وَقَدْ رُوِيَ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ قَالَ " مَنْ بَنَى لِلَّهِ مَسْجِدًا صَغِيرًا كَانَ أَوْ كَبِيرًا بَنَى اللَّهُ لَهُ بَيْتًا فِي الْجَنَّةِ " . حَدَّثَنَا بِذَلِكَ قُتَيْبَةُ حَدَّثَنَا نُوحُ بْنُ قَيْسٍ عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ مَوْلَى قَيْسٍ عَنْ زِيَادٍ النُّمَيْرِيِّ عَنْ أَنَسٍ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بِهَذَا .
It has been related that :the Prophet said: "Whoever builds a Masjid for (the sake of) Allah, be it small or large, then Allah will build a house for him in Paradise
स्रोत में दर्ज दर्जे
DaifAhmad Muhammad Shakir
DaifAl-Albani
DaifZubair Ali Zai
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।