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जामे तिर्मिज़ी

नंबर 2839

नंबर 2839किताब 43, नंबर 113
حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ نَافِعٍ الْبَصْرِيُّ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ عَلِيٍّ الْمُقَدَّمِيُّ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يُغَيِّرُ الاِسْمَ الْقَبِيحَ ‏.‏ قَالَ أَبُو بَكْرِ بْنُ نَافِعٍ وَرُبَّمَا قَالَ عُمَرُ بْنُ عَلِيٍّ فِي هَذَا الْحَدِيثِ هِشَامُ بْنُ عُرْوَةَ عَنْ أَبِيهِ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مُرْسَلٌ وَلَمْ يَذْكُرْ فِيهِ عَنْ عَائِشَةَ ‏.‏
Narrated 'Aishah:that the Prophet (ﷺ) would change abhorrent names
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihAhmad Muhammad Shakir
  • SahihAl-Albani
  • SahihZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 43 · Chapters on Manners

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।