أَخْبَرَنَا عَلِيُّ بْنُ خَشْرَمٍ، قَالَ أَنْبَأَنَا عِيسَى بْنُ يُونُسَ، عَنِ الأَوْزَاعِيِّ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ كَانَ النِّسَاءُ يُصَلِّينَ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الْفَجْرَ فَكَانَ إِذَا سَلَّمَ انْصَرَفْنَ مُتَلَفِّعَاتٍ بِمُرُوطِهِنَّ فَلاَ يُعْرَفْنَ مِنَ الْغَلَسِ .
It was narrated that 'Aishah said:"Women used to pray fajr with the Messenger of Allah (ﷺ), and when he said the taslim they would leave, wrapped in their Mirts, unrecognizable because of the darkness
स्रोत में दर्ज दर्जे
SahihAbu Ghuddah
SahihAl-Albani
Sahih - Agreed UponZubair Ali Zai
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।