशासन बहला रहेगा और इस उम्मत के लोग उस समय तक भलाई और बरकत से लाभान्वित होते रहेंगे, जब तक इस सुन्नत पर अमल करते रहेंगे। देर से इफ़तार करना इस बात की निशानी होगी कि वह बिगाड़ के मार्ग पर चलने लगी है।
  2. लोगों के अंदर भलाई सुन्नत के अनुसरण के कारण बाक़ी रहेगी। जैसे ही सुन्नत के साथ छेड़-छाड़ शुरू होगी, बिगाड़ की राहें खुलने लगेंगी।
  3. पूर्ववर्ती किताब वालों और बिदअतियों का विरोध, जो देर से इफ़तार किया करते हैं।
  4. इब्न-ए-हजर कहते हैं : इस हदीस के अंदर इफ़तार में देर न करने का कारण बयान कर दिया गया है। मुहल्लब कहते हैं : इसके अंदर हिकमत यह है कि रात के समय को दिन में जोड़ने से बचा जाए, यह रोज़ेदार के लिए अधिक आरामदायक है और इससे उसके अंदर रोज़े की ताक़त अधिक बाक़ी रहती है। लेकिन इसके साथ ही उलेमा का इस बात पर भी इत्तेफ़ाक़ है कि जल्दी उसके बाद ही की जाएगी, जब अपनी आँख से देख लेने या दो विश्वसनीय लोगों की गवाही के बाद इस बात का यक़ीन हो जाए कि सूरज डूब चुका है। वैसे, ज़्यादा पुख़्ता मत के अनुसार एक विश्वसनीय व्यक्ति की गवाही भी काफ़ी है।
  5. इब्न-ए-हजर कहते हैं : चेतावनी : आज के समय प्रकट होने वाली एक बहुत ही ग़लत बिदअत यह है कि रमज़ान महीने में फ़ज्र से लगभग बीस मिनट पहले दूसरी अज़ान दे दी जाती है और यह बताने के लिए कि अब रोज़ा रखने का इरादा रखने वाले के लिए खाना-पीना हराम हो चुका हैै, चराग़ बुझा दिए जाते हैं। यह सब कुछ एहतियात के नाम पर किया जाता है। इसी एहतियात के कारण वे सूरज डूब जाने के कुछ देर बाद अज़ान देते हैं। इस तरह इफ़तार में देर और सहरी में जल्दी करते हैं और सुन्नत की मुख़ालफ़त के शिकार हो जाते हैं। अतः उनमें भलाई कम हो गई और बुराई बढ़ गई। और अल्लाह ही है जिससे सहायता मांगी जाती है।
हवाला

صحيح البخاري (3/ 36) (1957). صحيح مسلم (2/ 771) (1098). تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص335). تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، لابن عثيمين (3/ 442). خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص155).

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हमने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ सहरी का खाना खाया, फिर नमाज के लिए चले गए। अनस कहते हैं : मैंने पूछा : अज़ान और सहरी के बीच कितना समय था? उन्होंने जवाब दिया : पचास आयतें पढ़ने के बराबर समय।

عَنْ زَيْدِ بْنِ ثَابِتٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: تَسَحَّرْنَا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ثُمَّ قَامَ إِلَى الصَّلاةِ، قُلْتُ: كَمْ كَانَ بَيْنَ الأَذَانِ وَالسَّحُورِ؟ قَالَ: قَدْرُ خَمْسِينَ آيَةً.
ज़ैद बिन साबित -रज़ियल्लाहु अनहु- से रिवायत है, वह कहते हैं : "हमने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ सहरी का खाना खाया, फिर नमाज के लिए चले गए। अनस कहते हैं : मैंने पूछा : अज़ान और सहरी के बीच कितना समय था? उन्होंने जवाब दिया : पचास आयतें पढ़ने के बराबर समय।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

