عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللهِ رضي الله عنهما أَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «إِذَا دَخَلَ الرَّجُلُ بَيْتَهُ، فَذَكَرَ اللهَ عِنْدَ دُخُولِهِ وَعِنْدَ طَعَامِهِ، قَالَ الشَّيْطَانُ: لَا مَبِيتَ لَكُمْ، وَلَا عَشَاءَ، وَإِذَا دَخَلَ، فَلَمْ يَذْكُرِ اللهَ عِنْدَ دُخُولِهِ، قَالَ الشَّيْطَانُ: أَدْرَكْتُمُ الْمَبِيتَ، وَإِذَا لَمْ يَذْكُرِ اللهَ عِنْدَ طَعَامِهِ، قَالَ: أَدْرَكْتُمُ الْمَبِيتَ وَالْعَشَاءَ».
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जब आदमी अपने घर में प्रवेश करता है और प्रवेश करते समय एवं खाना खाते समय अल्लाह का नाम लेता है, तो शैतान अपने साथियों से कहता है : यहाँ न तुम्हारे लिए रात बिताने का स्थान है और न रात के खाने का प्रबंध। और जब वह घर में प्रवेश करता है तथा प्रवेश करते समय अल्लाह का नाम नहीं लेता, तो शैतान कहता है : तुमने रात बिताने का स्थान पा लिया और जब खाना खाते समय अल्लाह का नाम नहीं लेता, तो कहता है : तुमने रात बिताने की जगह तथा रात का खाना दोनों पा लिया।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने घर में प्रवेश करते समय और खाना खाने से पहले अल्लाह का नाम लेने का आदेश दिया है। जब कोई व्यक्ति घर में प्रवेश करते और खाना खाते समय बिस्मिल्लाह कहता है, तो शैतान अपने सहयोगियों से कहता है कि तुम्हारे लिए इस घर में रात गुज़ारने का स्थान और रात के खाने का प्रबंध नहीं है, क्योंकि घर के मालिक ने तुमसे अल्लाह की शरण ले ली है। इसके विपरीत जब कोई व्यक्ति घर में दाख़िल होता है और घर में दाखिल होते तथा खाना खाते समय अल्लाह का नाम नहीं लेता, तो शैतान अपने सहयोगियों से कहता है कि इस घर में उनके रात गुज़ारने तथा खाने का प्रबंध हो गया है।
फ़ायदे
- घर में दाखिल होते तथा खाना खाते समय अल्लाह का नाम लेना मुसतहब है। क्योंकि अल्लाह का नाम न लेने पर शैतान घर में रात गुज़ारता है और खाने में शरीक हो जाता है।
- शैतान इन्सान के हर काम को ध्यान से देखता रहता है और जैसे ही इन्सान अल्लाह के नाम से ग़ाफ़िल होता है, उसकी मुराद पूरी हो जाती है।
- अल्लाह का ज़िक्र शैतान को भगाता है।
- हर शैतान के कुछ अनुसरणकारी तथा सहयोगी होते हैं, जो उसकी बात से खुश होते और उसके आदेश का पालन करते हैं।
हवाला
صحيح مسلم (3/ 1598) (2018).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 50).
