عن أبي موسى الأشعري رضي الله عنه قَالَ: قالَ رسول اللَّه -صَلّى اللهُ عَلَيْهِ وسَلَّم-: «إِنَّ مِنْ إِجْلاَلِ الله -تَعَالَى-: إِكْرَامَ ذِي الشَّيْبَةِ المُسْلِمِ، وَحَامِلِ القُرْآنِ غَيرِ الغَالِي فِيه، وَالجَافِي عَنْه، وَإِكْرَام ذِي السُّلْطَان المُقْسِط».
अबू मूसा अशअरी (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "अल्लाह तआला के सम्मान में यह बात भी सम्मिलित है कि सफ़ेद बाल वाले मुसलमान का तथा उस कुरवान वाले का, जो न उसमें अतिशयोक्ति करता हो और न उससे बेवफ़ाई करता हो एवं उस प्रशासक का सम्मान किया जाए, जो न्यायप्रिय हो।"
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन
हवाला
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415هـ.
تطريز رياض الصالحين للشيخ فيصل المبارك، ط1، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة، الرياض، 1423 هـ.
دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين لمحمد علي بن محمد بن علان، ط4، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة، بيروت، 1425 هـ.
رياض الصالحين للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428 هـ.
رياض الصالحين، ط4، تحقيق: عصام هادي، وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية القطرية، دار الريان، بيروت، 1428هـ.
سنن أبي داود، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد، المكتبة العصرية، بيروت.
عون المعبود شرح سنن أبي داود، ومعه حاشية ابن القيم: تهذيب سنن أبي داود وإيضاح علله ومشكلاته للعظيم آبادي ط3، دار الكتب العلمية، بيروت، 1415 هـ.
كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، ط1، كنوز إشبيليا، الرياض، 1430هـ.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.
مشكاة المصابيح، للتبريزي. تحقيق الألباني. الناشر : المكتب الإسلامي - بيروت. الطبعة : الثالثة - 1405 – 1985
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عمران بن حصين رضي الله عنهما قَالَ: قَالَ رسولُ اللَّه -صَلّى اللهُ عَلَيْهِ وسَلَّم-: «الحَيَاءُ لاَ يَأْتِي إِلاَّ بِخَيرٍ».
وفي رواية : «الحَيَاءُ خَيرٌ كُلُّهٌ» أو قال: «الحَيَاءُ كُلُّهُ خَيرٌ».
इमरान बिन हुसैन (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसू (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "हया केवल भलाई ही लाती है।"
एक और रिवायत में हैः "हया भलाई ही भलाई है।" या फिर फ़रमायाः "हया संपूर्ण रूप से भलाई है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
हया इनसान का ऐसा गुण है, जो इनसान को अपने व्यक्तित्व को सुरूप एवं सुशोभित बनाने वाले कार्यों को करने तथा कुरूप एवं अशोभित करने वाले कार्यों से दूर रहने पर आमादा करती है। यही कारण है हया केवल भलाई ही लाती है। इस हदीस का परिदृश्य यह है कि एक व्यक्ति अपने भाई को हया के बारे समझा-बुझा रहा था और उसे हया करने से रोक रहा था। ऐसे में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यह बात कही।
हवाला
رياض الصالحين للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428هـ.
شرح رياض الصالحين للشيخ ابن عثيمين، دار الوطن للنشر، الرياض، 1426هـ.
صحيح البخاري، ط1، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ.
صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي موسى الأشعري رضي الله عنه مرفوعاً: « المَرْءُ مَعَ مَنْ أَحَبَّ ».
وفي رواية: قِيلَ لِلنبي صلى الله عليه وسلم : الرَّجُلُ يُحِبُّ القَوْمَ وَلَمَّا يَلْحَق بهم؟ قال: « المَرْءُ مَعَ مَنْ أَحَبَّ».