कुछ सहाबा ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ सहरी की और उसके बाद आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- नमाज़ के लिए खड़े हो गए। अनस ने ज़ैद बिन साबित -रज़ियल्लाहु अनहु- से पूछा : अज़ान और सहरी की समाप्ति के बीच कितना समय था? ज़ैद -रज़ियल्लाहु अनहु- ने उत्तर दिया : क़ुरआन की पचास मध्यम आयतें, जो न लम्बी हों न छोटी, पढ़ने के बराबर समय। पढ़ने का अंदाज़ बहुत धीमा भी न हो, न बहुत तेज़।

फ़ायदे
  1. सहरी फ़ज्र से कुछ पहले करना बेहतर है। क्योंकि यह शरीर के लिए अधिक लाभदायक है और दिनभर के लिए अधिक फ़ायदेमंद।
  2. सहाबा का प्रयास रहता था कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ बैठ सकें, ताकि आपसे ज्ञान प्राप्त कर सकें।
  3. सहाबा के साथ अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का उत्तम व्यवहार कि उनके साथ बैठकर खाना खा लिया करते थे।
  4. रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ें छोड़ने (रोज़ा आरंभ) का समय फ़ज्र प्रकट होने से शुरू होता है।
  5. हदीस के शब्दों "सहरी एवं अज़ान के बीच कितना अंतराल होता था?" से मुराद सहरी एवं इक़ामत के बीच का समय है। क्योंकि दूसरी हदीस में है : "उन दोनों के सहरी समाप्त करने और नमाज़ में दाख़िल होने के बीच कितना समय रहता था?" ज़ाहिर सी बात है कि एक हदीस दूसरी हदीस की व्याख्या करती है (इस लिए अज़ान से मुराद यहां इक़ामत होगी)।
  6. मुहल्लब कहते हैं : इस हदीस में समय मापने का काम शारीरिक कार्यों द्वारा किया गया है। अरबों के अंदर शारीरिक कार्यों द्वारा समय मापने का प्रचलन रहा है। कहा करते थे : बकरी का दूध दुहने के बराबर समय और ऊँट ज़बह करने के बराबर समय। ज़ैद बिन साबित ने इस हदीस में समय मापने का काम क़ुरआन की तिलावत से किया है, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि यह क़ुरआन की तिलावत का समय हुआ करता था। अगर कार्य के अतिरिक्त किसी और चीज़ से समय मापते, तो मिसाल के तौर पर कहते : एक दर्जे के समान या एक घंटे के तीसरे या पाँचवें भाग के समान।
  7. इब्न-ए-अबू जमरा कहते हैं : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- देखते कि कौन-सी चीज़ आपकी उम्मत के लिए अधिक आसान है और उसके बाद उसी पर अमल करते। क्योंकि अगर आप सहरी नहीं करते तो आपका अनुसरण करते हुए लोग भी सहरी नहीं करते और इस तरह कुछ लोग कठिनाई में पड़ जाते। इसी तरह अगर आप रात के बीच वाले भाग में सहरी करते, तब भी ऐसे लोग कठिनाई में पड़ जाते, जिनपर नींद हावी हो जाती, क्योंकि संभव था कि इसके कारण उनकी फ़ज्र की नमाज़ छूट जाती या रात जागने के कष्ट से गुज़रना पड़ता।
हवाला

صحيح البخاري (3/ 29) (1921). صحيح مسلم (2/ 771) (1097). تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص318). تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (3/ 418). خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص147).

