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तशरीह के साथ हदीसें

वज़ू की फ़ज़ीलत

7 हदीसें

क़यामत के दिन मोमिन का ज़ेवर वहाँ तक पहुँचेगा, जहाँ तक वज़ू का पानी का पहुँचेगा।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : ((إن أمتي يُدْعَون يوم القيامة غُرًّا مُحَجَلِّين من آثار الوُضُوء)). فمن اسْتَطَاع منكم أن يُطِيل غُرَّتَه فَليَفعل. وفي لفظ لمسلم: ((رأَيت أبا هريرة يتوضَّأ، فغسل وجهه ويديه حتى كاد يبلغ المنكبين، ثم غسل رجليه حتى رَفَع إلى السَّاقين، ثم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: إنَّ أمتي يُدْعَون يوم القيامة غُرًّا مُحَجَّلِين من آثار الوُضُوء)) فمن استطاع منكم أن يطيل غُرَّتَه وتَحْجِيلَه فَليَفعَل. وفي لفظ لمسلم: سمعت خليلي صلى الله عليه وسلم يقول: ((تَبْلُغ الحِليَة من المؤمن حيث يبلغ الوُضُوء)).
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "मेरी उम्मत को क़यामत के दिन इस अवस्था में पुकारा जाएगा कि वज़ू के निशानों के कारण उनके चेहरे और हाथ-पाँव चमक रहे होंगे।" अतः, तुममें से जो अपनी इस चमक को बढ़ा सकता है, वह ऐसा ज़रूर करे। तथा मुस्लिम की एक रिवायत के शब्द हैंः मैंने अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) को वज़ू करते हुए देखा। उन्होंने अपने चेहरे तथा दोनों हाथों को धोया, तो लग रहा था कि (हाथों को धोते हुए) कंधों तक पहुँच जाएँगे। फिर अपने पैरों को धोया और पिंडली तक चले गए। उसके बाद कहाः मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुना हैः "मेरी उम्मत के लोग क़यामत के दिन इस अवस्था में पुकारे जाएँगे कि वज़ू के निशानों के कारण उनके चेहरे तथा हाथ-पाँव चमक रहे होंगे।" अतः, तुममें से जो अपनी इस चमक तथा ज़ेवर को बढ़ा सकता है, वह ऐसा ज़रूर करे।" तथा मुस्लिम ही की एक रिवायत के शब्द हैंः मैंने अपने प्रिय मित्र (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते सुना हैः "क़यामत के दिन मोमिन का ज़ेवर वहाँ तक पहुँचेगा, जहाँ तक वज़ू का पानी का पहुँचेगा।"
इसे इमाम मुस्लिम ने दोनों रिवायतों के साथ नक़ल किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपनी उम्मत को खुशख़बरी दी है कि अल्लाह तआला क़यामत के दिन उन्हें अन्य उम्मतों के बीच एक सम्मानसूचक निशानी प्रदान करेगा। जब उन्हें उस दिन पुकारा जाएगा और वह सारी सृष्टियों के सामने उपस्थित होंगे, तो उनके चेहरे, हाथ और पाँव चमक रहे होंगे। यह चमक उन्हें वुज़ू जैसी महत्वपूर्ण इबादत के कारण प्राप्त होगी, जिसके माध्यम से वे अपने शरीर के इन अंगों को अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए और उसके प्रतिफल की उम्मीद में बार-बार धोया करते थे। इसी के बदले में उन्हें यह प्रशंसनाीय विशेषता प्राप्त होगी। फिर अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैंः "जो इस चमक को बढ़ा सकता है, वह इसे ज़रूर बढ़ाए।" इसलिए कि वुज़ू के समय धोए जाने वाले अंगों के जितने अधिक भाग को धोया जाएगा, उतनी ही अधिक चमक प्राप्त होगी। लेकिन जायज़ सिर्फ़ इतना है कि वुज़ू में दोनों हाथों को कोहनियों समेत, बाज़ू के कुछ भाग को लेते हुए धोए। इसी तरह दोनों पैरों को टखनों समेत पिंडलियों के कुछ भागों को लेते हुए धोए। वुज़ू में बाज़ू तथा पिंडली को न धोया जाए। दूसरी रिवायत में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत किया गया है कि क़यामत के दिन मोमिन का गहना वहाँ तक होगा, जहाँ तक वुज़ू का पानी पहुँचता है।