عن عبد الله بن مسعود رضي الله عنه قال: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، كَيفَ تَقُولُ فِي رَجُلٍ أحَبَّ قَومًا ولم يَلحَق بِهم؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «المَرْءُ مَعَ مَنْ أَحَبَّ».
अबू मूसा अशअरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "आदमी उसी के साध होगा, जिससे वह मोहब्बत करता है।"
एक और रिवायत में हैः नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछा गया कि एक आदमी कुछ लोगों से मोहब्बत करता है, लेकिन वह उन लोगों तक पहुँच नहीं पाता? तो आपने फ़रमायाः "आदमी उसी के साध होगा, जिससे वह मोहब्बत करता है।"
अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि एक आदमी अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया और कहने लगाः ऐ अल्लाह के रसूल, आप उस व्यक्ति के बारे में क्या कहते हैं, जो कुछ लोगों से मोहब्बत करता है, लेकिन उन लोगों तक पहुँच नहीं पाता? तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "आदमी उसी के साध होगा, जिससे वह मोहब्बत करता है।"
इसे दोनों रिवायतों के साथ बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जादोनों रिवायतों को मिलाकर सह़ीह़
हवाला
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415ه.
تطريز رياض الصالحين للشيخ فيصل المبارك، ط1، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة، الرياض، 1423 هـ.
دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين لمحمد علي بن محمد بن علان، ط4، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة، بيروت، 1425 ه.
رياض الصالحين للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428 هـ.
صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه.
صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت.
كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، ط1، كنوز إشبيليا، الرياض، 1430هـ.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ مَسعودٍ رضي الله عنه عن رَسولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم قال: «الطِّيَرَةُ شِرْكٌ، الطِّيَرَةُ شِرْكٌ، الطِّيَرَةُ شِرْكٌ، -ثلاثًا-»، وَمَا مِنَّا إِلَّا، وَلَكِنَّ اللهَ عَزَّ وَجَلَّ يُذْهِبُهُ بِالتَّوَكُّلِ.
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अपशगुन लेना शिर्क है। अपशगुन लेना शिर्क है। अपशगुन लेना शिर्क है। -आपने यह बात तीन बार कही।- तथा हममें से हर व्यक्ति के दिल में इस तरह की बात आती है, लेकिन सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह उसे अपने ऊपर भरोसे के ज़रिए दूर कर देता है।
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी सुनी जाने वाली या देखी जाने वाली चीज़, जैसे पक्षियों, जानवरों, अक्षम लोगों, संख्याओं या दिनों आदि का अपशगुन लेने से सावधान किया है। लेकिन यहाँ पक्षी का उल्लेख इसलिए किया कि अज्ञानता काल में उससे अपशगुन लेना एक आम बात थी। होता यह था कि अरब के लोग जब कोई काम, जैसे यात्रा या व्यापार आदि शुरू करने का इरादा करते, तो एक पक्षी उड़ाते। यदि पक्षी दाएँ ओर उड़ता, तो अच्छा शगुन लेते और उस काम में क़दम आगे बढ़ा देते। लेकिन अगर बाएँ ओर उड़ता, तो अपशगुन लेते और क़दम वापस पीछे खींच लेते। आपने इसे शिर्क बताया। शिर्क इसलिए कि भलाई लाने वाला और बुराई से बचाने वाला अल्लाह के सिवा कोई नहीं है।
आगे अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु ने बताया कि कभी-कभी मुसलमान के दिल में थोड़ा-बहुत अपशगुन आ जाता है। ऐसे में उसे अल्लाह पर भरोसा रखते हुए, असबाब को अपनाकर, इसे खतम कर देना चाहिए।
फ़ायदे
- अपशगुन शिर्क है। क्योंकि इसमें दिल का संबंध अल्लाह के अतिरिक्त किसी और से जुड़ जाता है।
- अहम बातों को दोहराने का महत्व, ताकि याद कर लिए जाएँ और दिल में बैठ जाएँ।
- अपशगुन अल्लाह पर भरोसे से ख़त्म हो जाता है।
- केवल अल्लाह पर भरोसा रखने और दिल को उसी से जोड़े रखने का आदेश।
हवाला
سنن أبي داود (6/ 54) (3915).
