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सहीह मुस्लिम

नंबर 1356

नंबर 1356किताब 5, नंबर 191अरबी नंबरिंग 599
قَالَ مُسْلِمٌ وَحُدِّثْتُ عَنْ يَحْيَى بْنِ حَسَّانَ، وَيُونُسَ الْمُؤَدِّبِ، و غَيْرِهِمَا قَالُوا حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ بْنُ زِيَادٍ، قَالَ حَدَّثَنِي عُمَارَةُ بْنُ الْقَعْقَاعِ، حَدَّثَنَا أَبُو زُرْعَةَ، قَالَ سَمِعْتُ أَبَا هُرَيْرَةَ، يَقُولُ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا نَهَضَ مِنَ الرَّكْعَةِ الثَّانِيَةِ اسْتَفْتَحَ الْقِرَاءَةَ بِـ ‏{‏ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ‏}‏ وَلَمْ يَسْكُتْ ‏.‏
Abu Huraira reported that when the Messenger of Allah (ﷺ) stood up for the second rak'ah he opened it with the recitation of the praise of Allah, the Lord of universe (al-Fatiha), and he did not observe silence (before the recitation of al-Fatiha)

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 5 · The Book of Mosques and Places of Prayer

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।