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तशरीह के साथ हदीसें

वज़ू

42 हदीसें

जब तुममें से कोई वज़ू करे, तो अपनी नाक में पानी डालकर नाक झाड़े, और जो ढेलों से इस्तिंजा (शौच या मूत्र से पवित्रता अर्जन) करे, वह बेजोड़ (विषम) संख्या प्रयोग करे

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «إِذَا تَوَضَّأَ أَحَدُكُمْ فَلْيَجْعَلْ فِي أَنْفِهِ ثُمَّ لِيَنْثُرْ، وَمَنِ اسْتَجْمَرَ فَلْيُوتِرْ، وَإِذَا اسْتَيْقَظَ أَحَدُكُمْ مِنْ نَوْمِهِ فَلْيَغْسِلْ يَدَهُ قَبْلَ أَنْ يُدْخِلَهَا فِي وَضُوئِهِ، فَإِنَّ أَحَدَكُمْ لاَ يَدْرِي أَيْنَ بَاتَتْ يَدُهُ». ولفظ مسلم: «إِذَا اسْتَيْقَظَ أَحَدُكُمْ مِنْ نَوْمِهِ فَلَا يَغْمِسْ يَدَهُ فِي الْإِنَاءِ حَتَّى يَغْسِلَهَا ثَلَاثًا، فَإِنَّهُ لَا يَدْرِي أَيْنَ بَاتَتْ يَدُهُ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुममें से कोई वज़ू करे, तो अपनी नाक में पानी डालकर नाक झाड़े, और जो ढेलों से इस्तिंजा (शौच या मूत्र से पवित्रता अर्जन) करे, वह बेजोड़ (विषम) संख्या प्रयोग करे, और जब तुममें से कोई नींद से जागे, तो अपने हाथों को बरतन में डालने से पहले धो ले, क्योंकि तुममें से किसी को नहीं पता कि रात के समय उसका हाथ कहाँ-कहाँ गया है।" सहीह मुस्लिम के शब्द हैं : "जब तुममें से कोई नींद से जागे, तो अपने हाथ को बरतन में उस समय तक न डुबोए, जब तक उसे तीन बार न धो ले। क्योंकि उसे नहीं पता कि रात के समय उसका हाथ कहाँ-कहाँ गया है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

यहाँ अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पवित्रता प्राप्त करने के कुछ मसायल बयान किए हैं। जैसे : 1- वज़ू करने वाला अपनी नाक में साँस के साथ पानी चढ़ाए और फिर उसे साँस के साथ निकाल दे। 2- जो व्यक्ति पेशाब-पाखाने के बाद पानी की बजाय किसी और चीज़, जैसे पत्थर आदि के ज़रिए स्वच्छता प्राप्त करना चाहे, वह पत्थार आदि विषम संख्या में प्रयोग करे। कम से कम संख्या तीन हो और अधिक से अधिक उतनी, जिससे पेशाब-पाखाना आदि ख़त्म हो जाए और स्थान पाक हो जाए। 3- जो व्यक्ति रात को सोकर उठे, वह वज़ू के लिए अपना हाथ बरतन के अंदर उस समय तक न डाले, जब तक उसे बरतन से बाहर तीन बार धो न ले। क्योंकि उसे नहीं पता कि उसका हाथ रात में कहाँ-कहाँ गया होगा। ऐसे में उसके गंदा होने की संभावना रहती है। ऐसा भी हो सकता है कि उसके हाथ के साथ शैतान ने खेला हो और उसमें कोई ऐसी चीज़ लगा दी हो, जो इन्सान के लिए हानिकारक हो या पानी को ख़राब करने वाली हो।

फ़ायदे
  1. वज़ू करते समय साँस के माध्यम से नाक में पानी चढ़ाना और इसी तरह साँस के माध्यम से पानी बाहर निकालना वाजिब है।
  2. इस्तिंजा के लिए पत्थर विषम संख्या में प्रयोग करना मुसतहब है।
  3. रात में सोकर उठने के बाद दोनों हाथों को तीन बार धोना शरीयत सम्मत कार्य है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 43) (162). صحيح مسلم (1/ 233) (278). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص19). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 11).

