सीधे कंटेंट पर जाएँ
सहीह मुस्लिम

नंबर 1203

नंबर 1203किताब 5, नंबर 43अरबी नंबरिंग 539.01
حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَحْيَى، أَخْبَرَنَا هُشَيْمٌ، عَنْ إِسْمَاعِيلَ بْنِ أَبِي خَالِدٍ، عَنِ الْحَارِثِ بْنِ شُبَيْلٍ، عَنْ أَبِي عَمْرٍو الشَّيْبَانِيِّ، عَنْ زَيْدِ بْنِ أَرْقَمَ، قَالَ كُنَّا نَتَكَلَّمُ فِي الصَّلاَةِ يُكَلِّمُ الرَّجُلُ صَاحِبَهُ وَهُوَ إِلَى جَنْبِهِ فِي الصَّلاَةِ حَتَّى نَزَلَتْ ‏{‏ وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ‏}‏ فَأُمِرْنَا بِالسُّكُوتِ وَنُهِينَا عَنِ الْكَلاَمِ ‏.‏
ज़ैद बिन अरक़म (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि हम नमाज़ में बात कर लिया करते थे। आदमी अपने साथी से, जो उसके बगल में नमाज़ पढ़ रहा होता, बात कर लेता था। यहाँ तक कि क़ुरआन की यह आयतः "وقوموا لله قانتين" अवतरित हुई, तो हमें चुप रहने का आदेश दिया गया तथा बात करने से मना कर दिया गया।

तर्जुमा: HadeethEnc.comइसकी तशरीह

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

जहाँ तर्जुमा शुदा नबवी हदीसों के इनसाइक्लोपीडिया (HadeethEnc.com) में किसी रिवायत का हूबहू टेक्स्ट मौजूद है, वहाँ उसका तर्जुमा उसी रिवायत के नीचे स्रोत के नाम के साथ दिखाया गया है। दोनों को प्रोग्राम के ज़रिए, सिर्फ़ अरबी टेक्स्ट की बुनियाद पर जोड़ा गया है: इनसाइक्लोपीडिया की हदीस का पूरा टेक्स्ट, उसमें दर्ज सहाबी के नाम समेत, रिवायत का आख़िरी हिस्सा है, हर्फ़-ब-हर्फ़। इस जोड़ को किसी ने नहीं जाँचा है, और सबील के जायज़ाकारों ने तर्जुमे की जाँच नहीं की है। असल टेक्स्ट अरबी है।

किताब 5 · The Book of Mosques and Places of Prayer

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।