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सहीह मुस्लिम

नंबर 2342

नंबर 2342किताब 12, नंबर 79अरबी नंबरिंग 1014.01
وَحَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا لَيْثٌ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي سَعِيدٍ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ يَسَارٍ، أَنَّهُ سَمِعَ أَبَا هُرَيْرَةَ، يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَا تَصَدَّقَ أَحَدٌ بِصَدَقَةٍ مِنْ طَيِّبٍ - وَلاَ يَقْبَلُ اللَّهُ إِلاَّ الطَّيِّبَ - إِلاَّ أَخَذَهَا الرَّحْمَنُ بِيَمِينِهِ وَإِنْ كَانَتْ تَمْرَةً فَتَرْبُو فِي كَفِّ الرَّحْمَنِ حَتَّى تَكُونَ أَعْظَمَ مِنَ الْجَبَلِ كَمَا يُرَبِّي أَحَدُكُمْ فَلُوَّهُ أَوْ فَصِيلَهُ ‏"‏ ‏.‏
Abu Huraira reported Allah's Messenger (ﷺ) as saying:If anyone gives as Sadaqa the equivalent of a date from that (earning) earned honestly, for Allah accepts that which is lawful, the Lord would accept it with His Right Hand, and even if it is a date, it would foster in the Hand of the lord, as one of you fosters his colt, till it becomes bigger than a mountain

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 12 · The Book of Zakat

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।