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सुनन नसाई

नंबर 1768

नंबर 1768किताब 20, नंबर 171
أَخْبَرَنَا هِشَامُ بْنُ عَمَّارٍ، قَالَ حَدَّثَنَا يَحْيَى، - يَعْنِي ابْنَ حَمْزَةَ - قَالَ حَدَّثَنَا الأَوْزَاعِيُّ، عَنْ يَحْيَى، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، قَالَ هُوَ وَنَافِعٌ عَنِ ابْنِ عُمَرَ، عَنْ حَفْصَةَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يُصَلِّي بَيْنَ النِّدَاءِ وَالإِقَامَةِ رَكْعَتَيْنِ خَفِيفَتَيْنِ رَكْعَتَىِ الْفَجْرِ ‏.‏
It was narrated from Abu Salamah and Nafi', from Ibn Umar, from Hafsah that:The Prophet (ﷺ) used to pray two brief rak'ahs between the call (The adhan) and the Iqamah, the two rak'ahs of Fajr
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihAbu Ghuddah
  • SahihAl-Albani
  • HasanZubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 20 · The Book of Qiyam Al-Lail (The Night Prayer) and Voluntary Prayers During the Day

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।