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सहीह मुस्लिम

नंबर 1318

नंबर 1318किताब 5, नंबर 156अरबी नंबरिंग 583.03
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ حَاتِمٍ، أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَكْرٍ، أَخْبَرَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، ح قَالَ وَحَدَّثَنِي إِسْحَاقُ بْنُ مَنْصُورٍ، - وَاللَّفْظُ لَهُ - قَالَ أَخْبَرَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، أَخْبَرَنِي عَمْرُو بْنُ دِينَارٍ، أَنَّ أَبَا مَعْبَدٍ، مَوْلَى ابْنِ عَبَّاسٍ أَخْبَرَهُ أَنَّ ابْنَ عَبَّاسٍ أَخْبَرَهُ أَنَّ رَفْعَ الصَّوْتِ بِالذِّكْرِ حِينَ يَنْصَرِفُ النَّاسُ مِنَ الْمَكْتُوبَةِ كَانَ عَلَى عَهْدِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ‏.‏ وَأَنَّهُ قَالَ قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ كُنْتُ أَعْلَمُ إِذَا انْصَرَفُوا بِذَلِكَ إِذَا سَمِعْتُهُ ‏.‏
Ibn 'Abbas reported:Dhikr (mentioning the name of Allah) in a loud voice after obligatory prayers was (a common practice) during the lifetime of the Messenger of Allah (ﷺ) ; and when I heard that I came to knew that they (the people) had finished the prayer

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 5 · The Book of Mosques and Places of Prayer

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।