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तशरीह के साथ हदीसें

जनता पर इमाम (शासनाध्यक्ष) का अधिकार

19 हदीसें

जब अल्लाह तआला, शासक या अधिकारी के साथ भलाई का इरादा करता है, तो उसे सच्चा सहायक प्रदान करता है, जो भूलने पर याद दिलाता है और याद रहने पर सहायता करता है। परन्तु, जब इसके विपरीत इरादा करता है, तो उसे बुरा सहायक प्रदान करता है, जो न भूलने पर याद दिलाता है, न याद रहने पर सहायता करता है

عن عائشة رضي الله عنها مرفوعًا: «إِذَا أَرَادَ اللهُ بِالأمِيرِ خَيرًا، جَعَلَ لَهُ وَزِيرَ صِدقٍ، إِنْ نَسِيَ ذَكَّرَهُ، وَإِنْ ذَكَرَ أَعَانَهُ، وَإِذَا أَرَادَ بِهِ غَيرَ ذَلِكَ جَعَلَ لَهُ وَزِيرَ سُوءٍ، إِنْ نَسِيَ لَمْ يُذَكِّرهُ، وَإِنْ ذَكَرَ لَمْ يُعِنْهُ».
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से मरफ़ूअन वर्णन करते हुए कहती हैं कि जब अल्लाह तआला किसी शासक या अधिकारी के साथ भलाई का इरादा करता है, तो उसे सच्चा सहायक प्रदान करता है, जो भूलने पर याद दिलाता है और याद रहने पर सहायता करता है। परन्तु, जब इसके विपरीत इरादा करता है, तो उसे बुरा सहायक प्रदान करता है, जो न भूलने पर याद दिलाता है, न याद रहने पर सहायता करता है।
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الدمام، الطبعة: الأولى 1415هـ. تطريز رياض الصالحين، فيصل بن عبد العزيز المبارك، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة للنشر والتوزيع، الرياض، الطبعة: الأولى 1423هـ، 2002م. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، محمد علي بن البكري بن علان، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة، بيروت، الطبعة: الرابعة 1425هـ. رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، أبو زكريا محيي الدين النووي، تحقيق ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، الطبعة: الأولى 1428هـ. صحيح الترغيب والترهيب، محمد ناصر الدين الألباني، مكتبة المعارف، الرياض، الطبعة: الخامسة. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الرابعة عشر، 1407هـ، 1987م.

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अल्लाह ने जितने भी नबी भेजे और जितने भी शासक बनाए, सबके दो प्रकार के सलाहकार होते हैं; एक वह सलाहकार जो भलाई का आदेश देता है और उसकी प्रेरणा देता है। दूसरा वह सलाहकार जो बुराई का आदेश देता है और उसी का प्रोत्साहन देता है

عن أبي سعيد الخدري وأبي هريرة رضي الله عنهما مرفوعاً: "ما بعث الله من نبي ولا اسْتَخْلَفَ من خليفة إلا كانت له بطانتان: بطانة تأمره بالمعروف وتَحُضُّهُ عليه، وبطانة تأمره بالشر وتَحُضُّهُ عليه، والمعصوم من عصم الله".
अबू सईद ख़ुदरी और अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहुमा) अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से वर्णन करते हुए कहते हैंः अल्लाह ने जितने भी नबी भेजे और जितने भी शासक बनाए, सबके दो प्रकार के सलाहकार होते हैं; एक वह सलाहकार जो भलाई का आदेश देता है और उसकी प्रेरणा देता है। दूसरा वह सलाहकार जो बुराई का आदेश देता है और उसी का प्रोत्साहन भी देता है। बच वही पाता है, जिसे अल्लाह बचा ले।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الطبعة: الأولى 1418 هـ، 1997م. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الرابعة عشر، 1407هـ، 1987م. رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، أبو زكريا محيي الدين النووي، تحقيق ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، الطبعة: الأولى 1428هـ، 2007م. شرح رياض الصالحين، محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ.