تطريز رياض الصالحين، لفيصل المبارك (ص467).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 190).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 700).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «يَقُولُ اللهُ عَزَّ وَجَلَّ: أَنَا عِنْدَ ظَنِّ عَبْدِي، وَأَنَا مَعَهُ حِينَ يَذْكُرُنِي، فَإِنْ ذَكَرَنِي فِي نَفْسِهِ ذَكَرْتُهُ فِي نَفْسِي، وَإِنْ ذَكَرَنِي فِي مَلَإٍ ذَكَرْتُهُ فِي مَلَإٍ خَيْرٍ مِنْهُ، وَإِنِ اقْتَرَبَ إِلَيَّ شِبْرًا، تَقَرَّبْتُ إِلَيْهِ ذِرَاعًا، وَإِنِ اقْتَرَبَ إِلَيَّ ذِرَاعًا، اقْتَرَبْتُ إِلَيْهِ بَاعًا، وَإِنْ أَتَانِي يَمْشِي أَتَيْتُهُ هَرْوَلَةً».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "उच्च एवं महान अल्लाह कहता है : मैं अपने बारे में अपने बंदे की सोच के निकट होता हूँ तथा मैं उसके साथ होता हूँ, वह जब भी मुझे याद करे। अगर वह अपने मन में मुझे याद करता है, तो मैं भी उसे अपने मन में याद करता हूँ। अगर वह किसी सभा में मेरा ज़िक्र करता है, तो मैं उसका ज़िक्र ऐसी सभा में करता हूँ, जो उसकी सभा से बेहतर होती है। अगर वह मेरी ओर एक बित्ता आता है, मैं उसकी ओर एक हाथ जाता हूँ, और अगर मेरी ओर एक हाथ आता है, मैं उसकी ओर दो हाथ जाता हूँ तथा अगर मेरी ओर चलकर आता है, मैं उसकी ओर दौड़कर जाता हूँ।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि उच्च एवं महान अल्लाह फ़रमाता है :
मैं वैसा ही हूँ जैसा मेरा सेवक मेरे बारे में सोचता है, चुनांचे मैं अपने सेवक के साथ उसकी उम्मीद के हिसाब से पेश आता हूँ, अर्थात माफ़ी और भलाई की उम्मीद के साथ , और मैं उसके लिए वही करता हूँ जो वह मुझसे उम्मीद करता है, चाहे अच्छा हो या बुरा, और जब वह मुझे याद करता है तो मैं दया, तौफ़ीक़, मार्गदर्शन, देखभाल और सहारे के साथ उसके साथ होता हूँ।
अगर वह एकांत में सुबहान अल्लाह एवं ला इलाहा इल्लल्लाह आदि कहकर मुझे याद करता है, तो मैं उसे एकांत में याद करता हूँ।
अगर वह मुझको लोगों के समूह में याद करता है, तो मैं उसे कहीं बड़े और पवित्र समूह के सामने याद करता हूँ।
जो अल्लाह की ओर एक बित्ता आगे बढ़ता है, अल्लाह उसकी ओर एक हाथ आगे बढ़ता है।
जो अल्लाह की ओर एक हाथ आगे बढ़ता है, अल्लाह उसकी ओर दो हाथ आगे बढ़ता है।
जो अल्लाह की ओर चलकर आता है, अल्लाह उसकी ओर दौड़कर जाता है।
सारांश यह कि जब बंदा अपने पालनहार की ओर उसकी इबादत एवं बंदगी के साथ आगे बढ़ता है, तो अल्लाह उसे अपने से और क़रीब कर लेता है, बदले के तौर जो उसके कार्य ही की तरह होता है।
बंदे की बंदगी जितनी संपूर्ण होगी, अल्लाह उससे उतना ही निकट होगा। अल्लाह बंदे को सवाब और बदला उसके अमल और कोशिश से कहीं बढ़कर देता है। कुल मिलाकर, गुणवत्ता और परिमाण के मामले में, अल्लाह का इनाम बंदे के द्वारा किए गए काम से ज़्यादा होता है।
एक मोमिन की शान यह है कि वह अल्लाह से अच्छा गुमान रखे, अमल करता रहे, नेकी के कामों में तेज़ी से आगे बढ़ता रहे और अधिक से अधिक अच्छे काम करता रहे। यह सिलसिला अल्लाह से मिलने तक जारी रखे।
फ़ायदे
- यह हदीस उन हदीसों में से है, जो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने रब से रिवायत करके कहा है। इस तरह की हदीस को हदीस-ए-क़ुदसी या हदीस-ए-इलाही कहा जाता है। इससे मुराद वह हदीस है, जिसके शब्द तथा अर्थ दोनों अल्लाह के हों। अलबत्ता इसके अंदर क़ुरआन की विशेषताएँ, जैसे उसकी तिलावत का इबादत होना, उसके लिए तहारत प्राप्त करना तथा उसका चमत्कार होना आदि, नहीं पाई जाती।