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जब कोई मुस्लिम या मोमिन बंदा वज़ू करता है और अपना चेहरा धोता है, तो उसके चेहरे से वह सारे गुनाह पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ निकल जाते हैं, जो उसने अपनी आँखों से देखने के क्रम में किए थे।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضيَ اللهُ عنهُ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «إِذَا تَوَضَّأَ الْعَبْدُ الْمُسْلِمُ -أَوِ الْمُؤْمِنُ- فَغَسَلَ وَجْهَهُ خَرَجَ مِنْ وَجْهِهِ كُلُّ خَطِيئَةٍ نَظَرَ إِلَيْهَا بِعَيْنَيْهِ مَعَ الْمَاءِ -أَوْ مَعَ آخِرِ قَطْرِ الْمَاءِ-، فَإِذَا غَسَلَ يَدَيْهِ خَرَجَ مِنْ يَدَيْهِ كُلُّ خَطِيئَةٍ كَانَ بَطَشَتْهَا يَدَاهُ مَعَ الْمَاءِ -أَوْ مَعَ آخِرِ قَطْرِ الْمَاءِ-، فَإِذَا غَسَلَ رِجْلَيْهِ خَرَجَتْ كُلُّ خَطِيئَةٍ مَشَتْهَا رِجْلَاهُ مَعَ الْمَاءِ -أَوْ مَعَ آخِرِ قَطْرِ الْمَاءِ- حَتَّى يَخْرُجَ نَقِيًّا مِنَ الذُّنُوبِ».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जब कोई मुस्लिम या मोमिन बंदा वज़ू करता है और अपना चेहरा धोता है, तो उसके चेहरे से वह सारे गुनाह पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ निकल जाते हैं, जो उसने अपनी आँखों से देखने के क्रम में किए थे। फिर जब वह अपने हाथों को धोता है, तो पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ उसके हाथ के वह सारे गुनाह निकल जाते हैं, जो उसके हाथों के पकड़ने से हुए थे। फिर जब वह अपने पैरों को धोता है, तो पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ उसके पैरों से वह सारे गुनाह निकल जाते हैं, जिनकी ओर उसके पाँव चलकर गए थे। इस तरह वह गुनाहों से पवित्र होकर निकल जाता है।''
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि जब कोई मुसलमान या मोमिन वज़ू करता है और वज़ू करते समय अपने चेहरे को धोता है, तो उसके चेहरे से वह सारे छोटे गुनाह धोने के बाद गिरते हुए पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ निकल जाते हैं, जो उसने अपनी आँख से देखने के क्रम में किए थे। जब अपने दोनों हाथों को धोता है, तो उसके दोनों हाथों से वह सारे छोटे गुनाह पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ निकल जाते हैं, जो उसके हाथ से हुए थे। जब दोनों पैरों को धोता है, तो उसके पैरों से वह सारे छोटे गुनाह पानी के साथ या पानी की अंतिम पूँद के साथ निकल जाते हैं, जो उसके पैरों से चलने के क्रम में हुए थे। फलस्वरूप जब वज़ू पूरा होता है, तो छोटे गुनाहों से साफ़-सुथरा होकर निकल जाता है।

फ़ायदे
  1. वज़ू में रहने की फ़ज़ीलत। वज़ू गुनाहों का कफ़्फ़ारा बनता है।
  2. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नेकी के कामों और इबादतों का प्रतिफल बयान करके उनके लिए प्रेरित किया करते थे।
  3. इन्सान के शरीर के हर अंग से कुछ न कुछ गुनाह हो जाया करते हैं और ये गुनाह उन अंगों से लगे रहते हैं तथा तौबा कर लेने के बाद उनसे निकल जाते हैं।
  4. वज़ू करते समय, शरीर के अंगों को धोने से इंद्रियों की शुद्धि होती है और साथ ही विभिन्न अंगों के माध्यम से किए गए पापों से आध्यात्मिक शुद्धि भी प्राप्त होती है।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 215) (244). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (3/ 108). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 181). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 208). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 157).

