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तशरीह के साथ हदीसें

ईमान की शाखाएँ

7 हदीसें

अच्छे कार्यों की ओर जल्दी करो, उन फ़ितनों से पहले, जो अंधेरी रात के विभिन्न टुकड़ों की तरह सामने आएँगे।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «بَادِرُوا بِالْأَعْمَالِ فِتَنًا كَقِطَعِ اللَّيْلِ الْمُظْلِمِ، يُصْبِحُ الرَّجُلُ مُؤْمِنًا وَيُمْسِي كَافِرًا، أَوْ يُمْسِي مُؤْمِنًا وَيُصْبِحُ كَافِرًا، يَبِيعُ دِينَهُ بِعَرَضٍ مِنَ الدُّنْيَا».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अच्छे कार्यों की ओर जल्दी करो, उन फ़ितनों से पहले, जो अंधेरी रात के विभिन्न टुकड़ों की तरह सामने आएँगे। आदमी सुबह को मोमिन होगा, तो शाम को काफ़िर अथवा शाम को मोमिन होगा, तो सुबह को काफ़िर, दुनिया की किसी वस्तु के बदले में अपने धर्म का सौदा कर लेगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मोमिन को इससे पहले कि अच्छे कामों से रोक देने वाले फ़ितनों और संदेहों के सामने आ जाने के कारण उन्हें करना कठिन हो जाए और इन्सान के हाथ से अवसर निकल जाए, अच्छे कामों की ओर तेज़ी से बढ़ने और ज़्यादा से ज़्यादा से अच्छे काम करने की प्रेरणा दे रहे हैं। ये फ़ितने अंध्यारों के रूप में सामने आएँगे। मानो रात के टुकड़े हों। उनके आने के कारण सत्य एवं असत्य इस तरह आप में मिल जाएँगे कि दोनों के बीच अंतर करना कठिन हो जाएगा। हालत यह होगी कि इन्सान बद-हवासी का शिकार हो जाएगा। सुबह मोमिन रहेगा, तो शाम को काफ़िर हो जाएग। शाम को मोमिन रहेगा, तो सुबह काफ़िर बन जाएगा। दुनिया की चार दिन की चाँदनी के कारण अपने दीन का सौदा कर लेगा।

फ़ायदे
  1. दीन को मज़बूती से पकड़े रहने और अच्छे कर्म की ओर तेज़ी से बढ़ने की ज़रूरत, इससे पहले कि बाधाएँ रास्ता रोक लें।
  2. इस बात की ओर इशारा कि अंतिम ज़माने में एक के बाद एक गुमराह कर देने वाले फ़ितने सामने आते रहेंगे। स्थिति यह होगी कि एक फ़ितना जाएगा, तो दूसरा फ़ितना आ जाएगा।
  3. जब इन्सान का दीन कमज़ोर हो जाता है और वह दुनिया के मोह माया में पड़कर दीन को छोड़ देता है, तो इसके नतीजे में वह दीन से विचलित, दूर और फ़ितनों का शिकार हो जाता है।
  4. इस हदीस से मालूम होता है कि अच्छे कर्म इन्सान को फ़ितनों से बचाते हैं।
  5. फ़ितनों की दो क़िस्में हैं : संदेहों के रूप में आने वाला फ़ितना, जिसका इलाज ज्ञान है। और इच्छाओं तथा अभिलाषाओं के रूप में आने वाला फ़ितना, जिसका इलाज ईमान एवं सब्र है।
  6. इस हदीस से मालूम होता है कि जिस व्यक्ति के पास अच्छे कर्म की पूंजी कम होगी, उसकी ओर फ़ितने ज़्यादा तेज़ी से आएँगे और जिसके पास कर्म की पूंजी अधिक हो, उसे अपने कर्म के धोखे में आने के बजाय अधिक अच्छे कर्म करने चाहिए।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 110) (118). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 169). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 16). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 122).