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तुम लोग सहरी खाया करो, क्योंकि सहरी में बरकत है।

عن أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «تَسَحَّرُوا، فَإِنَّ فِي السَّحُورِ بَرَكَةً».
अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "तुम लोग सहरी खाया करो, क्योंकि सहरी में बरकत है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सहरी करने के लिए प्रेरित किया है। सहरी कहते हैं रोज़े की तैयारी के तौर पर रात के अंतिम भाग में खाने को। प्रेरित करने का कारण यह है कि उसमें बड़ा प्रतिफल तथा सवाब, रात के अंतिम भाग में दुआ के लिए जागने, रोज़ा रखने की शक्ति प्राप्त करने, अपने अंदर रोज़े के लिए चुस्ती पैदा करने और रोज़े की मशक़्क़त को कम करने जैसी चीज़ें पाई जाती हैं।

फ़ायदे
  1. शरई निर्देश का पालन करते हुए सहरी करना मुसतहब है।
  2. इब्न-ए-हजर फ़त्ह अल-बारी में लिखते हैं : सहरी की बरकत विभिन्न दिशाओं से प्राप्त होती है। सहरी करना सुन्नत का अनुपालन है, अह्ल-ए-किताब की मुख़ालफ़त है, इससे इबादत की शक्ति प्राप्त होती है, शरीर के अंदर चुस्ती आती है, भूख से पैदा होने वाला दुराचार दूर होता है, यह सहरी के समय मांगने वाले या आपके साथ सहरी खाने आने वाले को दान देने का कारण बनती है, दुआ की स्वीकृति के समय ज़िक्र एवं दुआ का सबब है और जिसने सोने से पहले रोज़े की नीयत नहीं की, उसे नीयत करने का एक अवसर प्रदान करती है।
  3. अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के शिक्षा देने का सुंदर तरीक़ा कि आप आदेश के साथ उसकी हिकमत भी बयान कर देते थे, ताकि दिल संतुष्ट हो जाए और शरीयत की बुलंदी समझ में आए।
  4. इब्न-ए-हजर कहते हैं : खान-पान की कोई भी थोड़ी-सी चीज़ खा-पी लेने से सहरी हो जाती है।
हवाला

صحيح البخاري (3/ 29) (1923). صحيح مسلم (2/ 770) (1095). تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص317). تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، لابن عثيمين (3/ 416).

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मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दो सहाबी ऐसे हैं जो नेकी के काम में कोताही नहीं करते।

عن أبي عطية، قال: دخلت أنا ومسروق على عائشة رضي الله عنها ، فقالَ لها مسروقٌ: رجلانِ من أصحابِ محمدٍ صلى الله عليه وسلم كِلاَهُمَا لا يَألُو عَنِ الخَيْرِ؛ أحَدُهُمَا يُعَجِّلُ المَغْرِبَ وَالإفْطَارَ، وَالآخر يؤخِّر المغرب وَالإفْطَارَ؟ فَقَالَتْ: مَنْ يُعَجِّلُ المَغْرِبَ وَالإفْطَار؟ قالَ: عبدُ اللهِ -يعني: ابن مسعود- فقالتْ: هَكذا كانَ رسولُ اللهِ يَصْنَعُ.
अबू अतिय्या कहते हैं कि मैं और मसरूक़, उम्मुल मोमिनीन आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) के पास पहुँचे तो मसरुक़ ने उनसे कहाः मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दो सहाबी ऐसे हैं, जो नेकी के काम में कोताही नहीं करते, लेकिन एक मग़्रिब की नमाज़ पढ़ने और इफ़तार करने में जल्दी करते हैं और दूसरे मग़्रिब की नमाज़ देर से पढ़ते तथा इफ़तार देर से करते हैं। उन्होंने पूछाः कौन मग़्रिब की नमाज़ पढ़ने और इफ़तार करने में जल्दी करता है? मसरुक़ ने कहाः अब्दुल्लाह (बिन मसऊद)। उन्होंने कहाः अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ऐसा ही करते थे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين، نشر: دار الوطن للنشر، الرياض، الطبعة: 1426هـ. رياض الصالحين، للنووي، تحقيق: ماهر الفحل، دار ابن كثير - بيروت، الطبعة الأولى، 1428هـ - 2007م. صحيح مسلم, ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي, دار إحياء التراث العربي, بيروت. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415هـ. تطريز رياض الصالحين، لفيصل بن عبد العزيز المبارك النجدي، تحقيق: عبد العزيز آل حمد, دار العاصمة, الطبعة الأولى، 1423هـ. كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا - الطبعة الأولى، 1430هـ.