- आजुर्री कहते हैं : "सत्यवादी सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के वही गुण बयान करते हैं, जो ख़ुद अल्लाह ने बयान किए हैं, उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बयान किए हैं और सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम ने बयान किए हैं। यही सुन्नत के अनुसरणकारी एवं बिदअत से दामन बचाने वाले उलेमा का तरीक़ा है।" अतः अह्ल-ए-सुन्नत सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के उन्हीं गुणों को साबित करते हैं, जिन्हें ख़ुद अल्लाह ने अपने लिए साबित किया है। वे इन गुणों को बतलाने वाले शब्दों के साथ न छेड़-छाड़ करते हैं, न उन्हें अर्थहीन बनाते हैं, न उन गुणों की मिसाल देते हैं और न उनकी कैफ़ियत बताते हैं। इसी तरह वे अल्लाह को उन गुणों से पाक मानते हैं, जिनसे उसने ख़ुद को पाक घोषित किया है। वे उन मामलों पर चुप रहते हैं जिनके बारे में न तो कोई पुष्टि होती है और न ही कोई खंडन। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "उसके जैसी कोई चीज़ नहीं है और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है।"
- अल्लाह के बारे में अच्छा गुमान रखने के साथ-साथ अमल की भी लाज़मी है। हसन बसरी कहते हैं : एक मोमिन अपने पालनहार के बारे में अच्छा गुमान रखता है और अच्छा अमल करता है, जबकि एक गुनाहगार अपने पालनहार के बारे में बुरा गुमान रखता है और बुरा अमल करता है।
- क़ुर्तुबी कहते हैं : कुछ लोग कहते हैं : "मैं अपने बंदे के गुमान के अनुसार काम करता हूँ" से मुराद, अल्लाह के वादे पर सम्पूर्ण विश्वास रखते हुए, दुआ के समय झोली भर दिए जाने का गुमान, तौबा करते समय तौबा के क़बूल होने का गुमान, क्षमा माँगते समय क्षमा दान का गुमान और शर्तों को पूरा करते हुए इबादत करते समय प्रतिफल एवं सवाब मिलने का गुमान है। इसलिए बंदे को अपनी ज़िम्मेवारियाँ पूरी तनमयता एवं इस विश्वास के साथ अदा करनी चाहिए कि अल्लाह ग्रहण करेगा और क्षमा करेगा। क्योंकि यह उसका वादा है और वह अपना किया हुआ वादा नहीं तोड़ता। इसके विपरीत यदि किसी को विश्वास हो या लगता हो कि अल्लाह उसकी इबादत क़बूल नहीं करेगा या उसे इबादत का कोई फ़ायदा नहीं होगा, तो यह अल्लाह की दया से निराशा एवं महा पाप है। इस निराशा के साथ मरने वाले के साथ उसके गुमान के अनुसार ही व्यवहार किया जाएगा, जैसा कि इस हदीस की कुछ रिवायतों में आया है : "अतः मेरा बंदा मेरे बारे में जो गुमान रखना चाहे, रखे।" वह कहते हैं : जहाँ तक गुनाह पर क़ायम रहने के बावजूद क्षमा का गुमान रखने की बात है, तो यह मूर्खता एवं धोखा में रहना है।
- ज़बान एवं दिल दोनों से अधिक से अधिक अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा। इन्सान के दिल में अल्लाह का भय रहे, उसकी महानता एवं अधिकार का एहसास रहे, उससे आशा रहे, प्रेम रहे, अच्छा गुमान रहे, विशुद्ध रूप से उसी के लिए अमल करने की भावना रहे और ज़बान पर सुबहान अल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर और ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह जैसे अज़कार रहें।
- इब्न अबू जमरा कहते हैं : जो भयाक्रांत होकर अल्लाह को याद करेगा, अल्लाह उसे शांति देगा और जो घबराए हुए अवस्था में अल्लाह को याद करेगा, अल्लाह उसकी घबराहट दूर करेगा।
- अश- शिब्रू: इसे हिंदी में बित्ता कहते हैं। इससे मुराद है हथेली को फैला देने के बाद कनिष्ठा के किनारे से अंगूठे के किनारे तक की दूरी। अल-ज़िराउ: बीच वाली उंगली के किनारे से कोहनी की हड्डी के बीच की दूरी। अल-बाउ : दोनों हाथों, दोनों बाज़ुओं और सीने की चौड़ाई के बीच की दूरी। सब मिलाकर कुल चार हाथ हुआ करते हैं।
हवाला
صحيح البخاري (9/ 121) (7405).