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ईमान की सत्तर से कुछ अधिक शाखाएँ हैं, जिनमें सर्वश्रेष्ठ शाखा 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहना है, जबकि सबसे छोटी शाखा रास्ते कष्टदायक वस्तु को हटाना है तथा हया भी ईमान की एक शाखा है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه مرفوعاً: «الإيمانُ بِضْعٌ وَسَبْعُونَ أو بِضْعٌ وسِتُّونَ شُعْبَةً: فَأَفْضَلُهَا قَوْلُ: لا إله إلا الله، وَأَدْنَاهَا إِمَاطَةُ الأَذَى عَنِ الطَّرِيقِ، وَالحَيَاءُ شُعْبَةٌ مِنَ الإِيمَانِ».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "ईमान की सत्तर से कुछ अधिक शाखाएँ हैं, जिनमें सर्वश्रेष्ठ शाखा 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहना है, जबकि सबसे छोटी शाखा रास्ते कष्टदायक वस्तु को हटाना है तथा हया भी ईमान की एक शाखा है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

- صحيح البخاري، للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. - صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب، الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. - شرح رياض الصالحين، للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. - نزهة المتقين بشرح رياض الصالحين، تأليف مصطفى سعيد الخن، مصطفى البغا، محي الدين مستو، علي الشربجي، محمد أمين لطفي، مؤسسة الرسالة، بيروت، لبنان، الطبعة الرابعة عشر، 1407ه. - بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الطبعة الأولى، 1418ه. - دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، المؤلف: محمد علي بن محمد بن علان الصديقي، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة للطباعة والنشر والتوزيع، بيروت، لبنان، الطبعة: الرابعة، 1425هـ - 2004م. - تطريز رياض الصالحين، تأليف فيصل آل مبارك، تحقيق د. عبد العزيز آل حمد، دار العاصمة، الرياض، الطبعة الأولى، 1423هـ.

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अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अंसार के बारे में फ़रमाया : "उनसे वही प्रेम करेगा, जो मोमिन होगा और उनसे वही द्वेष रखेगा, जो मुनाफ़िक़ होगा। जो उनसे प्रेम करेगा, अल्लाह उससे प्रेम करेगा और जो उनसे द्वेष रखेगा, अल्लाह उससे द्वेष रखेगा।

عَنِ الْبَرَاءِ رضي الله عنه: عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ قَالَ فِي الْأَنْصَارِ: «لَا يُحِبُّهُمْ إِلَّا مُؤْمِنٌ، وَلَا يُبْغِضُهُمْ إِلَّا مُنَافِقٌ، مَنْ أَحَبَّهُمْ أَحَبَّهُ اللهُ وَمَنْ أَبْغَضَهُمْ أَبْغَضَهُ اللهُ».
बरा रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अंसार के बारे में फ़रमाया : "उनसे वही प्रेम करेगा, जो मोमिन होगा और उनसे वही द्वेष रखेगा, जो मुनाफ़िक़ होगा। जो उनसे प्रेम करेगा, अल्लाह उससे प्रेम करेगा और जो उनसे द्वेष रखेगा, अल्लाह उससे द्वेष रखेगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि मदीने में रहने वाले अंसार लोगों से प्रेम करना ईमान की संपूर्णता की निशानी है। ऐसा इसलिए कि अंसारी इस्लाम और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहयोग में आगे रहे हैं, मुसलमानों को शरण दी है और अल्लाह के मार्ग में अपना धन एवं जान खर्च किया है। इसी तरह अंसार से द्वेष रखना निफ़ाक़ की निशानी है। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जो अंसार से मोहब्बत रखेगा, अल्लाह उससे मोहब्बत रखेगा और जो अंसार से द्वेष रखेगा, अल्लाह उससे द्वेष रखेगा।

फ़ायदे
  1. इस हदीस में अंसार की एक बड़ी फ़ज़ीलत बयान की गई है कि उनसे मोहब्बत निफ़ाक़ से बरी होने और मोमिन होने की निशानी है।
  2. अल्लाह के वलियों से मोहब्बत और उनके सहयोग से अल्लाह की मोहब्बत प्राप्त होती है।
  3. इस्लाम में दाख़िल होने में पहल करने वाले लोगों की फ़ज़ीलत।
हवाला

صحيح البخاري (5/ 32) (3783). صحيح مسلم (1/ 85) (75). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 447). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص257). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (6/ 258). شرح النووي على مسلم (2/ 63). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين (1/ 350).