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कोई वस्तु माँगने में हद से ज्यादा आग्रह मत करो। क्योंकि तुममें से कोई व्यक्ति जब मुझसे कोई चीज़ माँगता है और मुझे पसंद न होेने के बावजूद उसका सवाल मुझेस कोई वस्तु निकाल लेता है, तो मेरी दी हुई चीज़ में बरकत नहीं दी जाती।

عن معاوية بن أبي سفيان رضي الله عنهما قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «لا تُلْحِفُوا في المسأَلة، فوالله لا يَسْألني أحدٌ منكم شيئًا، فَتُخْرِجَ له مسألته منِّي شيئًا وأنا له كارِهٌ، فيُبَارَك له فيما أَعْطَيتُه».
मुआविया बिन अबू सुफ़यान- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "कोई वस्तु माँगते हुए हद से ज्यादा आग्रह मत करो, क्योंकि तुममें से कोई व्यक्ति जब मुझसे कोई चीज़ माँगता है और मुझे पसंद न होेने के बावजूद उसका सवाल मुझेस कोई वस्तु निकाल लेता है, तो मेरी दी हुई चीज़ में बरकत नहीं दी जाती।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

كنوز رياض الصالحين، تأليف: حمد بن ناصر بن العمار، الناشر: دار كنوز أشبيليا، الطبعة الأولى: 1430 هـ مرعاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، تأليف: عبيد الله بن محمد المباركفوري، الناشر: إدارة البحوث العلمية والدعوة والإفتاء، الطبعة: الثالثة - 1404 هـ بهجة الناظرين، تأليف: سليم بن عيد الهلالي، نسخة الكترونية ، لا يوجد بها بيانات نشر. صحيح مسلم، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. نزهة المتقين، تأليف: جمعٌ من المشايخ، الناشر: مؤسسة الرسالة ، الطبعة الأولى : 1397 هـ الطبعة الرابعة عشر 1407 هـ رياض الصالحين، تأليف: محيي الدين يحيى بن شرف النووي ، تحقيق: د. ماهر بن ياسين الفحل ، الطبعة: الأولى، 1428 هـ.

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धर्म, शुभचिंतन का नाम है

عن تميم الداري رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «الدِّينُ النَّصِيحَةُ» قُلْنَا: لِمَنْ؟ قَالَ: «لِلهِ وَلِكِتَابِهِ وَلِرَسُولِهِ وَلِأَئِمَّةِ الْمُسْلِمِينَ وَعَامَّتِهِمْ».
तमीम दारी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "धर्म, शुभचिंतन का नाम है।" हमने कहा : किसका? तो फ़रमाया : "अल्लाह, उसकी किताब, उसके रसूल, मुसलमानों के मार्गदर्शकों और आम लोगों का।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि दीन का आधार निष्ठा और सत्य पर है। हर काम उसी तरह होना चाहिए, जिस तरह अल्लाह ने वाजिब किया है। कोई कोताही या धोखा नहीं होना चाहिए। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से किसी ने पूछा कि शुभचिंतन किसका होना चाहिए? तो आपने उत्तर दिया : 1- पवित्र एवं महान अल्लाह का शुभचिंतन : इसका मतलब यह है कि हम विशुद्ध रूप से उसी की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए काम करें, किसी को उसका साझी न बनाएँ, उसके रब तथा पूज्य होने और उसके नामों तथा गुणों पर विश्वास रखें, उसके आदेशों को सम्मान दें और उसके प्रति विश्वास रखने का आह्वान करें। 2- अल्लाह की किताब पवित्र क़ुरआन का शुभचिंतन : इसका मतलब यह है कि हम इस बात पर विश्वास रखें कि क़ुरआन अल्लाह की वाणी तथा उसका उतारा हुआ अंतिम ग्रंथ है और इसने पिछली तमाम शरीयतों को निरस्त कर दिया है। साथ ही हम इस किताब को सम्मान दें, उसकी उचित रूप से तिलावत करें, उसकी मुहकम (स्पष्ट अर्थ वाली) आयतों पर अमल करें और मुतशाबेह (अस्पष्ट अर्थ वाली) आयतों को स्वीकार करें, उसे आर्थिक छेड़-छाड़ करने वालों के हाथों से बचाएँ, उसकी नसीहतों से शिक्षा ग्रहण करें, उसके ज्ञान को फैलाएँ और उसकी ओर लोगों को बुलाएँ। 3- अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का शुभचिंतन : यानी हम इस बात का विश्वास रखें कि आप अंतिम रसूल हैं, आपकी लाई हुई शिक्षाओं को सच मानें, आपके आदेशों का पालन करें, आपकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहें, आपके बताए हुए तरीक़ों से ही अल्लाह की इबादत करें, आपको सम्मान दें, आपके आह्वान को फैलाएँ, आपकी शरीयत को आम करें और आपपर कोई आरोप लगाया जाए, तो उसका खंडन करें। 4- मुस्लिम शासकों का शुभचिंतन : इसका मतलब यह है कि हक़ पर उनका सहयोग किया जाए, उनके विरुद्ध विद्रोह न किया जाए और जब तक वे अल्लाह की आज्ञा अनुसार काम कर रहे हों, तो उनकी बात सुनी और मानी जाए। 5- आम मुसलमानों का शुभचिंतन : इसका मतलब है उनके साथ अच्छा बर्ताव करना और उनपर उपकार करना, उनको अच्छे काम का आह्वान करना, उनको कष्ट से बचाना, उनकी भलाई चाहना और नेकी तथा परहेज़गारी में उनके सहयोग से काम करना।

