عن عبد الله بن عمرو رضي الله عنهما قال: أقبَلَ رجل إلى نبي الله صلى الله عليه وسلم فقال: أُبَايِعُكَ على الهجرة والجهاد أَبْتَغِي الأجر من الله تعالى قال: «فَهَل لَكَ من وَالِدَيك أحد حيٌّ؟» قال: نعم، بل كلاهما، قال: «فتبتغي الأجر من الله تعالى؟» قال: نعم، قال: «فَارْجِع إلى وَالِدَيك، فَأَحْسِن صُحْبَتَهُمَا».
وفي رواية لهما: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فاستأذنه في الجهاد، فقال: «أَحَيٌّ والداك؟»، قال: نعم، قال: «فَفِيهِمَا فجاهد».
अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि एक व्यक्ति नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया तथा कहा किः मैं आपसे हिजरत करने तथा जिहाद करने पर अल्लाह (तआला) से प्रतिफल की उम्मीद करते हुए बैअ़त करता हूँ। आपने फ़रमायाः क्या तुम्हारे माता-पिता में से कोई जीवित है? उन्होंने कहाः हाँ, बल्कि दोनों जीवित हैं। आपने पूछाः क्या तुम अल्लाह से प्रतिफल चाहते हो? उन्होंने कहाः हाँ। आपने फ़रमायाः तब तुम अपने माता-पिता के पास लौट जाओ तथा उनके साथ अच्छा व्यवहार करो।
बुख़ारी तथा मुस्लिम की एक रिवायत में है कि एक व्यक्ति नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया तथा जिहाद में सम्मिलित होने की आज्ञा मांगी, तो आपने फ़रमायाः क्या तुम्हारे माता-पिता जीवित हैं? उन्होंने कहाः हाँ। तो आपने फरमायाः उनके प्रति जिहाद करो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास एक व्यक्ति आया और आपसे अल्लाह के मार्ग में जिहाद तथा हिजरत की इच्छा प्रकट की। वह अपने पीछे अपने माता-पिता को छोड़ आया था और अबू दाऊद की रिवायत में है कि दोनों उसके मारे जाने की आशंका से रोए जा रहे थे। अतः अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उससे पूछा : "क्या तेरे माता-पिता में से कोई जीवित है?" उसने कहा कि एक नहीं, बल्कि दोनों जीवित हैं। आपने पूछा : "क्या तुम अल्लाह से प्रतिफल चाहते हो?" उसने कहा कि हाँ, तो आपने फ़रमाया : "अपने माता-पिता के पास लौट जाओ और उनकी अच्छी तरह सेवा करो।" जबकि अबू दाऊद की एक रिवायत में है : "उनके पास लौट जाओ और जिस तरह उनको रुलाया है, उसी तरह उनको हँसाओ।" अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उस व्यक्ति को उस काम की ओर लौटा दिया, जो उसके हक़ में बेहतर तथा अधिक ज़रूरी था। यानी माता-की ओर लौट जाना और उनकी अच्छी तरह सेवा करना। क्योंकि यह, उनकी सेवा, उनकी संतुष्टि और उनके आदेश के अनुपालन में अपने नफ़्स से जिहाद करना है। बुख़ारी एवं मुस्लिम की एक रिवायत में है : "अतः तुम उन दोनों के संबंध में जिहाद करो।"
एक अन्य हदीस में स्पष्ट रूप से बता दिया गया है कि माता-पिता की सेवा करना, उनकी बात मानना और उनके साथ अच्छा व्यवहार करना अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने से उत्तम है। अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- की एक रिवायत में है कि एक व्यक्ति अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और आपसे सबसे अच्छा कर्म जानना चाहा, तो आपने फ़रमाया : "सबसे अच्छा कर्म नमाज़ा है।" उसने पूछा कि उसके बाद सबसे अच्छा कर्म कौन-सा है? तो फ़रमाया : "उसके बाद जिहाद है।" उसने कहा कि मेरे माता-पिता जीवित हैं, तो आपने फ़रमाया : "तुम्हारा अपने माता-पिता की सेवा करना इससे अच्छा है।" लेकिन हाँ, यदि जिहाद व्यक्तिगत रूप से अनिवार्य हो, तो उसे माता-पिता की सेवा पर प्राथमिकता प्राप्त होगी।
हवाला
منار القاري شرح مختصر صحيح البخاري، المؤلف: حمزة محمد قاسم، راجعه: الشيخ عبد القادر الأرناؤوط، عني بتصحيحه ونشره: بشير محمد عيون
الناشر: مكتبة دار البيان، دمشق - الجمهورية العربية السورية، مكتبة المؤيد، الطائف - المملكة العربية السعودية،عام النشر: 1410هـ - 1990م.
بهجة الناظرين، لسليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي.
نزهة المتقين، د. مصطفى سيعد الخن، د. مصطفى البغا، محي الدين مستو، علي الشرجبي، محمد أمين لطفي، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة الأولى،1397هـ - 1977م، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ - 1987م.