हवाला

الإلمام بشرح عمدة الأحكام لإسماعيل الأنصاري، ط1، دار الفكر، دمشق، 1381هـ. تأسيس الأحكام للنجمي، ط2، دار علماء السلف، 1414هـ. تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ. تنبيه الأفهام شرح عمدة لأحكام لابن عثيمين، ط1، مكتبة الصحابة، الإمارات، 1426هـ. عمدة الأحكام من كلام خير الأنام -صلى الله عليه وسلم- لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408 هـ. شرح العمدة للسعدي، قيده عنه تلميذه: عبد الله العوهلي، تقديم: عبد الله بن عبد العزيز العقيل، تحقيق: أنس بن عبد الرحمن بن عبد الله العقيل، ط1، دار التوحيد، الرياض، 1431هـ. صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ.

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शैतान तुममें से हर व्यक्ति के सर के पीछ रात में सोते समय तीन गाँठ लगा देता है और हर गाँठ पर यह कहकर फूँक मारता है कि सो जा, अभी रात बहुत बाक़ी है।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «يَعْقِدُ الشَّيْطَانُ عَلَى قَافِيَةِ رَأْسِ أَحَدِكُمْ إِذَا هُوَ نَامَ ثَلاَثَ عُقَدٍ يَضْرِبُ كُلَّ عُقْدَةٍ عَلَيْكَ لَيْلٌ طَوِيلٌ، فَارْقُدْ، فَإِنِ اسْتَيْقَظَ فَذَكَرَ اللَّهَ، انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ، فَإِنْ تَوَضَّأَ انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ، فَإِنْ صَلَّى انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ، فَأَصْبَحَ نَشِيطًا طَيِّبَ النَّفْسِ، وَإِلَّا أَصْبَحَ خَبِيثَ النَّفْسِ كَسْلاَنَ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "शैतान तुममें से हर व्यक्ति के सर के पीछ रात में सोते समय तीन गाँठ लगा देता है और हर गाँठ पर यह कहकर फूँक मारता है कि सो जा, अभी रात बहुत बाक़ी है। फिर अगर आदमी जागकर अल्लाह को याद करने लगे, तो एक गाँठ खुल जाती है। फिर अगर वज़ू कर ले तो एक और गाँठ खुल जाती है। फिर अगर नमाज़ पढ़ ले तो एक और गाँठ भी खुल जाती है। इस तरह सुबह के समय आदमी चुस्त और प्रफुल्लित रहता है। वरना, उदास और सुस्त रहता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जब इन्सान तहज्जुद या फ़ज्र की नमाज़ के लिए उठना चाहता है, तो किस तरह शैतान उसे रोकने का प्रयास करता है। एक मोमिन जब सोता है, तो शैतान उसके सर के पिछले भाग में तीन गाँठ लगा देता है। ऐसे में जब वह जाग कर अल्लाह को याद करता है और शैतान द्वारा डाले गए ख़्यालों को रास्ता रोकने नहीं देता, तो एक गाँठ खुल जाती है। उसके बाद अगर वज़ू करता है, तो दूसरी गाँठ खुल जाती है। फिर अगर उठकर नमाज़ पढ़ता है, तो तीसरी गाँठ भी खुल जाती है। फलस्वरूप इन्सान भरपूर ऊर्जा के साथ और प्रसन्नचित होकर सुबह करता है कि उसे अल्लाह की ओर से इबादत का सुयोग प्राप्त हुआ, वह प्रतिफल एवं क्षमा के अल्लाह के किए हुए वादा और इस बात से ख़ुश रहता है कि शैतान द्वारा उसे इबादत से रोकने के प्रयास नाकाम हो गए। इसके विपरीत अगर वह इबादत के लिए खड़ा नहीं हुआ, तो उसकी सुबह उदासी एवं सुस्ती के साथ होती है। अच्छे कामों में उसका मन नहीं लगता। क्योंकि दरअसल वह शैतानी की ज़ंजीर में जकड़ा हुआ है और कृपावान् अल्लाह की दया से दूर हो जाता है।