फ़ायदे
  1. सभी के लिए शुभचिंतन का आदेश।
  2. दीन में शुभचिंतन का महत्व।
  3. दीन का आस्थाओं, कथनों और कर्मों पर आधारित होना।
  4. शुभचिंतन के अंदर नफ़्स (मन) को अपने भाई के साथ धोखे से पाक करना और उसका भला चाहना भी शामिल है।
  5. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शिक्षा देने की उत्तम पद्धति कि पहले किसी चीज़ को संक्षिप्त रूप में बयान करते हैं और उसके बाद उसकी व्याख्या करते हैं।
  6. बात महत्व को ध्यान में रखते हुए क्रमवार करनी चाहिए। हम यहाँ देखते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पहले अल्लाह के शुभचिंतन की बात करते हैं, फिर अल्लाह के रसूल, फिर मुस्लिम शासकों और फिर आम मुसलमानों के शुभचिंतन की।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 74) (55). التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثا النووية (ص21). شرح الأربعين النووية، لابن عثيمين (ص115). شرح النووي على مسلم (2/ 37).

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वे तुम्हें नमाज़ पढ़ाएँगे; अब यदि सही-सही पढ़ाएँगे तो तुम्हारे लिए होगी और यदि ग़लती करेंगे तो तुम्हारे लिए सही और उनके विरुद्ध होगी।

عن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "يُصَلُّونَ لكم، فإن أصابوا فلكم، وإن أخطأوا فلكم وعليهم".
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः वे तुम्हें नमाज़ पढ़ाएँगे; अब यदि सही-सही पढ़ाएँगे तो तुम्हारे लिए होगी और यदि ग़लती करेंगे तो तुम्हारे लिए सही और उनके विरुद्ध होगी।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि कुछ इमाम यानी शासक होंगे, जो तुम्हें नमाज़ पढ़ाएँगे। अब यदि अच्छी तरह नमाज़ पढ़ाएँगे, तो तुम्हें और उनको दोनों को प्रतिफल मिलेगा और अगर बिगाड़कर पढ़ाएँगे, तो तुम्हें नमाज़ का प्रतिफल मिल जाएगा और उनको उसे बिगाड़ने का गुनाह होगा। यह बात यद्यपि शासकों के बारे में कही गई है, लेकिन इसमें मस्जिदों के इमाम भी शामिल हैं। हर इमाम को नमाज़ सही रूप से पढ़ने के अनुपात में पुण्य मिलेगा और उसे बिगाड़कर पढ़ने के अनुपात में गुनाह होगा। इस हदीस में इस बात की ओर इशारा है कि शासकों के मामले में धैर्य से काम लेना अनिवार्य है, यद्यपि वे गलत तरीक़े से तथा देर से नमाज़ पढ़ाएँ। इस तरह की परिस्थिति में हमारे ऊपर वाजिब होगा कि हम उनसे अलग न हों, बल्कि उनके साथ देर से ही नमाज़ पढ़ें। इस हालत में हमारा नमाज़ को उसके आरंभिक समय से विलंब करके पढ़ना उचित शरई कारण पर आधारित होगा। वह कारण है, जमात के साथ रहना और उससे अलग होकर बाहर निकल न जाना। लेकिन हमें इस विलंब के बावजूद आरंभिक समय में नमाज़ पढ़ने का प्रतिफल मिलेगा। हाँ, नमाज़ में विलंब करने की भी एक सीमा है और वह यह है कि नमाज़ का समय निकल न जाए। यहाँ यह याद रहे कि लोगों तथा शासकों से अलग होकर निकल जाना, उनसे दूरी बना लेना, उनके ख़िलाफ़ लोगों को भड़काना और उनकी बुराइयों को फैलाना, यह सारी बातें इस्लाम धर्म के विपरीत हैं।

