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सहीह मुस्लिम

नंबर 296

नंबर 296किताब 1, नंबर 202अरबी नंबरिंग 107
وَحَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا وَكِيعٌ، وَأَبُو مُعَاوِيَةَ عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ أَبِي حَازِمٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ ثَلاَثَةٌ لاَ يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلاَ يُزَكِّيهِمْ - قَالَ أَبُو مُعَاوِيَةَ وَلاَ يَنْظُرُ إِلَيْهِمْ - وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ شَيْخٌ زَانٍ وَمَلِكٌ كَذَّابٌ وَعَائِلٌ مُسْتَكْبِرٌ ‏"‏ ‏.‏
It is narrated on the authority of Abu Huraira that the Messenger of Allah (ﷺ) observed:Three (are the persons) with whom Allah would neither speak, nor would He absolve them on the Day of Resurrection. Abu Mu'awiya added: He would not look at them and there is grievous torment for them: the aged adulterer, the liar king and the proud destitute

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 1 · The Book of Faith

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।