फ़ायदे
  1. शैतान का प्रयास हमेशा यह रहता है कि अल्लाह की इबादत की राह में रुकावट खड़ी की जाए। और बंदा शैतान के हथकंडों से उसी समय बच सकता है, जब अल्लाह से मदद माँगे और सुरक्षा साधानों को अपनाए।
  2. अल्लाह का ज़िक्र और उसकी इबादत इन्सान के अंदर चुस्ती एवं प्रसन्नता लाती है, उसे हार्दिक खुशी देती है, सुस्ती और आलस्य को दूर करती है तथा चिंता और आक्रोश को खत्म करती है। क्योंकि ज़िक्र और इबादत शैतान को दूर भगाते हैं, जबकि उपर्युक्त बातें शैतान के प्रयासों का नतीजा हुआ करती हैं।
  3. मोमिन अल्लाह की ओर से इबादत का सुयोग मिलने पर ख़ुश और वह सद्गुण और पूर्णता की प्राप्ती में अपनी कमियों के कारण उदास हो जाता है।
  4. नेकी के कामों से दूरी और उनसे अचेतना में शैतान का हाथ होता है।
  5. यह तीन चीज़ें -अल्लाह का ज़िक्र, वज़ू और नमाज़- शैतान को दूर भगाने का काम करती हैं।
  6. शैतान द्वारा सर के पिछले भाग ही में गाँठें इसलिए लगाई जाती हैं कि वही सारी शक्तियों का केंद्र है और वहीं से पूरे शरीर की व्यवस्था संचालित होती है। अतः वहाँ गाँठ लगा देने के बाद इन्सान की आत्मा पर क़ब्ज़ा जमाना और उसपर नींद थोंपना आसान हो जाता है।
  7. इब्न-ए-हज़र असक़लानी कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्दों "अलैका लैलुन" में रात का ज़िक्र बज़ाहिर यह बतलाता है कि यह बात रात की नींद के साथ खास है।
  8. इब्न-ए-हजर असक़लानी कहते हैं : ज़िक्र के लिए कोई चीज़ इस तरह निश्चित नहीं है कि दूसरी चीज़ प्रयाप्त न हो। हर वह चीज़ काफ़ी है, जो "अल्लाह के ज़िक्र" के दायरे में आती हो। इसमें क़ुर्आन की तिलावत, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस पढ़ना और शरई ज्ञान प्राप्त करने में व्यस्त रहना भी शामिल हैं। अलबत्ता सबसे अच्छा यह है कि अल्लाह का ज़िक्र उस हदीस में आए हुए शब्दों द्वारा किया जाए, जिसके शब्द इस प्रकार हैं : "जो व्यक्ति रात में जाग जाए और यह दुआ पढ़े : अल्लाह के सिवा कोई इबादत का हक़दार नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, राज्य उसी का है, सारी प्रशंसा उसी की है और वह हर बात की क्षमता रखता है। सारी प्रशंसा अल्लाह ही की है, अल्लाह की हस्ती पवित्र है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह की मदद के बिना न किसी के पास गुनाह से बचने की शक्ति है और न नेकी करने की क्षमता।) फिर कहे : ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे। या कोई और दुआ करे, तो उसकी दुआ क़बूल होती है। फिर अगर वह वज़ू करे (और नमाज़ पढ़े), तो नमाज़ भी क़बूल होती है।" इस हदीस को इमाम बुख़ारी ने रिवायत किया है।
हवाला

صحيح البخاري (2/ 52) (1142). صحيح مسلم (1/ 538) (776). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 328). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 834). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (15/ 305). فتح الباري شرح صحيح البخاري، لأحمد العسقلاني (10/ 564). طرح التثريب في شرح التقريب، العراقي (3/ 82).

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जो अच्छी तरह वज़ू करता है, उसके जिस्म से पाप निकल जाते हैं, यहाँ तक कि नाख़ून के नीचे से भी निकल जाते हैं।

عن عثمان بن عفان رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «مَنْ تَوَضَّأَ فَأَحْسَنَ الْوُضُوءَ خَرَجَتْ خَطَايَاهُ مِنْ جَسَدِهِ حَتَّى تَخْرُجَ مِنْ تَحْتِ أَظْفَارِهِ».
उसमान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो अच्छी तरह वज़ू करता है, उसके जिस्म से पाप निकल जाते हैं, यहाँ तक कि नाख़ून के नीचे से भी निकल जाते हैं।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जो वज़ू की सुन्नतों और आदाब का ख़्याल रखते हुए वज़ू करता है, तो इसके नतीजे में उसके गुनाह धो दिए जाते हैं। यहाँ तक कि उसके हाथ तथा पैरों के नाखूनों के नीचे से भी गुनाह निकल जाते हैं।