صحيح مسلم (4/ 2067) (2675).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 151).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 516).
منار القاري شرح مختصر صحيح البخاري، حمزة محمد (5/ 372).
الجواب الكافي لمن سأل عن الدواء الشافي أو الداء والدواء (ص25).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 510).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 983).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «يَعْقِدُ الشَّيْطَانُ عَلَى قَافِيَةِ رَأْسِ أَحَدِكُمْ إِذَا هُوَ نَامَ ثَلاَثَ عُقَدٍ يَضْرِبُ كُلَّ عُقْدَةٍ عَلَيْكَ لَيْلٌ طَوِيلٌ، فَارْقُدْ، فَإِنِ اسْتَيْقَظَ فَذَكَرَ اللَّهَ، انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ، فَإِنْ تَوَضَّأَ انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ، فَإِنْ صَلَّى انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ، فَأَصْبَحَ نَشِيطًا طَيِّبَ النَّفْسِ، وَإِلَّا أَصْبَحَ خَبِيثَ النَّفْسِ كَسْلاَنَ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "शैतान तुममें से हर व्यक्ति के सर के पीछ रात में सोते समय तीन गाँठ लगा देता है और हर गाँठ पर यह कहकर फूँक मारता है कि सो जा, अभी रात बहुत बाक़ी है। फिर अगर आदमी जागकर अल्लाह को याद करने लगे, तो एक गाँठ खुल जाती है। फिर अगर वज़ू कर ले तो एक और गाँठ खुल जाती है। फिर अगर नमाज़ पढ़ ले तो एक और गाँठ भी खुल जाती है। इस तरह सुबह के समय आदमी चुस्त और प्रफुल्लित रहता है। वरना, उदास और सुस्त रहता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जब इन्सान तहज्जुद या फ़ज्र की नमाज़ के लिए उठना चाहता है, तो किस तरह शैतान उसे रोकने का प्रयास करता है।
एक मोमिन जब सोता है, तो शैतान उसके सर के पिछले भाग में तीन गाँठ लगा देता है।
ऐसे में जब वह जाग कर अल्लाह को याद करता है और शैतान द्वारा डाले गए ख़्यालों को रास्ता रोकने नहीं देता, तो एक गाँठ खुल जाती है।
उसके बाद अगर वज़ू करता है, तो दूसरी गाँठ खुल जाती है।
फिर अगर उठकर नमाज़ पढ़ता है, तो तीसरी गाँठ भी खुल जाती है। फलस्वरूप इन्सान भरपूर ऊर्जा के साथ और प्रसन्नचित होकर सुबह करता है कि उसे अल्लाह की ओर से इबादत का सुयोग प्राप्त हुआ, वह प्रतिफल एवं क्षमा के अल्लाह के किए हुए वादा और इस बात से ख़ुश रहता है कि शैतान द्वारा उसे इबादत से रोकने के प्रयास नाकाम हो गए। इसके विपरीत अगर वह इबादत के लिए खड़ा नहीं हुआ, तो उसकी सुबह उदासी एवं सुस्ती के साथ होती है। अच्छे कामों में उसका मन नहीं लगता। क्योंकि दरअसल वह शैतानी की ज़ंजीर में जकड़ा हुआ है और कृपावान् अल्लाह की दया से दूर हो जाता है।
फ़ायदे
- शैतान का प्रयास हमेशा यह रहता है कि अल्लाह की इबादत की राह में रुकावट खड़ी की जाए। और बंदा शैतान के हथकंडों से उसी समय बच सकता है, जब अल्लाह से मदद माँगे और सुरक्षा साधानों को अपनाए।
