عَنْ أُبَيِّ بْنِ كَعْبٍ رَضيَ اللهُ عنه قَالَ: كَانَ رَجُلٌ لَا أَعْلَمُ رَجُلًا أَبْعَدَ مِنَ الْمَسْجِدِ مِنْهُ، وَكَانَ لَا تُخْطِئُهُ صَلَاةٌ، قَالَ: فَقِيلَ لَهُ: أَوْ قُلْتُ لَهُ: لَوْ اشْتَرَيْتَ حِمَارًا تَرْكَبُهُ فِي الظَّلْمَاءِ، وَفِي الرَّمْضَاءِ، قَالَ: مَا يَسُرُّنِي أَنَّ مَنْزِلِي إِلَى جَنْبِ الْمَسْجِدِ، إِنِّي أُرِيدُ أَنْ يُكْتَبَ لِي مَمْشَايَ إِلَى الْمَسْجِدِ، وَرُجُوعِي إِذَا رَجَعْتُ إِلَى أَهْلِي، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «قَدْ جَمَعَ اللهُ لَكَ ذَلِكَ كُلَّهُ».
उबै बिन काब- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मेरी जानकारी के अनुसार एक अंसारी का घर मस्जिद से सबसे ज़्यादा दूर था, परन्तु उनकी कोई नमाज़ नहीं छूटती थी। सो, उनसे कहा गया कि यदि आप एक गधा ख़रीद लें और अंधेरे तथा धूप की गर्मी के समय उसपर सवार होकर आएँ तो अच्छा हो। उन्होंने कहाः मुझे यह पसंद नहीं है कि मेरा घर मस्जिद के बगल में हो। मैं चाहता हूँ कि मैं जब मस्जिद आऊँ तो मेरा आना और जब घर वापस जाऊँ तो मेरा जाना लिखा जाए। इसपर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह ने तेरे लिए इन सब बातों को जमा कर दिया है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح مسلم (1/ 460) (663). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 162). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 199).