عن عبد الله بن عبَّاس رضي الله عنهما قال: «أُمِرَ الناس أن يكون آخر عَهْدِهِمْ بالبيت، إلا أنه خُفِّفَ عن المرأة الحائض».
अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है। वे कहते हैंः लोगों को आदेश दिया गया है कि उनका अंतिम कार्य काबा का तवाफ़ हो। हाँ, मगर माहवारी के दिनों वाली स्त्री के लिए आसानी रखी गई है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
पवित्र काबा बड़ा सम्मानित घर है। वह अल्लाह की इबादत और उसके सामने विनयपूर्वक खड़े होने का निशान है। लोगों के दिलों में उसका आदर, उससे संबंध और प्रेम रख दिया गया है।
यही कारण है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हज करने वाले को आदेश दिया कि वापसी से पहले उसका आख़िरी कार्य काबा का तवाफ़ हो। इस अंतिम तवाफ़ को 'तवाफ़-ए-वदा' कहा जाता है। अलबत्ता, माहवारी वाली स्त्री को तवाफ़ भी नहीं करना है और फ़िदया भी नहीं देना है; क्योंकि उसके प्रवेश करने से मस्जिद गंदी हो सकती है। लेकिन यह हदीस हज के बारे में है। इसमें उमरा शामिल नहीं है।
हवाला
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الأمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة 1426هـ.
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة، الإمارات، الطبعة: الأولى 1426هـ.
الإفهام في شرح عمدة الأحكام لابن باز، تحقيق: سعيد القحطاني، مؤسسة عبد العزيز بن باز الخيرية، الرياض، الطبعة: الأولى 1435هـ.
خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام، فيصل بن عبد العزيز المبارك، الطبعة: الثانية 1412هـ، 1992م.
صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ.
صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ.
تأسيس الأحكام، أحمد بن يحيى النجمي، دار المنهاج، القاهرة، الطبعة: الأولى.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي موسى الأشعري رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «إِذَا مَرِضَ الْعَبْدُ أَوْ سَافَرَ كُتِبَ لَهُ مِثْلُ مَا كَانَ يَعْمَلُ مُقِيمًا صَحِيحًا».
अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है,, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब बंदा बीमार होता है या यात्रा में निकलता है, तो उसके लिए उसी तरह की इबादतों का सवाब लिखा जाता है, जो वह घर में रहते तथा स्वस्थ रहते समय किया करता था।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यहाँ अल्लाह के एक अनुग्रह का उल्लेख कर रहे हैं। बता रहे हैं कि जब कोई मुसलमान स्वस्थ रहते हुए और घर में रहने की अवस्था में नियमित रूप से कोई काम करता रहा हो और फिर बीमारी के कारण वह उस काम को कर न पाए या सफ़र में निकलने की वजह से उसे छोड़ना पड़े या किसी भी मजबूरी के कारण उसे न कर सके, तो उसके लिए उतना ही सवाब लिखा जाएगा, जितना स्वस्थ होने या घर रहने पर उस काम को करने से मिलता।
फ़ायदे
- अल्लाह, बंदों पर बड़ा अनुग्रहशील है।
- नेकी के काम अधिक से अधिक करने और स्वास्थ्य तथा फ़ुर्सत को ग़नीमत जानने की प्रेरणा।
हवाला
صحيح البخاري (4/ 57) (2996).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 36).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 211).
بهجة قلوب الأبرار وقرة عيون الأخيار في شرح جوامع الأخبار، لعبد الرحمن السعدي (ص83).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أُبَيِّ بْنِ كَعْبٍ رَضيَ اللهُ عنه قَالَ: كَانَ رَجُلٌ لَا أَعْلَمُ رَجُلًا أَبْعَدَ مِنَ الْمَسْجِدِ مِنْهُ، وَكَانَ لَا تُخْطِئُهُ صَلَاةٌ، قَالَ: فَقِيلَ لَهُ: أَوْ قُلْتُ لَهُ: لَوْ اشْتَرَيْتَ حِمَارًا تَرْكَبُهُ فِي الظَّلْمَاءِ، وَفِي الرَّمْضَاءِ، قَالَ: مَا يَسُرُّنِي أَنَّ مَنْزِلِي إِلَى جَنْبِ الْمَسْجِدِ، إِنِّي أُرِيدُ أَنْ يُكْتَبَ لِي مَمْشَايَ إِلَى الْمَسْجِدِ، وَرُجُوعِي إِذَا رَجَعْتُ إِلَى أَهْلِي، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «قَدْ جَمَعَ اللهُ لَكَ ذَلِكَ كُلَّهُ».