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हमारे और अह्ले किताब के रोज़ों में अंतर, सहरी खाना है।

عن عمرو بن العاص رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «فَصْلُ مَا بَيْنَ صِيَامِنَا وصِيَامِ أهْلِ الكِتَابِ، أكْلَةُ السَّحَرِ».
अम्र बिन आस (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः हमारे और अह्ले किताब (यहूदी और ईसाई) के रोज़ों में अंतर सहरी खाना है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमारे और यहूदियों एवं ईसाइयों के रोज़ों का एक स्पष्ट अंतर बताया है। यह अंतर है वह खाना, जो मुसलमान सहरी के समय खाते हैं। क्योंकि अह्ल-ए-किताब सहरी नहीं करते और मुसलमानों के लिए अह्ल-ए-किताब की मुख़ालफ़त और सुन्नत के अनुपालन में सहरी करना मुसतहब है। इसमें बरकत एवं भलाई भी है, जैसा कि सुन्नत से साबित है। अह्ल-ए-किताब रोज़े का आरंभ आधी रात से करते हैं। वे आधी रात से पहले खा लेते हैं और सहरी के समय कुछ नहीं खाते। ज्ञात हो कि मुसलमानों एवं काफ़िरों के बीच अंतर शरीयत में एक वांछित वस्तु है।

हवाला

- شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين، نشر: دار الوطن للنشر، الرياض، الطبعة: 1426ه. - رياض الصالحين، للنووي، تحقيق: ماهر الفحل، دار ابن كثير - بيروت، الطبعة الأولى، 1428ه- 2007م. - صحيح مسلم, ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي, دار إحياء التراث العربي, بيروت. - نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين, مؤسسة الرسالة, الطبعة الرابعة عشر, 1407ه. - كنوز رياض الصالحين، نشر: دار كنوز إشبيليا، الطبعة الأولى، 1430ه - 2009م. - بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415ه. - المنهاج شرح صحيح مسلم بن الحجاج، للنووي، دار إحياء التراث العربي - بيروت، الطبعة الثانية، 1392.

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अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नमाज़ से पहले कुछ ताज़ा खुज़ूर खाकर इफ़तार करते थे।

عن أنس بن مالك رضي الله عنه قال: كان رسولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يُفطِر قبْل أن يصلي على رُطَبات، فإن لم تكنْ رُطَباتٌ فَتُمَيْراتٌ، فإن لم تكنْ تُمَيْراتٌ، حَسَا حَسَواتٍ مِن ماء.
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नमाज़ से पहले कुछ ताज़ा खुज़ूर खाकर इफ़तार करते थे। अगर ताज़ा ख़ुजूर न मिलती तो सूखी खुजूर ले लेते। अगर सूखी खुजूर भी न मिलती तो कुछ घोंट पानी पी लेते थे।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन
हवाला

سنن الترمذي، للإمام محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق أحمد شاكر وآخرين، مكتبة الحلبي - مصر، الطبعة الثانية، 1388هـ. رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير - دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. سلسلة الأحاديث الصحيحة، للشيخ محمد ناصر الدين الألباني، مكتبة المعارف - الرياض، 1415هـ. شرح رياض الصالحين، للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. فيض القدير شرح الجامع الصغير، تأليف عبدالرؤوف المناوي، دار الحديث - القاهرة. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة - بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. سنن أبي داود, أبو داود سليمان بن الأشعث السِّجِسْتاني, المحقق: محمد محيي الدين عبد الحميد, المكتبة العصرية، صيدا – بيروت. مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة الأولى، 1421هـ - 2001م. فيض القدير شرح الجامع الصغير, زين الدين محمد المدعو علي بن زين العابدين, الناشر: المكتبة التجارية الكبرى - مصر, الطبعة الأولى، 1356. زاد المعاد في هدي خير العباد, ابن قيم الجوزية, الناشر: مؤسسة الرسالة، بيروت - مكتبة المنار الإسلامية، الكويت, الطبعة: السابعة والعشرون, 1415هـ - 1994م.