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जब तुममें से किसी का वज़ू टूट जाए, तो जब तक वज़ू न कर ले, अल्लाह उसकी नमाज़ ग्रहण नहीं करता।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ: «لَا يَقْبَلُ اللهُ صَلَاةَ أَحَدِكُمْ إِذَا أَحْدَثَ حَتَّى يَتَوَضَّأَ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुममें से किसी का वज़ू टूट जाए, तो जब तक वज़ू न कर ले, अल्लाह उसकी नमाज़ ग्रहण नहीं करता।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि नमाज़ के सटीक होने की एक शर्त तहारत (पवित्रता) है। अतः जिस व्यक्ति का पेशाब, पाखाना एवं नींद आदि के कारण वज़ू टूट जाए और वह नमाज़ पढ़ना चाहे, तो उसपर वज़ू करना वाजिब होगा।

फ़ायदे
  1. नापाकी की हालत में नमाज़ ग्रहण नहीं होती, जब तक कि बड़ी नापाकी की अवस्था में स्नान और छोटी नापाकी की अवस्था में वज़ू न कर लिया जाए।
  2. वज़ू नाम है मुँह में पानी डालकर उसे मुँह के अंदर घुमाने, फिर साँस के साथ नाक में पानी चढ़ाने, फिर उसे निकाल बाहर करने और नाक झाड़ने, फिर चेहरे को तीन बार धोने, फिर दोनों हाथों को कोहनियों सहित तीन बार धोने, फिर पूरे सर का एक बार मसह (अर्थात पानी के साथ स्पर्श) करने और फिर दोनों पैरों को टखनों समेत तीन बार धोने का।
हवाला

صحيح البخاري (9/ 23) (6954). صحيح مسلم (1/ 204) (225). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص17). تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (1/ 11).

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ऐ आइशा ! मेरी आंखें तो सो जाती हैं मगर मेरा दिल नहीं सोता।