شرح رياض الصالحين، المؤلف: محمد بن صالح بن محمد العثيمين، الناشر: دار الوطن للنشر، الرياض، الطبعة: 1426ه.
دليل الفالحين، محمد بن علان، دار الكتاب العربي.
رياض الصالحين، للنووي، تحقيق: د. ماهر بن ياسين الفحل، الناشر: دار ابن كثير للطباعة والنشر والتوزيع، دمشق - بيروت، الطبعة: الأولى، 1428هـ - 2007م.
صحيح البخاري، محمد بن اسماعيل البخاري، دار طوق النجاة، الطبعة: الأولى، 1422هـ.
صحيح مسلم، المؤلف: مسلم بن الحجاج أبو الحسن القشيري النيسابوري، المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي - بيروت.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أُسَير بن عمرو، ويقال: ابن جابر قال: كَانَ عُمر بن الخطاب رضي الله عنه إِذَا أَتَى عَلَيه أَمْدَادُ أَهْلِ اليَمَن سَأَلَهُم: أَفِيكُم أُوَيس بنُ عَامِر؟ حَتَّى أَتَى عَلَى أُوَيس رضي الله عنه فقال له: أَنْت أُوَيس بنُ عَامِر؟ قال: نَعَم، قال: مِنْ مُرَادٍ ثُمَّ مِنْ قَرْنٍ؟ قَالَ: نَعَم، قَال: فَكَانَ بِكَ بَرَصٌ، فَبَرَأَتَ مِنُه إِلاَّ مَوْضِعّ دِرهَم؟ قال: نعم، قَالَ: لَكَ وَالِدة؟ قال: نعم، قال: سَمِعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «يَأتِي عَلَيكُم أُوَيس بنُ عَامِر مَعَ أَمْدَادِ أَهْلِ اليَمَن مِنْ مُرَاد، ثُمَّ مِنْ قَرْن كَانَ بِهِ بَرَصٌ، فَبَرَأَ مِنْهُ إِلاَّ مَوضِعَ دِرْهَم، لَهُ وَالِدَة هُوَ بِهَا بَرُّ، لَوْ أَقْسَمَ عَلَى الله لَأَبَرَّه، فَإِنْ اسْتَطَعْتَ أَنْ يَسْتَغْفِرَ لَكَ فَافْعَلْ» فَاسْتَغْفِرْ لِي فَاسْتَغْفَرَ لَهُ، فَقَالَ لَه عُمر: أَيْنَ تُرِيد؟ قَالَ: الكُوفَة، قال: أَلاَ أَكتُبُ لَكَ إِلَى عَامِلِهَا؟ قال: أَكُون فِي غَبْرَاءِ النَّاسِ أَحَبُّ إِلَيَّ، فَلَمَّا كَانَ مِنَ العَام الْمُقْبِل حَجَّ رَجُلٌ مِنْ أَشْرَافِهِم، فَوَافَقَ عُمَر، فَسَأَلَه عَنْ أُوَيس، فقال: تَرَكْتُهُ رَثَّ البَّيت قَلِيلَ الْمَتَاعِ، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «يَأْتِي عَلَيكُم أُوَيس بنُ عَامِر مَعَ أَمْدَادٍ مِنْ أَهْلِ اليَمَن مِنْ مُرَاد، ثُمَّ مِنْ قَرْن، كَانَ بِهِ بَرَص فَبَرَأَ مِنْه إِلاَّ مَوْضِعَ دِرْهَم، لَهُ وَالِدَة هُوَ بِهَا بَرٌّ لَوْ أَقْسَمَ عَلى الله لَأَبَرَّهُ، فَإِنْ اسْتَطَعْتَ أَنْ يَسْتَغْفِر لَكَ، فَافْعَلْ» فَأَتَى أُوَيسًا، فقال: اسْتَغْفِر لِي، قال: أَنْتَ أَحْدَثُ عَهْدًا بِسَفَرٍ صَالِحٍ، فَاسْتَغْفِرْ لِي، قال: لَقِيتَ عمر؟ قال: نَعَم، فاستغفر له، فَفَطِنَ لَهُ النَّاس، فَانْطَلَقَ عَلَى وَجْهِهِ.
وفي رواية أيضا عن أُسَير بن جابر: أنَّ أَهلَ الكُوفَةِ وَفَدُوا على عمر رضي الله عنه وفيهم رَجُلٌ مِمَّن كان يَسْخَرُ بِأُوَيْسٍ، فقال عمر: هَل هاهُنَا أَحَدٌ مِنَ القَرَنِيِّين؟ فَجَاء ذلك الرجل، فقال عمر: إِنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قَدْ قال: «إِنَّ رَجُلاً يَأْتِيكُم مِنَ اليَمَنِ يُقَالُ لَهُ: أُوَيْسٌ، لاَ يَدَعُ بِاليَمَنِ غَيرَ أُمٍّ لَهُ، قَد كَان بِهِ بَيَاضٌ فَدَعَا الله تعالى ، فَأَذْهَبَهُ إِلاَّ مَوضِعَ الدِّينَارِ أَو الدِّرْهَمِ، فَمَنْ لَقِيَهُ مِنْكُمْ، فَلْيَسْتَغْفِر لَكُم».