हवाला

صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت. نزهة المتقين، تأليف: جمعٌ من المشايخ، الناشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة الأولى، 1397هـ، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. بهجة الناظرين، تأليف: سليم بن عيد الهلالي، الناشر: دار ابن الجوزي، سنة النشر: 1418هـ - 1997م. رياض الصالحين، تأليف: محيي الدين يحيى بن شرف النووي، تحقيق: د.ماهر بن ياسين الفحل، الطبعة الأولى، 1428هـ. شرح رياض الصالحين، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، الناشر: دار الوطن للنشر، الطبعة: 1426هـ. تطريز رياض الصالحين، لفيصل بن عبد العزيز المبارك النجدي, تحقيق: عبد العزيز آل حمد, دار العاصمة, الطبعة الأولى، 1423هـ. مجموع فتاوى العلامة عبد العزيز بن باز -رحمه الله- أشرف على جمعه وطبعه: محمد بن سعد الشويعر.

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सुनो और अनुसरण करो। उनपर उस बात की ज़िम्मेवारी है, जो उनके ऊपर डाली गई है और तुमपर उस बात की ज़िम्मेवारी है, जो तुमपर डाली गई है।

عَنْ وَائِلٍ الْحَضْرَمِيِّ قَالَ: سَأَلَ سَلَمَةُ بْنُ يَزِيدَ الْجُعْفِيُّ رضي الله عنه رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: يَا نَبِيَّ اللهِ، أَرَأَيْتَ إِنْ قَامَتْ عَلَيْنَا أُمَرَاءُ يَسْأَلُونَا حَقَّهُمْ وَيَمْنَعُونَا حَقَّنَا، فَمَا تَأْمُرُنَا؟ فَأَعْرَضَ عَنْهُ، ثُمَّ سَأَلَهُ، فَأَعْرَضَ عَنْهُ، ثُمَّ سَأَلَهُ فِي الثَّانِيَةِ أَوْ فِي الثَّالِثَةِ، فَجَذَبَهُ الْأَشْعَثُ بْنُ قَيْسٍ، وَقَالَ: «اسْمَعُوا وَأَطِيعُوا، فَإِنَّمَا عَلَيْهِمْ مَا حُمِّلُوا، وَعَلَيْكُمْ مَا حُمِّلْتُمْ».
वाइल हज़रमी कहते हैं कि सलमा बिन यज़ीद जोफ़ी रज़ियल्लाहु अनहु ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! अगर हमारे शासक ऐसे लोग बन जाएँ, जो अपना हक़ तो हमसे वसूल करें, लेकिन हमारा हक़ हमें न दें, तो आप इस विषय में हमें क्या निर्देश देते हैं? आपने उनकी बात पर ध्यान हीं दिया। उन्होंने दोबारा सवाल किया, आपने इस बार भी ध्यान नहीं दिया। उन्होंने फिर दूसरी या तीसरी बात सवाल किया, तो अशअस बिन क़ैस रज़ियल्लाहु अनहु ने उनको खींच लिया। अब आपने फ़रमाया : "सुनो और अनुसरण करो। उनपर उस बात की ज़िम्मेवारी है, जो उनके ऊपर डाली गई है और तुमपर उस बात की ज़िम्मेवारी है, जो तुमपर डाली गई है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से ऐसे शासकों के बारे में पूछा गया, जो लोगों को उनकी बात मानने और उनका अनुसरण करने को कहते हैं, लेकिन न्याय करने, ग़नीमत के धन का उचित बटवारा करने, अत्याचार से बचाने और सब को समान दृष्टि से देखने आदि अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करते। ऐसे शासकों के प्रति किस प्रकार का रवैया होना चाहिए? यह सवाल सुनने के बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सवाल करने वाले से मुँह फेर लिया। ऐसा लगा कि आपने इस सवाल को पसंद नहीं किया। लेकिन सवाल करने वाला अपना सवाल दूसरी बार और फिर तीसरी बार दोहराता रहा। यह देख अशअस बिन क़ैस रज़ियल्लाहु अनहु ने उनको ख़ामोश करने के लिए खींच लिया। यह सब कुछ होने के बाद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सवाल का जवाब दे दिया। फ़रमाया : तुम शासकों की बात मानो और उनके आदेशों का पालन करो। क्योंकि उनको न्याय स्थापित करने और आम लोगों को उनका अधिकार देने जैसी ज़िम्मेवारियों का जवाब देना है, जो उनके सर पर डाली गई हैं और तुमको उनके आदेशों का पालन करने, उनके अधिकार देने और परीक्षा के समय धैर्य से काम लेने जैसी ज़िम्मेवारियों का जवाब देना होगा, जो तुम्हारे सर पर डाली गई हैं।