- अल्लाह का ज़िक्र और उसकी इबादत इन्सान के अंदर चुस्ती एवं प्रसन्नता लाती है, उसे हार्दिक खुशी देती है, सुस्ती और आलस्य को दूर करती है तथा चिंता और आक्रोश को खत्म करती है। क्योंकि ज़िक्र और इबादत शैतान को दूर भगाते हैं, जबकि उपर्युक्त बातें शैतान के प्रयासों का नतीजा हुआ करती हैं।
- मोमिन अल्लाह की ओर से इबादत का सुयोग मिलने पर ख़ुश और वह सद्गुण और पूर्णता की प्राप्ती में अपनी कमियों के कारण उदास हो जाता है।
- नेकी के कामों से दूरी और उनसे अचेतना में शैतान का हाथ होता है।
- यह तीन चीज़ें -अल्लाह का ज़िक्र, वज़ू और नमाज़- शैतान को दूर भगाने का काम करती हैं।
- शैतान द्वारा सर के पिछले भाग ही में गाँठें इसलिए लगाई जाती हैं कि वही सारी शक्तियों का केंद्र है और वहीं से पूरे शरीर की व्यवस्था संचालित होती है। अतः वहाँ गाँठ लगा देने के बाद इन्सान की आत्मा पर क़ब्ज़ा जमाना और उसपर नींद थोंपना आसान हो जाता है।
- इब्न-ए-हज़र असक़लानी कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्दों "अलैका लैलुन" में रात का ज़िक्र बज़ाहिर यह बतलाता है कि यह बात रात की नींद के साथ खास है।
- इब्न-ए-हजर असक़लानी कहते हैं : ज़िक्र के लिए कोई चीज़ इस तरह निश्चित नहीं है कि दूसरी चीज़ प्रयाप्त न हो। हर वह चीज़ काफ़ी है, जो "अल्लाह के ज़िक्र" के दायरे में आती हो। इसमें क़ुर्आन की तिलावत, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस पढ़ना और शरई ज्ञान प्राप्त करने में व्यस्त रहना भी शामिल हैं। अलबत्ता सबसे अच्छा यह है कि अल्लाह का ज़िक्र उस हदीस में आए हुए शब्दों द्वारा किया जाए, जिसके शब्द इस प्रकार हैं : "जो व्यक्ति रात में जाग जाए और यह दुआ पढ़े : अल्लाह के सिवा कोई इबादत का हक़दार नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, राज्य उसी का है, सारी प्रशंसा उसी की है और वह हर बात की क्षमता रखता है। सारी प्रशंसा अल्लाह ही की है, अल्लाह की हस्ती पवित्र है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह की मदद के बिना न किसी के पास गुनाह से बचने की शक्ति है और न नेकी करने की क्षमता।) फिर कहे : ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे। या कोई और दुआ करे, तो उसकी दुआ क़बूल होती है। फिर अगर वह वज़ू करे (और नमाज़ पढ़े), तो नमाज़ भी क़बूल होती है।" इस हदीस को इमाम बुख़ारी ने रिवायत किया है।
हवाला
صحيح البخاري (2/ 52) (1142).
صحيح مسلم (1/ 538) (776).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 328).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 834).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (15/ 305).
فتح الباري شرح صحيح البخاري، لأحمد العسقلاني (10/ 564).