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इस बारे में आपका क्या कहना है कि अगर मैं पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ें पढ़ूँ, रमज़ान महीने के रोज़े रखूँ तथा हलाल को हलाल एवं हराम को हराम

عن جابر رضي الله عنه: أَنَّ رَجُلًا سَأَلَ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: أَرَأَيْتَ إِذَا صَلَّيْتُ الصَّلَوَاتِ الْمَكْتُوبَاتِ، وَصُمْتُ رَمَضَانَ، وَأَحْلَلْتُ الْحَلَالَ، وَحَرَّمْتُ الْحَرَامَ، وَلَمْ أَزِدْ عَلَى ذَلِكَ شَيْئًا، أَأَدْخُلُ الْجَنَّةَ؟ قَالَ: «نَعَمْ»، قَالَ: وَاللهِ لَا أَزِيدُ عَلَى ذَلِكَ شَيْئًا.
जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि : एक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रश्न करते हुए कहा : इस बारे में आपका क्या कहना है कि अगर मैं पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ें पढ़ूँ, रमज़ान महीने के रोज़े रखूँ तथा हलाल को हलाल एवं हराम को हराम मानकर चलूँ और इससे अधिक कुछ न करूँ, तो क्या मैं जन्नत में प्रवेश कर सकूँगा? आपने उत्तर दिया : "हाँ।" इसपर उसने कहा : अल्लाह की क़सम, मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं करूँगा।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ें पढ़ीं तथा नफ़ल नमाज़ें नहीं पढ़ीं, रमज़ान के रोज़े रखे और नफ़ल रोज़े नहीं रखे, हलाल को हलाल माना और उसपर अमल किया तथा हराम को हराम माना और उससे दूर रहा, वह जन्नत में प्रवेश करेगा।

फ़ायदे
  1. एक मुसलमान को फ़र्ज़ कामों को करना और हराम कामों से दूर रहना चाहिए और उसका उद्देश्य जन्नत में प्रवेश करना होना चाहिए।
  2. इस हदीस से हलाल कामों को करने और उनके हलाल होने का विश्वास रखने तथा हराम कामों से दूर रहने और उनके हराम होने का विश्वास रखने का महत्व मालूम होता है।
  3. वाजिब (अनिवार्य) कार्यों को करना और हराम कार्यों से बचना जन्नत में प्रवेश प्राप्त करने का सबब है।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 44) (15). جامع العلوم والحكم (1/513). شرح الأربعين النووية للعثيمين (ص: 215). فتح القوي المتين في شرح الأربعين للعباد (ص 77).

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पवित्रता आधा ईमान है, अल-हम्दु लिल्लाह तराज़ू को भर देता है, सुबहानल्लाह और अल-हम्दु लिल्लाह दोनों मिलकर आकाश एवं धरती के बीच के खाली स्थान को भर देते हैं