عن أبي سَلمة بن عبد الرحمن، أنه أخْبَره: أنه سَأل عائشة رضي الله عنها ، كيف كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان؟ فقالت: «ما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يَزيد في رمضان ولا في غَيره على إحدى عَشرة ركعة يصلِّي أربعا، فلا تَسَل عن حُسْنِهِنَّ وَطُولِهِنَّ، ثم يصلِّي أربعا، فلا تَسَل عن حُسْنِهِنَّ وَطُولِهِنَّ، ثم يصلَّي ثلاثا». قالت عائشة: فقلت يا رسول الله: أتنام قبل أن توتر؟ فقال: «يا عائشة إن عَيْنَيَّ تَنَامَانِ ولا يَنام قَلْبِي»
अबू सलमा बिन अब्दुर्रहमान से रिवायत है, वह बताते हैं कि उन्होंने आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- से पूछा कि रमज़ान में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ कैसी होती थी? उन्होंने फ़रमाया : “रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान में और रमज़ान के अलावा दिनों में ग्यारह रकअत से ज़्यादा नहीं पढ़ते थे, पहली चार रकअतें ऐसी पढ़ते कि उनकी ख़ूबसूरती और लम्बाई के बारे में न पूछो और फिर आप चार रकअतें ऐसी ही पढ़ते कि उनकी ख़ूबसूरती और लम्बाई की हालत मत पूछो । फिर तीन रकअत पढ़ते थे ।” आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ! क्या आप वित्र पढ़ने से पहले सोते रहते हैं ? तो आपने फ़रमाया : “मेरी आंखें तो सो जाती हैं मगर मेरा दिल नहीं सोता।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस बात से सब लोग अवगत थे कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रमज़ान का महीना हो कि कोई और महीना, रात में उठकर नमाज़ें पढ़ा करते थे। यही कारण है कि अबू सलमा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने रमज़ान की रातों में पढ़ी जाने वाली नमाज़ के बारे में पूछा कि रमज़ान में आपकी रात की नमाज़, राकतों की संख्या के मामले में अन्य महीनों की तरह ही होती थी या फिर कुछ अलग होती थी? इसका उत्तर आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने यह दिया कि आपकी रमज़ान तथा अन्य महीनों की रात की नमाज़ के बीच कोई अंतर नहीं है। क्योंकि आप आम तौर पर ग्यारह रकात पढ़ा करते थे और इससे अधिक नहीं पढ़ते थे। फिर उन्होंने अबू सलमा -रज़ियल्लाहु अनहु- को आपकी रात की नमाज़ की कैफ़ियत बताते हुए फ़रमाया : "पहले चार रकात पढ़ते" इसका मतलब यह है कि पहले दो रकात पढ़ने के बाद सलाम फेर देते और उसके बाद दो रकात पढ़कर सलाम फेरते। क्योंकि स्वयं आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने इस हदीस में संक्षिप्त रूप से कही गई बात की व्याख्या अपनी एक अन्य हदीस में कर दी है, जो सहीह मुस्लिम में मौजूद है। वह कहती हैं : "अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इशा की नमाज़ पढ़ने के बाद से फ़ज़्र तक ग्यारह रकात पढ़ते थे। इस दौरान हर दो रकात के बीच सलाम फेरते थे और एक रकात वित्र पढ़ते थे।" जबकि एक अन्य हदीस में है : "रात की नमाज़ दो-दो रकात है।" यह हदीस सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में वर्णित है। "तुम उनकी सुन्दरता तथा लम्बाई के बारे में न पूछो।" यानी उनकी कैफ़ियत मत पूछो। वह श्रेष्ट क़िरात तथा क़याम, रुकू एवं सजदे की लम्बाई में बड़ी ही सुंदर एवं संपूर्ण हुआ करती थीं। इसी तरह अंतिम चार रकातों को भी दो-दो रकात पढ़ा करते थे और श्रेष्ठ क़िरात तथा क़याम, रुकू एवं सजदे की लम्बाई में उनकी सुंदरता अद्भुत हुआ करती थी। "फिर तीन रकात पढ़ते थे।" इन शब्दों का ज़ाहिर यह बताता है कि आप तीन रकात लगातार पढ़ते थे और उनके बीच में सलाम नहीं फेरते थे। लेकिन आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- की दूसरी रिवायत ने स्पष्ट कर दिया है कि आप दो रकात के बाद सलाम फेर देते थे और उसके बाद एक रकात वित्र पढ़ते थे। उस रिवायत के शब्द हैं : "आप हर दो रकात के बाद सलाम फेरते और एक रकात वित्र पढ़ते थे।" यह हदीस इस बात का प्रमाण है कि आप तीन रकात वित्र पढ़ते समय बीच में सलाम फेरते थे। "आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा- फ़रमाती हैं कि मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम! क्या आप वित्र पढ़ने से पहले सोते हैं?" यानी आप वित्र पढ़ने से पहले कैसे सोते हैं? "तो आपने फ़रमाया : ऐ आइशा! मेरी आँखें तो सो जाती हैं, मगर मेरा दिल नहीं सोता।" इसका अर्थ यह है कि जिस तरह आपकी आँखें अनुपस्थित हो जाती हैं, उस तरह आपका दिल अनुस्थित नहीं होता। आप सब कुछ अनुभव तथा महसूस करते हैं। मसलन आपको सोने की अवस्था में भी समय का ध्यान तथा उसकी पहचान रहती थी। यही कारण है कि नबियों का स्वप्न वह्य हुआ करता था।

हवाला

صحيح البخاري، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى، 1422هـ صحيح مسلم ، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. سبل السلام شرح بلوغ المرام، تأليف : محمد بن إسماعيل بن صلاح الصنعاني، الناشر: دار الحديث الطبعة: بدون طبعة وبدون تاريخ توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن بن صالح البسام، الناشر: مكتبة الأسدي، مكة المكرّمة الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام، تأليف: صالح بن فوزان بن عبد الله الفوزان، الطبعة: الأولى، 1427 ه _ 2006 م فتح ذي الجلال والإكرام، شرح بلوغ المرام، تأليف: محمد بن صالح بن محمد العثيمين، الناشر: المكتبة الإسلامية، تحقيق: صبحي بن محمد رمضان، وأُم إسراء بنت عرفة.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com