وفي رواية له: عن عمر رضي الله عنه قال: إِنِّي سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «إِنَّ خَيرَ التَّابِعِين رَجُلٌ يُقَال لَهُ: أُوَيسٌ، وَلَهُ وَالِدَةٌ وَكَانَ بِهِ بَيَاضٌ، فَمُرُوهُ، فَلْيَسْتَغْفِر لَكُم».
उसैर बिन अम्र तथा कुछ लोगों के अनुसार उसैर बिन जाबिर का वर्णन है, वह कहते हैं कि उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अंहु) के पास जब भी यमन से सहायक सैन्यदल आते, तो वह पूछते थे कि क्या तुम्हारे बीच उवैस बिन आमिर हैं? यहाँ तक एक सैन्यदल के साथ उवैस बिन आमिर आ गए। चुनांचे उनसे कहाः क्या आप उवैस बिन आमिर हैं? उत्तर दियाः हाँ! फ़रमायाः आप मुराद क़बीले की क़र्न शाखा से हैं? कहाः हाँ! फ़रमायाः आपके शरीर पर सफ़ेद दाग़ थे, जो एक दिरहम के बराबर स्थान को छोड़कर ठीक हो गए हैं? फ़रमायाः हाँ! फ़रमायाः आपकी माता जीवित हैं? कहाः हाँ! फ़रमायाः मैंने अल्लाह रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुना हैः "तुम्हारे पास यमन से आने वाले सहायक सैन्यदलों के साथ मुराद क़बीले की क़र्न शाखा का एक व्यक्ति उवैस बिन आमिर आएगा। उसके शरीर पर सफ़ेद दाग रहे होंगे, जो एक दिरहम के बराबर स्थान को छोड़कर ठीक हो गए होंगे। उसकी माता जीवित होगी, जिसके साथ वह अच्छा व्यवहार कर रहा होगा। अगर वह अल्लाह पर क़सम खा ले, तो अल्लाह उसकी क़सम को पूरा करेगा। अगर यह हो सके कि वह तुम्हारे लिए क्षमा याचना करे, तो उससे ऐसा करवाना।" अतः, आप मेरे लिए क्षमा याचना करें। चुनांचे उवैस बिन आमिर ने उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) के लिए क्षमा याचना की। उसके बाद उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने उनसे कहाः आप कहाँ जाना चाहते हैं? उन्होंने उत्तर दियाः कूफ़ा। फ़रमायाः क्या मैं आपके लिए कूफ़ा के शासक के नाम एक पत्र लिख दूँ? उन्होंने उत्तर दियाः मुझे ग़रीब तथा गुमनाम लोगों के बीच रहना अधिक पसंद है। जब अगले साल कूफ़ा के सम्मानित लोगों में से एक व्यक्ति हज के लिए आया, तो उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) से उसकी मुलाक़ात हो गई। उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने उससे उवैस के बारे में पूछा, तो उसने बतायाः मैंने उन्हें इस हाल में छोड़ा है कि उनका जीवन बहुत सादा है और वह सामान भी बहुत कम रखते हैं। तो फ़रमायाः मैंने अल्लाह रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुना हैः "तुम्हारे पास यमन से आने वाले सहायक सैन्यदलों के साथ मुराद क़बीले की क़र्न शाखा का एक व्यक्ति उवैस बिन आमिर आएगा। उसके शरीर पर सफ़ेद दाग रहे होंगे, जो एक दिरहम के बराबर स्थान को छोड़कर ठीक हो गए होंगे। उसकी माता जीवित होगी, जिसके साथ वह अच्छा व्यवहार कर रहा होगा। अगर वह अल्लाह पर क़सम खा ले, तो अल्लाह उसकी क़सम को पूरा करेगा। अगर यह हो सके कि वह तुम्हारे लिए क्षमा याचना करे, तो उससे ऐसा करवाना।" चुनांचे यह यमनी व्यक्ति हज के बाद उवैस के पास गया और उनसे कहा कि मेरे लिए क्षमा याचना कीजिए। परन्तु, उन्होंने उत्तर दियाः तुम एक मुबारक सफ़र से नए-नए आए हो, इसलिए ख़ुद तुम मेरे लिए क्षमा याचना करो। फिर (मामले को भाँपते हुए) कहाः क्या तुमको उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) मिले थे? उसने कहाः हाँ! तो फिर उसके लिए क्षमा याचना की। इससे लोग उन्हें पहचान गए और वह वहाँ से कहीं चल दिए।
उसैर बिन जाबिर ही की एक रिवायत में है कि कूफ़ा के लोगों का एक प्रतिनिधि मंडल उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के पास आया। उनके अंदर एक व्यक्ति ऐसा भी था, जो उवैस का उपहास करने वालों में शामिल था। चुनांचे उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने कहाः क्या यहाँ क़र्न क़बीले का कोई व्यक्ति है? तो वही व्यक्ति आया। चुनांचे, उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने कहाः अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया हैः "तुम्हारे पास एक यमनी व्यक्ति आएगा, जिसे उवैस कहा जाएगा। वह यमन में केवल अपनी माँ को छोड़कर आया होगा। उसके शरीर पर सफेद दाग रहे होंगे, लेकिन अल्लाह से दुआ करने के कारण एक दीनार या दिरहम के बराबर स्थान को छोड़कर ठीक हो गए होंगे। तुममें से जो उससे मिले, वह उससे तुम्हारे लिए क्षमा याचना ज़रूर करवाए।"
तथा उन्हीं की एक रिवायत में हैः "उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुना हैः "सबसे उत्तम ताबेई एक व्यक्ति है, जो उवैस कहा जाएगा। उसकी माँ जीवित होगी और उसके शरीर पर सफ़ेद दाग होंगे। उससे कहना कि वह तुम्हारे लिए क्षमा याचना करे।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415هـ.