عن أبي مالكٍ الأشعريِّ رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «الطُّهُورُ شَطْرُ الْإِيمَانِ، وَالْحَمْدُ لِلهِ تَمْلَأُ الْمِيزَانَ، وَسُبْحَانَ اللهِ وَالْحَمْدُ لِلهِ تَمْلَآنِ -أَوْ تَمْلَأُ- مَا بَيْنَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ، وَالصَّلَاةُ نُورٌ، وَالصَّدَقَةُ بُرْهَانٌ، وَالصَّبْرُ ضِيَاءٌ، وَالْقُرْآنُ حُجَّةٌ لَكَ أَوْ عَلَيْكَ، كُلُّ النَّاسِ يَغْدُو، فَبَايِعٌ نَفْسَهُ فَمُعْتِقُهَا أَوْ مُوبِقُهَا».
अबू मालिक अशअरी रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "पवित्रता आधा ईमान है, अल-हम्दु लिल्लाह तराज़ू को भर देता है, सुबहानल्लाह और अल-हम्दु लिल्लाह दोनों मिलकर आकाश एवं धरती के बीच के खाली स्थान को भर देते हैं, नमाज़ नूर है, सदक़ा प्रमाण है, धैर्य प्रकाश है और क़ुरआन तुम्हारे लिए या तुम्हारे विरुद्ध प्रमाण है। प्रत्येक व्यक्ति जब रोज़ी की खोज में सुबह निकलता है, तो अपने नफ़्स को बेचता है। चुनांचे वह उसे आज़ाद करता है या उसका विनाश करता है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि ज़ाहिरी शरीर की तहारत (पवित्रता) वज़ू एवं ग़ुस्ल (स्नान) के द्वारा प्राप्त होती है। तहारत नमाज़ की एक शर्त है। अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि अल्लाह की प्रशंसा करना और उसे संपूर्णता पर आधारित गुणों से परिपूर्ण मानना है, इसे कहना क़यामत के दिन वज़न किया जाएगा और यह कर्मों के तराज़ू को भर देगा। सुबहानल्लाह तथा अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि दरअसल अल्लाह को हर कमी से पवित्र घोषित करना और उसे संपूर्णता के ऐसे गुणों से परिपूर्ण मानना है, जो उसके प्रताप के अनुरूप हैं, इन दोनों वाक्यों को कहना और साथ में अल्लाह से प्रेम तथा उसका सम्मान करना, आकाशों एवं ज़मीन के बीच के स्थान को भर देता है। नमाज़ बंदे के लिए नूर है, जो उसके दिल में मौजूद रहता है, उसके चेहरे पर प्रकट होता है, उसकी क़ब्र को रौशन रखता है और दोबारा जीवित होकर उठते समय उसका साथ देगा। सदक़ा बंदे के सच्चे मोमिन होने का प्रमाण है, और उसके मुनाफ़िक़ से अलग होने का प्रमाण है, जो सदक़ा के प्रतिफल पर विश्वास न होने के कारण सदक़ा नहीं करता। सब्र (धैर्य) प्रकाश है। सब्र, अधीर होने और नाराज़ होने से बचने का नाम है। नूर ऐसे प्रकाश को कहते हैं, जिसमें गर्मी और जलाने की विशेषता होती है। जैसे सूरज का प्रकाश। सब्र को नूर इसलिए कहा गया है कि सब्र करना एक कठिन कार्य है और इसके लिए नफ़्स से लड़ने और उसे उसकी पसंद से रोकने की ज़रूरत होती है। सब्र करने वाला इन्सान हमेशा सच्चाई के आलोकित मार्ग पर चलता रहता है। यहाँ सब्र से मुराद उसके तीनों प्रकार यानी अल्लाह के आज्ञापालन पर डटे रहना, उसकी अवज्ञा से बचते रहना और मुसीबतों तथा दुनिया के हादसों (दुर्घटनाओं) का धैर्य के साथ मुक़ाबला करना है। क़ुरआन की तिलावत और उसमें लिखी हुई बातों का अनुपालन तुम्हारे लिए दलील है। जबकि क़ुरआन पर अमल न करना या उसकी तिलावत न करना तुम्हारे विरुद्ध दलील है। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि सारे लोग जब नींद से जागते हैं, विभिन्न कार्यों के लिए अपने घरों निकल पड़ते हैं। ऐसे में कुछ लोग अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करके खुद को आग से आज़ाद कर लेते हैं। जबकि कुछ लोग इससे विचलित हो जाते हैं, गुनाहों में पड़ जाते हैं और आग में प्रवेश करने का सामान करके खुद को विनष्ट कर लेते हैं।

फ़ायदे
  1. तहारत के दो प्रकार हैं। एक ज़ाहिरी (प्रत्यक्ष) तहारत, जो वज़ू एवं स्नान से प्राप्त होती है और दूसरा बातिनी (परोक्ष) तहारत, जो तौहीद (एकेश्वरवाद), ईमान और अच्छे कर्म से प्राप्त होती है।
  2. नमाज़ की पाबंदी करने का महत्व। क्योंकि नमाज़ बंदे के लिए दुनिया में तथा क़यामत के दिन प्रकाश है।
  3. सदक़ा सच्चे ईमान का प्रमाण है।
  4. क़ुरआन पर अमल करने और उसे सच्ची किताब मानने का महत्व। इससे क़ुरआन इन्सान के पक्ष में प्रमाण बन जाता है। उसके विरुद्ध नहीं।
  5. नफ़्स (आत्मा, मन) अगर अल्लाह के आज्ञापालन में न लगाया जाए, वह इन्सान को अल्लाह की अवज्ञा में लगा देता है।
  6. हर इन्सान कोई न कोई काम ज़रूर करता है। काम चाहे अल्लाह को राज़ी करने वाला हो, जो उसे जहन्नम से मुक्ति प्रदान करता है या उसे नाराज़ करने वाला, जो उसका विनाश कर देता है।
  7. सब्र के लिए सहन शक्ति तथा आत्म मूल्यांकन की ज़रूरत होती है, जो कि एक कठिन कार्य है।
हवाला

صحيح مسلم (1/ 203) (223)، شرح الأربعين لابن دقيق العيد (ص 84)، شرح الأربعين النووية للعثيمين (ص: 231)، الرياض الزكية شرح الأربعين النووية للخضير (ص 293)، فتح القوي المتين في شرح الأربعين للعباد (ص 79)