फ़ायदे
  1. अल्लाह की प्रसन्नता वाले कामों में शासकों की बात हर हाल में सुनी जाएगी और उनका अनुसरण हर हाल में किया जाएगा, चाहे वह आम लोगों के अधिकार न भी देते हों।
  2. शासकों की ओर से आम लोगों के अधिकार की अदायगी में होने वाली कोताही इस बात की अनुमति नहीं देती कि आम लोग भी अपनी ज़िम्मेवारियों की अदायगी में कोताही बरतने लगें। क्योंकि हर इन्सान से ख़ुद उसके अमल के बारे में पूछा जाएगा और ख़ुद उसकी कोताहियों पर उसे पकड़ा जाएगा।
  3. दीन का आधार जैसे को तैसा के सिद्धांत पर नहीं बल्कि अपनी ज़िम्मेवारियाँ अदा करने पर रखा गया है। चाहे सामने वाला व्यक्ति अपनी ज़िम्मेवारियों की अदायगी में कोताही ही क्यों न करता हो। यही बात इस हदीस में कही गई है।
हवाला

صحيح مسلم (3/ 1474) (1846). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 719). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (3/ 664). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص432). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 553).

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तथा जो किसी इमाम की बैअत करे और उसे अपना हाथ तथा अपने दिल का फल दे दे, उसे चाहिए कि जहाँ तक हो सके, उसका अनुसरण करे। फिर अगर कोई दूसरा उसे अपने मातहत करने के लिए उससे झगड़ा करे, तो उसकी गरदन उड़ा दो।

عن عبد الله بن عمرو رضي الله عنهما قال: كنا مع رسول الله - صلى الله عليه وسلم- في سفر، فَنَزَلنَا مَنْزِلًا، فَمِنَّا مَنْ يُصلِح خِبَاءَه، ومِنَّا من يَنتَضِل، ومِنَّا مَن هو في جَشَرِهِ، إِذْ نادى مُنادي رسول الله صلى الله عليه وسلم : الصَّلاةُ جَامِعَةٌ. فاجْتَمَعنَا إلى رسول الله - صلى الله عليه وسلم - فقال: «إِنَّه لَمْ يَكُن نبي قبْلِي إِلاَّ كَان حَقًّا عليه أَنْ يَدُلَّ أُمَّتَه عَلَى خَيرِ مَا يَعْلَمُهُ لَهُم، ويُنذِرَهُم شّرَّ ما يعلمه لهم، وإِنَّ أُمَّتُكُم هذه جَعَل عَافِيَتَهَا في أوَّلِها، وَسَيُصِيبُ آخِرَهَا بَلاَءٌ وأُمُورٌ تُنكِرُونَهَا، وتَجِيءُ فِتنَةٌ يُرَقِّقُ بَعْضُهَا بَعضًا، وتَجِيءُ الفتنة فيقول المؤمن: هذه مُهلِكَتِي، ثُمَّ تَنْكَشِف، وتجيء الفتنة فيقول المؤمن: هَذِه هذِه. فمَنْ أَحَبَّ أنْ يُزَحْزَحَ عن النار، ويدخل الجنة، فَلْتَأْتِه مَنِيَتُهُ وهو يؤمن بالله واليوم الآخر، وَلْيَأتِ إِلى النَّاسِ الَّذِي يُحِبُّ أَنْ يُؤْتَى إليه، ومَنْ بَايَع إِمَامًا فَأَعْطَاه صَفْقَةَ يَدِهِ، وَثَمْرَةَ قلْبِهِ، فَلْيُطِعُه إِن اسْتَطَاع، فَإِن جَاء آخَرُ يُنَازِعُه فَاضْرِبُوا عُنُقَ الآخَرِ».
अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ एक सफ़र में थे। हमने एक स्थान में पड़ाव डाला, तो कोई ख़ेमा ठीक कर रहा था, कोई तीरंदाज़ी का मुक़ाबला कर रहा था और कोई अपने जानवरों के साथ था। इसी बीच अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तरफ़ से पुकारने वाले ने पुकारा कि नमाज़ खड़ी होने वाली है। चुनांचे, हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास एकत्र हुए, तो आपने फ़रमायाः "मुझसे पूर्व जो भी नबी आया, उसपर अनिवार्य था कि अपनी उम्मत को हर उस ख़ैर की राह दिखा दे, जिसे वह उनके लिए अच्छा जानता है और हर उस चीज़ से डराए, जिसे वह उनके लिए बुरा जानता है। और तुम्हारी इस उम्मत की आफ़ियत (कुशलता) उसके आरंभिक भाग में रख दी गई है। जबकि उसके अंतिम भाग में आज़माइशें और ऐसी बातें सामने आएँगी, जिन्हें तुम नापसंद करोगे। ऐसे फ़ितने सामने आएँगे, जो एक-दूसरे को हल्का कर देंगे। एक फ़ितना सामने आएगा, तो मोमिन कहेगाः यह मेरा विनाश का देगा। लेकिन वह दूर हो जाएगा। फिर दूसरा फ़ितना आएगा, तो मोमिन कहेगाः यही सबसे बड़ा फ़ितना है। अतः, जो यह पसंद करता हो कि उसे जहन्नम से दूर कर दिया जाए और जन्नत में दाख़िल कर दिया जाए, उसकी मौत इस अवस्था में आए कि वह अल्लाह तथा अंतिम दिवस पर ईमान रखता हो। तथा लोगों के साथ वही व्यवहार करे, जो अपने साथ किए जाने को पसंद करता हो। तथा जो किसी इमाम की बैअत करे और उसे अपना हाथ तथा अपने दिल का फल दे दे, उसे चाहिए कि जहाँ तक हो सके, उसका अनुसरण करे। फिर अगर कोई दूसरा उसे अपने मातहत करने के लिए उससे झगड़ा करे, तो उसकी गरदन उड़ा दो।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस से मालूम हुआ कि नबियों की तरह आह्वानकर्ताओं पर भी भलाई को स्पष्ट करना, उसकी प्रेरणा देना, उसकी ओर लोगों का मार्गदर्शन करना तथा इसी तरह बुराई को स्पष्ट करना और उससे सावधान करना अनिवार्य है। इस हदीस में एक अन्य बात यह बताई गई है कि इस उम्मत के आरंभिक काल के लोग आज़माइशों से सुरक्षित रहे, जबकि इसके अंतिम काल के लोगों को ऐसी बुराइयों एवं परीक्षाओं का सामना रहेगा कि बाद में आने वाले फ़ितनों के सामने पहले आने वाले फ़ितने बौने दिखाई देंगे। आगे बताया गया है कि इन फ़ितनों से मुक्ति एकेश्वरवाद, सुन्नत के अनुसरण, लोगों के साथ अच्छे व्यवहार, शासकों से की गई बैअत की पाबंदी, उसके विरुद्ध बग़ावत से गुरेज़ तथा मुसलमानों की एकता को भंग करने वालों से युद्ध के द्वारा मिल सकती है।

