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सहीह मुस्लिम

नंबर 4335

नंबर 4335किताब 27, नंबर 82अरबी नंबरिंग 1668.01
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ حُجْرٍ السَّعْدِيُّ، وَأَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ وَزُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ قَالُوا حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ، - وَهُوَ ابْنُ عُلَيَّةَ - عَنْ أَيُّوبَ، عَنْ أَبِي قِلاَبَةَ، عَنْ أَبِي الْمُهَلَّبِ، عَنْ عِمْرَانَ، بْنِ حُصَيْنٍ ‏.‏ أَنَّ رَجُلاً، أَعْتَقَ سِتَّةَ مَمْلُوكِينَ لَهُ عِنْدَ مَوْتِهِ لَمْ يَكُنْ لَهُ مَالٌ غَيْرُهُمْ فَدَعَا بِهِمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَجَزَّأَهُمْ أَثْلاَثًا ثُمَّ أَقْرَعَ بَيْنَهُمْ فَأَعْتَقَ اثْنَيْنِ وَأَرَقَّ أَرْبَعَةً وَقَالَ لَهُ قَوْلاً شَدِيدًا ‏.‏
Imran b. Husain reported that a person who had no other property emancipated six slaves of his at the time of his death. Allah's Messenger (ﷺ) called for them and divided them into three sections, cast lots amongst them, and set two free and kept four in slavery; and he (the Holy Prophet) spoke severely of him

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 27 · The Book of Oaths

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।