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क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे रब ने क्या कहा?” लोगों ने कहा : अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं। (आपने फ़रमाया कि अल्लाह ने) फ़रमाया : “मेरे बंदों में से कुछ ने मुझपर ईमान लाने वाले और कुछ ने कुफ़्र करने वाले बनकर सुबह की

عَنْ زَيْدِ بْنِ خَالِدٍ الجُهَنِيِّ رضي الله عنه أَنَّهُ قَالَ: صَلَّى لَنَا رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَلَاةَ الصُّبْحِ بِالْحُدَيْبِيَةِ عَلَى إِثْرِ سَمَاءٍ كَانَتْ مِنَ اللَّيْلَةِ، فَلَمَّا انْصَرَفَ أَقْبَلَ عَلَى النَّاسِ، فَقَالَ: «هَلْ تَدْرُونَ مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ؟» قَالُوا: اللهُ وَرَسُولُهُ أَعْلَمُ، قَالَ: «أَصْبَحَ مِنْ عِبَادِي مُؤْمِنٌ بِي وَكَافِرٌ، فَأَمَّا مَنْ قَالَ: مُطِرْنَا بِفَضْلِ اللهِ وَرَحْمَتِهِ، فَذَلِكَ مُؤْمِنٌ بِي وَكَافِرٌ بِالْكَوْكَبِ، وَأَمَّا مَنْ قَالَ: بِنَوْءِ كَذَا وَكَذَا، فَذَلِكَ كَافِرٌ بِي وَمُؤْمِنٌ بِالْكَوْكَبِ».
ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, वह कहते हैं : हुदैबिया में रात में बारिश होने के बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें लेकर फ़ज्र की नमाज़ अदा की। सलाम फेरने के बाद लोगों की ओर मुंह करके फ़रमाया : “क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे रब ने क्या कहा?” लोगों ने कहा : अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं। (आपने फ़रमाया कि अल्लाह ने) फ़रमाया : “मेरे बंदों में से कुछ ने मुझपर ईमान लाने वाले और कुछ ने कुफ़्र करने वाले बनकर सुबह की। जिसने कहा कि अल्लाह की कृपा व रहमत से हमपर बारिश हुई तो वह मुझपर ईमान लाने वाला और नक्षत्रों को नकारने वाला है और जिसने कहा कि अमुक-अमुक नक्षत्रों के कारण हमपर बारिश हुई तो वह मेरे साथ कुफ़्र करने वाला और नक्षत्रों पर ईमान लाने वाला ठहरा।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हुदैबिया के स्थान पर सुबह की नमाज़ पढ़ी। हुदैबिया मक्का के निकट एक बस्ती का नाम है। उस दिन रात को बारिश हुई थी। जब आपने नमाज़ पूरी कर ली और सलाम फेरा तो लोगों की ओर मुँह किया और उनसे पूछा : क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे सर्वशक्तिमान एवं महान रब ने क्या कहा है? लोगों ने उत्तर दिया : अल्लाह और उसका रसूल बेहतर जानते हैं। यह सुन आपने कहा : अल्लाह ने बताया है कि वर्षा होते समय लोग दो प्रकार में बँट जाते हैं। कुछ लोग अल्लाह पर विश्वास रखते हैं और कुछ लोग उसके प्रति अविश्वास व्यक्त करते हैं। ऐसे में जिसने कहा कि हमें अल्लाह के अनुग्रह और उसकी दया से बारिश मिली और इस तरह उसने बारिश देने वाला अल्लाह को माना, वह अल्लाह पर विश्वास रखने वाला है और नक्षत्रों के प्रति अविश्वास व्यक्त करने वाला है। इसके विपरीत जिसने कहा कि हमें अमुक नक्षत्र के कारण बारिश मिली, वह अल्लाह के प्रति अविश्वास व्यक्त करने वाला और नक्षत्र पर विश्वास रखने वाला है। याद रहे कि इस तरह से नक्षत्र की ओर बारिश की निस्बत करना छोटा कुफ़्र है, क्योंकि अल्लाह ने नक्षत्र को बारिश का शरई एवं सांसारिक सबब नहीं बनाया है। लेकिन जिसने बारिश होने आदि लौकिक घटनाओं का संबंध यह समझकर नक्षत्रों के निकलने या डूबने की से जोड़ा कि यही वास्तविक कारक हैं, तो वह बड़ा कुफ़्र करने वाला है।