फ़ायदे
  1. वज़ू, उसकी सुन्नतों और आदाब को सीखने तथा उनपर अमल करने की प्रेरणा।
  2. वज़ू की फ़ज़ीलत तथा उसका छोटे गुनाहों को मिटा दिए जाने का सबब होना। रही बात बड़े गुनाहों की, तो उनके लिए तौबा ज़रूरी है।
  3. गुनाहों के निकलने के लिए शर्त यह है कि वज़ू को अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बताए हुए तरीक़े के मुताबिक़ संपूर्ण तरीक़े से किया जाए और उसमें कोई कमी रहने न दिया जाए।
  4. इस हदीस में गुनाहों की माफ़ी की बात कबीरा गुनाहों से बचने और उनसे तौबा करने के साथ जुड़ी हुई है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "यदि तुम, उन बड़े पापों से बचते रहे, जिनसे तुम्हें रोका जा रहा है, तो हम तुम्हारे (छोटे) गुनाहों को क्षमा कर देंगे।" [सूरा अल-निसा : 31]
हवाला

صحيح مسلم (1/ 216) (245). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 9). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمصطفى الخِن وغيره (2/ 763). بهجة الناظرين، سليم الهلالي (2/ 247).

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जिस ने इस प्रकार वज़ू किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं

عن عثمان بن عفان رضي الله عنه قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم توضأ مِثل وُضوئي هذا، ثم قال: «مَنْ تَوَضَّأ هكَذَا، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ، وَكَانَتْ صَلاَتُهُ وَمَشْيُهُ إِلَى المَسْجدِ نَافِلَةً».
उस़मान बिन अफ़्फ़ान (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मेरी तरह वज़ू करते हुए देखा फिर आपने फ़रमायाः जिसने इस प्रकार वज़ू किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं और उसकी नमाज़ तथा मस्जिद चल कर जाने का सवाब उसके अलावा है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. صحيح مسلم، المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين, محمد علي بن محمد البكري الصديقي الشافعي, اعتنى بها: خليل مأمون شيحا, الناشر: دار المعرفة للطباعة والنشر والتوزيع، بيروت – لبنان, الطبعة: الرابعة، 1425 هـ - 2004 م. بهجة الناظرين, سليم بن عيد الهلالي، الناشر: دار ابن الجوزي ، سنة النشر: 1418 هـ- 1997.

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पवित्रता आधा ईमान है, अल-हम्दु लिल्लाह तराज़ू को भर देता है, सुबहानल्लाह और अल-हम्दु लिल्लाह दोनों मिलकर आकाश एवं धरती के बीच के खाली स्थान को भर देते हैं

