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सहीह मुस्लिम

नंबर 110

नंबर 110किताब 1, नंबर 18अरबी नंबरिंग 15.03
وَحَدَّثَنِي سَلَمَةُ بْنُ شَبِيبٍ، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ أَعْيَنَ، حَدَّثَنَا مَعْقِلٌ، - وَهُوَ ابْنُ عُبَيْدِ اللَّهِ - عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ، أَنَّ رَجُلاً، سَأَلَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ أَرَأَيْتَ إِذَا صَلَّيْتُ الصَّلَوَاتِ الْمَكْتُوبَاتِ وَصُمْتُ رَمَضَانَ وَأَحْلَلْتُ الْحَلاَلَ وَحَرَّمْتُ الْحَرَامَ وَلَمْ أَزِدْ عَلَى ذَلِكَ شَيْئًا أَأَدْخُلُ الْجَنَّةَ قَالَ ‏ "‏ نَعَمْ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ وَاللَّهِ لاَ أَزِيدُ عَلَى ذَلِكَ شَيْئًا ‏.‏
जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि : एक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रश्न करते हुए कहा : इस बारे में आपका क्या कहना है कि अगर मैं पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ें पढ़ूँ, रमज़ान महीने के रोज़े रखूँ तथा हलाल को हलाल एवं हराम को हराम मानकर चलूँ और इससे अधिक कुछ न करूँ, तो क्या मैं जन्नत में प्रवेश कर सकूँगा? आपने उत्तर दिया : "हाँ।" इसपर उसने कहा : अल्लाह की क़सम, मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं करूँगा।

तर्जुमा: HadeethEnc.comइसकी तशरीह

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

जहाँ तर्जुमा शुदा नबवी हदीसों के इनसाइक्लोपीडिया (HadeethEnc.com) में किसी रिवायत का हूबहू टेक्स्ट मौजूद है, वहाँ उसका तर्जुमा उसी रिवायत के नीचे स्रोत के नाम के साथ दिखाया गया है। दोनों को प्रोग्राम के ज़रिए, सिर्फ़ अरबी टेक्स्ट की बुनियाद पर जोड़ा गया है: इनसाइक्लोपीडिया की हदीस का पूरा टेक्स्ट, उसमें दर्ज सहाबी के नाम समेत, रिवायत का आख़िरी हिस्सा है, हर्फ़-ब-हर्फ़। इस जोड़ को किसी ने नहीं जाँचा है, और सबील के जायज़ाकारों ने तर्जुमे की जाँच नहीं की है। असल टेक्स्ट अरबी है।

किताब 1 · The Book of Faith

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।