हवाला

- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428ه . - دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين؛ لمحمد بن علان الشافعي، دار الكتاب العربي-بيروت - بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي- الطبعة الأولى1418ه - نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. - صحيح البخاري –الجامع الصحيح-؛ للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. - صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. - شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. - كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا- الطبعة الأولى1430ه

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तुममें से जिसे मैं किसी प्रशासनिक काम की ज़िम्मेवारी दूँ, फिर उसने हमसे एक सूई या उससे भी छोटी चीज़ छिपाई, तो वह ख़यानत में शुमार होगा, जिसे लेकर वह क़यामत के दिन उपस्थित होगा।

عن عدي بن عميرة الكندي رضي الله عنه مرفوعاً: «من اسْتَعْمَلْنَاهُ منكم على عمل، فكَتَمَنَا مِخْيَطًا فما فوقه، كان غُلُولا يأتي به يوم القيامة». فقام إليه رجلٌ أسودُ من الأنصار، كأني أنظر إليه، فقال: يا رسول الله، اقبل عني عَمَلَكَ، قال: «وما لك؟» قال: سمعتك تقول كذا وكذا، قال: «وأنا أقوله الآن: من اسْتَعْمَلْنَاهُ على عمل فلْيَجِيْء بقليله وكثيره، فما أُوتِيَ منه أَخَذَ، وما نهي عنه انْتَهَى».
अदी बिन उमैर किंदी (रज़ियल्लाहु अंहु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हुए कहते हैंः "तुममें से जिसे मैं किसी प्रशासनिक काम की ज़िम्मेवारी दूँ, फिर उसने हमसे एक सूई या उससे भी छोटी चीज़ छिपाई, तो वह ख़यानत में शुमार होगा, जिसे लेकर वह क़यामत के दिन उपस्थित होगा।" यह सुन एक काला-कलौटा अंसारी आदमी आपके पास आया। ऐसा लग रहा है कि मैं उसे आज भी देख रहा हूँ। वह कहने लगाः ऐ अल्लाह के रसूल, आपने जो काम मुझे दिया था, उसे मुझसे वापस ले लें। आपने कहाः "ऐसा क्यों?" उसने कहाः मैंने आपको इस इस तरह की बात कहते सुना है। फ़रमायाः "वही बात मैं अब भी कह रहा हूँ; जिसे मैं किसी प्रशासनिक काम का ज़िम्मेवार बनाऊँ, तो वह कम तथा ज़्यादा सब कुछ लाकर रख दे। फिर उसमें से जो कुछ उसे दिया जाए, उसे ले ले और जिससे मना किया जाए, उससे दूर रहे।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