سنن ابن ماجه (4/ 560) (3538).
سنن الترمذي (3/ 258) (1614).
مسند أحمد (6/ 213) (3687).
الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص259).
الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص233).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن النُّعمان بن بَشير رضي الله عنه قال: سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ -وَأَهْوَى النُّعْمَانُ بِإِصْبَعَيْهِ إِلَى أُذُنَيْهِ-: «إِنَّ الْحَلَالَ بَيِّنٌ وَإِنَّ الْحَرَامَ بَيِّنٌ، وَبَيْنَهُمَا مُشْتَبِهَاتٌ لَا يَعْلَمُهُنَّ كَثِيرٌ مِنَ النَّاسِ، فَمَنِ اتَّقَى الشُّبُهَاتِ اسْتَبْرَأَ لِدِينِهِ وَعِرْضِهِ، وَمَنْ وَقَعَ فِي الشُّبُهَاتِ وَقَعَ فِي الْحَرَامِ، كَالرَّاعِي يَرْعَى حَوْلَ الْحِمَى يُوشِكُ أَنْ يَرْتَعَ فِيهِ، أَلَا وَإِنَّ لِكُلِّ مَلِكٍ حِمًى، أَلَا وَإِنَّ حِمَى اللهِ مَحَارِمُهُ، أَلَا وَإِنَّ فِي الْجَسَدِ مُضْغَةً، إِذَا صَلَحَتْ صَلَحَ الْجَسَدُ كُلُّهُ، وَإِذَا فَسَدَتْ فَسَدَ الْجَسَدُ كُلُّهُ، أَلَا وَهِيَ الْقَلْبُ».
नोमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है - यह कहते समय नोमान ने अपनी दो उंगलियों को अपने दोनों कानों की ओर बढ़ाया- : "निस्संदेह, हलाल स्पष्ट है और हराम भी स्पष्ट है तथा दोनों के बीच कुछ चीज़ें अस्पष्ट हैं, जिन्हें बहुत से लोग नहीं जानते। अतः, जो अस्पष्ट चीज़ों से बचा, उसने अपने धर्म और प्रतिष्ठा की रक्षा कर ली तथा जो अस्पष्ट चीज़ों में पड़ गया, वह हराम में पड़ गया। जैसे एक चरवाहा सुरक्षित चरागाह (पशुओं के चरने का स्थान) के आस-पास जानवर चराए, तो संभावना रहती है कि जानवर उसके अंदर चले जाएँ। सुन लो, हर बादशाह की सुरक्षित चरागाह होती है। सुन लो, अल्लाह की सुरक्षित चरागाह उसकी हराम की हुई चीज़ें हैं। सुन लो, शरीर के अंदर मांस का एक टुकड़ा है, जब वह सही रहेगा, तो पूरा शरीर सही रहेगा और जब वह बिगड़ेगा तो पूरा शरीर बिगड़ेगा। सुन लो, मांस का वह टुकड़ा, दिल है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम चीज़ों के बारे में एक साधारण सिद्धाँत बता रहे हैं। सिद्धाँत यह है कि चीज़ों के तीन प्रकार हैं। स्पष्ट हलाल चीज़ें, स्पष्ट हराम चीज़ें और ऐसी चीज़ें जिनका हलाल या हराम होना स्पष्ट न हो तथा वो हलाल हैं या हराम इस बात को बहुत-से लोग जानते न हों।
ऐसे में, जिसने अस्पष्ट चीज़ों को छोड़ दिया, तो हराम चीज़ों में पड़ने से बचने के कारण उसका दीन सुरक्षित रहेगा और अस्पष्ट चीज़ में लिप्त होने की वजह से उसपर जो लोगों की उंगलियाँ उठ सकती थीं, उससे उसका सम्मान भी सुरक्षित रहेगा। इसके विपरीत जो अस्पष्ट चीज़ों से दूर नहीं रहा, उसने खुद को या तो हराम में पड़ने के लिए या लोगों के लाँछन का सामना करने के लिए आगे कर दिया। इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अस्पष्ट चीज़ों में पड़ने वाले का एक उदाहरण दिया। फ़रमाया कि अस्पष्ट चीज़ों में पड़ने वाला उस चरवाहे की तरह है, जो अपने जानवर किसी सुरक्षित चरागाह के पास चरा रहा हो। यहाँ इस बात की संभावना बनी