طرح التثريب في شرح التقريب، العراقي (3/ 82).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ سَعْدِ بنِ أبي وَقَّاصٍ رَضيَ اللهُ عنه قَالَ: كُنَّا عِنْدَ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: «أَيَعْجِزُ أَحَدُكُمْ أَنْ يَكْسِبَ، كُلَّ يَوْمٍ أَلْفَ حَسَنَةٍ؟» فَسَأَلَهُ سَائِلٌ مِنْ جُلَسَائِهِ: كَيْفَ يَكْسِبُ أَحَدُنَا أَلْفَ حَسَنَةٍ؟ قَالَ: «يُسَبِّحُ مِائَةَ تَسْبِيحَةٍ، فَيُكْتَبُ لَهُ أَلْفُ حَسَنَةٍ، أَوْ يُحَطُّ عَنْهُ أَلْفُ خَطِيئَةٍ».
साद बिन अबू वक़्क़ास- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि हम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास थे कि आपने फ़रमायाः क्या तुममें से कोई इस बात से विवश है कि प्रत्येक दिन एक हज़ार नेकियाँ प्राप्त करे? आपके पास बैठे लोगों में से एक व्यक्ति ने पूछाः आदमी एक हज़ार नेकियाँ कैसे प्राप्त कर सकता है? आपने फ़रमायाः सौ बार 'सुबहानल्लाह' कहने से उसके लिए एक हज़ार नेकियाँ लिखी जाएँगी अथवा उसके एक हज़ार गुनाह मिटाए जाएँगे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح مسلم (4/ 2073) (2698).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 507).
مرقاة المفاتيح، لعلي القاري (4/ 1594).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 980).
مرعاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعبيد الله المباركفوري (7/ 454).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي مُوسَى رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَثَلُ الَّذِي يَذْكُرُ رَبَّهُ وَالَّذِي لاَ يَذْكُرُ رَبَّهُ، مَثَلُ الحَيِّ وَالمَيِّتِ»، ولفظ مسلم: «مَثَلُ الْبَيْتِ الَّذِي يُذْكَرُ اللهُ فِيهِ، وَالْبَيْتِ الَّذِي لَا يُذْكَرُ اللهُ فِيهِ، مَثَلُ الْحَيِّ وَالْمَيِّتِ».
तथा अबू मूसा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "उस व्यक्ति की मिसाल जो अपने रब को याद करता है और उसकी मिसाल जो अपने रब को याद नहीं करता, जीवित और मृत की सी है।" सही मुस्लिम के शब्द हैं : "उस घर की मिसाल जिसमें अल्लाह को याद किया जाता है और उस घर की मिसाल जिसमें अल्लाह को याद नहीं किया जाता, जीवित और मृत जैसी है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यहाँ अल्लाह का ज़िक्र करने वाले और न करने वाले का अंतर बयान फ़रमाया है। लाभ एवं सौंदर्य के मामले में दोनों के बीच में वही अंतर है, जो जीवित एवं मृत के बीच है। जो अपने रब को याद करता है, वह एक जीवित प्राणी की तरह है, जिसका बाहरी रूप जीवन से सुसज्जित और जिसका आंतरिक रूप ज्ञान के प्रकाश से सुसज्जित है, उसके अंदर लाभ प्रदान करने की क्षमता होती है। जबकि जो अल्लाह को याद नहीं करता, उसकी मिसाल एक मृत प्राणी की तरह है, जिसका बाहरी रूप जीवन से रहित है और जिसका आंतरिक रूप बेकार है, उसके अंदर लाभ देने की क्षमता नहीं होती।
इसी तरह जब घर में रहने वाले लोग अल्लाह का ज़िक्र करते हैं, तो वह घर जीवित है और जब अल्लाह के ज़िक्र की अनदेखी करते हैं, तो वह घर मृत है। वैसे, यहाँ जीवित एवं मृत यद्यपि घर के लोगों को कहा गया है, लेकिन मुराद घर में रहने वाले लोग हैं।
फ़ायदे
- अल्लाह के ज़िक्र की प्रेरणा और ज़िक्र से ग़फ़लत पर चेतावनी।
- जिस प्रकार आत्मा शरीर का जीवन है, उसी प्रकार ज़िक्र आत्मा का जीवन है।
- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपनी बात समझाने के लिए उदाहरण दिया करते थे।
- नववी कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि घर में अल्लाह का ज़िक्र करते रहना चाहिए और घर को अल्लाह के ज़िक्र से ख़ाली नहीं होने देना चाहिए।
- नववी कहते हैं : अगरचे एक मृत मोमिन भी भलाई की ओर जा चुका होता है, लेकिन अल्लाह की बंदगी के सुयोग के साथ लंबी उम्र मिलना फ़ज़ीलत की बात है। क्योंकि जीवित व्यक्ति की नेकियों का ख़ज़ाना उसके द्वारा किए जा रहे अच्छे कामों से समृद्ध होता जाता है।
हवाला
صحيح البخاري (8/ 86) (6407).