عن أبي مالكٍ الأشعريِّ رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «الطُّهُورُ شَطْرُ الْإِيمَانِ، وَالْحَمْدُ لِلهِ تَمْلَأُ الْمِيزَانَ، وَسُبْحَانَ اللهِ وَالْحَمْدُ لِلهِ تَمْلَآنِ -أَوْ تَمْلَأُ- مَا بَيْنَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ، وَالصَّلَاةُ نُورٌ، وَالصَّدَقَةُ بُرْهَانٌ، وَالصَّبْرُ ضِيَاءٌ، وَالْقُرْآنُ حُجَّةٌ لَكَ أَوْ عَلَيْكَ، كُلُّ النَّاسِ يَغْدُو، فَبَايِعٌ نَفْسَهُ فَمُعْتِقُهَا أَوْ مُوبِقُهَا».
अबू मालिक अशअरी रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "पवित्रता आधा ईमान है, अल-हम्दु लिल्लाह तराज़ू को भर देता है, सुबहानल्लाह और अल-हम्दु लिल्लाह दोनों मिलकर आकाश एवं धरती के बीच के खाली स्थान को भर देते हैं, नमाज़ नूर है, सदक़ा प्रमाण है, धैर्य प्रकाश है और क़ुरआन तुम्हारे लिए या तुम्हारे विरुद्ध प्रमाण है। प्रत्येक व्यक्ति जब रोज़ी की खोज में सुबह निकलता है, तो अपने नफ़्स को बेचता है। चुनांचे वह उसे आज़ाद करता है या उसका विनाश करता है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि ज़ाहिरी शरीर की तहारत (पवित्रता) वज़ू एवं ग़ुस्ल (स्नान) के द्वारा प्राप्त होती है। तहारत नमाज़ की एक शर्त है। अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि अल्लाह की प्रशंसा करना और उसे संपूर्णता पर आधारित गुणों से परिपूर्ण मानना है, इसे कहना क़यामत के दिन वज़न किया जाएगा और यह कर्मों के तराज़ू को भर देगा। सुबहानल्लाह तथा अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि दरअसल अल्लाह को हर कमी से पवित्र घोषित करना और उसे संपूर्णता के ऐसे गुणों से परिपूर्ण मानना है, जो उसके प्रताप के अनुरूप हैं, इन दोनों वाक्यों को कहना और साथ में अल्लाह से प्रेम तथा उसका सम्मान करना, आकाशों एवं ज़मीन के बीच के स्थान को भर देता है। नमाज़ बंदे के लिए नूर है, जो उसके दिल में मौजूद रहता है, उसके चेहरे पर प्रकट होता है, उसकी क़ब्र को रौशन रखता है और दोबारा जीवित होकर उठते समय उसका साथ देगा। सदक़ा बंदे के सच्चे मोमिन होने का प्रमाण है, और उसके मुनाफ़िक़ से अलग होने का प्रमाण है, जो सदक़ा के प्रतिफल पर विश्वास न होने के कारण सदक़ा नहीं करता। सब्र (धैर्य) प्रकाश है। सब्र, अधीर होने और नाराज़ होने से बचने का नाम है। नूर ऐसे प्रकाश को कहते हैं, जिसमें गर्मी और जलाने की विशेषता होती है। जैसे सूरज का प्रकाश। सब्र को नूर इसलिए कहा गया है कि सब्र करना एक कठिन कार्य है और इसके लिए नफ़्स से लड़ने और उसे उसकी पसंद से रोकने की ज़रूरत होती है। सब्र करने वाला इन्सान हमेशा सच्चाई के आलोकित मार्ग पर चलता रहता है। यहाँ सब्र से मुराद उसके तीनों प्रकार यानी अल्लाह के आज्ञापालन पर डटे रहना, उसकी अवज्ञा से बचते रहना और मुसीबतों तथा दुनिया के हादसों (दुर्घटनाओं) का धैर्य के साथ मुक़ाबला करना है। क़ुरआन की तिलावत और उसमें लिखी हुई बातों का अनुपालन तुम्हारे लिए दलील है। जबकि क़ुरआन पर अमल न करना या उसकी तिलावत न करना तुम्हारे विरुद्ध दलील है। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि सारे लोग जब नींद से जागते हैं, विभिन्न कार्यों के लिए अपने घरों निकल पड़ते हैं। ऐसे में कुछ लोग अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करके खुद को आग से आज़ाद कर लेते हैं। जबकि कुछ लोग इससे विचलित हो जाते हैं, गुनाहों में पड़ जाते हैं और आग में प्रवेश करने का सामान करके खुद को विनष्ट कर लेते हैं।

फ़ायदे
  1. तहारत के दो प्रकार हैं। एक ज़ाहिरी (प्रत्यक्ष) तहारत, जो वज़ू एवं स्नान से प्राप्त होती है और दूसरा बातिनी (परोक्ष) तहारत, जो तौहीद (एकेश्वरवाद), ईमान और अच्छे कर्म से प्राप्त होती है।
  2. नमाज़ की पाबंदी करने का महत्व। क्योंकि नमाज़ बंदे के लिए दुनिया में तथा क़यामत के दिन प्रकाश है।
  3. सदक़ा सच्चे ईमान का प्रमाण है।
  4. क़ुरआन पर अमल करने और उसे सच्ची किताब मानने का महत्व। इससे क़ुरआन इन्सान के पक्ष में प्रमाण बन जाता है। उसके विरुद्ध नहीं।
  5. नफ़्स (आत्मा, मन) अगर अल्लाह के आज्ञापालन में न लगाया जाए, वह इन्सान को अल्लाह की अवज्ञा में लगा देता है।
  6. हर इन्सान कोई न कोई काम ज़रूर करता है। काम चाहे अल्लाह को राज़ी करने वाला हो, जो उसे जहन्नम से मुक्ति प्रदान करता है या उसे नाराज़ करने वाला, जो उसका विनाश कर देता है।
  7. सब्र के लिए सहन शक्ति तथा आत्म मूल्यांकन की ज़रूरत होती है, जो कि एक कठिन कार्य है।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 203) (223)، شرح الأربعين لابن دقيق العيد (ص 84)، شرح الأربعين النووية للعثيمين (ص: 231)، الرياض الزكية شرح الأربعين النووية للخضير (ص 293)، فتح القوي المتين في شرح الأربعين للعباد (ص 79)

