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सहीह मुस्लिम

नंबर 7289

नंबर 7289किताब 54, नंबर 55अरबी नंबरिंग 2902
حَدَّثَنِي حَرْمَلَةُ بْنُ يَحْيَى، أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ، أَخْبَرَنِي يُونُسُ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، أَخْبَرَنِي ابْنُ الْمُسَيَّبِ، أَنَّ أَبَا هُرَيْرَةَ، أَخْبَرَهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ح وَحَدَّثَنِي عَبْدُ الْمَلِكِ بْنُ شُعَيْبِ بْنِ اللَّيْثِ، حَدَّثَنَا أَبِي، عَنْ جَدِّي، حَدَّثَنِي عُقَيْلُ بْنُ، خَالِدٍ عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، أَنَّهُ قَالَ قَالَ ابْنُ الْمُسَيَّبِ أَخْبَرَنِي أَبُو هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ لاَ تَقُومُ السَّاعَةُ حَتَّى تَخْرُجَ نَارٌ مِنْ أَرْضِ الْحِجَازِ تُضِيءُ أَعْنَاقَ الإِبِلِ بِبُصْرَى ‏"‏ ‏.‏
Abu Huraira reported that Allah's Messenger (ﷺ) said:The Last Hour would not come until fire emits from the earth of Hijaz which would illuminate the necks of the camels of the Busra

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 54 · The Book of Tribulations and Portents of the Last Hour

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।