تطريز رياض الصالحين، للشيخ فيصل المبارك، ط1، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة، الرياض، 1423هـ.
رياض الصالحين للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428هـ.
كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، برئاسة حمد بن ناصر العمار، ط1، كنوز إشبيليا، الرياض، 1430هـ.
صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.
دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لابن علان، نشر دار الكتاب العربي.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عبد الله بن عمر رضي الله عنهما أَنَّ رَجُلاً مِنَ الأعرَاب لَقِيهَ بِطَريق مَكَّة، فَسَلَّم عَلَيه عَبد الله بنُ عمر، وَحمَلهُ على حمار كان يركَبُهُ، وَأعطَاه عِمَامَة كَانت على رأسه، قال ابن دينار: فقُلنا له: أَصْلَحَك الله، إنَّهم الأعراب وهُم يَرْضَون بِاليَسِير، فقال عبدُ الله بنَ عُمر: إِنَّ أَبَا هَذَا كَانَ وُدًّا لِعُمر بنِ الخطَّاب رضي الله عنه وإنِّي سَمِعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «إِنَّ أَبَرَّ البِرِّ صِلَةُ الرَّجُل أَهْلَ وُدِّ أَبِيه».
وفي رواية عن ابن دينار، عن ابن عمر: أنَّه كان إذَا خَرَج إلى مكة كان له حمار يَتَرَوَّحُ عليه إذا ملَّ رُكُوبَ الرَّاحِلة، وَعِمَامة يَشُدُّ بها رأسه، فَبينَا هو يومًا على ذلك الحمار إِذْ مَرَّ بِهِ أَعْرَابِي، فقال: أَلَسْتَ فُلاَن بنَ فُلاَن؟ قال: بَلَى. فَأَعْطَاهُ الحِمَار، فقال: ارْكَب هَذَا، وَأَعْطَاهُ العِمَامَةَ وَقَالَ: اشْدُدْ بِهَا رَأْسَكَ، فَقَالَ لَهُ بَعض أصحَابِه: غفر الله لك أَعْطَيت هذا الأعرابي حمارا كنت تَرَوَّحُ عليه، وعِمَامَة كُنتَ تشدُّ بها رأسَك؟ فقال: إِنِّي سمِعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «إِنَّ مِنْ أَبَرِّ البِّر أَنْ يَصِلَ الرَّجُلُ أَهْلَ وُدَّ أَبِيهِ بَعْدَ أَنْ يُوَلِّيَ» وَإِنَّ أَبَاه كان صَدِيقًا لِعُمَرَ رضي الله عنه .
अब्दुल्लाह बिन उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि मक्का के रास्ते में उन्हें एक देहात का रहने वाला मिला। अब्दुल्लाह बिन उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- ने उसे सालम किया, खुद जिस गधे की सवारी करते थे, उसपर सवार किया और खुद जो पगड़ी बाँधा करते थे, वह उसे प्रदान कर दी। इब्ने दीनार का कहना है कि यह देखकर हमने उनसे कहाः अल्लाह आपका भला करे। यह तो देहात के रहने वाले लोग हैं। थोड़ा कुछ मिलने पर संतुष्ट हो जाते हैं! तो अब्दुल्लाह बिन उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- ने कहाः वास्तव में, इसका पिता उमर बिन ख़त्ताब- रज़ियल्लाहु अन्हु- का दोस्त था और मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुना हैः सबसे बड़ी भलाई यह है कि आदमी अपने पिता के दोस्तों के साथ अच्छा व्यवहार करे।
तथा एक रिवायत में इब्ने दीनार, अब्दुल्लाह बिन उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- के बारे में कहते हैं कि जब वह मक्का निकलते तो उनके साथ एक गधा होता था। जब ऊँट की सवारी से थक जाते तो उसपर बैठते, तथा एक पगड़ी होती, जिसे सिर पर बाँधते। एक दिन वह गधे पर सवार थे कि उनके निकट से एक देहाती गुज़रा। उन्होंने कहाः क्या तुम अमुक के बेटे अमुक नहीं हो? उसने कहाः हाँ, हूँ तो ज़रूर। अतः, उसे गधा देते हुए कहा कि उसपर सवार हो जाओ तथा पगड़ी देते हुए कहा कि इसे बाँध लो। यह देखकर उनके कुछ साथियों ने कहाः अल्लाह आपको क्षमा करे! आपने इस देहाती को वह गधा दे दिया, जिसपर थकावट दूर करने के लिए सवार होते थे और वह पगड़ी दे दी, जिसे सिर पर बाँधा करते थे? उन्होंने कहाः मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुना हैः सबसे बड़ी भलाइयों में से एक यह है कि आदमी अपने पिता की मृत्यु के बाद उसके दोस्तों के साथ अच्छा व्यवहार करे। तथा इसका पिता उमर- रज़ियल्लाहु अन्हु- का दोस्त था।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415هـ.