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अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर नमाज़ के लिए वज़ू कर लिया करते थे

عن عَمْرُو بْنُ عَامِرٍ عَنْ ‌أَنَس بن مالك قَالَ: كَانَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَتَوَضَّأُ عِنْدَ كُلِّ صَلَاةٍ، قُلْتُ: كَيْفَ كُنْتُمْ تَصْنَعُونَ؟ قَالَ: يُجْزِئُ أَحَدَنَا الْوُضُوءُ مَا لَمْ يُحْدِثْ.
अम्र बिन आमिर का वर्णन है कि अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा है : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर नमाज़ के लिए वज़ू कर लिया करते थे। मैंने पूछा : आप लोग क्या करते थे? उन्होंने उत्तर दिया : हमारे लिए वज़ू उस समय तक काफ़ी हो जाता था, जब तक वज़ू भंग न हो जाए।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर फ़र्ज़ नमाज़ के लिए वज़ू कर लिया करते थे, चाहे वज़ू न भी टूटे। ऐसा आप सवाब तथा प्रतिफल प्राप्त करने के लिए करते थे। यह अलग बात है कि जब तक वज़ू न टूटे इन्सान एक ही वज़ू से एक से अधिक फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ सकता है।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अधिकतर हर नमाज़ के लिए वज़ू कर लिया करते थे। क्योंकि यही सबसे संपूर्ण तरीक़ा है।
  2. हर नमाज़ के समय वज़ू करना मुसतहब (वांछित) है।
  3. एक वज़ू से एक से अधिक नमाज़ें पढ़ना जायज़ है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 53) (214)، شرح ابن بطّال (1/321)، إرشاد الساري لشرح صحيح البخاري (1/ 285).

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“तहारत (पवित्रता) आधा ईमान है। ‘अल-हमदु लिल्लाह’ तराज़ू को भर देगा। ‘सुबहान अल्लाह’ और ‘अल-हमदु लिल्लाह’ आकाश और धरती के बीच के ख़ाली स्थानों को भर देंगे