रहती है कि उसके जानवर निकट ही में स्थित सुरक्षित चरागाह में जाकर चरने लगें। बिल्कुल यही हाल संदेह वाले काम करने वाले का है। क्योंकि इससे वह हराम काम के निकट पहुँच जाता है और इस बात की संभावना बन जाती है कि वह हराम में पड़ जाए। फिर अंत में यह बताया है कि इन्सान के शरीर में मांस का एक टुकड़ा है। जब वह सही रहता है, तो पूरा शरीर सही रहता है और जब वह बिगड़ जाता है, तो पूरा शरीर बिगड़ जाता है। मांस का वह टुकड़ा दिल है।
फ़ायदे
- अस्पष्ट चीज़, जिसका हलाल या हराम होना स्पष्ट न हो, छोड़ देने की प्रेरणा।
हवाला
صحيح البخاري (1/ 20) (52).
صحيح مسلم (3/ 1219) (1599).
التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثا النووية (ص18).
شرح الأربعين النووية، لابن عثيمين (ص105).
فتح القوي المتين في شرح الأربعين وتتمة الخمسين، للعباد (ص41).
فتح الباري لابن حجر (4/ 291).
شرح النووي على مسلم (11/ 28).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال: إنه سمع نبي الله صلى الله عليه وسلم يقول: «لَو أَنَّكُمْ تَتَوَكَّلُونَ عَلَى اللهِ حَقَّ تَوَكُّلِهِ، لَرَزَقَكُمْ كَمَا يَرْزُقُ الطَّيْرَ، تَغْدُو خِمَاصًا وَتَرُوحُ بِطَانًا».
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा कि उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह कहते हुए सुना : "अगर तुम अल्लाह पर वैसा ही भरोसा करने लगो, जैसा भरोसा उसपर होना चाहिए, तो वह तुम्हें उसी तरह रोज़ी दे, जैसे चिड़ियों को रोज़ी देता है; वह सुबह को खाली पेट निकलती हैं और शाम को पेट भरकर लोटती हैं।"
इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमें इस बात की प्रेरणा दे रहे हैं कि हम दुनिया और दीन से संबंधित तमाम कामों में लाभ प्राप्त करने और हानि से बचने के मामले में अल्लाह पर भरोसा करें। क्योंकि देने वाला और रोकने वाला तथा नुक़सान करने वाला और लाभ देने वाला केवल अल्लाह है। इसी तरह हमें अल्लाह पर सच्चे भरोसे के साथ-साथ ऐसे काम करने चाहिएँ, जिनसे लाभ प्राप्त हो और हानि से बचा जा सके। जब हम ऐसा करेंगे, तो अल्लाह हमें उसी तरह रोज़ी देगा, जैसे पक्षियों को रोज़ी देता है, जो सुबह भूखे पेट निकलते हैं और शाम को पेट भरकर वापस होते हैं। दरअसल पक्षियों का सुबह और शाम निकलना रोज़ी तलाश करने के लिए किया जाने वाला काम ही तो है। ऐसा नहीं होता कि वह अल्लाह पर भरोसा करके बैठ जाएँ या सुस्ती से काम लें और उनको रोज़ी मिल जाए।
फ़ायदे
- अल्लाह पर भरोसा करने की फ़ज़ीलत तथा यह कि अल्लाह पर भरोसा रोज़ी प्राप्त करने का एक बहुत बड़ा सबब है।
- अल्लाह पर भरोसा साधनों को अपनाने के विरुद्ध नहीं है, क्योंकि आपने बताया कि जीविका की खोज में सुबह और शाम को निकलना अल्लाह पर वास्तविक भरोसे के विरुद्ध नहीं है।
- शरीयत दिल के कार्यों पर भी धियान देता है, क्योंकि अल्लाह पर भरोसा करना दिल का कार्य है।
- केवल साधनों पर भरोसा करना दीन की कमी को दर्शाता है, जबकि अल्लाह पर भरोसा करने के नाम पर साधनों को छोड़ देना बुद्धी की कमी को दर्शाता है।
हवाला
سنن الترمذي (4/ 166) (2344).