जिसे हम ज़कात अथवा ग़नीमत का धन अदा करने या इस प्रकार की कोई ज़िम्मेवारी दें और वह एक सूई या उससे भी कोई छोटी चीज़ छुपा ले, तो यह अमानत में ख़यानत है, और वह क़यामत के दिन उसे लेकर उपस्थित होगा। यह सुन एक अंसारी व्यक्ति खड़ा हुआ और आपसे आपकी ओर से सोंपी हुई ज़िम्मेवारी से खुद को अलग कर लेने की अनुमति माँगी, तो आपने उससे पूछा कि तुम ऐसा क्यों करना चाहते हो? जब उसने कहा कि इसका कारण वह चेतावनी है, जो मैंने आपको देते हुए सुना है, तो आपने फ़रमाया : मैं अब भी वही कहता हूँ; हम जिसे कोई ज़िम्मेवारी दें, वह थोड़ा हो कि ज़्यादा, सब कुछ लाकर सामने रख दे। फिर पारिश्रमिक के तौर पर उसे जितना दिया जाए, उसे ले ले और जिसे लेने से मना किया जाए और जिसका वह अधिकार न रखता हो, उसे न ले।

हवाला

دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لابن علان، نشر دار الكتاب العربي. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الرابعة عشر، 1407ه 1987م. كنوز رياض الصالحين، نشر: دار كنوز إشبيليا، الطبعة: الأولى، 1430ه 2009م. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، للهلالي، نشر: دار ابن الجوزي. المعجم الوسيط، نشر: دار إحياء التراث العربي، بيروت – لبنان، الطبعة: الثانية. سنن أبي داود، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد، نشر: المكتبة العصرية، صيدا – بيروت. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.