फ़ायदे
  1. बारिश होने के बाद यह कहना मुसतहब है कि हमें अल्लाह के अनुग्रह और उसकी रहमत से बारिश मिली।
  2. जिसने बारिश बरसाने आदि घटनाओं का संबंध नक्षत्रों से जोड़ा और उनको इन घटनाओं का कारक माना, उसने बड़ा कुफ़्र किया। लेकिन अगर उसे केवल सबब माना, तो उसने छोटा शिर्क किया, क्योंकि यह न तो शरई सबब है और न भौतिक।
  3. नेमत की जब नाशुक्री हो, तो वह अविश्वास का सबब बन जाती है और जब उसका शुक्र अदा किया जाए, तो वह ईमान का सबब बन जाती है।
  4. यह कहना मना है कि हमें अमुक नक्षत्र के कारण बारिश मिली, चाहे इससे मुराद समय ही क्यों न लिया गया हो। ऐसा दरअसल शिर्क का द्वार बंद करने के लिए किया गया है।
  5. नेमतों की प्राप्ति और अप्रिय चीज़ों से बचाव के संबंध में दिल का संबंध अल्लाह से होना ज़रूरी है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 169) (846)، صحيح مسلم (1/ 83) (71)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (2/ 484)، المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (1/ 260).

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मैं हौज़ (तालाब) के पास ही रहूँगा, ताकि देख सकूँ कि तुममें से कौन-कौन मेरे पास पानी पीने आता है। कुछ लोगों को मेरे पास आने से रोक दिया जाएगा, तो मैं कहूँगा कि ऐ मेरे रब! ये मेरे तथा मेरी उम्मत के लोग हैं

عَنْ أَسْمَاءَ بِنْتِ أَبِي بَكْرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا، قَالَتْ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِنِّي عَلَى الحَوْضِ حَتَّى أَنْظُرَ مَنْ يَرِدُ عَلَيَّ مِنْكُمْ، وَسَيُؤْخَذُ نَاسٌ دُونِي، فَأَقُولُ: يَا رَبِّ مِنِّي وَمِنْ أُمَّتِي، فَيُقَالُ: هَلْ شَعَرْتَ مَا عَمِلُوا بَعْدَكَ، وَاللَّهِ مَا بَرِحُوا يَرْجِعُونَ عَلَى أَعْقَابِهِمْ».
असमा बिंत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, उन्होंने कहा कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मैं हौज़ (तालाब) के पास ही रहूँगा, ताकि देख सकूँ कि तुममें से कौन-कौन मेरे पास पानी पीने आता है। कुछ लोगों को मेरे पास आने से रोक दिया जाएगा, तो मैं कहूँगा कि ऐ मेरे रब! ये मेरे तथा मेरी उम्मत के लोग हैं।" चुनांचे कहा जाएगा : क्या तुम्हें मालूम है कि इन लोगों ने तुम्हारे बाद क्या अमल क्या है? अल्लाह की क़सम, ये लोग अपनी एड़ियों के बल (आपके दीन से) लौटते रहे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि क़यामत के दिन आप अपने हौज़ (तालाब) के पास ही होंगे, ताकि देख सकें कि आपकी उम्मत के कौन-कौन लोग आपके हौज़ पर पानी पीने आ रहे हैं। उस दिन कुछ लोगों को आपके पास आने से रोक दिया जाएगा। यह देख आप कहेंगे कि ऐ मेरे रब! ये मेरे और मेरी उम्मत के लोग हैं। इसपर कहा जाएगा : क्या आप जानते हैं कि इन लोगों ने आपसे जुदा होने के बाद क्या किया है? अल्लाह की क़सम, ये लोग लगातार ऐड़ियों के बल पीछे लौटते रहे और अपने दीन से दूर जाते रहे। इसलिए ये न तो आपके लोग हैं और न आपकी उम्मत के लोग।

फ़ायदे
  1. अपनी उम्मत पर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की कृपा और उनको बचाने के प्रति आपकी तत्परता।
  2. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शिक्षाओं की मुख़ालफ़त करने का नुक़सान।
  3. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत को मज़बूती से पकड़े रहने की प्रेरणा।
हवाला

صحيح البخاري (8/ 121) (6593)، صحيح مسلم (4/ 1793) (2292)، عمدة القاري (23/144)، البحر المحيط الثجاج (37/322).

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com