سنن ابن ماجه (5/ 266) (4164).
مسند أحمد (1/ 332) (205).
التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثًا النووية (ص103).
فتح القوي المتين في شرح الأربعين وتتمة الخمسين، للعباد (ص152).
الأحاديث الأربعون النووية وعليها الشرح الموجز المفيد، لعبد الله المحسن (ص91).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي كبشة عمرو بن سعد الأنماري رضي الله عنه مرفوعاً: «ثلاثة أقسم عليهن، وأحدثكم حديثاً فاحفظوه: ما نقص مال عبد من صدقة، ولا ظلم عبد مظلمة صبر عليها إلا زاده الله عزًا، ولا فتح عبد باب مسألة إلا فتح الله عليه باب فقر -أو كلمة نحوها- وأحدثكم حديثًا فاحفظوه»، قال: «إنما الدنيا لأربعة نفر: عبد رزقه الله مالاً وعلمًا، فهو يتقي فيه ربه، ويَصِلُ فيه رحمه، ويعلم لله فيه حقًا، فهذا بأفضل المنازل. وعبد رزقه الله علما، ولم يرزقه مالاً، فهو صادق النية، يقول: لو أن لي مالا لَعَمِلْتُ بعمل فلان، فهو بنيته، فأجرهما سواء. وعبد رزقه الله مالاً، ولم يرزقه علما، فهو يخبط في ماله بغير علم، لا يتقي فيه ربه، ولا يصل فيه رحمه، ولا يعلم لله فيه حقًا، فهذا بأخبث المنازل. وعبد لم يرزقه الله مالاً ولا علمًا، فهو يقول: لو أن لي مالا لعملت فيه بعمل فلان، فهو بنيته، فوزرهما سواء».
अबू कबशा अम्र बिन साद अन्मारी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "मैं तीन चीज़ों पर क़सम खाता हूँ और एक हदीस बताता हूँ, उसे याद कर लो। किसी बंदे का धन सदक़ा करने से कम नहीं होता, जिस बंदे पर अत्याचार होता है, फिर वह उसपर धैर्य रखता है, तो अल्लाह उसका सम्मान बढ़ा देता है और जो बंदा माँगने का दरवाज़ा खोलता है, अल्लाह उसके लिए निर्धनता का दरवाज़ा खोल देता है -अथवा इसी तरह का कोई शब्द फ़रमाया-। एक हदीस सुनाता हूँ, उसे याद कर लो।" फ़रमाया : "दुनिया चार प्रकार के लोगों के लिए है : एक वह बंदा, जिसे अल्लाह ने धन एवं ज्ञान प्रदान किया है और वह उसके प्रति अपने रब से भय खाता है और उसके द्वारा अपने निकटवर्तियों का हक़ अदा करता है तथा उसमें अल्लाह के अधिकार को जानता है। यह सबसे उत्तम दर्जा है। दूसरा वह बंदा है, जिसे अल्लाह ने ज्ञान प्रदान किया है और धन से वंचित रखा है, लेकिन उसकी नीयत सच्ची है। वह कहता है : यदि मेरे पास धन होता, तो मैं अमुक व्यक्ति की तरह काम करता। अतः, उसे उसकी नीयत के अनुरूप प्रतिफल मिलेगा और दोनों का सवाब बराबर होगा। तीसरा वह बंदा है, जिसे अल्लाह ने धन दिया है, लेकिन ज्ञान नहीं दिया है। अतः, वह अपना धन ज्ञान के बिना खर्च करता है। धन के बारे में न अल्लाह से डरता है, न निकटवर्तियों का हक़ अदा करता है और न उसमें अल्लाह के अधिकार को जानता है। यह सबसे बुरा दर्जा है। जबकि चौथा व्यक्ति वह है, जिसे अल्लाह ने न धन दिया है और न ही ज्ञान दिया है। वह कहता हैः यदि मेरे पास धन होता, मैं अमुक व्यक्ति (अर्थात इस हदीस में उल्लिखित तीसरे व्यक्ति) की तरह कार्य करता। अतः, उसकी नीयत का एतबार होगा और इन दोनों का पाप बराबर होगा।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
