حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ الأَزْهَرِ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ الْخَطَّابِ، حَدَّثَنَا مِنْدَلٌ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي رَافِعٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ جَدِّهِ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ كَانَ يَأْتِي الْعِيدَ مَاشِيًا وَيَرْجِعُ مَاشِيًا فِي غَيْرِ الطَّرِيقِ الَّذِي ابْتَدَأَ فِيهِ .
It was narrated from Muhammad bin ‘Ubaidullah bin Abu Rafi’, from his father, from his grandfather, that the Messenger of Allah (ﷺ) used to come to ‘Eid prayers walking, and that he would go back via a different route than the one he began with
स्रोत में दर्ज दर्जे
SahihAl-Albani
Sahih LighairihiMuhammad Fouad Abd al-Baqi
DaifZubair Ali Zai
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।