عَنْ أَبِي مَالِكٍ الحَارِثِ بْنِ عَاصِمٍ الأَشْعَرِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «الطُّهُورُ شَطْرُ الْإِيمَانِ، وَالْحَمْدُ لِلهِ تَمْلَأُ الْمِيزَانَ، وَسُبْحَانَ اللهِ وَالْحَمْدُ لِلهِ تَمْلَآنِ -أَوْ تَمْلَأُ- مَا بَيْنَ السَّمَاءِ وَالأَرْضِ، وَالصَّلَاةُ نُورٌ، وَالصَّدَقَةُ بُرْهَانٌ، وَالصَّبْرُ ضِيَاءٌ، وَالْقُرْآنُ حُجَّةٌ لَكَ أَوْ عَلَيْكَ، كُلُّ النَّاسِ يَغْدُو، فَبَايِعٌ نَفْسَهُ فَمُعْتِقُهَا أَوْ مُوبِقُهَا»
अबू मालिक अशअरी -रज़ियल्लाहु अनहु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : “तहारत (पवित्रता) आधा ईमान है। ‘अल-हमदु लिल्लाह’ तराज़ू को भर देगा। ‘सुबहान अल्लाह’ और ‘अल-हमदु लिल्लाह’ आकाश और धरती के बीच के ख़ाली स्थानों को भर देंगे। नमाज़ प्रकाश है। सदक़ा प्रमाण है। क़ुरआन तेरे हक़ में अथवा तेरे विरुद्ध प्रमाण है। प्रत्येक व्यक्ति जब सुबह को निकलता है, तो अपने नफ़्स का सौदा करता है। चुनांचे या तो उसे आज़ाद करता है या उसे हलाक करता है।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि ज़ाहिरी शरीर की तहारत (पवित्रता) वज़ू एवं ग़ुस्ल (स्नान) के द्वारा प्राप्त होती है। तहारत नमाज़ की एक शर्त है। अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि अल्लाह की प्रशंसा करना और उसे संपूर्णता पर आधारित गुणों से परिपूर्ण मानना है, इसे कहना क़यामत के दिन वज़न किया जाएगा और यह कर्मों के तराज़ू को भर देगा। सुबहानल्लाह तथा अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि दरअसल अल्लाह को हर कमी से पवित्र घोषित करना और उसे संपूर्णता के ऐसे गुणों से परिपूर्ण मानना है, जो उसके प्रताप के अनुरूप हैं, इन दोनों वाक्यों को कहना और साथ में अल्लाह से प्रेम तथा उसका सम्मान करना, आकाशों एवं ज़मीन के बीच के स्थान को भर देता है। नमाज़ बंदे के लिए नूर है, जो उसके दिल में मौजूद रहता है, उसके चेहरे पर प्रकट होता है, उसकी क़ब्र को रौशन रखता है और दोबारा जीवित होकर उठते समय उसका साथ देगा। सदक़ा बंदे के सच्चे मोमिन होने का प्रमाण है, और उसके मुनाफ़िक़ से अलग होने का प्रमाण है, जो सदक़ा के प्रतिफल पर विश्वास न होने के कारण सदक़ा नहीं करता। सब्र (धैर्य) प्रकाश है। सब्र, अधीर होने और नाराज़ होने से बचने का नाम है। नूर ऐसे प्रकाश को कहते हैं, जिसमें गर्मी और जलाने की विशेषता होती है। जैसे सूरज का प्रकाश। सब्र को नूर इसलिए कहा गया है कि सब्र करना एक कठिन कार्य है और इसके लिए नफ़्स से लड़ने और उसे उसकी पसंद से रोकने की ज़रूरत होती है। सब्र करने वाला इन्सान हमेशा सच्चाई के आलोकित मार्ग पर चलता रहता है। यहाँ सब्र से मुराद उसके तीनों प्रकार यानी अल्लाह के आज्ञापालन पर डटे रहना, उसकी अवज्ञा से बचते रहना और मुसीबतों तथा दुनिया के हादसों (दुर्घटनाओं) का धैर्य के साथ मुक़ाबला करना है। क़ुरआन की तिलावत और उसमें लिखी हुई बातों का अनुपालन तुम्हारे लिए दलील है। जबकि क़ुरआन पर अमल न करना या उसकी तिलावत न करना तुम्हारे विरुद्ध दलील है। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि सारे लोग जब नींद से जागते हैं, विभिन्न कार्यों के लिए अपने घरों निकल पड़ते हैं। ऐसे में कुछ लोग अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करके खुद को आग से आज़ाद कर लेते हैं। जबकि कुछ लोग इससे विचलित हो जाते हैं, गुनाहों में पड़ जाते हैं और आग में प्रवेश करने का सामान करके खुद को विनष्ट कर लेते हैं।

फ़ायदे
  1. तहारत के दो प्रकार हैं। एक ज़ाहिरी (प्रत्यक्ष) तहारत, जो वज़ू एवं स्नान से प्राप्त होती है और दूसरा बातिनी (परोक्ष) तहारत, जो तौहीद (एकेश्वरवाद), ईमान और अच्छे कर्म से प्राप्त होती है।
  2. नमाज़ की पाबंदी करने का महत्व। क्योंकि नमाज़ बंदे के लिए दुनिया में तथा क़यामत के दिन प्रकाश है।
  3. सदक़ा सच्चे ईमान का प्रमाण है।
  4. क़ुरआन पर अमल करने और उसे सच्ची किताब मानने का महत्व। इससे क़ुरआन इन्सान के पक्ष में प्रमाण बन जाता है। उसके विरुद्ध नहीं।
  5. नफ़्स (आत्मा, मन) अगर अल्लाह के आज्ञापालन में न लगाया जाए, वह इन्सान को अल्लाह की अवज्ञा में लगा देता है।
  6. हर इन्सान कोई न कोई काम ज़रूर करता है। काम चाहे अल्लाह को राज़ी करने वाला हो, जो उसे जहन्नम से मुक्ति प्रदान करता है या उसे नाराज़ करने वाला, जो उसका विनाश कर देता है।
  7. सब्र के लिए सहन शक्ति तथा आत्म मूल्यांकन की ज़रूरत होती है, जो कि एक कठिन कार्य है।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 203) (223). شرح الأربعين لابن دقيق العيد (ص 84). شرح الأربعين النووية للعثيمين (ص: 231). الرياض الزكية شرح الأربعين النووية للخضير (ص 293). فتح القوي المتين في شرح الأربعين للعباد (ص 79).

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