अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सहरी करने के लिए प्रेरित किया है। सहरी कहते हैं रोज़े की तैयारी के तौर पर रात के अंतिम भाग में खाने को। प्रेरित करने का कारण यह है कि उसमें बड़ा प्रतिफल तथा सवाब, रात के अंतिम भाग में दुआ के लिए जागने, रोज़ा रखने की शक्ति प्राप्त करने, अपने अंदर रोज़े के लिए चुस्ती पैदा करने और रोज़े की मशक़्क़त को कम करने जैसी चीज़ें पाई जाती हैं।
- शरई निर्देश का पालन करते हुए सहरी करना मुसतहब है।
- इब्न-ए-हजर फ़त्ह अल-बारी में लिखते हैं : सहरी की बरकत विभिन्न दिशाओं से प्राप्त होती है। सहरी करना सुन्नत का अनुपालन है, अह्ल-ए-किताब की मुख़ालफ़त है, इससे इबादत की शक्ति प्राप्त होती है, शरीर के अंदर चुस्ती आती है, भूख से पैदा होने वाला दुराचार दूर होता है, यह सहरी के समय मांगने वाले या आपके साथ सहरी खाने आने वाले को दान देने का कारण बनती है, दुआ की स्वीकृति के समय ज़िक्र एवं दुआ का सबब है और जिसने सोने से पहले रोज़े की नीयत नहीं की, उसे नीयत करने का एक अवसर प्रदान करती है।
- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के शिक्षा देने का सुंदर तरीक़ा कि आप आदेश के साथ उसकी हिकमत भी बयान कर देते थे, ताकि दिल संतुष्ट हो जाए और शरीयत की बुलंदी समझ में आए।
- इब्न-ए-हजर कहते हैं : खान-पान की कोई भी थोड़ी-सी चीज़ खा-पी लेने से सहरी हो जाती है।
صحيح البخاري (3/ 29) (1923). صحيح مسلم (2/ 770) (1095). تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص317). تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، لابن عثيمين (3/ 416).