صحيح مسلم (1/ 539) (779).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، (2/ 982).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 516).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ جَابِرٍ رَضيَ اللهُ عنهُ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «مَنْ قَالَ: سُبْحَانَ اللهِ العَظِيمِ وَبِحَمْدِهِ، غُرِسَتْ لَهُ نَخْلَةٌ فِي الجَنَّةِ».
जाबिर -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिसने कहा : "मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ", उसके लिए जन्नत में एक खजूर का पेड़ लगा दिया जाता है।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि जिसने कहा :
(सुबहान अल्लाह, अर्थात, मैं अल्लाह की पाकी बयान करता हूँ) और अल्लाह की पवित्रता का गुणगान किया, (अल-अज़ीम, अर्थात : जो महान है) स्वयं तथा अपने गुणों एवं कार्यों में महान है, (वबि-हम्दिही) इस हाल में कि यह पाकीज़गी उसकी प्रशंसा के साथ जुड़ी हुई है; जब भी व्यक्ति यह कहता है तब जन्नत की ज़मीन में उसके लिए खजूर का एक पेड़ लगा दिया जाता है।
फ़ायदे
- अधिक से अधिक अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा। अल्लाह के ज़िक्र में "अल-हम्दु लिल्लाह" के साथ 'सुबहान अल्लाह' भी कहना हैं।
- जन्नत एक विशाल एवं विस्तृत स्थान है और अल्लाह की पवित्रता तथा प्रशंसा गान से उसमें पेड़ लगते हैं। यह दरअसल अल्लाह का अनुग्रह एवं कृपा है।
- यहाँ हदीस में अन्य पेड़ों की बजाय खजूर के पेड़ का ज़िक्र इसलिए किया गया है कि यह एक बहुत ही लाभकारी पेड़ है और इसका फल बहुत अच्छा होता है। यही कारण है कि अल्लाह ने कुरान में मोमिन और उसके ईमान की मिसाल इसी पेड़ से दी है।
हवाला
سنن الترمذي (5/ 456) (3464).
مرعاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، للمباركفوري (7/ 464).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 985).
مشكاة المصابيح، للتبريزي (2/ 713).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ كَعْبِ بْنِ عُجْرَةَ رضي الله عنه عَنْ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «مُعَقِّبَاتٌ لَا يَخِيبُ قَائِلُهُنَّ -أَوْ فَاعِلُهُنَّ- دُبُرَ كُلِّ صَلَاةٍ مَكْتُوبَةٍ، ثَلَاثٌ وَثَلَاثُونَ تَسْبِيحَةً، وَثَلَاثٌ وَثَلَاثُونَ تَحْمِيدَةً، وَأَرْبَعٌ وَثَلَاثُونَ تَكْبِيرَةً».