यह हदीस HadeethEnc.com पर
19 में से 8
19 हदीसें
  1. जब अल्लाह तआला, शासक या अधिकारी के साथ भलाई का इरादा करता है, तो उसे सच्चा सहायक प्रदान करता है, जो भूलने पर याद दिलाता है और याद रहने पर सहायता करता है। परन्तु, जब इसके विपरीत इरादा करता है, तो उसे बुरा सहायक प्रदान करता है, जो न भूलने पर याद दिलाता है, न याद रहने पर सहायता करता है
  2. अल्लाह ने जितने भी नबी भेजे और जितने भी शासक बनाए, सबके दो प्रकार के सलाहकार होते हैं; एक वह सलाहकार जो भलाई का आदेश देता है और उसकी प्रेरणा देता है। दूसरा वह सलाहकार जो बुराई का आदेश देता है और उसी का प्रोत्साहन देता है
  3. कोई वस्तु माँगने में हद से ज्यादा आग्रह मत करो। क्योंकि तुममें से कोई व्यक्ति जब मुझसे कोई चीज़ माँगता है और मुझे पसंद न होेने के बावजूद उसका सवाल मुझेस कोई वस्तु निकाल लेता है, तो मेरी दी हुई चीज़ में बरकत नहीं दी जाती।
  4. धर्म, शुभचिंतन का नाम है
  5. वे तुम्हें नमाज़ पढ़ाएँगे; अब यदि सही-सही पढ़ाएँगे तो तुम्हारे लिए होगी और यदि ग़लती करेंगे तो तुम्हारे लिए सही और उनके विरुद्ध होगी।
  6. सुनो और अनुसरण करो। उनपर उस बात की ज़िम्मेवारी है, जो उनके ऊपर डाली गई है और तुमपर उस बात की ज़िम्मेवारी है, जो तुमपर डाली गई है।
  7. तथा जो किसी इमाम की बैअत करे और उसे अपना हाथ तथा अपने दिल का फल दे दे, उसे चाहिए कि जहाँ तक हो सके, उसका अनुसरण करे। फिर अगर कोई दूसरा उसे अपने मातहत करने के लिए उससे झगड़ा करे, तो उसकी गरदन उड़ा दो।
  8. तुममें से जिसे मैं किसी प्रशासनिक काम की ज़िम्मेवारी दूँ, फिर उसने हमसे एक सूई या उससे भी छोटी चीज़ छिपाई, तो वह ख़यानत में शुमार होगा, जिसे लेकर वह क़यामत के दिन उपस्थित होगा।
  9. तुम (अपने शासकों की बात) सुनो और अनुसरण करो, कठिन परिस्थिति में भी तथा आसान परिस्थिति में भी, चाहते हुए भी तथा न चाहते हुए भी एवं उस समय भी जब तुमपर किसी और को तरजीह दी जाए।
  10. जब हम अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हाथ पर सुनने तथा आज्ञा का पालन पर बैअत करते, तो आप हमसे फ़रमाते : "जहाँ तक हो सके, इसका पालन करना।।”
  11. एक मुस्लिम व्यक्ति पर ज़रूरी है कि वह सुने और आज्ञा का पानल करे। चाहे उसे पसंद हो या नापसंद। यह और बात है कि उसे किसी गुनाह का आदेश दिया जाए। यदि उसे किसी गुनाह का आदेश दिया जाता है, तो सुनना और आज्ञा का पालन करना ज़रूरी नहीं है।
  12. जो सुलतान का अपमान करता है, वह अल्लाह का अपमान करता है।
  13. बात सुनो और अनुसरण करो, यद्यपि तुम्हारा शासक किसी हबशी दास ही को क्यों न बना दिया जाए, जिसका सर किशमिश की तरह हो।
  14. जिसने मेरी आज्ञा का पानल किया, उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया और जिसने मेरी अवज्ञा की, उसने अल्लाह की अवज्ञा की। जो अमीर की आज्ञा का पालन करता है, वह मेरी आज्ञा का पालन करता है और जो अमीर की अवज्ञा करता, वह मेरी अवज्ञा करता है।
  15. तुम्हारे सबसे अच्छे शासक वह हैं, जिन्हें तुम पसंद करते हो और वे तुम्हें पसंद करते हैं। इसी तरह, वे तुम्हारे लिए दया की प्रार्थना करते हैं और तुम उनके लिए दया की प्रार्थना करते हो। जबकि तुम्हारे सबसे बुरे शासक वह हैं, जिन्हें तुम नापसंद करते हो और वे तुम्हें नापसंद करते हैं। इसी तरह, तुम उनपर लानत भेजते हो और वे तुमपर लानत भेजते हैं।
  16. हम लोग जब अपने बादशाहों के पास जाते हैं, तो ऐसी बातें करते हैं, जो बातें वहाँ से निकलने के बाद नहीं करते। उन्होंने उत्तर दिया : हम इसे अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के युग में निफ़ाक़ -पाखंड तथा ढ़ोंग- समझते थे।
  17. तुम अल्लाह से डरते रहना और अपने शासकों के आदेश सुनना तथा मानना। चाहे शासक एक हबशी ग़ुलाम ही क्यों न हो। तुम मेरे बाद बहुत ज़्यादा मतभेद देखोगे। अतः तुम मेरी सुन्नत तथा नेक और सत्य के मार्ग पर चलने वाले ख़लीफ़ागण की सुन्नत पर चलते रहना।
  18. ऐसे लोग तुम्हारे शासक बन जाएँगे, जो झूठ बोलेंगे और अत्याचार करेंगे। ऐसे में जो उनके झूठ की पुष्टि करेगा और अत्याचार में उनका सहयोग करेगा, उसका मुझसे कोई संबंध नहीं है और मेरा उससे कोई संबंध नहीं है।
  19. मैं तुम्हें अल्लाह से डरने तथा (अपने शासनकर्ता की) बात सुनने और मानने की वसीयत करता हूँ, चाहे तुम्हारा शासक एक दास ही क्यों न हो। क्योंकि तुममें से जो जीवित रहेगा, वह बहुत सारा मतभेद और टकराव देखेगा। उस समय तुम मेरी सुन्नत और सत्य के मार्ग पर चलने वाले ख़लीफ़ागण की सुन्नत को सीने से लगाए रहना

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com