الجامع الكبير (سنن الترمذي), تأليف: محمد بن عيسى الترمذي, تحقيق وتعليق:أحمد محمد شاكر ومحمد فؤاد عبد الباقي وإبراهيم عطوة عوض -شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي - مصر
الطبعة: الثانية، 1395 هـ - 1975 م
صحيح الجامع وزيادته, تأليف: محمد ناصر الدين الألباني, الناشر: المكتب الإسلامي.
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين, تأليف: سليم بن عيد الهلالي, دار ابن الجوزي.
مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح, تأليف: علي بن سلطان محمد الملا الهروي القاري, الناشر: دار الفكر, ط1 عام 1422ه.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه مرفوعاً: «يقول اللهُ: إذا أراد عبدي أنْ يعملَ سيئةً، فلا تكتبوها عليه حتى يعملَها، فإنْ عَمِلها فاكتبوها بمثلِها، وإنْ تركها مِن أجلي فاكتبوها له حسنةً، وإذا أراد أنْ يعملَ حسنةً فلم يعملها فاكتبوها له حسنةً، فإنْ عملها فاكتبوها له بعشر أمثالها إلى سبعِ مائة ضِعْفٍ».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : “अल्लाह कहता है : जब मेरा बंदा किसी गुनाह का इरादा करे, तो उसे न लिखो, यहाँ तक कि उसे कर डाले। यदि वह उस गुनाह को कर डालता है, तो बस उतना ही लिखो जितना उसने किया हो। और यदि मेरे (भय के) कारण उस गुनाह को छोड़ देता है, तो उसके लिए एक नेकी लिख दो। इसी प्रकार यदि वह कोई नेकी करने का इरादा करे, लेकिन उसे कर न डाले, तो उसके लिए एक नेकी लिख दो। और यदि वह उस नेकी को कर ले, तो उसे उसके लिए दस गुना से लेकर सात सौ गुना तक लिख दो।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
इस हदीस में उन फ़रिश्तों को संबोधित किया गया है जो इन्सान का कर्म लिखने के कार्य पर नियुक्त हैं। यह हदीस इन्सान पर अल्लाह के अनुग्रह और उसकी क्षमा को प्रदर्शित करती है। आपने फ़रमाया : "जब मेरा बंदा किसी गुनाह का इरादा करे, तो उसे न लिखो, यहाँ तक कि उसे कर डाले।" अमल से दिल तथा शरीर के अंगों द्वारा किया जाने वाला अमल भी मुराद होता है और यहाँ यही मुराद है। क्योंकि इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि दिल के अमल की भी पकड़ होती है और इन्सान को उसका भी बदला दिया जाता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "तथा जो उसमें अत्याचार से अधर्म का विचार करेगा, हम उसे दुःखदायी यातना चखाएँगे।" तथा सहीह हदीस में है : "जब दो मुसलमान अपनी-अपनी तलवार लेकर आपस में भिड़ जाते हैं, तो वध करने वाला और वध किया गया व्यक्ति, दोनों जहन्नम में प्रवेश करेंगे।" सहाबा ने पूछा कि वध करने वाले की बात तो समझ में आती है, लेकिन