تطريز رياض الصالحين، للشيخ فيصل المبارك، ط1، تحقيق: عبد العزيز بن عبد الله آل حمد، دار العاصمة، الرياض، 1423 هـ.
رياض الصالحين، للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428هـ.
رياض الصالحين، ط4، تحقيق: عصام هادي، وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية القطرية، دار الريان، بيروت، 1428هـ.
كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، ط1، كنوز إشبيليا، الرياض، 1430هـ.
شرح رياض الصالحين، للشيخ ابن عثيمين، دار الوطن للنشر، الرياض، 1426هـ.
صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «رَغِمَ أَنْفُ، ثُمَّ رَغِمَ أَنْفُ، ثُمَّ رَغِمَ أَنْفُ»، قِيلَ: مَنْ؟ يَا رَسُولَ اللهِ قَالَ: «مَنْ أَدْرَكَ أَبَوَيْهِ عِنْدَ الْكِبَرِ، أَحَدَهُمَا أَوْ كِلَيْهِمَا فَلَمْ يَدْخُلِ الْجَنَّةَ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "वह व्यक्ति अपमानित हो, फिर वह व्यक्ति अपमानित हो, फिर वह व्यक्ति अपमानित हो।" किसी ने पूछा : कौन ऐ अल्लाह के रसूल? फ़रमाया : "जिसने अपने माता-पिता को बुढ़ापे में पाया, चाहे दोनों में से एक को पाया हो या दोनों को, परन्तु (उनकी सेवा करके) जन्नत में दाखिल नहीं हुआ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी के लिए अपमान एवं तिरस्कार की बद-दुआ करते हुए नाक मिट्टी में मिलने तक की बात कह डाली और वह भी यह बात तीन बार कही। किसी ने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! यह बद-दुआ आप किसके विरुद्ध फ़रमा रहे हैं?
आपने कहा : जिसने अपने माता-पिता या दोनों में से एक को बुढ़ापे में पाया और दोनों की सेवा करके जन्नत में दाख़िल होने का सामान न कर सका। न उनके साथ अच्छा व्यवहार किया और न उनका आज्ञाकारी बना।
फ़ायदे
- माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करना ज़रूरी है। उनकी आज्ञा का पालन जन्नत में प्रवेश दिलाएगा। ख़ास तौर से उनके बुढ़ापे एवं निर्बलता की अवस्था में।
- माता-पिता की अवज्ञा बड़ा गुनाह है।
हवाला
صحيح مسلم (4/ 1978) (2551).
بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (1/ 394).
نزهة المتقين، لمجموعة من الباحثين (1/ 308).
فيض القدير شرح الجامع الصغير، زين الدين المناوي (4/ 34).
شرح النووي على مسلم، (16/ 108).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «لاَ يَجْزِي ولدٌ والدًا إلا أن يجده مملوكًا، فَيَشْتَرِيَهُ فَيُعْتِقَهُ».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः कोई संतान अपने पिता का बदला चुका नहीं सकती, सिवाय इसके कि उसे गुलामी की अवस्था में पाए और ख़रीदकर आज़ाद कर दे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
- صحيح البخاري، للإمام محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ.
- صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي.
- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي- الطبعة الأولى1418ه.
- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشرة، 1407هـ.
- كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا- الطبعة الأولى1430ه.
- دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لمحمد علي بن محمد بن علان بن إبراهيم البكري، تحقيق خليل مأمون شيحا-دار المعرفة-بيروت-الطبعة الرابعة1425ه.
- شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، مَنْ أحقُّ الناس بِحُسن صَحَابَتِي؟ قال: «أمك» قال: ثم مَنْ ؟ قال: «أمك»، قال: ثم مَنْ؟ قال: «أمك»، قال: ثم مَنْ؟ قال: «أبوك». متفق عليه. وفي رواية: يا رسول الله، مَنْ أحقُّ بحُسْنِ الصُّحْبَةِ؟ قال: «أمك، ثم أمك، ثم أمك، ثم أباك، ثم أدْنَاك أدْنَاك».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि एक व्यक्ति अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! लोगों के अंदर कौन मेरे अच्छे व्यवहार का सबसे अधिक हक़दार है? आपने कहाः तेरी माँ। उसने कहाः फिर कौन? फ़रमायाः तेरी माँ। उसने कहाः फिर कौन? फ़रमायाः तेरी माँ। उसने कहाः फिर कौन? फ़रमायाः तेरा बाप। (बुख़ारी एवं मुस्लिम) तथा एक रिवायत में हैः ऐ अल्लाह के रसूल! अच्छे व्यवहार का सबसे हक़दार कौन है? फ़रमायाः तेरी माँ, फिर तेरी माँ, फिर तेरी माँ, फिर तेरा बाप, फिर क्रमशः तेरा सबसे निकट का रिश्तेदार।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
इस हदीस से मालूम हुआ कि माता एवं पिता दोनों का अधिकार है कि बच्चे उनके साथ अच्छा व्यवहार करें और पूर्ण रूप से उनकी देखभाल करें। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "तथा दुनिया में उनके साथ अच्छा व्यवहार करो।" लेकिन माता का अधिकार पिता की तुलना में कई गुना अधिक है। क्योंकि इस हदीस में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने पिता के अधिकार का उल्लेख माता के अधिकार को अच्छी तरह उजागर करने के लिए उसका ज़िक्र तीन बार करने के बाद किया है। हालाँकि बच्चे के पालन-पोषण में माता एवं पिता दोनों की भूमिका होती है। पिता उसके लिए धन जुटाता है और उसकी देखभाल करता है तो माता उसे खिलाने, पिलाने, कपड़ा पहनाने और उसके लिए बिस्तर लगाने आदि कामों में स्वयं को व्यस्त रखती है। लेकिन इसके बावजूद माता का पद अधिक ऊँचा इसलिए है कि माता बच्चे के लिए जिस प्रकार का कष्ट उठाती है, पिता नहीं उठाता। वह नौ महीने तक कष्ट झेलते हुए उसे अपने पेट में रखती है, उसे जन्म देते समय इस क़दर कष्ट का समाना करती है कि उसे मौत सामने दिखाई देने लगती है, दो सालों तक उसे दूध पिलाती है, उसके आराम के लिए रातों की नींद क़ुरबान करती है और उसके हित के लिए जो कुछ किया जा सकता है, करती है, चाहे उसे जितनी भी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इन्हीं बात का उल्लेख करते हुए अल्लाह तआला ने कहा है : "और हमने निर्देश दिया है मनुष्य को, अपने माता-पिता के साथ उपकार करने का। उसे गर्भ में रखा है उसकी माँ ने दुःख झेलकर तथा जन्म दिया उसे दुःख झेलकर तथा उसके गर्भ में रखने तथा दूध छुड़ाने की अवधि तीस महीने रही।" आप देख सकते कि अल्लाह ने इस आयत में इनसान को अपने माता-पिता के साथ उपकार करने का निर्देश दिया है और इसके लिए कारण वही बताए हैं, जिनका सामना माता को करना पड़ता है, जो उसके अधिकार के महत्व को दर्शाता है।
माता-पिता के साथ अच्छे व्यवहार का एक पक्ष यह है कि यदि वे कंगाल हों तो उनके खाने-पीने, रहने-सहने और वस्त्र आदि के लिए धन खर्च किया जाए। बल्कि यदि वे निम्न अथवा मध्यम स्तर का जीवन व्यतीत कर रहे हों और तुम उच्च स्तर का जीवन गुज़ार रहे हो, तो उन्हें अपनी श्रेणी में ले आओ या अपने से भी उँची श्रेणी प्रदान करो, यह बात भी उनके साथ अच्छा व्यवहार करने में सम्मिलित है। याद कीजिए कि जब यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को राज्य प्राप्त हो गया, तो अपने माता-पिता के साथ क्या किया? उन्हें देहात से लाने के बाद सिंहासन पर बिठाया।
माता-पिता के साथ अच्छे व्यवहार का एक पक्ष, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह है, जिसका उल्लेख अल्लाह तआला ने अपने इस फ़रमान में किया है : "और (हे मनुष्य!) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो तथा माता-पिता के साथ उपकार करो, यदि तेरे पास दोनों में से एक वृद्धावस्था को पहुँच जाए अथवा दोनों, तो उन्हें उफ़ तक न कहो और न झिड़को और उनसे सादर बात बोलो। और उनके लिए विनम्रता का बाज़ू दया से झुका दो और प्रार्थना करो : हे मेरे पालनहार! उन दोनों पर दया कर, जैसे उन दोनों ने बाल्यावस्था में, मेरा लालन-पालन किया है।" अतः उनके साथ बदज़ुबानी न करो, उन्हें कोई कष्ट होने न दो, उनके साथ नर्मी से बात करो, उनके लिए अपना बाज़ू झुकाए रखो, उनके आज्ञापालन के सामने अपने अस्तित्व को कमतर जानो और दिल की गरहाई से उनके लिए दुआ करते रहो कि ऐ मेरे पालनहार, जिस तरह इन दोनों ने बचपन में लालन-पालन किया है, उसी तरह तू इन दोनों पर दया कर, और फिर हमेशा माता का ख़याल अधिक रखा करो कि आयत में इसी की ओर इशारा किया गया है और हदीस में भी तो स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख कर दिया गया है।
हवाला
- شرح صحيح البخارى لابن بطال - تحقيق: أبو تميم ياسر بن إبراهيم مكتبة الرشد - السعودية، الرياض الطبعة: الثانية، 1423هـ - 2003م.
