कुछ सहाबा ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा कि क्या हम क़यामत के दिन अपने प्रभु को देख सकेंगे? तो आपने उनसे प्रश्न किया : "क्या तुम्हें दोपहर के समय, जब सूरज बादलों में न हो, उसे देखने में कोई कठिनाई होती है?" यानी जब सूरज बीच आकाश में हो, उसका प्रकाश चारों ओर फैला हुआ हो और आकाश में कहीं कोई बादल न हो, उस समय तुम्हें लोगों की भीड़-भाड़ की वजह से सूरज को देखने में कोई कठिनाई होती है? सहाबा ने नहीं में इसका उत्तर दिया, तो फ़रमाया : "क्या तुम्हें चौदहवीं की रात को, चाँद को देखने में, जबकि वह बादलों में न हो, कोई कठिनाई होती है?" यानी क्या पूरे चाँद की रात को, जब चाँद हर तरफ़ रोशनी बिखेर रहा हो और आकाश में कोई बादल भी न हो, उस समय तुम्हें लोगों की भीड़-भाड़ के कारण उसे देखने में कोई कष्ट होता है? इसका उत्तर भी जब सहाबा ने नहीं में दिया, तो फ़रमाया : "उसकी क़सम, जिसके हाथ में मेरी जान है, तुम्हें अपने रब को देखने में कोई कठिनाई नहीं होगी, जिस तरह इन दोनों में से किसी को देखने में कोई कठिनाई नहीं होती है।" यानी उसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकेगा। उसे देखने में न कोई आपसी झगड़ा होगा और न संदेह कि उसके बारे में लोग एक-दूसरे का विरोध करें और एक-दूसरे को झुठलाएँ। बिल्कुल वैसे ही, जिस तरह सूरज एवं चाँद को देखने में कोई संदेह नहीं होता और कोई झगड़ा नहीं होता। इस तरह यहाँ समानता स्पष्टता के दृष्टिकोण से देखने में दिखाई गई है और बताया गया है कि दोनों स्थानों में देखना संदेह के दायरे से बाहर है। न सारी कैफ़ियतों में कोई संदेह है और न देखी जाने वाली वस्तु में। क्योंकि पवित्र अल्लाह सृष्टि की समानता से पाक है। फिर अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने आख़िरत के दिन के एक दृश्य के बारे में बताया है। दृश्य यह है कि अल्लाह अपने एक बंदे से मिलेगा और उससे अपने नेमतों का एतराफ़ कराते हुए कहेगा : ऐ अमुक बंदे! क्या मैंने तुझे श्रेष्ठता प्रदान नहीं की थी, अपनी जाति का सरदार नहीं बनाया था, तुम्हारी ही जाति की पत्नी प्रदान नहीं की और फिर तुम्हें उसपर प्राबल्य प्रदान नहीं किया, तुम्हारे और उनके बीच प्रेम, दया और मोहब्बत नहीं बनाई, तुम्हारी सेवा में घोड़ों और ऊँटों को नहीं लगाया, तुम्हें अपनी जाति का प्रधान बनाकर ग़नीमत का एक चौथाई भाग देने का अधिकार नहीं दिया, जिसे अज्ञान काल के राजा अपने लिए लिया करते थे? जब बंदा इन सारी नेमतों का एतराफ़ करेगा, तो अल्लाह कहेगा : क्या तू जानता था कि तुझे मुझसे मिलना है? वह नहीं में उत्तर देगा, तो उच्च एवं महान अल्लाह फ़रमाएगा : "जा, मैं तुझे भुला देता हूँ, जिस तरह तू ने मुझे भुला रखा था।" यानी आज मैं तुझे अपनी अनुकंपा से वंचित करता हूँ, जिस तरह तू ने दुनिया में मेरी इबादत से गुरेज़ किया था। यहाँ भुलाने से मुराद जान-बूझकर छोड़ना है। जैसा कि उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है : "हमने (भी) तुम्हें भुला दिया है। चखो, सदा की यातना।" फिर अल्लाह दूसरे बंदे से मिलेगा। फिर अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उसी प्रकार के वार्तालाप का ज़िक्र किया, जिस प्रकार की वार्तालाप पहले बंदे और अल्लाह के बीच हुई थी। फिर तीसरे बंदे से मिलेगा और उससे भी इसी प्रकार की बात कहेगा, तो वह कहेगा कि ऐ मेरे पालनहार! मैं तुझपर, तेरी किताब और तेरे रसूलों पर ईमान लाया, नमाज़ पढ़ी, रोज़ा रखा और सदक़ा किया। इस तरह वह जहाँ तक उससे बन सकेगा अपनी प्रशंसा करेगा। इसपर अल्लाह कहेगा : "यह बात है तो ज़रा यहीं ठहरना।" यानी जब तूने इस प्रकार अपनी प्रशंसा की है, तो यहाँ रुके रहो, ताकि हम गवाह प्रस्तुत कर तुम्हें तुम्हारे कर्म दिखा सकें। फिर उससे कहा जाएगा : अब हम तुम्हारे विरुद्ध गवाह सामने लाने जा रहे हैं। ऐसे में बंदा अपने मन में कहेगा कि भला मेरे विरुद्ध गवाही कौन दे सकता है? इसपर अल्लाह उसके मुँह पर मुहर लगा देगा और उसकी रान, मांस और हड्डियों से कहा जाएगा कि तुम बोलो। अतः उसकी रान, मांस और हड्डियाँ उसके कर्मों को उजागर करने लगेंगी। "ऐसा इसलिए किया जाएगा, ताकि उसका कोई बहाना बाक़ी न रहे।" यानी उसके शरीर के अंगों को बोलने की शक्ति इसलिए प्रदान की जाएगी और उनसे गुनाहों का एतराफ़ इसलिए करवाया जाएगा, ताकि उसके पास कोई बहाना न रहे। यह तीसरा बंदा मुनाफ़िक़ है, जो अल्लाह के क्रोध का अधिकारी है।
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