वध किए हुए व्यक्ति को जहन्नम क्यों जाना पड़ेगा? तो आपने कहा : "इसलिए कि वह अपने भाई की हत्या की इच्छा रखता था।" क़ुरआन एवं हदीस के ये स्पष्ट उल्लेख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के शब्द "जब मेरा बंदा किसी गुनाह का इरादा करे, तो उसे न लिखो, यहाँ तक कि उसे कर डाले" की व्यापकता को सीमित करने के लिए काफ़ी हैं। फिर यह, गुनाह के इरादे के बारे में कहे हुए आपके शब्द "उसे उसपर लिखा नहीं जाता है" के विरुद्ध नहीं है, क्योंकि दिल का इरादा एवं प्रतिज्ञा भी कर्म है।
आपने फ़रमाया : "यदि वह उस गुनाह को कर डालता है, तो बस उतना ही लिखो जितना उसने किया है।" यानी एक ही गुनाह। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "जो (क़यामत के दिन) एक सत्कर्म लेकर (अल्लाह) से मिलेगा, उसे उसके दस गुना प्रतिफल मिलेगा और जो कुकर्म लाएगा, तो उसको उसी के बराबर कुफल दिया जाएगा तथा उनपर अत्याचार नहीं किया जाएगा।" एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "जिसने दुष्कर्म किया, तो उसे उसी के समान प्रतिकार दिया जाएगा तथा जो सुकर्म करेगा; नर अथवा नारी में से और वह ईमान वाला (एकेश्वरवादी) हो, तो वही प्रवेश करेंगे स्वर्ग में। जीविका दिए जाएंगे उसमें अगणित।"
आपने कहा : "और यदि मेरे (भय के) कारण उस गुनाह को छोड़ देता है, तो उसके लिए एक नेकी लिख दो।" गुनाह को छोड़ने के साथ अल्लाह के भय तथा उसकी हया के कारण छोड़ने की शर्त रखी गई है। यदि कोई विवश होने के कारण, सृष्टि के भय से या किसी अन्य कारण से छोड़ता है, तो उसके लिए एक नेकी नहीं लिखी जाएगी, बल्कि हो सकता है कि उसके खाते में गुनाह ही लिखा जाए।
आपने फ़रमाया : "और यदि वह कोई नेकी करने का इरादा करे, लेकिन उसे न करे, तो उसके लिए एक नेकी लिख दो..." यह दरअसल दयावान एवं उपकारी अल्लाह का अनुग्रह है। अतः सारी प्रशंसा एवं उपकार उसी का है। भला इससे बढ़कर उपकार क्या हो सकता है कि नेकी का इरादा करने पर एक पूरी नेकी मिले और नेक काम करने पर दस से सात सौ गुना तक नेकी मिले!
इस हदीस में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस कथन की निसबत उच्च एवं महान अल्लाह की ओर यह कहते हुए की : "अल्लाह कहता है : जब मेरा बंदा इरादा करता है"। इसमें आपने अल्लाह का यह गुण बयान किया है। यह कथन उस विधान का अंश है, जिसमें अल्लाह का अपने बंदों से वादा और उसका उनपर उपकार है। यह क़ुरआन के अतिरिक्त है और सृष्टि नहीं है। अतः अल्लाह की वाणी सृष्टि नहीं है।
हवाला
صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه.
صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.
شرح كتاب التوحيد من صحيح البخاري، لعبد الله بن محمد الغنيمان، الناشر: مكتبة الدار، المدينة المنورة، الطبعة: الأولى، 1405 هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com