उबै बिन काब- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मेरी जानकारी के अनुसार एक अंसारी का घर मस्जिद से सबसे ज़्यादा दूर था, परन्तु उनकी कोई नमाज़ नहीं छूटती थी। सो, उनसे कहा गया कि यदि आप एक गधा ख़रीद लें और अंधेरे तथा धूप की गर्मी के समय उसपर सवार होकर आएँ तो अच्छा हो। उन्होंने कहाः मुझे यह पसंद नहीं है कि मेरा घर मस्जिद के बगल में हो। मैं चाहता हूँ कि मैं जब मस्जिद आऊँ तो मेरा आना और जब घर वापस जाऊँ तो मेरा जाना लिखा जाए। इसपर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह ने तेरे लिए इन सब बातों को जमा कर दिया है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح مسلم (1/ 460) (663).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 162).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 199).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «إذا قَام أحَدُكُم من الليل، فَاسْتَعْجَمَ القرآن على لِسَانه، فلم يَدْرِ ما يقول، فَلْيَضْطَجِع».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "जब तुममें से कोई रात को नमाज़ पढ़े और उसकी ज़बान पर क़ुरआन ठीक से न आ रहा हो और उसे पता न चल रहा हो कि क्या कुछ पढ़ रहा है, तो सो जाए।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير - دمشق، الطبعة الأولى، 1428ه.
- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي- الطبعة الأولى 1418ه.
- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.
- صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ.
- كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا- الطبعة الأولى 1430ه.
- إِكمَالُ المُعْلِمِ بفَوَائِدِ مُسْلِم، لعياض بن موسى اليحصبي السبتي أبو الفضل - المحقق: الدكتور يحْيَى إِسْمَاعِيل - دار الوفاء للطباعة والنشر والتوزيع، مصر- الطبعة: الأولى، 1419 هـ - 1998 م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن جابر رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «ما من مسلم يَغرس غَرسا إلا كان ما أُكل منه له صدقة، وما سُرق منه له صدقة، ولا يَرْزَؤُهُ أحد إلا كان له صدقة».
وفي رواية: «فلا يَغرس المسلم غَرسا فيأكلَ منه إنسان ولا دَابَة ولا طير إلا كان له صدقة إلى يوم القيامة»، وفي رواية: «لا يَغرس مسلم غرسا، ولا يزرع زرعًا، فيأكل منه إنسان ولا دَابَة ولا شيء، إلا كانت له صدقة».
जाबिर- रज़ियल्ललाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जो मुसलमान कोई पेड़ लगाता है तो उससे जो कुछ खाया जाएगा वह उसके लिए सद्क़ा होगा, जो कुछ चुराया जाएगा वह उसके लिए सदक़ा होगा और जो कुछ किसी के द्वारा लिया जाएगा वह भी उसके लिए सदक़ा होगा।
तथा एक अनय रिवायत में है कि जो मुसलमान कोई पेड़ लगाता है और उससे कोई इंसान, चौपाया और पक्षी कुछ खाता है तो वह उसके लिए सद्क़ा होता है।
तथा एक और रिवायत में है कि जब कोई मुसलमान पेड़ लगाता है और खेती करता है तथा उससे कोई इंसान, चौपाया अथवा कोई और कुछ खाता है तो वह उसके लिए सद्क़ा होता है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
- صحيح البخاري، للإمام محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق محمد الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ.
- صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي.
- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي- الطبعة الأولى1418هـ.
- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشرة، 1407هـ.
- كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا- الطبعة الأولى1430هـ.
- دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لمحمد علي بن محمد الشافعي اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة للطباعة والنشر والتوزيع، بيروت – لبنان-الطبعة: الرابعة، 1425 هـ - 2004 م.
- شرح رياض الصالحين، للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ.
- الأدب النبوي، محمد عبد العزيز الخَوْلي، دار المعرفة -بيروت- الطبعة: الرابعة، 1423 هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «كُلُّ سُلاَمَى مِنَ النَّاسِ عَلَيْهِ صَدَقَةٌ، كُلَّ يَوْمٍ تَطْلُعُ فِيهِ الشَّمْسُ يَعْدِلُ بَيْنَ الِاثْنَيْنِ صَدَقَةٌ، وَيُعِينُ الرَّجُلَ عَلَى دَابَّتِهِ فَيَحْمِلُ عَلَيْهَا أَوْ يَرْفَعُ عَلَيْهَا مَتَاعَهُ صَدَقَةٌ، وَالكَلِمَةُ الطَّيِّبَةُ صَدَقَةٌ، وَكُلُّ خُطْوَةٍ يَخْطُوهَا إِلَى الصَّلاَةِ صَدَقَةٌ، وَيُمِيطُ الأَذَى عَنِ الطَّرِيقِ صَدَقَةٌ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "आदमी के हर एक जोड़ पर, हर रोज़ जिसमें सूरज निकलता है, सदक़ा है। दो व्यक्तियों के बीच न्याय करना सदक़ा है। किसी को उसके जानवर पर सवार होने में या उस पर उसका सामान लादने में मदद करना सदक़ा है, अच्छी बात सदक़ा है, नमाज़ की ओर उठने वाला हर क़दम सदक़ा है और रास्ते से कष्टदायक वस्तु को हटाना भी सदक़ा है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि शरीयत का पालन करने पर बाध्य हर मुसलमान को प्रत्येक दिन उसकी हड्डी के हर जोड़ के बदले में एक एक नफ़ली सदक़ा इस बात के शुक्र के तौर पर करना है कि उसने उसे स्वस्थ आकार दिया और उसकी हड्डियों के जोड़ बनाए, जिनके कारण शरीर के अंगों को फैलाना और समेटना संभव हो सका। यह सदक़ा सभी प्रकार के नकी के कामों से अदा हो सकता है। ज़रूरी नहीं है कि धन ही खर्च किया जाए। जैसे : दो झगड़ रहे व्यक्तियों के बीच न्याय के साथ निर्णय करना और सुलह करा देना सदक़ा है। किसी ऐसे व्यक्ति को, जो सवारी पर चढ़ न पा रहा हो, सवारी पर चढ़ा देना या उसका सामान लाद देना सदक़ा है। अच्छी बात, जैसे ज़िक्र, दुआ और सलाम आदि सदक़ा हैं। नमाज़ के लिए जाते समय उठने वाला हर क़दम सदक़ा है। रास्ते से किसी कष्ट देने वाली वस्तु को हटा देना सदक़ा है।
फ़ायदे
- इन्सान की हड्डियों का जुड़ाव और उनका स्वस्थ होना अल्लाह की एक बहुत बड़ी नेमत है। इसलिए इस नेमत के शुक्राने के तौर पर हर हड्डी की ओर से विशेष सदक़ा किया जाना चाहिए।
- ये नेमतें निरंतर रूप से प्राप्त रहें, इसके लिए हर रोज़ अल्लाह का शुक्र अदा करने की प्रेरणा।
- निरंतर रूप से हर रोज़ नफ़ल कार्य एवं सदक़े करते रहने की प्रेरणा।
- लोगों के बीच सुलह कराने की महत्ता।
- अपने भाई की मदद करने की प्रेरणा। क्योंकि अपने भाई की मदद करना भी सदक़ा है।
- जमात के साथ नमाज़ पढ़ने, इसके लिए चलकर जाने और मस्जिद को आबाद करने की प्रेरणा।
- मुसलमानों के रास्तों का सम्मान ज़रूरी है। रास्तों पर कोई ऐसा काम न किया जाए, जिससे उनको कष्ट हो।
हवाला
صحيح البخاري (4/ 56) (2989).