- الأدب النبوي لمحمد الخَوْلي، ط4، دار المعرفة - بيروت، 1423 هـ.
- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين لسليم الهلالي، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1415ه.
- رياض الصالحين للنووي، ط1، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، 1428 هـ.
- رياض الصالحين، تحقيق: عصام هادي، وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية القطرية، دار الريان، بيروت، ط4، 1428هـ.
- شرح رياض الصالحين للشيخ ابن عثيمين، دار الوطن للنشر، الرياض، 1426هـ.
- شرح صحيح البخارى لابن بطال، تحقيق: أبو تميم ياسر بن إبراهيم، ط2، مكتبة الرشد - السعودية، الرياض، 1423هـ.
- صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، ط1، 1422ه.
- صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت.
- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين لمجموعة من الباحثين، ط14، مؤسسة الرسالة، 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن عبد الله بن عمرو رضي الله عنهما عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «رضا الله في رضا الوالدين، وسَخَطُ الله في سَخَطِ الوالدين».
अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "अलल्लाह की प्रसन्नता माता-पिता की प्रसन्नता में है और अल्लाह की अप्रसन्नता माता-पिता की अप्रसन्नता में है।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन लि-ग़ैरिही (अन्य सनदों अथवा रिवायतों के साथ मिलकर हसन)
हवाला
تسهيل الالمام، للشيخ الفوزان، طبعة الرسالة، الطبعة الأولى 1427 – 2006 م.
منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان، دار ابن الجوزي، ط1 1428هـ.
توضِيحُ الأحكَامِ مِن بُلوُغ المَرَام، للبسام، مكتَبة الأسدي، مكّة المكرّمة، الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م.
فتح ذي الجلال والاكرام بشرح بلوغ المرام، للشيخ ابن عثيمين، مدار الوطن للنشر، الطبعة الأولى 1430 - 2009م.
بلوغ المرام من أدلة الأحكام، لابن حجر، دار الفلق، الرياض، الطبعة: السابعة، 1424هـ.
صحيح الترغيب والترهيب، الألباني، مكتبة المعارف، الرياض.
سنن الترمذي، محمد بن عيسى أبو عيسى الترمذي السلمي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، تحقيق: أحمد محمد شاكر وآخرون.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن ابن عمر رضي الله عنهما ، عن النبي صلى الله عليه وسلم ، قال: «خرج ثلاثةُ نَفَرٍ يمشون فأصابهم المَطَر، فدَخَلوا في غارٍ في جبَل، فانْحَطَّت عليهم صَخْرةٌ، قال: فقال بعضُهم لبعض: ادعوا اللهَ بأفضلِ عَمَلٍ عَمِلتموه، فقال أحدُهم: اللهمَّ إني كان لي أبَوَانِ شَيْخانِ كبيران، فكنتُ أخرج فَأَرْعى، ثم أَجيء فأحْلِب فأجيء بالحِلاب، فآتي به أبويَّ فيَشْربان، ثم أسِقِيَ الصِّبْيَة وأهلي وامرأتي، فاحتَبَستُ ليلة، فجئتُ فإذا هما نائمان، قال: فكرهتُ أن أُوقِظَهما، والصِّبية يَتَضَاغَوْن عند رِجْلي، فلم يزل ذلك دَأْبي ودَأْبَهما، حتى طلَع الفجر، اللهم إن كنتَ تَعْلَمُ أنِّي فعلتُ ذلك ابْتغاء وجهِك، فافرُجْ عنا فُرْجة نرى منها السماء، قال: فَفُرِج عنهم، وقال الآخر: اللهم إن كنتَ تعلم أني كنتُ أُحبُّ امرأةً مِن بنات عمي كأشَدِّ ما يُحبُّ الرجلُ النساء، فقالت: لا تَنال ذلك منها حتى تعطيها مائة دينار، فسَعيْتُ فيها حتى جَمَعتُها، فلما قَعَدتُ بيْن رِجليْها قالت: اتقِ الله ولا تَفُضَّ الخاتَمَ إلا بحقِّه، فقمتُ وتركتُها، فإن كنتَ تعْلَم أنِّي فعلتُ ذلك ابتغاء وجهِك، فافرُجْ عنا فُرْجَة، قال: ففُرِج عنهم الثُّلُثيْنِ، وقال الآخر: اللهم إن كنتَ تعْلَم أني اسْتَأجَرْتُ أجيرًا بفَرَق من ذُرَة فأعْطيتُه، وأَبَى ذاك أنْ يأخُذَ، فعَمَدتُ إلى ذلك الفَرَق فزرعتُه، حتى اشتريتُ منه بقرًا وراعِيها، ثم جاء فقال: يا عبد الله أعْطِني حَقِّي، فقلتُ: انطلقْ إلى تلك البقر وراعِيها فإنها لك، فقال: أتستهْزِئ بي؟ قال: فقلت: ما أستهزئ بك ولكنها لك، اللهم إن كنتَ تعلم أنِّي فعلتُ ذلك ابتغاء وجهك، فافْرُجْ عنا فكُشِف عنهم».