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जो किसी रोज़ेदार को इफ़तार करवाता है, उसे भी रोज़ा रखने वाले के समान पुण्य मिलता है

عن زيد بن خالد الجهني رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: «مَنْ فَطَّرَ صائمًا، كان له مِثْلُ أجْرِهِ، غَيْرَ أنَّهُ لاَ يُنْقَصُ مِنْ أجْرِ الصَّائِمِ شَيْءٌ».
ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जो किसी रोज़ेदार को इफ़तार करवाता है, उसे भी रोज़ा रखने वाले के समान नेकी मिलती है और रोज़ेदार की नेकी में कोई कमी नहीं की जाती है।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में रोज़ेदार को इफ़तार कराने की फ़ज़ीलत बयान की गई है, इस कार्य की प्रेरणा दी गई है और यह बताया गाय है कि जिसने किसी रोज़ेदार को इफ़तार कराया, उसके लिए रोज़ेदार के बराबर नेकी लिखी जाती है, लेकिन इससे रोज़ेदार की नेकी में कोई कटौती नहीं होती। यह दरअसल अल्लाह का अपने बंदों पर एक बड़ा अनुग्रह है, क्योंकि इसमें नेकी एवं धर्मपरायणता के कामों में परस्पर सहयोग और मुसलमानों के बीच प्रेम तथा सहजीवन की भावना निहित है। इस हदीस के ज़ाहिर से मालूम होता है कि किसी रोज़ेदार को इफ़तार कराने मात्र से, चाहे एक खजूर के द्वारा ही क्यों न हो, रोज़ेदार के बराबर सवाब मिल जाता है। इसलिए इन्सान को चाहिए कि जहाँ तक हो सके, रोज़ेदारों को इफ़तार कराने का प्रयास करे, विशेष रूप से उस समय जब रोज़ेदारों को इसकी ज़रूरत हो और वे निर्धन हों या फिर रोज़ेदार के पास इफ़तार का सामान तैयार करने के लिए आदमी न हो।

हवाला

- الجامع الصحيح –وهو سنن الترمذي-؛ للإمام محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق أحمد شاكر وآخرين، مكتبة الحلبي-مصر، الطبعة الثانية، 1388هـ. - رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. - سنن ابن ماجه؛ للحافظ محمد بن يزيد القزويني، حققه محمد فؤاد عبدالباقي، دار إحياء الكتب العربية. - شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. - المسند؛ للإمام أحمد بن حنبل، نشر المكتب الإسلامي-بيروت، مصور عن الطبعة الميمنية. - مسند الدارمي –المعروف بـ: سنن الدارمي-؛ للإمام عبدالله بن عبدالرحمن الدارمي، تحقيق حسين سليم، دار المغني-الرياض، الأولى، 1421هـ. - مشكاة المصابيح؛ تأليف محمد بن عبدالله التبريزي، تحقيق محمد ناصر الدين الألباني، المكتب الإسلامي-بيروت، الطبعة الثانية، 1399هـ. - مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م. - بهجة الناظرين, وهي كالتالي: بهجة الناظرين, سليم بن عيد الهلالي، الناشر: دار ابن الجوزي ، سنة النشر: 1418 هـ- 1997م. - دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين, محمد علي بن محمد البكري الصديقي الشافعي, اعتنى بها: خليل مأمون شيحا, الناشر: دار المعرفة للطباعة والنشر والتوزيع، بيروت – لبنان, الطبعة: الرابعة، 1425 هـ - 2004 م. - نزهة المتقين شرح رياض الصالحين, مصطفى سعيد الخن، مصطفى البغا، محي الدين مستو، علي الشربجي، محمد أمين لطفي, مؤسسة الرسالة, سنة النشر: 1407 – 1987.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com