صحيح مسلم (1/ 498) (720).
-التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثًا النووية، مطبعة دار نشر الثقافة، الإسكندرية، الطبعة: الأولى، 1380 هـ.
-شرح الأربعين النووية، للشيخ ابن عثيمين، دار الثريا للنشر.
-فتح القوي المتين في شرح الأربعين وتتمة الخمسين، دار ابن القيم، الدمام المملكة العربية السعودية، الطبعة: الأولى، 1424هـ/2003م.
-الفوائد المستنبطة من الأربعين النووية، للشيخ عبد الرحمن البراك، دار التوحيد للنشر، الرياض.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عائشة رضي الله عنها مرفوعاً: «إذا نَعَسَ أحدكم وهو يصلي فَلْيَرْقُدْ حتى يذهب عنه النوم، فإن أحدكم إذا صلى وهو نَاعِسٌ لا يدري لعله يذهب يستغفر فَيَسُبُّ نَفْسَهُ».
आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "जब तुममें से किसी को नमाज़ पढ़ने की दशा में नींद आए, तो सो जाए, यहाँ तक नींद खत्म हो जाए। क्योंकि ऊँघते हुए जब कोई नमाज़ पढ़ता है, तो वह नहीं जान पाता कि अपने लिए क्षमा की दुआ कर रहा है या अपने हक़ में बददुआ कर रहा है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح البخاري, تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري, تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر, دار طوق النجاة ترقيم محمد فؤاد عبدالباقي, ط 1422.
صحيح مسلم ،تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري, تحقيق: محمد فؤاد عبدالباقي, دار إحياء التراث العربي.
مقاييس اللغة, تأليف: أحمد بن فارس الرازي, المحقق: عبدالسلام محمد هارون, الناشر: دار الفكر, عام 1399
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين, تأليف: سليم بن عيد الهلالي, دار ابن الجوزي،الطبعة الأولى1418.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين, تأليف: مصطفى الخن ومصطفى البغا ومحي الدين مستو وعلي الشربجي ومحمد لطفي, مؤسسة الرسالة, ط 14 عام 1407 - 1987.
دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين؛ لمحمد بن علان الشافعي، تحقيق خليل مأمون شيحا-دار المعرفة-بيروت-الطبعة الرابعة1425ه.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «إِنَّ الدِّينَ يُسْرٌ، وَلَنْ يُشَادَّ الدِّينَ أَحَدٌ إِلَّا غَلَبَهُ، فَسَدِّدُوا وَقَارِبُوا، وَأَبْشِرُوا، وَاسْتَعِينُوا بِالْغَدْوَةِ وَالرَّوْحَةِ وَشَيْءٍ مِنَ الدُّلْجَةِ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "धर्म आसान एवं सरल है और धर्म के मामले में जो भी उग्रता दिखाएगा, वह परास्त होगा। अतः, बीच का रास्ता अपनाओ, अच्छा करने की चेष्टा करो, नेकी की आशा रखो तथा प्रातः एवं शाम और रात के अंधेरे में इबादत करके सहायता प्राप्त करो।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बयान फ़रमाया कि इस्लाम धर्म अपने सभी मामलों में आसानी और सरलता पर आधारित है। और यह आसानी उस समय और भी पुख्ता हो जाती है जब कमजोरी (असमर्थता) और ज़रूरत का कोई कारण मौजूद हो। और क्योंकि धार्मिक कार्यों में गहराई (बहुत सख्ती) अपनाने और नरमी छोड़ देने का परिणाम असमर्थता और पूरे काम या उसके कुछ हिस्से से रुक जाना है। उसके बाद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने संतुलित रहने की प्रेरणा दी है। बंदा शरई आदेशों के अनुपालन में न तो कोताही से काम ले और न अपने ऊपर ऐसी चीज़ें लादे, जिन्हें उठाने की शक्ति न रखता हो। अगर संपूर्णतम पर अमल न कर सके, तो उसके निकटतम पर अमल करे।
उसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसे व्यक्ति को बड़े प्रतिफल का सुसमाचार सुनाया है, जो संपूर्णतम पर अमल न कर पाने के कारण थोड़ा-सा अमल ही करता हो, उसमें निरंतरता रखता हो। क्योंकि जब विवशता में बंदे का कोई हाथ न हो, तो उससे प्रतिफल में कमी नहीं होती।
फिर चूँकि दुनिया यात्रा का स्थान है और यहीं से आख़िरत का मार्ग तय होता है, इसलिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने चुस्ती के तीन समयों में निरंतरता के साथ इबादत द्वारा सहयोग प्राप्त करने का आदेश दिया है। ये तीन समय इस प्रकार हैं :
1- दिन के पहले भाग में चलना। दिन के पहले भाग में चलने से मुराद फ़ज्र की नमाज़ से लेकर सूरज निकलने के बीच का समय है।
2- सूरज ढलने के बाद चलना।
3- पूरी रात या रात के कुछ भाग में चलना। चूँकि रात में काम करना दिन में काम करने की तुलना में कहीं अधिक कठिन होता है, इसलिए "रात के कुछ भाग में" कहकर उसके कुछ भाग में काम करने का आदेश दिया है।
फ़ायदे
- इस्लाम एक आसान, उदार एवं संतुलित धर्म है। इसमें न अति दुरुस्त है, न कोताही।
- इन्सान को कोई भी काम अपने सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। न सुस्ती दिखे, न अति।
- इन्सान को इबादत के लिए ऐसे समयों का चयन करना चाहिए, जब तबीयत में चुस्ती हो। उपर्युक्त तीन समय ऐसे हैं कि उनमें शरीर इबादत के लिए सबसे अधिक तत्पर रहता है।
- इब्न-ए-हजर कहते हैं : यहाँ एक तरह से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी गंतव्य की ओर यात्रा कर रहे व्यक्ति को संबोधित किया है। चूँकि इस हदीस के अंदर बयान किए गए तीन समय यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त समय हैं, इसलिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इन्हें चिह्नित कर दिया। क्योंकि यदि यात्री रात-दिन चलता ही रह जाए, तो कुछ दूरी तय करने के बाद थक हारकर बैठ जाएगा। इसके विपरीत अगर इन अनुकूल समयों में चले और उसके बाद आराम कर ले, तो यात्रा को जारी रखना आसान हो जाएगा।
- इब्न-ए-हजर कहते हैं : इस हदीस में रुख़्सत (शरई छूट) पर अमल करने की ओर संकेत है। क्योंकि जहाँ छूट हो, वहाँ उससे फ़ायदा न उठाना अतिवाद है। मसलन किसी के लिए पानी का प्रयोग वर्जित हो और वह तयम्मुम की बजाय वज़ू करने की ज़िद पर अड़ा हुआ हो और इसकी वजह से उसका नुक़सान हो जाए, तो यही अतिवाद है।
- इब्न अल-मुनैयिर कहते हैं : यह हदीस मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सच्चे नबी होने की एक बहुत बड़ी निशानी है। ख़ुद हमने और हमसे पहले के लोगों ने भी देखा है कि शक्ति से अधिक अमल का बोझ उठाने की कोशिश करने वाला हर व्यक्ति थक-हार कर बैठ जाता है। लेकिन यह भी याद रहे कि यहाँ इबादत की संपूर्णतम पद्धति अपनाने से मना नहीं किया गया है। यह तो एक सराहनीय बात है। मना अतिवाद से किया गया है, जो थक-हार कर बैठ जाने का सबब बनता है। जैसे कोई व्यक्ति रात भर तहज्जुद पढ़कर सो जाए और फ़ज्र की नमाज़ जमात के साथ अदा न कर सके या फिर सूरज निकलने तक सोया ही रह जाए।
हवाला
صحيح البخاري (1/ 16) (39).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 219).
تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص115).
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com