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: तीन व्यक्ति कहीं जा रहे थे कि अचानक बारिश आ गई। वे पहाड़ की एक गुफा में जा छिपे। इतने में एक चट्टान लुढ़क कर आई (और गुफा के द्वार को बंद कर दिया)। आप कहते हैं: ऐसे में, उन्होंने एक- दूसरे से कहा: अल्लाह से अपने किए हुए सबसे अच्छे कार्य के द्वारा दुआ माँगो। सो, उनमें से एक ने कहा: ऐ अल्लाह! मेरे वयोवृद्ध माता- पिता थे। मैं बकरी चराने जाता, वापस आकर दूध दुहता और दूध का बर्तन लेकर अपने माता- पिता के पास जाता। जब दोनों पी लेते, तो अपने बच्चों, घर के लोगों और पत्नी को पिलाता था। संयोगवश, एक रात मुझे देर हो गई। मैं पहुँचा, तो दोनों सो चुके थे। वह कहते हैं कि मुझे अच्छा न लगा कि उन्हें जगाऊँ। बच्चे मेरे पाँव के पास भूखे पड़े रो रहे थे। मेरी और मेरे माता- पिता की यही हालत थी कि सुबह हो गई। ऐ अल्लाह! अगर तू जानता है कि मैंने यह कार्य तेरी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए किया है, तो चट्टान को इतना हटा दे कि हम आकाश के दर्शन कर सकें। आप फ़रमाते हैं: तो चट्टान कुछ हट गई। अब दूसरे ने कहा: ऐ अल्लाह! तू अच्छी तरह जानता है कि मैं अपनी एक चचेरी बहन से उतना ज़्यादा प्यार करता था, जितना प्यार एक पुरुष एक स्त्री से कर सकता है। लेकिन उसने कह दिया कि तुम मुझसे अपनी वासना उस समय तक पूरी नहीं कर सकते, जब तक मुझे सौ दीनार न दे दो। इसलिए, मैंने सौ दीनार जमा करने का प्रयास किया और जमा कर लिया। जब मैं उसके दोनों पैरों के बीच बैठ गया, तो उसने कहा: अल्लाह से डर और अवैध तरीक़े से मुहर को न तोड़! इतना सुनना था कि मैं उसे छोड़ कर खड़ा हो गया। (ऐ अल्लाह!) अगर तू जानता है कि मैंने यह कार्य तेरी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए किया है, तो हमारे लिए निकलने का रास्ता बना दे। आप फ़रमाते हैं: तो द्वार का दो तिहाई भाग खुल गया। फिर तीसरे ने कहा: ऐ अल्लाह! तू जानता है कि मैंने एक 'फ़रक़' (एक पैमाना, जो 16 पाउंड का होता था) मकई के पारिश्रमिक पर एक मज़दूर को काम पर लगाया था। मैंने उसे उसकी मज़दूरी दी, तो उसने लेने से इनकार कर दिया। तो मैंने उस एक 'फ़रक़' मकई को बोया और उससे चरवाहा समेत एक बैल ख़रीद लिया। कुछ कालान्तर बाद वह आया और बोला: ऐ अल्लाह के बंदे! मुझे मेरा हक़ दे। मैंने कहा: जाओ, देखो, वह बैल और उसका चरवाहा तुम्हारा है। उसने कहा: क्या तुम मेरा मज़ाक़ उड़ा रहे हो? मैंने कहा: मैं तुम्हारा मज़ाक़ नहीं उड़ा रहा हूँ। वह सचमुच तुम्हारा है। ऐ अल्लाह! अगर तू जानता है कि मैंने यह कार्य तेरी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए किया है, तो इस चट्टान को हमारे रास्ते से हटा दे। तो चट्टान को उनके रास्ते से हटा दिया गया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
- صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه.
- صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.
- عمدة القاري شرح صحيح البخاري، لمحمود بن أحمد بن موسى الحنفى بدر الدين العينى، الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.
- النهاية في غريب الحديث والأثر، لابن الأثير، نشر: المكتبة العلمية - بيروت، 1399هـ - 1979م، تحقيق: طاهر أحمد الزاوى - محمود محمد الطناحي.
- شرح رياض الصالحين، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، الناشر: دار الوطن للنشر، الطبعة: 1426 هـ.
- الشرح الممتع على زاد المستقنع, محمد بن صالح بن محمد العثيمين, دار ابن الجوزي, الطبعة: الأولى، 1422 - 1428 هـ.
- دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين, محمد علي بن محمد البكري, اعتنى بها: خليل مأمون شيحا, الناشر: دار المعرفة, بيروت – لبنان, الطبعة: الرابعة، 1425 هـ - 2004 م.
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