काब बिन उजरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "प्रत्येक फ़र्ज नमाज़ के पश्चात कही जाने वाली तसबीहों को कहने वाले -या उनका पालन करने वाले- नाकाम नहीं होंगे। अर्थात 33 बार सुबहानल्लाह, 33 बार अल-हम्दु लिल्लाह और 34 बार अल्लाहु अकबर।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
इस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुछ अज़कार के बारे में बात की है, जिन्हें पढ़ने वाला घाटे में नहीं रहता और शर्मिंदा नहीं होता। उसे उनका सवाब ज़रूर मिलता है। ये ऐसे शब्द हैं, जो एक-दूसरे के बाद आते और फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद पढ़े जाते हैं। ये शब्द हैं :
"सुबहानल्लाह" तैंतीस बार। इसका अर्थ यह है कि अल्लाह हर कमी एवं ऐब से पाक है।
"अल-हमदु लिल्लाह" तैंतीस बार। यानी इस बात की घोषणा कि अल्लाह हर दृष्टिकोण से परिपूर्ण है, साथ ही उससे मोहब्बत करना और उसका सम्मान करना।
"अल्लाहु अकबर" चौंतीस बार। यानी अल्लाह दुनिया की सारी चीज़ों से बड़ा, महान और शक्तिशाली है।
फ़ायदे
- अल्लाह की पाकी, प्रशंसा और बड़ाई बयान करने का महत्व। और इनको बाक़ी रहने वाले नेक आमाल कहा गया है।
हवाला
صحيح مسلم (1/ 418) (596).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 501).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 976).
مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (2/ 766).
تيسير العلام، للبسام (ص227).
فيض القدير شرح الجامع الصغير، لزين الدين المناوي (5/ 525).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي سعيد الخدري وأبي هريرة رضي الله عنهما أَنهُما شَهِدَا عَلَى رسول اللَّه -صَلّى اللهُ عَلَيْهِ وسَلَّم- أَنه قالَ: «من قال: لا إله إلا الله والله أكبر، صَدَّقه ربه، فقال: لا إله إلا أنا وأنا أكبر. وإذا قال: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، قال: يقول: لا إله إلا أنا وَحدِي لا شريك لي. وإذا قال: لا إله إلا الله له الملك وله الحمد، قال: لا إله إلا أنا لي الملك ولي الحمد. وإذا قال: لا إله إلا الله ولا حول ولا قوة إلا بالله، قال: لا إله إلا أنا ولا حول ولا قوة إلا بي» وكان يقول: «من قالها في مرضه ثم مات لم تَطْعَمْهُ النار».
अबू सईद ख़ुदरी तथा अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहुमा) ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को साक्षी ठहराते हुए कहा कि आपने फ़रमायाः जो (لا إله إلا الله والله أكبر) कहता है तो अल्लाह कहता हैः मेरे सिवा कोई सत्य़ पूज्य नहीं और मैं ही सबसे महान हूँ) और जब (لا إله إلا الله وحده لا شريك له) कहता है, तो कहता हैः मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं और मेरा साझी भी कोई नहीं। और जब (لا إله إلا الله له الملك وله الحمد) कहता है, तो अल्लाह कहता हैः मेरे सिवा कोई सत्य़ पूज्य नहीं और मेरी ही बादशाहत है तथा सारी प्रशंसा भी मेरे लिए है और जब لا إله إلا الله ولا حول ولا قوة إلا بالله कहता है, तो अल्लाह कहता हैः मेरे सिवा कोई सत्य़ पूज्य नहीं और मेरी अनुमति के बिना कोई क्षमता और ताक़त भी नहीं। आप कहा करते थे किः जो रोगग्रस्त हालत में कह कर मरता है, उसे आग जला नहीं सकती।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
1- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي.
2- الجامع الصحيح –وهو سنن الترمذي-؛ للإمام محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق أحمد شاكر وآخرين، مكتبة الحلبي-مصر، الطبعة الثانية، 1388هـ.
3- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ.
4- سلسلة الأحاديث الصحيحة؛ للشيخ محمد ناصر الدين الألباني، مكتبة المعارف-الرياض، 1415هـ.
5- سنن ابن ماجه؛ للحافظ محمد بن يزيد القزويني، حققه محمد فؤاد عبدالباقي، دار إحياء الكتب العربية.
6- شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن-الرياض، 1426هـ.
7- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com